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Magazine - Year 1964 - Version 2

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उपासना बिना कल्याण नहीं

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चन्द्रमा तब चमकता है जब उस पर सूर्य चमकता है। जब वह चमक उसे प्राप्त नहीं होती है तो अमावस्या के दिन यथास्थान रहते हुए भी उसका अस्तित्व लुप्त प्रायः ही रहता है। होते हुए भी न होने जैसी स्थिति उसकी रहती है। पृथ्वी के उतने भाग में दिन रहता है जितने पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं। जितने भाग पर वे नहीं चमकती वहीं घोर अन्धकार छाया रहता है, और हाथों-हाथ सूझ नहीं पड़ता। यही बात आत्मा के सम्बन्ध में है। उस पर जब परमात्मा का प्रकाश चमकता है जो उज्ज्वल और दीप्तिमान दीखता है और जब वह चमक बन्द हो जाती है तो मानव शरीर धारी एक निकृष्ट नर-पशु के रूप में एक घृणित एवं निकम्मा अस्तित्व मात्र ही दृष्टि गोचर होता है। परमात्मा से दूर रहने वालों मनुष्य बहुधा मनुष्यता से रहित ही पाये जाते हैं।

आत्मा, परमात्मा का एक अंश मात्र है। उसे जो कुछ शक्ति और प्रतिभा प्राप्त है ईश्वर की ही विभूति है। जिसमें वह विभूति जितनी कम पड़ जाती है वह उतना ही दीन-हीन बना रहता है। शक्ति का स्रोत जिस उद्गम से प्रवाहित होता है उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेने से सामान्य जीव को भी शक्ति का पुँज बनने में देर नहीं लगती। बिजलीघर के साथ जुड़े हुए पतले-पतले तार अपने भीतर इतनी शक्ति धारण कर लेते हैं कि उनके द्वारा सैकड़ों घोड़ों की शक्ति वाली मशीनें धड़-धड़ाती हुई चलने लगती हैं। उनको स्पर्श करने वाले बल्ब अन्धेरी रात को दिन जैसा प्रकाशवान बना देते हैं। बिजली घर से जब तक सम्बन्ध है तभी तक उन तारों में यह विभूति रहती है कि उनके स्पर्श से चमत्कार उत्पन्न हो सके जब वह सम्बन्ध कट जाता है, तारों को बिजली घर के विद्युत भण्डार की धारा का प्रवाह मिलना रुक जाता है तो फिर उनका कोई महत्व नहीं रह जाता। देखने से पहले जैसा लगने पर भी वे न प्रकाश उत्पन्न करते हैं और न मशीनें चला पाते हैं। तार का मूल्य बिजली घर से सम्बन्ध होने के कारण हो तो या, वह टूट गया तो फिर उसकी महत्ता कहाँ स्थिर रह सकती थीं?

आत्मा के द्वारा अनेक लौकिक और पारलौकिक प्रयोजन पूर्ण किये जाते हैं। अनेकों सफलता और समृद्धियों को प्राप्त करने का श्रेय आत्म-बल को ही दिया जा सकता है। शरीर की दृष्टि से सब मनुष्य लगभग समान होते हैं। देह के बल पुञ्जों में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। फिर भी मनुष्य-मनुष्य के बीच जमीन आसमान का अन्तर पाया जाता है। एक भीरु है तो दूसरा दुस्साहसी। एक दुष्ट है तो दूसरा महात्मा। एक तृष्णा वासना की मृग मरीचिका में भटकता है, दूसरा आनन्द और उल्लास की परितृप्ति का रसास्वादन करता है। एक के उद्वेग और शोक सन्ताप का ठिकाना नहीं, दूसरे को सन्तोष की शान्ति आह्लादित किये रहती है। एक को सम्पूज्य और दूसरे को तिरस्कृत देखते हैं। एक प्रगति की ओर बढ़ रहा है तो दूसरा पतन के गर्त में गिरता ही चला जा रहा है। इस प्रकार के असाधारण अन्तर मनुष्य की आन्तरिक आत्मिक स्थिति की भिन्नता के कारण ही उत्पन्न होते हैं।

आत्म-बल संसार के सब बलों से श्रेष्ठ है। धन-बल, शरीर-बल, बुद्धि-बल, संख्याबल आदि अनेक बलों के द्वारा मनुष्यों को विविध प्रकार की सफलताएँ मिलती हैं पर उन सबके मूल में आत्म-बल की ही प्रधानता रहती है। उसके अभाव में अन्य सब बल बालू की भीत की तरह अस्थिर रहते हैं। जरा-सा आघात लगते ही उनके अस्त-व्यस्त होने में देर नहीं होती। जीवन की सार्थकता आत्म-बल पर ही निर्भर रहती है। अन्य बल तो छाया मात्र हैं।

आत्मा को जब भी स्थायी बल प्राप्त होता है तब उसे वह उपलब्धि परमात्मा से ही मिली होती है। मोती समुद्र से ही निकलते हैं। उनका उपयोग कहीं भी किसी कार्य के लिए भी किया जा सकता है पर उसकी उत्पत्ति समुद्र के अतिरिक्त और कहीं नहीं होती। इसी प्रकार आत्म-बल का वरदान भी परमात्मा से प्राप्त होता है। अन्धा लाठी के सहारे अपनी मंजिल पार करता हैं। जीव भी इस पाप-ताप के अन्धकार से भरे संसार से जीवन-लक्ष प्राप्त करने की यात्रा ईश्वर का अवलम्बन करके ही पूर्ण कर सकता हैं।

परमात्मा समस्त उच्च शक्तियों और संभावनाओं का केन्द्र है। उसी भण्डार से आत्मा अपनी अभीष्ट वस्तुएँ उपलब्ध करता है। इसी अमृत को पीकर उसकी प्यास बुझती है। पपीहा तब तक तृषित ही रहता है जब तक उसे स्वाति नक्षत्र की वर्षा का जल नहीं मिलता। आत्मा भी तब तक अतृप्त ही रहती है जब तक उसे प्रभु की शरणागति प्राप्त नहीं हो जाती। नव-जात शिशु अपनी माता का पय पान करके ही जीवन धारण कर सकने में समर्थ होता है। मानवीय महानताएँ भी परमात्मा के सान्निध्य से प्राप्त होती हैं।

प्रभु की अवज्ञा करके, अहंकार में परमात्मा को विस्मरण करके अपने पुरुषार्थ के आधार पर कुछ भौतिक सम्पदाएँ भी प्राप्त की जा सकती हैं पर आन्तरिक महानता, उदार दृष्टिकोण एवं प्राणी मात्र के प्रति आत्मीयता का वरदान केवल ईश्वर की अनुकम्पा से ही मिल पाता है। बिना डोरी के पतंग की तरह जीव निरुद्देश्य दिन काटता रहता है पर जब भगवान के साथ वह अपना सम्बन्ध बना लेता है तो उसे अपने स्वरूप और लक्ष का पता चल जाता है। तब मंजिल को पूरी करने का क्रम भी वह जान लेता है और दृढ़तापूर्वक नियत दिशा में चलते हुए उन सब विभूतियों को प्राप्त कर लेता है, जिन्हें प्राप्त करने के लिए उसे वह सुर दुर्लभ मानव शरीर मिला होता है।

पाप का प्रलोभन और आपत्तियों का भय मनुष्य को पग-पग पर पथ भ्रष्ट करता है। ऐसी परिस्थितियाँ सामने आती ही रहती हैं जिनके अनुसार अनुचित मार्ग को अपना कर आकर्षक लाभ उठाया जाना सम्भव होता है। ऐसे विघ्न भी आते ही रहते हैं जो सन्मार्ग छोड़कर कुपथ अपना लेने से टल सकते हैं। आधार विहीन व्यक्ति ऐसे अवसरों पर स्थिर नहीं रह सकते, उन्हें पथ भ्रष्ट होते देर नहीं लगती। छोटे से परीक्षा अवसर सामने आने पर भी वे अपनी प्रामाणिकता खो बैठते है। धर्म और नीति की पतवार हाथ से छूट जाती है और जमाने की बहती हुई धारा में डोलती हुई उनकी नाव भी भंवर में जा फँसती हैं। उस विपत्ति से छुड़ा सकने की सामर्थ्य केवल प्रभु आश्रय में ही है। भगवान का संबल पकड़े रहने से ही जीवन अपनी रक्षा पतनकारी आँधी तूफानों से कर सकता है। इसी आश्रय को लेकर भव निधि से पार उतर सकना सम्भव होता है।

जिसने सच्चे मन से भगवान का आश्रय लिया उसे सन्मति का वरदान मिला। मति का सही दिशा में लगना न लगना ही जीवन क्रम की सफलता असफलता का आधार होता है। जिसको जीवन के सदुपयोग की चिन्ता हो गई, जिसने सत्य का, धर्म और पवित्रता का अवलम्बन ग्रहण कर लिया उसे अपने भीतर आत्म सन्तोष और बाहर से सहयोग एवं सम्मान की तरंगें उठती दिखाई देंगी और वह उसी आनन्द से निमग्न होकर मानव-जीवन की सफलता का रसास्वादन कर रहा होगा। यह अवसर ईश्वर की कृपा से ही मिलता है। पुरुषार्थ से भौतिक वैभव भले ही हमले पर आत्म-विकास के साधन तो भगवान की कृपा से ही सम्भव होते हैं। जो प्रभु के आगे अपना हृदय खोल कर रखता है उनकी करुणा के लिए प्यासे की तरह पुकारता है उसे निश्चय ही अतृप्त नहीं रहना पड़ता।

कुतुबनुमा की सुई उत्तर की ओर ही मुँह करके स्थिर रहती है जब तक उसे दूसरी दिशाओं में घुमाया जाता रहेगा तब तक वह अस्थिर ही बनी रहेगी। स्थिरता तब आती है जब आधार का सही आश्रय मिल जाता है। आत्मा का लक्ष परमात्मा की प्राप्ति है, जब तक यह दिशा प्राप्त नहीं होती तब तक अस्थिरता, उद्विग्नता, चंचलता एवं अशान्ति नहीं बनी रहती है। पर जब लक्ष की दिशा में पग उठने लगते हैं, परमात्मा को प्राप्त करने की लगन लग लाती है, तब उस प्रयत्न का प्रत्येक चरण जीवात्मा के लिए शान्ति का सृजन करने लगता है।

जीव स्वयं तो निर्बल, तुच्छ है। उसे विशालता और महानता परमात्मा के सान्निध्य से ही उपलब्ध होती है। इसके लिए जो प्रयत्न करता है वही बुद्धिमान है। दूरदर्शिता की एकमात्र कसौटी यह है कि अपने सुदूर भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए भावना उठे, विचारणा चले और क्रिया आरम्भ हो। जानते, समझते और चाहते हुए भी वह हो नहीं पाता। पैर कदम-कदम पर डगमगाते हैं। विपन्नताएँ मार्ग रोक कर खड़ी होती हैं, विभीषिकाएँ निराश करती हैं और साँसारिक आकर्षणों का जाल अपने बन्धनों में कसकर बाँध लेता है। इस कुचक्र में फँसा हुआ जीव कुछ कर नहीं पाता। श्रेय प्राप्ति का उद्देश्य प्रेय की उलझन में ही फँसा रह जाता है। इस चक्रव्यूह से उद्धार केवल भगवान की कृपा से ही हो सकता है और यह सब मिलती है जब भक्त सच्चे मन से आतुर होकर भगवान को पुकारता है।

प्रार्थना में बड़ी शक्ति है। वह भगवान को भक्त के समीप खींच लाती है या भक्त को भगवान तक पहुँचा देती है। सच्चे मन से की हुई, अन्तरात्मा की आते पुकार कभी अनसुनी नहीं की जा सकती। भगवान उसे सुनते हैं और पूरा करते हैं। शर्त एक ही है-प्रार्थना सच्ची होनी चाहिए। सच्ची प्रार्थना का अर्थ हैं आत्म-कल्याण के लिए पाप-तापों से, प्रलोभन आकर्षणों से बचने और सन्मार्ग पर चलने की उत्कृष्ट आकांक्षा और उसकी अभिव्यक्ति । लौकिक कष्टों की निवृत्ति और सफलताओं की प्राप्ति के लिए भावनाशील भक्त अपने भगवान को कष्ट देना उचित न समझेगा इस सम्बन्ध में तो वह अधिक से अधिक इतना ही कह सकता है कि विपत्तियों से लड़ने, प्रारब्ध कर्मों को हँसते हुए सहने और पुरुषार्थ के बल पर आवश्यक साधनों को उपार्जित करने योग्य उसे आवश्यक साहस, धैर्य और स्वभाव मिल जाय तो उतना ही पर्याप्त है।

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