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Magazine - Year 1964 - Version 2

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आत्मा की पुकार अनसुनी न करें

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आज सर्वत्र ज्ञान-विज्ञान की बड़ी लम्बी-चौड़ी बातें होती हैं। अटलाँटिक से लेकर एशिया, अफ्रीका तथा यूरोप आदि का सम्पूर्ण भूगोल पुस्तकालयों में भरा पड़ा है। पाषाण-युग से लेकर आज तक ही मानव-जाति का इतिहास मनुष्य रटे बैठा है। हजारों, लाखों ‘कार्बनिक’ एवं ‘अकार्बनिक’ रसायन तत्वों से प्रयोग-शालाओं की शीशियाँ भरी पड़ी हैं। कल-कारखानों के बोझ से धरती आसमान सभी परेशान से नजर आते हैं। जिधर आँख उठाकर देखो, साहित्य, कला, शल्य-चिकित्सा आदि के ढेरों ग्रन्थ, अगणित जानकार और असंख्य प्रयोग-शालायें आज खुली हैं। इन्हें देखते हुए मनुष्य की बौद्धिक क्षमता पर अपार आश्चर्य होता है। समझ में नहीं आता कि आखिर आदमी के दिमाग में कौन-सा जादू है जो अनेकों आश्चर्य-जनक उपकरण बनाता चला जाता है।

हजारों मील दूर तक उड़ जाने वाले पक्षियों की क्या मजाल कि एक छोटे-से हवाई जहाज को दौड़ में परास्त कर दें। जलयान निरन्तर-ही सागर की छाती पर कुहराम मचाते रहते हैं। इन्हें देखकर अन्य जलचर जीवों की क्षमता तुच्छ-सी जान पड़ने लगी है। अपने घर बैठे-बैठे हजारों मील की खबरें ऐसे सुन लेते हैं जैसे आपस में बैठे बात-चीत कर रहे हों। आज जैसी प्रकाशन आदि की सुविधायें यदि प्राचीन युग में भी सम्भव रही होती तो शायद उसी समय विश्व-फिरने तक, बोलने बात करने से लेकर गाने-बजाने तक के जो भी आविष्कार आज मनुष्य ने कर लिये हैं उन्हें देखकर दाँतों तले उँगली दबाना पड़ता हैं कि आखिर मनुष्य में इतनी बड़ी क्षमता का प्रादुर्भाव कहाँ से और कैसे हुआ?

किंतु जब एक क्षण इस मशीनी दुनिया से ध्यान हटाकर व्यावहारिक जगत की ओर देखते हैं, साधनों के साथ सुख और शाँति की तुलना करने बैठते हैं तो भारी निराशा होती है। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिये मनुष्य ने इतनी सारी सुविधायें जुटाई वह उद्देश्य अभी तक अधूरा पड़ा है। अभी तक इन्सान अपनी मंजिल की ओर सही कदम नहीं बढ़ा रहा है। आज एक ओर सभ्यता के विकास का प्रतिपादन किया जाता है किन्तु दूसरी ओर मनुजता आहें भरती है। नाना आभूषणों वस्त्रालंकारों से आदमी अपने शरीर को सजाता हैं पर दूसरी ओर वासना की महामारी फैली है। एक ओर आमोद-प्रमोद चलता है, दूसरी ओर शोषण अपहरण की चक्की में आदमी पिसा जा रहा है। शिक्षा सभ्यता के विकास के लिये हजारों स्कूल खोले जा रहे हैं किंतु दूसरी ओर वे ही सुशिक्षित उद्धतता एवं अनाचार का सृजन कर रहे होते हैं।

इससे अलग एक और संसार है। सत्य का संसार या आध्यात्मिक आस्था की दुनिया। मनुष्य सारा जीवन अपने अहंकार के पोषण में ही गँवाता रहता है पर जब मृत्यु उसके सामने उपस्थित होती है तो उसे इस आत्मिक संसार का पता चलता है। तब ज्ञान-विज्ञान की लम्बी-चौड़ी चौकड़ी भूल जाती है। इस समय पछतावा ही हाथ लगता है। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिये यह जीवन मिला था वह तो तुच्छ बातों में गँवा दिया गया। सारा का सारा जीवन तुच्छ कामनाओं और साँसारिक गोरखधंधों में बिता दिया तो आखिरी समय क्या बन सकता है। मनुष्य भारी दिल लिये हुए इस संसार से विदा हो जाता है। यहाँ का सारा वैभव, व्यापार, वस्त्र, आभूषण, स्त्री, पुत्र सब यहीं रह जाते हैं। साथ में मात्र पश्चाताप जाता है। महान विजेता सिकन्दर ने अपनी मृत्यु के समय प्रमुख सचिव को बुलाकर एक ही आदेश दिया था “मृत्यु के बाद मेरे दोनों हाथ अर्थी से बाहर निकालकर रखना, ताकि दर्शक यह जान लें कि सिकन्दर अपने साथ कुछ नहीं ले गया।”मृत्यु अपने टेढ़े हाथ राजा-रंक सभी पर फैलाती है। उससे कोई बच नहीं पाता। पर कितने आश्चर्य की बात है कि उससे निरन्तर उपेक्षा ही बरती जाती हैं। लोग आने वाली मृत्यु का कभी विचार तक नहीं करते।

मनुष्य जितना समय अपनी भौतिक उन्नतियों के लिये लगाता है उसका आधार भी यदि अपनी आत्मिक प्रगति के लिये लगाता तो अपने जीवन लक्ष्य को जरूर समझ लेता। आध्यात्मिक जीवन के शुभ परिणाम भी उसे मिलते, आत्मा परमात्मा की सम्पदाओं से वह वञ्चित न रहता। पीछे भी ऐसा हुआ है और अब भी वह सभी सम्भव है किन्तु यह सब आत्मा की उपेक्षा करते रहने से नहीं होगा। इसके लिये भी अपनी बौद्धिक क्षमता को लगाना पड़ेगा। अपना पुरुषार्थ अर्पित करना पड़ेगा। आध्यात्मिक प्रगति के लिए भी उतनी ही लगन और तत्परता की आवश्यकता है जितने से आज की आश्चर्य जनक भौतिक सफलतायें मिल सकी हैं। आध्यात्म कोई जादू नहीं जो छड़ी घुमाते ही सारे सत्परिणाम उपस्थित कर देता है, इसके लिये भी विधिवत साधना करनी पड़ती है। सुखी जीवन का आधार है प्रेम, न्याय, अपरिग्रह, सच्चरित्रता, सौहार्द सौजन्य और विवेक। इन्हें धारण करने से ही व्यक्ति दूसरी दुनिया अर्थात् आध्यात्मिक जगत में देर तक टिक सकता है। उनका अनुशीलन करने से ही उस महान उद्देश्य की पूर्ति किया जाना सम्भव है जिसके लिये मनुष्य का जन्म हुआ है। विश्वानि देव सवितुर्दुरितानि’ की भावना बनाने उसी से ही यह सम्भव है कि आध्यात्मिक दिशा में कुछ प्रगति की जा सके।

मनुष्य ने जितनी प्रगति भौतिक जगत में की है उस से भी अधिक की सम्भावना अध्यात्म में है। उसकी स्वचेतना में वह शक्ति भरी पड़ी है जिसका उत्कर्ष-जागरण किया जा सके तो इस संसार के सारे वैभव विलास तुच्छ से लगेंगे। शास्त्रकार ने लिखा है :-

यत्परं ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतनं महत्।

सुक्षात सूक्ष्मतरं नित्यम् सत्वमेव त्वमेवतत्॥

अर्थात् “सबकी आत्मा परब्रह्म परमात्मा जो विश्व से भी बड़ा है तथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है वही नित्य तत्व तुम ही और तुम भी वही हो।” यहाँ आत्मा परमात्मा की एकरूपता दर्शाते हुए दैवज्ञ आप्त पुरुषों ने स्पष्ट बता दिया परमात्मा की संज्ञा के साथ जिन शक्तियों का बोध होता है वे सब दोष रूप से आत्मा में विद्यमान हैं। इतनी महत्वपूर्ण सत्ता का अधिकारी पुरुष इतना महान अवसर प्राप्त करके भी उसकी उपेक्षा करता है तो इसे उसका दुर्भाग्य ही माना जायेगा।

दुःख और निराशा की परिस्थितियों का निर्माण अपना भौतिकवादी दृष्टि-कोण बनाने में होता है। अपने दृष्टिकोण में यदि परिवर्तन कर सके होते तो आत्मिक जगत का भी ज्ञान अवश्य मिला होता। अपने गुण कर्म स्वभाव में सत्य का अनुशीलन किया जाय तो आध्यात्मिक जगत के सत्परिणामों से भी लाभान्वित हुआ जा सकता है। आत्मा की उपेक्षा करते रहने से भौतिक सम्पदायें कभी भी सुख नहीं दे सकती। शाश्वत शान्ति की प्राप्ति अथवा जीवन लक्ष्य की सिद्धि का एक ही मार्ग है-आध्यात्मवाद। इस पर चल पाना, देर तक टिके रहना तभी सम्भव है जब आत्मा के हित की उपेक्षा न करें। उसके महत्व की समझ और प्राप्ति के लिये आज से, अभी से लग जायँ।

इस संसार में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं दिखाई देती जो देर तक टिकती जान पड़ती हो। जो वस्तु आज हैं वह कल दिखाई भी नहीं देती। आज के पहाड़ इतिहास के पन्नों में किसी समय के सागर अंकित हैं। जो पेड़ आज खड़ा दिखाई देता है कल उसकी जड़ें तक दिखाई नहीं देती। समुद्र की लहरों की भाँति यह जगत बनता बिगड़ता रहता है। कुछ यदि अमृत है-अविनाशी है तो वह आत्मा है। मनुष्य-जन्म का उद्देश्य भी यही है कि वह आत्मा के माध्यम से चिन्मय परमात्मा की प्राप्ति करे। इसी को जीवन लक्ष्य आदि अनेकों नामों से पुकारा जाता है। इसी की प्राप्ति के लिये ऋषियों ने जोर दिया है। गीताकार ने भी इसी की पुष्टि करते हुये लिखा है।-

यं लब्ध्वा च परं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन, गुरुणापि विचाल्यते॥

अर्थात् “योगी परमेश्वर की प्राप्ति रूप लाभ से अधिक लाभ कुछ भी नहीं मानता। आत्मा को प्राप्त कर लेने से दुःख चलायमान नहीं करते।” इस परम तत्व को धारण करने से जाना जाता है कहने मात्र से नहीं। बाह्य ज्ञान बौद्धिक क्षमता को बड़ा कर तद्जन्य सुख दिला सकता है पर उससे इन्द्रिय निग्रह का सुख प्राप्त करना सम्भव नहीं। बाह्य ज्ञान मात्र से श्रेय पथ पर नहीं चला जा सकता। अतः विश्व-कल्याणार्थ आत्म-ज्ञान सम्पादन अत्यावश्यक है। इसी से मानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव है अन्य कोई चारा नहीं।

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