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Magazine - Year 1966 - Version 2

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शिष्ट एवं सभ्य व्यवहार ही मनुष्य की शोभा है।

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शील एवं शिष्टता मनुष्य के मानसिक-विकास के परिचायक गुण हैं। जिस अनुपात से मनुष्य का मानसिक-विकास होता जाता है उसी अनुपात से वह पशुता से उठकर मनुष्यता की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार, एक दिन, वह शनैः शनैः बढ़ता हुआ अपने आत्म-स्वरूप तक पहुँचकर चिरन्तन सुख शान्ति का अधिकारी बन जाता है।

आत्म-स्वरूप की उपलब्धि सहसा नहीं होती। यह धीरे-धीरे क्रमपूर्वक मानसिक विकास द्वारा ही संभव होती है। शील एवं शिष्टता मनुष्य के मानसिक विकास के लक्षण हैं। इन्हीं लक्षणों द्वारा मनुष्य यह जान सकता है कि उसने कितना मानसिक विकास कर लिया है। जब कोई प्रत्येक क्षण प्रत्येक व्यक्ति के साथ यथायोग्य शीलता एवं शिष्टता का व्यवहार करने लगे तो उसे समझ लेना चाहिये कि उसका मानसिक विकास होना प्रारम्भ हो गया है। जिस दिन यह व्यवहार औरों के साथ रहने के अतिरिक्त अपनी आत्मा और आत्मा से बढ़कर समस्त जड़ चेतन के साथ होने लगे तो समझ लेना चाहिये कि अब हम आत्म-स्वरूप की परिधि के पास पहुँचने लगे हैं।

मनोविकास का अर्थ है—मनोविकारों का दूर होना। काम, क्रोध, मद, लोभ आदि विकार जितनी मात्रा में कम होते जाते हैं, उतनी ही मात्रा में मनोविकास होता जाता है। दुःशीलता एवं अशिष्टता के कारण भी ये मनोविकार ही हैं। काम मनुष्य को शील-रहित बना देता है। एक बार उसकी कामजन्य दुःशीलता अन्य किसी पर प्रकट नहीं होती तो अपनी आत्मा पर तो प्रकट हो ही जाती है। वह अपनी आत्मा के प्रति तो अशिष्ट एवं असभ्य हो ही जाता है। कामनाओं के रूप में जो काम मनुष्य में तीव्रता एवं लिप्सा उत्पन्न कर देता है। इससे मनुष्य में छल-कपट, शोषण, अपहरण आदि के दोष उत्पन्न हो जाते हैं।

क्रोध तो मनुष्य को एक प्रकार से सामयिक पागल ही बना देता है। क्रोध होने पर मनुष्य शिष्टता तथा सभ्यता की सारी सीमायें तक भूल जाता है। वह न कहने योग्य बातें कहने और न करने योग्य काम कर बैठता है। क्रोध में लोग छोटों के साथ तो दुर्व्यवहार करते ही हैं बड़ों के साथ भी अशिष्टता का व्यवहार कर बैठते हैं। क्रोध में मनुष्य बड़ों का बड़प्पन और आदरणीयों की गुरुता का भी मान नहीं करता। लोग अपने बड़े भाइयों यहाँ, तक कि माता-पिता तक को भी बुरा भला कहने लगते हैं क्रोध, धृष्टता एवं अशिष्टता का बहुत बड़ा कारण है।

मद मनुष्य को संसार में किसी को भी शालीन व्यवहार के योग्य नहीं समझने देता। मद का नशा क्रोध के वेग से अधिक बुरा होता है। जिसे धन वैभव रूप यौवन शक्ति , बल अथवा अधिकारों का अहंकार रहता है वह सचराचर जगत को तृणवत् ही समझा करता है। किसी से सीधे मुँह बात करना तो वह जानता ही नहीं। अहंकार मद से मतवाले व्यक्ति बहुधा दया, क्षमा, सहानुभूति एवं संवेदना जैसे मानवी गुणों को तिलाँजलि दे देते हैं। जरा-सी प्रतिकूलता पाकर अहंकारी व्यक्ति आपे से बाहर हो जाता है और बड़े-बड़े अनर्थ कर डालने पर उतर आता है। अनाचार, अत्याचार तथा अनीति आदिक दोष प्रायः अहंकार से ही जन्म पाते हैं। अहंकार मनुष्य को आततायी भी बना देता है। वह अपने दम्भ की तुष्टि में दूसरों की सुख-सुविधा का भी ध्यान नहीं रखता। वह अपनी प्रसन्नता के स्वार्थ में यह तक विचार नहीं कर पाता कि मेरे अमुक व्यवहार से अमुक व्यक्ति को अमुक कष्ट, दुःख अथवा क्लेश हो सकता है। अहंकारी एक अपने को प्रसन्न करने के लिये हजारों पर अत्याचार करने, उनका अधिकार छीनने में संकोच नहीं करता। अहंकार जैसा भयानक रोग मनुष्य को किस सीमा तक शील एवं शिष्टता से दूर हटा सकता है इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

लोभ भी मनुष्य को स्वार्थी, संकीर्ण, निष्ठुर एवं क्रूर बना देता है। लोभी की तृष्णायें भयानक रूप से बढ़ जाती हैं। संसार की सारी दौलत पाकर भी लोभी की वित्तेषणा पूरी नहीं होती। बहुत कुछ पास होने पर भी लोभी की “और” नामक रट लगी ही रहती है। लोभी को जहाँ अपने लिये वस्तुओं की स्पृहा होती है वहाँ दूसरे की चीजों के प्रति बड़ी डाह होती है। वह यही चाहता है कि जो वस्तु मेरे पास है वह किसी दूसरे के पास न हो और यदि किसी के पास है तो मुझे मिल जानी चाहिये। संसार को विपन्न कर स्वयं सम्पन्न बनने की इच्छा लोभी की सहज स्वाभाविक मानसिक दुर्बलता होती है। अपने स्वार्थ-साधन अथवा लिप्सा की पूर्ति में लोभी कपटपूर्ण व्यवहार करने में भी नहीं चूकता। वह झूठ बोलकर आडम्बर बनाकर लोगों को ठगा ही करता है। अपने स्वार्थ के लिये वह किसी के साथ भी क्रूरता का व्यवहार कर सकता है। लोभी व्यक्ति धनी, निर्धन, सबल निर्बल, स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध किसी का भी सम्मान करना नहीं जानता। दया, दाक्षिण्य, सहायता, सहयोग, सहानुभूति एवं संवेदना, सद्व्यवहार मानों उसके शब्द कोष में नहीं होते। लालची व्यक्ति पराकाष्ठा तक कृपण होता है। वह किसी क्षुधार्त को भूखा मरते आँखों देख सकता है, किन्तु उसका पाषाण हृदय उसे एक बार भोजन कराना स्वीकार नहीं करेगा। एक पैसे के लिये किसी का बड़े से बड़ा काम बिगड़ते देख सकता है किन्तु एक पैसा देना स्वीकार नहीं करेगा। लोभी व्यक्ति तो अशिष्टता एवं अभद्रता का जीता जागता नमूना ही होता है।

इस प्रकार के मानसिक विकारों के रहते हुये कोई किस प्रकार अपना मानसिक विकास कर सकता है, और मानसिक विकास के अभाव में उसका आत्म स्वरूप की ओर बढ़ सकना सम्भव न होगा। अतएव आवश्यक है कि मनुष्य अपने मानसिक विकारों को दूर करे उन पर विजय प्राप्त करे और चिर साध्य सच्ची सुख-शाँति का अधिकारी बने।

मनोविकारों पर विजय पाने का साधारण-सा उपाय है—अपने अन्दर सभ्यता, शिष्टता तथा नम्रता का भाव उत्पन्न करना है। शिष्टता में एक अनुपम मिठास रहती है। एक बार का शिष्ट व्यवहार अपनी मधुरता से अनेक बार शिष्टता का व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है। जो सुशील है, सभ्य एवं शिष्ट है वह न केवल औरों को ही सुखी एवं शीतल बनाता है बल्कि अपने को भी सुखी बनाता है। शील एवं शिष्टता दैवी गुण हैं। इनका अवतरण कर लेने से मनुष्य सहज ही मानसिक विकास की ओर बढ़ने लगता है। अपने मनोविकास के लिये एक सच्चे, शिष्ट तथा शालीन व्यक्ति को किसी तप साधना अथवा पूजा अर्चना की जरूरत नहीं पड़ती। शिष्ट व्यवहार स्वयं ही अपने में एक पूजा है, एक उपासना है। एक उपासक तो केवल एक ईश्वर की कल्पना करके उसकी पूजा किया करता है, उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न किया करता है, किन्तु एक नम्र एवं शिष्ट व्यक्ति न जाने कितने मनुष्यों की आत्मा प्रसन्न किया करता है जो कि ईश्वर का ही अंश होती है। उपासक एक देव की पूजा करता है और शिष्ट व्यक्ति अपने शालीन व्यवहार से सार्वजनिक विराट भगवान की पूजा किया करता है शिष्ट व्यवहार को केवल व्यवहार नहीं पूजा के भाव से ही देखना चाहिये।

भगवान की बनाई हुई चराचरमय सारी सृष्टि अपने युक्त व्यवहार से ही सुरक्षित एवं शाश्वत बनी हुई है। सृष्टि में अयुक्तता आते ही प्रलय एवं विनाश की सम्भावना उपस्थित हो जाती है। मनुष्य में जब तक शिष्टता एवं सभ्यता का उदय नहीं हुआ वह भी पशुओं की कोटि में बना रहा और उन्हीं की तरह जंगली जीवन व्यतीत करता रहा। ज्यों-ज्यों उसमें सभ्यता एवं शिष्टता की वृद्धि होती गई, उसका मनोविकास होता गया तो वह आज की उन्नत स्थिति में पहुँच सका। अपने सभ्यता एवं शिष्टता के जिन गुणों के आधार पर मनुष्य पशुता से वास्तविक मनुष्यता में आ सका है उसका त्याग कर देने से स्वाभाविक है कि वह अपनी आदिम अवस्था में वापस जाने लगे। आज भी जो व्यक्ति अश्लील, अशिष्ट अथवा असभ्य व्यवहार किया करता है उसे लोग नर-पशु ही मानते हैं। यह शील एवं शिष्टता का ही चमत्कार है कि मनुष्य पारस्परिक सहयोग एवं सहायता से अपने जीवन में इतनी सुख-सुविधाओं का समावेश कर सका है। यदि जंगलियों की तरह वे एक दूसरे से अशिष्ट तथा अभद्र व्यवहार करते रहे होते तो कैसे वो मिल-जुल कर रहते? कैसे मिलकर खेती तथा व्यवसाय करते? और कैसे मिल जुलकर विचार विमर्श करते हुये सभ्यता एवं संस्कृति का विकास कर पाते?

आत्मिक उन्नति के साथ-साथ शील एवं शिष्टता भौतिक उन्नति का भी आधार है। जो अशिष्ट है, असभ्य अथवा शील रहित है वह जीव जीवन में किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकता। नौकरी, व्यवसाय आदि किसी भी क्षेत्र में किसी धृष्ट की सफलता का कोई उदाहरण आज तक नहीं पाया है। धृष्ट अथवा अशिष्ट व्यक्ति को कोई भी पसन्द नहीं करता और न कोई उससे सहयोग ही करना चाहेगा। मनुष्य के बड़े से बड़े गुण, बड़ी से बड़ी क्षमतायें अशिष्टता के दोष से दूषित होकर नष्ट हो जाती हैं। बहुत कुछ उपयोगी होने पर भी दुष्ट अथवा दुर्मुख व्यक्ति के पास कोई जाना तक पसन्द नहीं करेगा। अशिष्ट व्यक्ति एक प्रकार से समाज से बहिष्कृत ही रहता है।

धृष्ट अथवा अशिष्ट विद्यार्थी बहुत कम सफल होते हैं। कर्कशा पत्नी कभी भी पति का प्यार नहीं पा सकती और कठोर पति कभी भी गृहस्थी की सुख-शाँति नसीब नहीं कर सकता। धृष्ट तथा अशिष्ट बच्चे और तो और स्वयं अपने माता-पिता के लिये भी घृणा के पात्र बन जाते हैं। असफलता एवं अशाँति अशिष्टता एवं असभ्यता का सुनिश्चित परिणाम है।

इसके विपरित विनम्रता, मधुरता, शिष्टता एवं सभ्यता पूर्ण व्यवहार मनुष्य को सफलता के उच्च शिखर पर पहुँचा देने में सक्षम होते हैं। निर्धन होने पर भी शिष्ट विद्यार्थी की शिक्षा रुकने नहीं पाती। किसी नौकरी में शिष्टता एक बार योग्यता की कमी को भी पूरा कर देती है। जो स्वयं सही मायनों में शिष्ट एवं सभ्य है उसे किसी काम के लिये किसी की सिफारिश की आवश्यकता नहीं पड़ती। विनम्रता एवं मधुरता क्रूर से क्रूर शत्रु को जीत लिया करते हैं। सहयोग, सहायता एवं सहानुभूति शिष्ट एवं शीलवान व्यक्ति की विरासत ही माननी चाहिये। घर बाहर, देश परदेश, कहीं भी क्यों न रहे विनम्रता एवं शिष्टता मनुष्य को मित्र की तरह हर जगह सहायता करती रहती है। विनम्र व्यवहार विरोधों के बीच भी अपना मार्ग बना लिया करता है।

जो शिष्ट एवं सभ्य होता है वह सहिष्णु भी होता है। शिष्ट दूसरे से तो दुखदायी व्यवहार नहीं करता है यदि उसके साथ भी दुःखद व्यवहार किया जाता है तब भी वह अधिक दुखी नहीं होता। न तो उस पर कोई अप्रिय प्रतिक्रिया होती है और न उसे क्रोध ही आता है। विपरित व्यवहार में भी उसकी मनः शाँति अक्षुण्ण बनी रहती है। बदले में बुरा व्यवहार न करके वह अपने धृष्ट विरोधी को भी लज्जित कर देता है। शिष्ट एवं सभ्य के सम्मुख संघर्ष की परिस्थितियाँ बहुत कम आती हैं और यदि आती भी हैं तो वे उलझकर अधिक भयानक नहीं बनने पातीं। वह बिना किसी हानि के उन्हें सुलझा लिया करता है। इस प्रकार कोई भी शिष्ट एवं सभ्य व्यक्ति सदा ही संघर्षहीन, निर्द्वन्द्व एवं सौहार्द्रता पूर्ण सुख शाँति का जीवन व्यतीत किया करता है। मनुष्य को चाहिये कि वह स्थायी सुख शाँति के लिये विकारों को दबाकर शिष्ट एवं सभ्य बने तथा शिष्ट एवं सभ्य व्यवहार के अभ्यास से विकारों पर विजय प्राप्त करें।

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