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Magazine - Year 1966 - Version 2

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आस्तिकता का स्वरूप एवं प्रतिफल

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आस्तिकता का अर्थ है ईश्वर को मानना, मानने का अर्थ है उसका अनुयायी होना और अनुयायी होने का तात्पर्य है उसके विचार, निर्देश एवं आदर्श के अनुसार चलना। जो अपने को आस्तिक मानता है उसे यह भी मानना होगा कि वह परम प्रभु परमात्मा का अनुयायी है, उसका प्रतिनिधि है, उसका ऐसा प्रतिबिम्ब है जिसको देखकर परमात्मा के स्वरूप तथा उसके गुण तथा विशेषताओं का आभास पाया जा सकता है। परमात्मा में विश्वास करते हुए भी अपनी रीति-नीति उसके अनुरूप नहीं बनाता, पवित्र एवं उन्नत आत्मा नहीं बनता वह धृष्ट, विद्रोही तथा प्रच्छन्न नास्तिक है।

आस्तिकता स्वयं में ही एक उदात भावना है जिसे हर मनुष्य को अपने में विकसित करना ही चाहिये। उस परमात्मा को मानना, उसमें विश्वास करना, मनुष्य का परम-पावन कर्तव्य है जिसने चिदानन्द का साधन यह समर्थ जीवन दिया है, एक से बढ़कर विशेषतायें एवं क्षमतायें दी हैं। साथ ही आस्तिकता एक बहुत बड़ा सम्बल भी है आस्तिक भावना एक ऐसी अक्षय एवं अमोघ शक्ति है जिसके सहारे मनुष्य भयानक से भयानक संकट सागर को सहज में ही पार कर जाता है। संसार में किसी समय भी कोई संकट आ सकता है और ऐसी भी स्थिति हो सकती है कि उस समय उससे बचने अथवा उभरने का कोई साधन न हो, संसार के सारे मित्रों, प्रेमियों, हितैषियों ने साथ छोड़ दिया हो, ऐसी भयानक स्थिति के अवसर पर उस निरुपाय एवं असहाय मनुष्य की आस्तिकता बहुत बड़ी सहायता बन जाती है। सब ओर से निराश होकर आस्तिक व्यक्ति ईश्वर का सहारा पकड़ लेता है उसे ही अपना सब से बड़ा सहायक एवं साथी समझ लेता है।

सर्वशक्तिमान परमात्मा का अंचल पकड़ते ही उसमें आत्मबल, आत्मविश्वास तथा उत्साहपूर्ण आशा का संचार होने लगता है। प्रकाश पाते ही अन्धकार दूर हो जाता है मनुष्य में संकट सहने अथवा उसको दूर कर सकने का साहस आ जाता है। ईश्वर में अखण्ड विश्वास रखने वाला सच्चा आस्तिक जीवन में कभी हार नहीं मानता। एक तो उसे यह विश्वास रहता है कि परमात्मा जो भी सुख-दुख अनुग्रह किया करता है उसमें मनुष्य का कल्याण ही निहित रहता है। इसलिए वह किसी हर्ष, उल्लास अथवा कष्ट-क्लेश से प्रभावित नहीं होता। दूसरे परमात्मा के प्रति आस्थावान होने से उसमें संकट सहने की शक्ति बनी रहती है। आस्तिक व्यक्ति परमात्मा का नाम लेकर संकट सहना क्या उसका नाम लेकर जहर पी जाते और शूली पर चढ़ जाते हैं। मीरा, प्रहलाद, ईसा और मंसूर ऐसे ही सच्चे आस्तिक थे।

नास्तिक व्यक्ति के पास परमात्मा जैसा कोई अन्तिम सम्बल अथवा शक्ति साहस का स्रोत नहीं होता। इसलिए वह निरुपाय अथवा निस्सहायता की दशा में संकट आ जाने पर वह अस्त-व्यस्त, अशान्त एवं हताश हो जाता है। मानसिक सन्तुलन बनाये रहने के लिए उसके पास आस्तिकता के भाव जैसा कोई मानसिक आधार नहीं होता। इस अभाव में या तो वह अपने जीवन से भटक जाता है, कुमार्गगामी, सिद्धान्त-हिंसक, आदर्शहीन होकर अपनी रक्षा करता अथवा हार मानकर मैदान से हट जाता है, अथवा निराश होकर आत्महत्या तक कर लेता है। संसार में मानसिक संकटों से घबराकर विक्षिप्त होने अथवा आत्महत्या करने वालों की यदि मनःपरीक्षा सम्भव हो सके और उनके विचारों तथा विश्वासों का पता लगाया जा सके तो निश्चय ही वे नास्तिक भावना वाले निकलेंगे।

आस्तिकता न केवल बाह्य संकटों में सहायक होने वाला सम्वल अथवा सहारा है, अपितु वह आन्तरिक शत्रुओं, काम, क्रोध, मद, लोभ आदि से भी रक्षा करती है। उसका आत्मिक विश्वास रहता है कि जिस प्रकार परमपिता परमात्मा का प्रिय पुत्र, अनुयायी अथवा प्रतिबिम्ब हूँ, उसी प्रकार प्रत्येक प्राणी भी है। इस विश्वास से पुलकित सच्चा आस्तिक प्रत्येक प्राणी को अपना भाई बहन ही मानता और तदनुरूप प्रेम व्यवहार करता है। संपर्क में आने वाला जब प्रत्येक व्यक्ति अपना भाई-बहन ही है तब सच्चा आस्तिक उनसे कठोर, क्रूर अथवा छल-कपटपूर्ण व्यवहार किस प्रकार कर सकता है? वह तो सब से प्रेमपूर्ण, निश्छल एवं युक्त व्यवहार ही करेगा। बंधु भाव से प्रेरित वह प्रत्येक की सहायता करने को हर समय तैयार रहेगा। वह किसी से स्वार्थ अथवा विश्वासघात पूर्ण व्यवहार कदापि नहीं करेगा। इस प्रकार सच्चा आस्तिक सहज ही में आत्म-कल्याणकारी यज्ञ भावना का अधिकारी बन जाता है। काम, क्रोध अथवा लोभ के शत्रु तभी आक्रमण करते हैं जब मनुष्य का मन मलीन अथवा आरक्षित रहता है। आस्तिक व्यक्ति का ईश्वरीय विश्वास एवं परमात्मा की अनुभूति उसके हृदय को प्रसन्न एवं उज्ज्वल बनाने में सहायक होते हैं। उसकी भावनाओं में हर समय परमात्मा का निवास रहता है जिससे उसके सुरक्षित हृदय पर आसुरी वृत्तियाँ आक्रमण नहीं कर पाती।

आस्तिक भावना से परमात्मा का सहारा पाकर मनुष्य नितान्त निर्भय एवं निश्चिंत हो जाता है। उसके अखण्ड विश्वास के रूप में उसका साथी, मित्र, पिता तथा रक्षक हर समय उसके साथ रहता है। परमात्मा रूपी पिता अथवा रक्षक के साथ रहने पर भय अथवा चिन्ता किस बात की? संसार में ऐसा शक्तिशाली दुष्ट कौन हो सकता है जो सर्वशक्तिमान परमात्मा से रक्षित किसी आस्तिक का बाल भी बाँका कर सके। अखण्ड विश्वास के साथ जब कोई आस्तिक भूत, भविष्य, वर्तमान के साथ अपना सम्पूर्ण जीवन परमात्मा अथवा उसके उद्देश्यों को सौंप देता है, तब उसे अपने जीवन के प्रति किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रहती। तब भी यदि वह चिन्ता करता है तो समझना चाहिए कि उसने अपना दायित्व पूरी तरह से सर्वशक्तिमान को सौंपा नहीं है अथवा उसकी ईमानदारी में विश्वास नहीं करता—कि धरोहर रूप में उसके पास सौंपें हुए जीवन की वह खोज खबर लेता ही रहेगा। जो अपना सर्वस्व पूर्णरूप से परमात्मा को सौंपकर उसके उद्देश्य में नियोजित हो जाता है, पूरी तरह से उसका बन जाता है, परमात्मा उसके जीवन का सारा दायित्व खुशी-खुशी अपने ऊपर ले लेता है और कभी भी विश्वासघात नहीं करता। आत्म-समर्पण में कमी अथवा दुरभिसंधि होने पर ही उसकी ओर से उपेक्षा बरती जा सकती है अन्यथा नहीं। आस्तिक अनुभूति से परमात्मा में समाहित हो जाने पर किसी प्रकार का भय अथवा चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रहती। निश्चिंतता एवं निर्भयता में कितना अनिवर्चनीय सुख है इसको एक सच्चा आस्तिक ही अनुभव कर सकता है।

असंदिग्ध आस्तिकता ईश्वर के साथ भावनात्मक है। जब साधारण सज्जनों तथा सत्पुरुषों का संग मनुष्य को क्या बना देगा इसकी प्रसन्न कल्पना उसका संग करके ही अनुभूत की जा सकती है, कही नहीं जा सकती है।

मनोवैज्ञानिक तथ्य के अनुसार जो जिसके संसर्ग में रहता है वह उसी का अनुरूप एवं अनुभव हो जाता है। ऐसा तो तब हो जाता है जब मनुष्य बाह्य रूप में किसी के संपर्क में आता है। भावनाओं का समावेश होने पर तो यह अनुरूपता और भी अधिक गहरी होकर तदरुपता में बदल जाती है। जब साधारण लौकिक व्यक्तियों के संसर्ग का इस प्रकार प्रतिफल होता है तब उन सर्व एवं सम्पूर्ण श्रेय तथा श्रीमन्त सर्वशक्तिमान के संपर्क में आकर, सो भी भावना भूमि के स्तर पर आकर मनुष्य किस अनिर्वचनीय आत्म कल्प की दिशा में गतिमान हो उठेगा इसे उस सौभाग्यपूर्ण स्थिति में पहुँचे बिना किस प्रकार बताया जा सकता है। केवल इतना ही कहा जा सकता है कि भृंगी एवं कीट की तरह मनुष्य ईश्वर रूप ही हो जायेगा। इस कल्पनातीत एवं अन्तिम पदवी की प्रदायिनी आस्तिकता को कौन बुद्धिमान अपने अन्तर एवं अणु-अणु में ओत-प्रोत करने का प्रयत्न नहीं करेगा?

आस्तिकता सदाचार की जननी है। जो आस्तिक होगा, जो सब में और सब जगह भगवान की उपस्थिति देखेगा वह कोई दुराचार करने का साहस ही न करेगा। सदा-सर्वदा ऐसे ही कार्य करने और भावनाएँ रखने का प्रयत्न करेगा जो सच्चे आस्तिक-ईश्वर के अनुयायी के अनुरूप हों। ईश्वरीय निर्देश एवं आदर्श सत्यं, शिवं सुन्दरम् के अतिरिक्त कुछ हो ही नहीं सकता । प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, सत्य तथा सेवाभाव आस्तिक के विशेष गुण हैं। चोरी, मक्कारी, छल, कपट, ईर्ष्या-द्वेष, लोभ, मोह, काम आदि की दूषित प्रवृत्तियों से आस्तिक व्यक्ति का कोई सम्बन्ध नहीं रहता। आस्तिकता द्वारा ईश्वर से भावनात्मक संपर्क रखने वाला तो उसके अनुरूप ही अपने जीवन को उन्नत एवं उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न करेगा। आज संसार जिस शान्ति, व्यवस्था तथा सहयोग भावना की आवश्यकता अनुभव कर रहा है वह आस्तिकता द्वारा सहज ही प्राप्त हो सकता है।

यदि संसार का प्रत्येक व्यक्ति पूर्णरूप से आस्तिक होकर ईश्वरीय आदर्श पर चलने लगे तो न तो कोई किसी को सताये और न प्रवंचित करने का प्रयत्न करे। हर कोई अपनी सीमाओं में सन्तुष्ट होकर शांतिपूर्ण जीवन यापन करे। आज संसार में फैला हुआ सारा अनाचार दूसरे की सुख-सुविधा अथवा अधिकार सीमा का ध्यान नहीं रखते। यदि आज आस्तिकता का व्यापक प्रचार हो जाये लोग ईश्वर को सच्ची भावना से जानने-मानने और उससे डरने लगें तो कल ही सारे अपराधों का अन्त हो जाये और चिर वाँछित रामराज्य साकार हो उठे।

जप-तप, पूजा-पाठ लेने अथवा किसी देव प्रतिमा के सम्मुख, सिर नवा देने मात्र से ही कोई आस्तिक नहीं हो जाता। आस्तिकता का अर्थ है अपनी भावनाओं एवं क्रियाओं को उत्कृष्ट बनाना। ईश्वर में विश्वास करता हुआ और अपने को आस्तिक घोषित करता हुआ भी जो व्यक्ति साँसारिक तृष्णा, वासना का दास बना हुआ है वह आस्तिक नहीं आडम्बरी है। किसी प्रकार भी आस्तिक मानकर उसका आदर नहीं किया जा सकता। आस्तिकता का अर्थ है प्राणीमात्र में परमात्मा की झाँकी देखना और तदनुसार ही प्रत्येक का आदर करना, उसके साथ उदारता, दया और प्रेम का व्यवहार करना ही आस्तिकजनों के श्रेष्ठ लक्षण हैं।

आस्तिक भावना भक्ति रूप में परिपक्व होकर मनुष्य को कृतार्थ कर देती है। अपने को आस्तिक कहते हुए भी जिसमें भगवद्भक्ति का अभाव है वह झूठा है उसकी आस्तिकता अविश्वसनीय है। आस्तिकता के माध्यम से जिसके हृदय में भक्ति भावना का उदय हो जाता है आनन्द मग्न होकर उसका जीवन सफल हो जाता है। भक्ति का उदय होते ही मनुष्य में सुख-शांति, सन्तोष आदि के ईश्वरीय गुण फूट पड़ते हैं भक्त के पास अपने प्रियतम परमात्मा के प्रति आन्तरिक दुख, क्षोभ, ईर्ष्या-द्वेष का कोई कारण नहीं रहता। भक्त का दृष्टिकोण उदार तथा व्यापक हो जाता है। उसे संसार में प्रत्येक प्राणी से प्रेम तथा बन्धुत्व अनुभव होता है। जन-जन उसका तथा वह जन-जन का होकर लघु से विराट बन जाता है। आठों याम उसका ध्यान प्रभु में ही लगा रहता है। संसार की कोई भी बाधा-व्याधा उसे सता नहीं पाती। वह इसी शरीर में जीवन मुक्त होकर चिदानन्द का अधिकारी बन जाता है। यह है आस्तिकता की परिपक्वता का परिणाम। तब भला कौन ऐसा होगा जो भगवान से सान्निध्य, संसर्ग तथा उसकी भक्ति पाकर कृतार्थ होने के लिए सच्चा आस्तिक बनकर अपना जीवन धन्य न करना चाहेगा।

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