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Magazine - Year 1966 - Version 2

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गायत्री महाशक्ति का रत्न भण्डार किसे मिलेगा?

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विद्याह वै ब्राह्मण माजगाम गोपाय माँ शेवधिष्ठेऽहम।

—वशिष्ठ स्मृति

“ब्रह्मविद्या-गायत्री-ब्राह्मण के पास पहुँची और बोली मैं ही तेरा खजाना हूँ।”

ब्राह्मण को भौतिक जीवन में भले ही निर्धन या भाव ग्रस्त रहना पड़ता हो पर उसके पास आत्मिक सम्पन्ता इतनी प्रचुर मात्रा में होती है कि वह अपना ही नहीं सारे असंख्यों का भी कल्याण कर सकता है। अपने ही नहीं दूसरों के जीवनों को भी आनन्द एवं उल्लास से परिपूर्ण कर सकता है। स्वयं तो रोग-शोक रहित होता ही है दूसरों को भी निरामय, निःशंक, निर्भय एवं निर्मल बना सकता है। जिसके निज के पास विभूतियों का भांडागार पड़ा हो उसके लिए दूसरों की छुट-पुट सहायता कर पाना कुछ विशेष कठिन नहीं होता।

तपकल्प तत्वदर्शी ऋषियों के संपर्क एवं आशीर्वाद से अनेक का भला होते नित्य ही देखा जाता है। यह अजस्र अनुदान वितरण करने की क्षमता उस ब्राह्मण को कहाँ से मिलती है उसका रहस्योद्घाटन उपरोक्त कण्डिका में किया जाता है। ब्रह्मविद्या—गायत्री—ब्राह्मण के पास पहुँची और उसे उद्बोधन करते हुए कहा—”मैं ही तेरा खजाना हूँ।” यह खजाना जिसमें प्रत्येक स्तर की श्री समृद्धि और सफलता प्रचुर परिमाण में भरी पड़ी है। ऐसा खजाने का पता जिसे लग जाय अथवा जो उसके उपयोग का अधिकारी बन जाय उसे भला कमी रहेगी भी किस बात की। उसकी शक्ति एवं सामर्थ्य की सीमा भी क्या रहेगी? ब्राह्मण द्वारा सहना और दूसरों का असीम उपकार इसी आधार पर होता है। परा और अपरा महाशक्तियों का बीज रहस्य इसके हाथ लग गया हो उसे इस संसार की कौन सी प्रतिभूति उपलब्ध होने से बच सकती है।

महाशक्ति का यह महान भाण्डागार सब के लिए खुला नहीं है। खजाने की ताली विश्वस्त खजानची के हाथ में ही रहती है, हर कोई उसे अपने पास रखने का अधिकारी नहीं होता। उसी प्रकार गायत्री का वास्तविक एवं परिपूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को अपना ब्राह्मणत्व परिपक्व एवं परिपुष्ट करना होता है। उस महती अनुकम्पा को करतलगत करने से पूर्व इस बात की परीक्षा देनी होती है कि वह ब्राह्मण है या नहीं? जो इस कसौटी पर खरा उतरता है उसे गायत्री महाशक्ति का साक्षात्कार होता है और वह सब कुछ मिल जाता है जो भगवती के पास है।

गायत्री उपासना का छुट-पुट लाभ कोई भी उठा सकता है। सकाम उपासनाएं, बीज मन्त्रों का प्रभाव, अनुष्ठान एवं पुरश्चरणों की शृंखला अपने ढंग के लाभ प्रदान करती रहती है, उनके द्वारा साधक के छुट-पुट कष्ट दूर होने एवं अभीष्ट सफलताऐं प्राप्त होने का क्रम चलता रहता है। ऐसे लाभ और चमत्कार आये दिन देखने को मिलते रहते हैं, पर यह सब हैं छोटे स्तर की वस्तुऐं। अमुक कष्ट को दूर कर लेना या अमुक सफलता को प्राप्त कर लेना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा लाभ तो भौतिक प्रयत्नों से भी प्राप्त किया जा सकता है। उपासना का लाभ तो अन्तरात्मा को अनन्त सामर्थ्य से भर देता और चन्दन वृक्ष की तरह स्वयं ही सुगन्धित होने के साथ-साथ समीपवर्त्ती झाड़-झंखाड़ों को भी अपने ही समान सुरभित कर देता है। ऐसा उच्चस्तरीय लाभ प्राप्त करने के लिए मनुष्य को ब्राह्मणत्व के अनुरूप गुण-कर्म, स्वभाव अपने में उत्पन्न करने पड़ते हैं। तभी वह खजाना मिलता है, जिसके लिए ब्रह्मविद्या ने ब्राह्मण का उद्बोधन करते हुए उसे उस महान भांडागार को हस्तगत कर लेने की प्रेरणा की है। गायत्री महामंत्र में जिन देवशक्तियों का समावेश है वे सत्पात्र पर ही अवतरित होती हैं। स्वर्ग से उतर कर गंगा पृथ्वी पर उतरने का वरदान तो दिया था पर साथ ही यह भी कह दिया था कि यदि मेरी धारा को संभालने वाली भूमिका न बनी तो धारा पृथ्वी में छेद करती हुई पाताल को चली जायगी, उसका लाभ भूलोक वासियों को न मिल सकेगा। इस आवश्यकता की पूर्ति जब शंकर भगवान ने कर दी तभी गंगा अवतरण सम्भव हो सका। गायत्री महाशक्ति की भी ठीक यही स्थिति है उसे धारण करने के लिए समर्थ पृष्ठ-भूमि की अनिवार्य रूप से आवश्यक है। और इस आवश्यकता की पूर्ति ब्राह्मणत्व के गुण-कर्म, स्वभाव से सम्पन्न साधक ही कर सकता है। ऐसा ब्रह्मण मन्त्र की महाशक्ति को अपने में धारण कर सकता है और उससे व्यक्ति एवं समाज का महान उपकार साध सकता है। कहा भी है—

दैवाधीनं जगर्त्सवं मन्त्राधीनाश्च देवता। ते मन्त्रा ब्राह्मणाधीनास्तत्याद् विप्राहि देवता॥

—मत्स्य पुराण

“देवताओं के अधीन सब संसार है। वे देवता मन्त्रों के आधीन हैं। वे मन्त्र ब्राह्मण द्वारा प्रयुक्त होते हैं, इसलिए ब्राह्मण भी देवता हैं।”

महर्षि वशिष्ठ इसी प्रकार के सुर—पृथ्वी के देवता थे। उनके पास नन्दिनी कामधेनु—अर्थात् गायत्री की महाशक्ति थी। राजा विश्वामित्र के साथ जब वशिष्ठ का युद्ध हुआ और राजा की विशाल सेना परास्त हो गई तो विश्वामित्र के मुख से यही निकला—”धिग् बलं क्षत्रिय बल—ब्रह्म तेजो बलम्-बलम्” अर्थात् भौतिक बल धिक्कारने योग्य तुच्छ एवं नगण्य है। वास्तविक बल तो ब्रह्मबल ही है। वही मन्त्र बल है वही सच्चा बल है। यह कहते हुए विश्वामित्र ने राजपाट का परित्याग कर दिया और ब्रह्मबल प्राप्त करने के लिए तप करने लगे।

यहाँ किसी बिरादरी की चर्चा नहीं की जा रही है। हर बिरादरी में हर स्तर के लोग पाये जाते हैं। यहाँ गुण-कर्म स्वभाव से ब्राह्मणत्व अपने भीतर विकसित कर सकें उन्हीं साधकों की चर्चा की जा रही है और उन्हीं के लिए ब्राह्मण शब्द प्रयुक्त किया जा रहा है। वे ही मन्त्र-शक्ति के अधिकारी हो सकते हैं। शास्त्रकार ने कहा है—

यै शान्त दान्ताः श्रुतपूर्ण कर्णाः जितेन्द्रियाः प्राणिव्यथान्निवृत्ताः। प्रतिग्रहे संकुचिताग्रहस्ता— स्ते ब्राह्मणस्तरायितुँ समर्थाः।

—ब्रह्म वैवर्तन

“जो ब्राह्मण शान्त, दान्त, वेदज्ञ, जितेन्द्रिय, दयालु दान न लेने वाले हैं वे ही दूसरों का उद्धार कर सकते हैं।”

ब्राह्मणः समदृक् शान्ते दीनानाँ समुपेक्षकः। स्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्न भाण्डात् पयोयथा।

—कात्यायन

“जो ब्राह्मण समदर्शी, शान्तिवादी आदि का बहाना लेकर दीन दुखियों की उपेक्षा करता है—सेवा से जी चुराता है—उसका ब्रह्मज्ञान वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे फूटे बर्तन में से पानी टपक जाता है।

अतपास्त्वनधीयाना प्रतिग्रहरुचिर्द्विजः। अम्भस्यश्मप्लेनेव सह ते नैव मज्जति॥

(मनुस्मृति)

“ज्ञान और सेवाभाव से शून्य ब्राह्मण यदि दान लेता है तो वह उस दान देने वाले के साथ ही इस प्रकार डूब जाता है (नरकगामी होता है) जैसे पत्थर की नाव में बैठा मनुष्य नौका समेत डूब जाता है।”

तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्। तपसा किल्विषं हंति विद्ययाऽमृतमश्नुते॥

(मनुस्मृति)

“ब्राह्मण के लिए तप और विद्या दोनों अत्यन्त श्रेयस्कर हैं। तप से पापों का नाश होता है और विद्या से अमर जीवन की प्राप्ति होती है।”

ब्राह्मण की मान्यता, भावना एवं आकाँक्षा किस स्तर की होती है इसका दिग् दर्शन-परिचय नीचे के दो श्लोकों में देखें।

याचे न कञ्चन न कञ्चन बंचयामि, पेवे न कञ्चन निरस्तसमस्तदैन्यः।

गायत्री उपासना अनादिकाल से है, ऐसा वेदों में कहा गया है। इसके बिना ब्राह्मण की दुर्गति होती है।

इत्येवं संविचार्याथ गायत्रीं प्रजपेत्सुधीः आदि देवीं च त्रिपदाँ ब्राह्मणत्वादिदायजाम्।

—शिव कैवल्य

इन बातों पर विचार करके ब्राह्मण को चाहिए कि ब्राह्मणत्व प्रदान करने वाली गायत्री का जप नित्य किया करे।

बहुनाकिमि होक्तेन यथा साधु साधिता द्विजन्मनामियं विद्या सिद्धि कामदुघामता।

—शारदा तिलक

अधिक कहने की क्या आवश्यकता। भली प्रकार साधना की हुई यह गायत्री विद्या द्विजों के लिए कामधेनु के समान सब सिद्धियों को देने वाली है।

स्वयं शुद्धो हि पूतात्मा नरोन संत्रन्नतुमर्हति। गायत्रीजपशुद्ध ह शुद्धो ब्राह्मण उच्यते।

गायत्री जप से शुद्ध हुआ ब्राह्मण ही शुद्ध कहा जा सकता है। जो स्वयं शुद्ध हो चुका है वही दूसरों को भी शुद्ध कर सकता है।

उपर्युक्त प्रमाणों में किसी जाति विशेष की महत्ता का प्रतिपादन नहीं है, और न किसी जाति को उपासना के अधिकार से वंचित किया गया है। ईश्वरीय ज्ञान, वेद—और उसकी उपासना के अधिकार से किसी भी मनुष्य को वंचित नहीं किया जा सकता। इन शास्त्र वचनों से तो इस तथ्य का प्रकटीकरण किया गया है कि जो अपने मानसिक बौद्धिक एवं भावनात्मक स्तर को निर्मल बनाकर जितना ब्रह्मवर्चस प्राप्त कर लेगा उसे उतनी ही अधिक उतनी ही शीघ्र, उतनी ही उच्चस्तर की सिद्ध सफलता मिलेगी। गायत्री उपासना का अवलम्बन ग्रहण करने वाले को जप-अनुष्ठानों के भाँति ही अपनी मनोभूमि को परिष्कृत करने की साधना में संलग्न होना चाहिए।

ब्रह्मणोतर वर्ण भी गायत्री उपासना का लाभ उठा सकते हैं उसकी चर्चा शास्त्रों में जगह-जगह उपलब्ध होती है। यथा—

सोमदित्यान्वयाः सर्वे राघवाः कुरवस्तथाः पठन्ति शुचयो नित्यं सावित्रीं परमाँ गतिम्।

—महाभारत

हे युधिष्ठिर, सम्पूर्ण चन्द्रवंशी, रघुवंशी तथा कुरुवंशी नित्य ही पवित्र होकर परमगति दायक गायत्री मन्त्र का जप करते हैं।

तस्यर्षेः परमोरं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ। स्नात्वा कृतादिको वीरौ जपेतुः परमंजपम्।

—बाल्मीक रामायण

परम उदार ऋषि के वचन सुनकर राम-लक्ष्मण दोनों भाई स्नान-आचमन करके गायत्री का परम जप करने लगे।

प्रभावेणैव गायत्र्याः क्षत्रियः कौशिकी वशी। राजर्षित्व परित्यज्य ब्रह्मर्षि पदमीयिवान्। सामर्थ्यं प्रापचात्युच्चै रन्यद् युवन र्स्रजन। किं किं न दयात् गायत्री सम्यगेवमुपासिता।

—स्कन्द पुरण

क्षत्रिय विश्वामित्र ने राजर्षि पद से उन्नति करते हुए ब्रह्मर्षि पद गायत्री मन्त्र की उपासना से ही प्राप्त कर लिया तथा दूसरी सृष्टि रच डालने की भी शक्ति प्राप्त की थी। भली प्रकार साधना की हुई गायत्री भला कौन सा ऐसा अभीष्ट लाभ है जिसे प्राप्त नहीं करा सकती?

वंदेताँ परमाँ देवीं गायत्रीं वरदाँ शुभाम्। यत्कृपालेशतो यान्ति द्विजा वै परमाँगतिम्।

उस वरदात्री परम देवी गायत्री को नमस्कार है, जिसकी लेश मात्र कृपा से द्विज, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य परमगति को प्राप्त करते हैं।

उपर्युक्त अभिवचनों में ब्राह्मणेतर जातियों द्वारा गायत्री उपासना करने और उसके आधार पर परम सिद्धियाँ प्राप्त करने का वर्णन है। इससे स्पष्ट है कि जातिगत बंधन लगाने का शास्त्रों में कोई उल्लेख नहीं है। केवल इतना ही कहा गया है कि जो इस महाशक्ति का वास्तविक लाभ उठाना चाहें वे अपने आन्तरिक एवं व्यावहारिक जीवन में ब्राह्मणत्व की विशेषताऐं उत्पन्न करें जो इस दिशा में प्रयत्नशील रहे हैं उन्होंने इतना कुछ पाया है कि स्वयं धन्य हुए हैं और दूसरों को धन्य बनाया है। जिन्होंने जप-ध्यान तक ही अपने को सीमित रखा वे लौकिक जीवन की छुट-पुट समृद्धियाँ प्राप्त कर सकने के स्वल्प लाभों से आगे बढ़कर कोई अधिक महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त न कर सके। कारण स्पष्ट है। शारीरिक और मानसिक अनाचार बरतने से आत्मशक्ति का इतना क्षारण जाता है कि फिर साधक मटियाल सर्प की तरह निस्तेज ही रहता है। किसी मन्त्र के सहारे भी अपना आन्तरिक वर्चस्व बढ़ाने का अवसर नहीं मिलता। आज के अग्रदूत पूजा-भजन में संलग्न व्यक्ति इसी प्रकार तेज रहित जीवन बिता रहे हैं। उनने उपासना को सरल जानकर उसे तो अपनाया पर जीवन शोधन की कठिन प्रक्रिया से कतराते-कतराते रहे। ऐसे लोगों को आत्म-बल और उसके आधार पर मिलने वाली महान उपलब्धियाँ भला मिलें भी तो कैसे? और वे अपने आशीर्वाद से किसी का भला कर सकें तो कैसे?

अनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात्। आलस्यात् अन्न दोषाँच्च मृत्युर्विप्रान् जिघाँसति।

—मनु. 5-4

वेदों का अभ्यास न करने से, आचार छोड़ देने से, आलस्य से, कुधान्य खाने से ब्राह्मण की मृत्यु हो सकती है।

जिह्वा दग्धा परान्नेन करौ दग्धौ प्रतिग्रहात्। मनो दग्धं परस्त्रीभिः कथं सिद्धिर्वरानने॥

पराया अन्न खाने से जिह्वा की शक्ति नष्ट हो गई, दान, दक्षिणा लेते रहने से हाथों की शक्ति चली गई, नर-नारी की ओर मन डुलाने से मन नष्ट हो गया। हे पार्वती! इन ब्राह्मणों को सिद्धि कैसे मिले?

वादार्थं पठयते विद्या परार्थं क्रियते जपः। ख्यार्त्यधं दीयते दानं कथं सिद्धिर्वरानने॥

वाद-विवाद के लिये विद्या पढ़ी, दूसरों से दक्षिणा पाकर जप किया, कीर्ति के लिए दान दिया। ऐसे लोगों को पार्वती, सिद्धि कैसे मिले?

अनध्यापन शीलं च सदाचार विलंघनम्। सालसं च दुरन्नादं ब्राह्मणं वाधते यमः॥

स्वाध्याय न करने से, आलस्य से और कुधान्य खाने से ब्राह्मण का पतन हो जाता है।

देखा जाता है कि अभी भी कितने व्यक्ति गायत्री-उपासना करते हैं और उसके फलस्वरूप ज्ञान एवं विज्ञान की उपलब्धि चाहते हैं किन्तु कुछ कहने लायक सफलता नहीं मिलती। इसका कारण उनके उपासना-क्रम का अधूरापन ही है। साधारण साधना का विधि-विधान शास्त्रों में सार-रूप में लिखा हुआ है, उसमें कोई बड़ी पेचीदगी नहीं है। विधि-विधानों की मामूली जानकारी किन्हीं प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर की जा सकती है। उन्हें कर सकना भी कुछ विशेष कठिन नहीं है। लोग करते भी हैं, कर भी रहे हैं, पर साधारण कठिनाइयों या मामूली-सी कामनाओं की पूर्ति के अतिरिक्त वस्तुतः कोई इतना बड़ा प्रभाव उन्हें नहीं दीखता, जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि गायत्री महामन्त्र के माध्यम से वेदों में वर्णित आत्म-विद्या के असंख्य चमत्कारी लाभों में से—ऋूद्धि-सिद्धियों में से—कुछ की उपलब्धि वे कर सकेंगे।

इस असफलता से निराश होने की आवश्यकता नहीं, वरन् यह देखना है कि यह अवरोध उत्पन्न क्यों होता है। इसका एकमात्र कारण साधक का शरीर और मन उस उच्च स्तर का न होना ही है, जिसमें कि आध्यात्मिक साधनाएँ फलित हुआ करती हैं। गन्ने की, गुलाब की या दूसरी कीमती फसलें पैदा करने के लिए वाटिका को जमीन की आवश्यकता पड़ती है। उसमें खाद-पानी का समुचित प्रबंध करना होता है। यदि ऐसा न हो सके, ऊसर, बंजर में बिना जोते-बोए बीज बो दिया जाए, वहाँ खाद-पानी तथा सुरक्षा का प्रबन्ध न हो तो अच्छी फसल की आशा किस प्रकार की जा सकेगी? आध्यात्मिक साधनाएँ—जिनमें गायत्री उपासना प्रमुख है, एक प्रकार की वैज्ञानिक कृषि है। उसके लिये उपयुक्त साधन आवश्यक हैं। इस संदर्भ में सबसे अधिक आवश्यकता साधक के उत्कृष्ट व्यक्तित्व की है। उसकी मनोभूमि बढ़िया किस्म की होनी चाहिए। यह बढ़ियापन जितना बढ़ा-चढ़ा होगा, उतनी ही साधना की सफलता सुनिश्चित रहेगी।

बढ़िया बन्दूक में रखकर चलाये जाने पर कारतूस जैसा ठीक काम करता है, वैसा घटिया, नकली बन्दूक में रखकर चलाने पर काम नहीं कर सकता है। कारतूस वही है पर बन्दूक के घटिया-बढ़िया होने पर वह अपना काम भी वैसा ही करता है। मन्त्र एक प्रकार का कारतूस है। व्यक्तित्व को बन्दूक कहना चाहिए। यदि साधक का चरित्र, स्वभाव, आचार, व्यवहार, दृष्टिकोण निकृष्ट स्तर का है तो गायत्री जैसे महान शक्ति सम्पन्न मन्त्र की उपासना का प्रतिफल भी सन्तोषजनक न होगा। यदि कोई चरित्रवान, इन्द्रिय संयमी, तपस्वी, उदारमना एवं देव-स्वभाव का मनुष्य उसी मन्त्र को जपेगा, उसी उपासना को करेगा तो निकृष्ट स्तर के व्यक्ति की तुलना में इसका परिणाम सैकड़ों गुना अधिक होगा। मन्त्र वही, विधान वही, फिर भी सफलता में इतना अन्तर? इस विषय में किसी को शंकाशील नहीं होना चाहिए। गायत्री जादू नहीं, एक सर्वांगपूर्ण विधान है। घटिया रेडियो खड़खड़ करती हुई जरा सी आवाज में बोलते हैं, जबकि बढ़िया, कीमती रेडियो बहुत साफ और बुलन्द आवाज में बोलता है। दिल्ली से एक ही तरह की आवाज बोली जाती है, आकांशा में भी कम्पन एक से हैं पर पास-पास रखे हुए दो रेडियो जिनकी सुई उसी स्टेशन पर है, यदि आवाज की दृष्टि से बहुत बड़ा अन्तर प्रकट करते हैं, तो उसमें दोष किसी का नहीं। उन सस्ते और कीमती यन्त्रों का ही है। मीरा, सूर, तुलसी, कबीर आदि ने जो हरि-नाम लिया था, उसी को हम रोज लेते हैं पर उनके उत्कृष्ट व्यक्तित्वों से मन्त्र सफल हुए, भगवान ने दर्शन दिये, पर हमारे लिए वही हरि-नाम कुछ भी प्रतिफल उत्पन्न नहीं करता तो उसका दोष बाहर किसी को न देकर अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को ही देना चाहिए।

गायत्री और उसकी पृष्ठ-भूमि

दशरथ जी को जब सन्तान-कामना की पूर्ति के लिए ‘पुत्रेष्टि यज्ञ’ कराने की आवश्यकता हुई तो उसका विधि-विधान भली प्रकार जानते हुए भी महर्षि वशिष्ठ ने उसे पूरा करा सकने में अपनी असर्थता प्रकट की। इस पर दशरथ जी ने आश्चर्य के साथ इसका कारण पूछा। वशिष्ठ जी ने कहा—’पुत्रेष्टि यज्ञ का विधान तो मैं जानता हूँ पर व्यक्तित्व की दृष्टि से पूर्ण ब्रह्मचारी न होने के कारण उस विधान को सफलतापूर्वक कार्यान्वित करने की सामर्थ्य से सम्पन्न नहीं। वर्तमान ऋषियों में यह कार्य शृंगी ऋषि ही ठीक तरह पूरा करा सकते हैं, क्योंकि वयस्क हो जाने पर भी वनवास में रहने के कारण उन्होंने रमणी को न तो देखा है और न उसकी कल्पना की है। ऐसे ब्रह्मचारी की आत्मा ही इतनी बलिष्ठ हो सकती है कि उसके द्वारा सफल पुत्रेष्टि यज्ञ कराया जा सके।’ अन्ततः शृंगी ऋषि को ही बुलाया गया और उन्हीं के पौरोहित्य में दशरथ का वह पुत्रेष्टि यज्ञ सफल हुआ जिसके प्रभाव से राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न जैसी आत्माओं को अवतरित होना पड़ा। यदि शृंगी ऋषि जैसे तपस्वी का पौरोहित्य न मिला होता तो विधि-विधान के पूर्ण ज्ञाता आचार्य द्वारा कराये जाने पर भी पुत्रेष्टि यज्ञ सफल न होता।

मन्त्र वही है, विधि-विधान भी वही है, उनकी जानकारी वही है, उनकी जानकारी ग्रन्थों से तथा दूसरे विद्वानों से प्राप्त की जा सकती है। इतने पर भी उनकी वैसी महिमा जैसी कि बताई गई है, अक्सर दृष्टिगोचर नहीं होती। इसका कारण उस विद्या का मिथ्या होना या विधि-विधान में कोई फर्क रह जाना नहीं होता, वरन् यह होता है कि उसे करने वाले का व्यक्तित्व एवं चरित्र उस स्तर का उत्कृष्ट नहीं होता जैसा कि आत्म-विद्या के सच्चे पथिक का होना चाहिये। साधक के लिये मन्त्र विद्या का विधि-विधान जान लेना ही पर्याप्त नहीं वरन् यह भी आवश्यक है कि वह अपने चरित्र एवं मानसिक स्तर को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने में संलग्न रहे।

गायत्री उपासना के छुटपुट लाभ साधारण रीति से जप, अनुष्ठान करने वालों को भी मिल सकते हैं। गमलों में छोटे से फूल-पौधे उगाये जा सकते हैं, पर यदि कोई विशाल वृक्ष लगाना हो तो यह आवश्यक है कि उसके लिये ऐसी जमीन ढूँढ़ी जाय जिसमें होकर जड़ें नीचे गहराई तक प्रवेश कर सकें। बरगद और पीपल के वृक्ष गमलों में उग तो सकते हैं पर फलने-फूलने की स्थिति तक नहीं पहुँच सकते। गायत्री जैसा महामन्त्र जिसकी सामर्थ्य की कोई तुलना नहीं, पूरी तरह अपना प्रभाव तभी प्रकट कर सकता है जब साधक की मनोभूमि काफी परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बनाई गई हो। उपासना का विधि-विधान दक्षिण मार्गी, वाममार्गी साधना विधान अपना-अपना विशिष्ट प्रतिफल उत्पन्न करते हैं पर इसके लिए उनकी समुचित जानकारी इस महाविद्या के प्रयोगकर्ताओं को ठीक तरह अनुभव और अभ्यास में लानी चाहिए। इसके लिए अनुभवी मार्गदर्शक और ऋषि परम्परा की शास्त्रीय पद्धति का अवलम्बन ग्रहण करना चाहिए। साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आध्यात्मिक उपासनाओं के पथ पर गतिशील होने के आकाँक्षी साधक को अपने व्यक्तित्व की उत्कृष्टता बढ़ाना तथा स्थिर रखना नितान्त आवश्यक है। आत्मिक प्रगति की यह एक अनिवार्य शर्त है।

बढ़िया किस्म का बाण भले ही हो पर उसे ठीक निशाने तक पहुँचाने के लिए बढ़िया मजबूत धनुष भी तो चाहिए। सड़ी, घुनी लकड़ी के धनुष का तीर के लिए निशाने तक फेंक सकना तो कठिन ही है—इस खींच-तान में अपनी भी दुर्गति करा लेगा। ओछे आदमी—घृणित और निकृष्ट दृष्टिकोण अपनाकर जीवन यात्रा कर रहे हैं। ऐसे कुसंस्कारी व्यक्ति भले ही जप-तप का बाह्य आवरण पूरा करते रहें, वह कर्मकाण्ड उनकी आन्तरिक प्रगति में कुछ विशेष सहायता न कर सकेगा।

प्राचीन काल में ऐसे अनेक साधक हुए हैं जिनका साधना-विधान कोई बड़ी शास्त्रीय परम्परा पर आधारित न था फिर भी उन्हें अपने उद्देश्य की पूर्ति में आशाजनक सफलता मिली। कबीर की शिक्षा स्वल्प थी, उन्हें मार्गदर्शक भी अनुभवी नहीं मिला। सन्त रामानन्द उनके ऐसे ही गुरु थे जैसे एकलव्य के द्रोणाचार्य। वे प्रत्यक्ष में कबीर के गुरु होने की बात से इनकार करते रहे। रैदास की वंश परम्परा ने उन्हें शास्त्रीय साधना पद्धति का लाभ लेने से वंचित रखा। मीरा केवल भजन, कीर्तन, नृत्य एवं भावोन्माद तक अपना साधन विधान सीमित रख सकी। शबरी किस प्रकार की उपासना पद्धति अपनाये रही कुछ पता नहीं चलता। बाल्मीकि तो सीधा राम नाम भी न ले सके उन्हें ‘मरा’ ‘मरा’ का उलटा नाम जप कर ही आगे बढ़ना पड़ा। ऐसे उदाहरण साधन इतिहास के पन्ने-पन्ने पर भरे पड़े हैं। और आज भी ऐसे अनेक साधक मिलते हैं जिनकी शिक्षा एवं साधना पद्धति उपहासास्पद है। फिर भी उनने काफी ऊँचाई तक आत्मिक प्रगति कर ली। इसका एकमात्र कारण उनके व्यक्तित्व की उत्कृष्टता ही थी। मानवीय सद्भावों का बाहुल्य ही उनकी यह विशेषता थी, जिसने उच्चस्तरीय सफलता का अधिकारी उन्हें बना दिया।

दूसरी ओर ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जिनमें उपासना का शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक प्रकरण भली प्रकार जानते हुए भी साधक कुछ आशाजनक लाभ प्राप्त न कर सके। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, मारीच, भस्मासुर, वृकासुर, हिरण्यकश्यपु, मधुकैटभ आदि अगरिफ्त व्यक्ति उच्च कुलों में उत्पन्न हुए थे, उनके गुरु भी शुक्राचार्य जैसे पारंगत थे। उन्होंने कठिन तपश्चर्यायें भी कीं और वरदान भी पाए, फिर भी इन सुविधाओं का कोई विशेष लाभ उन्हें नहीं मिला। उनकी आत्मिक प्रगति नगण्य रही। जो साधना तपश्चरण उनने की वह उनकी आत्मा का, उनके परिवार का सारे समाज का कुछ भी हित साधन न कर सकी। अतएव हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि जिन्हें वस्तुतः अध्यात्मिकता का लाभ लेना हो, इस मार्ग पर चिरस्थायी और आशाजनक प्रगति करनी हो, उन्हें सबसे पूर्व—सबसे अधिक—ध्यान इस बात पर देना चाहिए कि उनका व्यक्तित्व, उत्कृष्ट स्तर का बने। यही ब्राह्मणत्व है। ब्रह्मवर्चस है। ब्रह्मवर्चस की सारी शक्ति, चेतना एवं क्षमता इसी आधार पर उपलब्ध होती और बढ़ती है।

प्राचीन काल के ब्राह्मण भूसुर कहलाते थे—भु-सुर अर्थात् पृथ्वी के देवता। देवताओं में जो शक्ति होती है वह सच्चे ब्राह्मण में देखी और पाई जाती है। यह उपलब्धि उसे मन्त्र बल से ही नहीं मिल जाती वरन् उत्कृष्ट स्तर के व्यक्तित्व का निर्माण करने की भी शर्त पूरी करने पर मिलती है। हममें से हर गायत्री उपासक को यह तथ्य भली प्रकार हृदयंगम करना चाहिए और अपना ब्रह्मणत्व बढ़ाना चाहिए। स्मरण रहे ब्राह्मणत्व का अभिवर्धन करने में किसी जाति-बिरादरी में जन्म लेना न तो सहायक है और न बाधक।

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