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Magazine - Year 1967 - Version 2

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युग बदल रहा है-हम भी बदलें

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अखण्ड-ज्योति के किसी अंक में हम एक महत्त्वपूर्ण भविष्यवाणी कर चुके हैं कि अब से तीस वर्ष पश्चात् इस संसार की मानव-समाज की स्थिति आज के सर्वथा भिन्न होगी। युग सर्वथा पलटा हुआ दिखाई देगा सन् 2000 के लगभग इस दुनिया को आज की आँखों में देखा जाए तो सब कुछ बदला हुआ ही दिखाई देगा। यों पिछले तीन सौ वर्षों में विज्ञान की प्रगति ने संसार की बाह्य परिस्थितियों में जमीन आसमान जैसा अंतर ला दिया है। रेल, मोटर, तार, डाक, रेडियो, जलयान, वायुयान, बिजली, कल-कारखाने, सिनेमा आदि मनोरंजन, चिकित्सा आदि की दिशा में जो प्रगति हुई है और उसके कारण जो साधन-सुविधायें बढ़ी हैं उन्हें यदि आज के तीन सौ वर्ष पूर्व का आदमी आकर देखे तो भौचक्का रह जायेगा। उसे यकीन न होगा कि यह वही दुनिया है जिसमें वह रह रहा था। उन दिनों तीर्थ यात्रा के लिए पैदल ही जाना पड़ता था, सड़कें थीं नहीं, बीहड़ मार्गों में से चारों धाम की यात्रा करके कोई विरले ही जीवित लौटते थे। पर आज तो हवाई जहाज की यात्रा करके दो दिन में चारों धाम के दर्शन करके घर लौट आया जा सकता है। इस प्रकार की अगणित साधन-सुविधायें बढ़ जाने से तीन सौ वर्ष पूर्व और अब के सुविधा साधनों में आश्चर्य चकित कर देने वाला परिवर्तन हो गया है।

विज्ञान की क्राँति ने तीन सौ वर्ष में दुनिया का नक्शा बदला है। ज्ञान की क्राँति तीस वर्षों में मानव-जाति की भावनात्मक स्थिति में इसी तरह की आश्चर्य चकित कर देने वाली उलट-पुलट उत्पन्न करेगी। तीस वर्ष बाद के मनुष्य के सोचने, चाहने और करने का तरीका आज से इतना भिन्न होगा कि उसे भावनात्मक युग परिवर्तन कहने में किसी को कोई आपत्ति न होगी।

यह आगामी तीस वर्ष मानव जाति के लिये अत्यधिक कष्टकारक और अशाँति, बेचैनी से भरे हैं, वैसे ही जैसे प्रसव के दिनों में किसी जननी के लिये हर क्षण वेदना और बेचैनी से भरा होता है। परिवर्तन सभी कष्टकर होते हैं। महंगाई, सूखा, अकाल, संघर्ष, अवरोध, अव्यवस्था, की दुःखदायक घटनायें रोज ही देखी सुनी जाती हैं। अगले दिनों और बड़े प्रकृति प्रकोप के लिये, छोटे और बड़े, ठंडे और गरम युद्ध के लिये हमें तैयार रहना चाहिए। निकम्मी मिट्टी जब उपयोगी बर्तनों या खिलौनों के रूप में परिवर्तित होती है तब उसे कुम्हार द्वारा रौंदने, मसलने, पीटने, सुखाने, पकाने की अनेक कष्टसाध्य प्रक्रियाओं में होकर गुजरना पड़ता है। अगले तीस वर्ष में मनुष्य जाति को सुसंस्कृत परिवर्तन के लिये तैयार होने के लिये भाँति-भाँति की प्रताड़नाओं के लिये तैयार होना होगा। यह मनुष्य इतना भला है भी तो नहीं कि समझने से सहज ही मान जाए और कुमार्ग छोड़ कर सन्मार्ग पर चलने लगे। हठवादियों को जिस तरह ठीक किया जाता है प्रकृति हमारे साथ अगले दिनों वही कठोर व्यवहार करने जा रही है।

उपरोक्त तथ्यों से किसी को डरने या परेशान होने की जरूरत नहीं है, वरन् आवश्यकता इस बात की है कि ईश्वर की इच्छा के अनुरूप अपनी गति विधियों का निर्माण कर हम अपने को बुद्धिमान दूरदर्शी एवं सौभाग्यशाली कहलाने का लाभ प्राप्त करें। लंका टूटने वाली, असुर मरने वाले थे, राम जीतने वाले थे, इस तथ्य को जिन रीछ वानरों ने, वे अल्प साधन सम्पन्न होते हुए भी इतिहास में अजर-अमर रहने जैसी भूमिका सम्पादन कर सके। गंगा के अवतरण की संभावना से परिचित भागीरथ ने जो तप किया उससे वे धन्य हो गये। गंगाजी को भागीरथी कहलाना पड़ा। भारत स्वतंत्र होने वाला है, इस संभावना का आभास पाकर जो व्यक्ति आगे बढ़ चले वे तिलक, गाँधी, पटेल, नेहरू, सुभाष आदि के नाम से विख्यात हुए। ईश्वर की इच्छा में सहायक बन कर अग्रिम पंक्ति में चल सकने का साहस एकत्रित कर लेना वस्तुतः बहुत बड़ी बुद्धिमानी है। ऐसे दुर्लभ अवसर कभी-कभी ही आते हैं, जो उन्हें चूक जाते हैं, उनके हाथ केवल पश्चाताप ही शेष रहता है।

अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को यह प्रेरणा दी जाती रही है कि वे बदलती हुई संभावनाओं को विवेक की दिव्य दृष्टि से देखें और यह निर्णय करें कि ऐसे मध्यकाल में उनका विशेष कर्त्तव्य है या नहीं? मूढ़ की एक ही पहचान है कि वह जिस ढर्रे में बंध गया उसी में कोल्हू के बैल की तरह घूमता रहता है। वह न अपनी कोई भूल सुधारता है और न किसी श्रेष्ठ संभावना के लिये तैयार होता है। इस स्तर के लोगों से और कहना सुनना बेकार है, वे और सोचने-समझने, छोड़ने, पकड़ने की स्थिति में हैं ही नहीं तो उनसे सिरफोड़ी कौन करे? उन्हें तो प्रकृति के थपेड़े ही रास्ते पर लाते हैं। समझना, समझाना विवेकशील लोगों के लिये ही संभव होता है। सो अखण्ड ज्योति परिवार का संगठन हमने 28 वर्ष के परिश्रम के बाद इसी दृष्टि से किया है कि प्रबुद्ध आत्माएं बदलते युग के अनुरूप अपने कर्त्तव्य धर्म को पहचाने और भी महत्वपूर्ण घड़ियों का विवेकशील लोग जिस तरह उपयोग किया करते हैं वैसे ही वे भी करें।

भगवान् की इच्छा युग परिवर्तन की व्यवस्था बना रही है। इसमें सहायक बनना ही वर्तमान युग में जीवित प्रबुद्ध आत्माओं के लिये सबसे बड़ी दूरदर्शिता है। अगले दिनों में पूँजी नामक वस्तु किसी व्यक्ति के पास नहीं रहने वाली है। धन एवं सम्पत्ति का स्वामित्व सरकार एवं समाज का होना सुनिश्चित है। हर व्यक्ति अपनी रोटी मेहनत करके कमायेगा और खायेगा। कोई चाहे तो इसे एक सुनिश्चित भविष्यवाणी की तरह नोट कर सकता है। अगले दिनों इस तथ्य को अक्षरशः सत्य सिद्ध करेंगे। इसलिये वर्तमान युग के विचारशील लोगों से हमारा आग्रह पूर्वक निवेदन है कि वे पूँजी बढ़ाने, बेटे पोतों के लिये जायदादें इकट्ठी करने के गोरख-धंधे में न उलझें। राजा और जमींदारों को मिटते हमने अपनी आँखों देख लिया अब इन्हीं आँखों को व्यक्तिगत पूँजी को सार्वजनिक घोषित किया जाना देखने के लिए तैयार रहना चाहिए।

भले ही लोग सफल नहीं हो पा रहे हैं पर सोच और कर यही रहे हैं कि वे किसी प्रकार अपनी वर्तमान सम्पत्ति को जितना अधिक बढ़ा सकें, दिखा सकें उसकी उधेड़ बुन में जुटे रहें। यह मार्ग निरर्थक है। आज की सबसे बड़ी बुद्धिमानी यह है कि किसी प्रकार गुजारे की बात सोची जाए। परिवार के भरण-पोषण भर के साधन जुटाये जायें और जो जमा पूँजी पास है उसे लोकोपयोगी कार्य में लगा दिया जाए। जिनके पास नहीं है वे इस तरह की निरर्थक मूर्खता में अपनी शक्ति नष्ट न करें। जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक साधन मौजूद हैं, जो उसी पूँजी के बल पर अपने वर्तमान परिवार को जीवित रख सकते हैं वे वैसी व्यवस्था बना कर निश्चित हो जायें और अपना मस्तिष्क तथा समय उस कार्य में लगायें, जिसमें संलग्न होना परमात्मा को सबसे अधिक प्रिय लग सकता है।

जो जितना समय बचा सकता है वह उसका अधिकाधिक भाग नव-निर्माण जैसे इस समय के सर्वोपरि पुण्य परमार्थ में लगाने के लिये तैयार हो जाए। समय ही मनुष्य की व्यक्तिगत पूँजी है, श्रम ही उसका सच्चा धर्म है। इसी धन को परमार्थ में लगाने से मनुष्य के अन्तःकरण में उत्कृष्टता के संस्कार परिपक्व होते हैं। धन वस्तुतः समाज एवं राष्ट्र की सम्पत्ति है। उसे व्यक्तिगत समझना एक पाप एवं अपराध है। जमा पूँजी में से जितना अधिक दान किया जाए वह तो प्रायश्चित मात्र है। सौ रुपये की चोरी करके कोई पाँच रुपये दान कर दें तो वह तो एक हल्का सा प्रायश्चित ही हुआ। मनुष्य को अपरिग्रही होना चाहिए। इधर कमाता और उधर अच्छे कर्मों में खर्च करता रहे यही भलमनसाहत का तरीका है। जिसने जमा कर लिया उसने बच्चों को दुर्गुणी बनाने का पथ प्रशस्त किया और अपने को लोभ-मोह के माया बंधनों में बाँधा। इस भूल का जो जितना प्रायश्चित कर ले, जमा पूँजी को सत्कार्य में लगा दे उतना उत्तम है। प्रायश्चित से पाप का कुछ तो भार हल्का होता ही है। पुण्य परमार्थ तो निजी पूँजी से होता है। वह निजी पूँजी है- समय और श्रम। जिसका व्यक्तिगत श्रम और समय परमार्थ कार्यों में लगा समझना चाहिए कि उसने उतना ही अपना अन्तरात्मा निर्मल एवं सशक्त बनाने का लाभ ले लिया।

युग-निर्माण योजना की क्रिया पद्धति इसी धुरी पर घूमती है। हमने अपने प्रत्येक परिजन को गंभीर चेतावनी और प्रबल प्रेरणा के साथ इस दिशा में मोड़ने के लिये प्रयत्न किया है कि यह युग बदलने का अनुपम अवसर है। हममें से हर प्रबुद्ध आत्मा का कुछ विशेष कर्त्तव्य एवं कुछ विशेष उत्तर दायित्व है। भगवान का प्रयोजन पूरा करने में सहयोगी होना वर्तमान युग के जीवित अध्यात्मवादियों के लिये विवेक की सबसे बड़ी चुनौती है। इसे समझा और स्वीकारा जाए।

परमार्थ प्रयोजनों के लिये समय का अभाव केवल एक ही कारण से रहता है कि मनुष्य तुच्छ स्वार्थों को सर्वोत्तम समझता है और उन्हीं की पूर्ति को प्रमुखता देता है। जो कार्य बेकार लगेगा उसी के लिये समय न बचेगा। परमार्थ को बेकार की बात माना जायेगा तो उसके लिये समय कहाँ से बचेगा? भगवान की युग की पुकार को उपेक्षणीय माना जायेगा तो उसके लिए श्रम या धन खर्च करने की सुविधा कहाँ रह जायेगी? अपनी आत्मा को मिथ्या प्रवंचनाओं से नहीं ठगना चाहिए। समय,श्रम या धन न बचने का बहाना नहीं बनाना चाहिए। प्रबुद्ध, विवेकशील एवं जागृत आत्माओं से परमेश्वर कुछ बड़ी आशा करता है। उसी के अनुरूप हमें अपनी गतिविधियों को मोड़ना चाहिए।

शेष जीवन किस प्रकार किस क्रम से खर्च करें, यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न है। अपने स्नेही सहचरों को इस प्रश्न के हल करने में सहायता देने के लिये ही एक व्यवस्थित योजना सामने प्रस्तुत हुई है। उसकी अपेक्षा करके हम अपने विवेक एवं सौभाग्य का ही तिरस्कार करेंगे। ऐसा होना नहीं चाहिए। हमें परिवार के आवश्यक उत्तर दायित्वों को पूरा करने में जितनी शक्ति लगाना अनिवार्य है, उसके अतिरिक्त जो भी बचे उस समय, श्रम एवं धन को उस प्रयोजन में लगा देना चाहिए जिससे मानव जाति का भविष्य निर्माण करने का संतोष और सम्मान हमें मिल सके। सोचते-विचारते बहुत दिन बीत गये अब समय आ पहुँचा है जबकि साहसपूर्वक अपने आपको ही परिवर्तित कर डालना चाहिए। अपने आपको परिवर्तित करके ही हम युग परिवर्तन की भूमिका सच्चे अर्थों में प्रस्तुत कर सकेंगे।

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