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Magazine - Year 1967 - Version 2

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तीन और चार वर्ष की शिक्षा-व्यवस्था

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जिन्हें सरकारी नौकरी नहीं करनी है, योग्यता बढ़ानी है और योग्यता के बल पर अपने पैतृक अथवा किसी अन्य धंधे से आजीविका उपार्जित करनी है, उनके लिए ऐसी शिक्षा-व्यवस्था होनी चाहिए जिससे सर्वतोमुखी प्रतिभा का विकास करने के लिए ही परिश्रम करना पड़े। स्कूली पढ़ाई में यह दोष है कि उसमें ऐसे विषय पढ़ने पड़ते हैं, जो जीवन में कभी काम नहीं आते। स्कूल छोड़ते ही वे विस्मरण हो जाते हैं। छोटी-सी बात जो एक-दो बार पढ़ने-समझने से हृदयंगम हो सकती है, परीक्षा में सही उत्तर लाने के लिए बहुत बार घोटनी पड़ती है। इस प्रकार विद्यार्थी के समय का जो उपयोग उसकी प्रतिभा विकसित करने और जीवन में काम आने वाली बातें सीखने में लगना चाहिए था, वह भारभूत जंजाल में नष्ट होता रहता है।

कई बार तो परीक्षा के औंधे-सीधे गोरखधंधे जैसे जंजाल में उलझकर होनहार लड़के अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। इसकी प्रतिक्रिया उन पर हीनता की, आत्मग्लानि की ऐसी भयानक छाप डालती है कि वे एक प्रकार से टूट ही जाते हैं। उनकी मनोभूमि दो कौड़ी की हो जाती है। परीक्षा में फेल होना ऐसा मानसिक घाव लगता है कि शिक्षार्थी फिर जीवन की हर परीक्षा में ही फेल होता चला जाता है। ऊंची नौकरी लग गई तो पढ़ाई की भरपाई, अन्यथा वह अभिभावकों को स्वाहा करने और जीवन-रस चूस लेने वाली अभिशाप जैसी मूर्खता तो बनी बनाई है ही।

इस जंजाल से होनहार छात्रों को छुटकारा दिलाने के लिए हमें ऐसी शिक्षा प्रणाली का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा जो यह सिद्ध कर सके कि सही शिक्षण क्रम किस प्रकार का होना चाहिए। कोसने, गाली देने और कुड़कुड़ाने से काम न चलेगा। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली के दोष सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर बताये और स्वीकार किये जाते हैं पर कोई यह नहीं बताता कि आखिर स्वस्थ शिक्षा प्रक्रिया होनी किस प्रकार की चाहिए? इसी प्रश्न का उत्तर हमें एक रचनात्मक ढाँचा खड़ा करके देना होगा।

योजना यह बनाई गई कि जूनियर हाईस्कूल (कक्षा 8) तक पढ़े छात्रों के लिए चार वर्ष का और हाईस्कूल तक पढ़े छात्रों के लिए तीन वर्ष का एक ऐसा पाठ्यक्रम हो, जिसे पूरा करने पर शिक्षार्थी की योग्यता बी.ए. पास लड़कों की तुलना में कहीं अधिक हो।

1. हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत ये तीनों भाषायें सारी शिक्षा अवधि में नित्य नियमित रूप से पढ़ाई जायेंगी। अंग्रेजी में ऐसी योग्यता उत्पन्न कर दी जायेगी कि छात्र धड़ल्ले से अंग्रेजी बोल सकें, पत्र लेख आदि शुद्ध, सही रूप में लिख सकें। संस्कृत का भी ऐसा अच्छा ज्ञान इस अवधि में हो जायेगा जिसके आधार पर धर्मशास्त्रों को अच्छी तरह समझ सकना संभव हो सके। हिन्दी की योग्यता साहित्य रत्न की-एम.ए. जैसी होगी। तीनों भाषाओं के एक अच्छे ज्ञाता की जो योग्यता होनी चाहिए वह इस अवधि में हो जायेगी।

इस भाषा शिक्षण के साथ टाइप राइटिंग भी जुड़ा हुआ है। हिन्दी के टाइपराइटर और अंग्रेजी के टाइपराइटर कक्षाओं में रहेंगे और छात्र उन पर टाइप राइटिंग सीखते रहेंगे। पढ़ाई समाप्त करने तक यह कला इतनी आ जायेगी कि नौकरी करनी हो तो टाइपिस्ट की नौकरी मिल सके। अदालतों में जाकर या बाजार में दुकान जमाकर बाजार का टाइप-कार्य करते हुए स्वतंत्र आजीविका कमाई जा सके। ऐसा भी हो सकता है कि टाइप-राइटिंग का स्कूल खोल लिया जाये। स्कूली लड़के फीस देकर उसमें सीखने आया करें और इससे अपनी सम्मानप्रद आजीविका उपार्जित होती रहे।

2. भाषा के अतिरिक्त उपयोगी जानकारी का प्रशिक्षण चलेगा। इसके अंतर्गत गणित (अर्थमेटिक) इतना पढ़ाया जायेगा, जिसके आधार पर देशी और अंग्रेजी ढंग से बही-खाते, सालाना बेलेन्स शीट, सेलटैक्स, इन्कम टैक्स की तैयारी, व्यापारी पर लगने वाली सभी प्रकार के टैक्सों की कानूनी जानकारी और उस संबंध में सही तरीके से कागज रखने का ज्ञान, टैक्स संबंधी मुकदमों का स्वरूप और उनसे निपटने के अनेक तरीके आदि की व्यावहारिक शिक्षा दी जायेगी।

नये सिक्के, बाँट, माप एवं ब्याज संबंधी सभी प्रकार के वे गणित, जिनके काम आने की जीवन में तनिक भी संभावना हो सकती है, लिखकर गणित करने की अपेक्षा मौखिक हिसाब जोड़ने की कुशलता पैदा की जायेगी।

3. भूगोल, इतिहास इतना पढ़ाया जायेगा कि जिससे विश्व ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए ग्रह-नक्षत्रों में पृथ्वी का स्थान कहाँ और कितना है? पृथ्वी अन्य ग्रह-नक्षत्रों से कितनी प्रभावित है? पृथ्वी के जन्म से लेकर अब तक का उसका इतिहास, महाद्वीपों की स्थिति, संसार के वर्तमान देशों का राजनैतिक, साँस्कृतिक एवं सामाजिक इतिहास, विभिन्न देशों की आधुनिक विशेषताएं तथा समस्यायें, संसार के विभिन्न समाजों के जीवन-स्तर तथा शासन-स्वरूप। विज्ञान की अब तक की प्रगति तथा उसकी भावी संभावनायें, विश्व का भावी संभावित स्वरूप, जीव-विकास का इतिहास, भारतवर्ष का राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक इतिहास, देश की विभिन्न समस्यायें आदि भूगोल-इतिहास का मिश्रित स्वरूप इस प्रकार पढ़ाया जायेगा कि संसार के आरंभ होने से लेकर अब तक का स्वरूप आँखों के आगे खड़ा हो सके। इसी प्रकार के आधार पर ही वर्तमान की उलझनों को सुलझाना और भविष्य के निर्माण का ढाँचा संभव हो सकता है।

4. शरीर-विज्ञान में, अनाटोमी, फिजियोलॉजी, नक्शे, चित्र और मॉडलों के आधार पर इस प्रकार पढ़ाया जायेगा, जिससे यह पता चल सके कि शरीर के विभिन्न अवयवों का स्थान, स्वरूप और कार्य कैसा है? उनमें बीमारी कैसे होती है और फिर से किस चिकित्सा-पद्धति से किस आधार पर कितना सुधारा जा सकता है? रोगों की निवृत्ति प्रकृति द्वारा कितनी होती है और चिकित्सा से क्या सहायता मिलती है?

रैडक्रास सोसायटी से सहायता प्राप्त फर्स्ट एड, घरेलू, जड़ी-बूटियों द्वारा सामान्य रोगों की सामान्य चिकित्सा, रोगी की परिचर्या जैसे उपचार सीखने को मिलेंगे। आहार के विभिन्न स्तर, उनके गुण-दोष, भोजन सही ढंग से पकाने, रखने, परोसने तथा खाने की कला, स्नान, सफाई, निद्रा, संयम आदि शरीर-संरक्षण का विधि-विधान प्रत्येक अंग को सक्रिय गतिशील, निरोग, एवं प्रफुल्ल रखने वाले वैज्ञानिक व्यायाम, फौजी ढंग की कवायदें, यह शरीर-विज्ञान का अंग होंगी। दैनिक रहन-सहन का अभ्यास इस तरह ढाला जायेगा कि आजीवन बीमार पड़ने की नौबत ही न आये।

शस्त्र-विद्या का थोड़ा-सा प्रयोग एक वर्षीय प्रशिक्षण में भी है पर उतनी कम अवधि में उस विषय का सामान्य ज्ञान ही हो सकता है। इस परिपूर्ण शिक्षण में लाठी चलाना, भाला, छुरा, फरसा, गुलेल, धनुष-बाण एवं बन्दूक चलाने का अधिक अच्छी तरह-अधिक भेद-उप-भेदों के साथ शिक्षण कराया जायेगा।

5. मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिए इस अवधि में वैसे ही प्रयत्न किए जायेंगे जैसे शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए मनोविज्ञान, मन-बुद्धि-चित्त अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय का स्वरूप एवं गुण-कर्म, विचारों की शक्ति, चिन्तन की दिशा मोड़ डालने की कला, बुद्धिमत्ता एवं दूरदर्शिता का विकास, साहस, धैर्य एवं मनस्विता का अभ्यास, श्रमशीलता और तन्मयता की प्रवृत्ति, नम्रता, मधुरता, शिष्टता, सज्जनता एवं अनुशासन प्रिय स्वभाव, नियमितता एवं व्यवस्था का गुण, समय और धन को ठीक तरह खर्च करने की आदत, कामनाओं और वासनाओं का नियंत्रण, अनुपयुक्त विचारों को हटाकर उनके स्थान पर उपयुक्त विचारों को स्थापना आदि मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिए बौद्धिक एवं व्यावहारिक दोनों ही तरह से-थ्योरी और प्रेक्टिस दोनों ही तरीकों से-मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन की शिक्षा-व्यवस्था नियमित रूप से चलती रहेगी।

6. लोक-व्यवहार के उपयुक्त तरीकों को सिखाने की शिक्षा-व्यवस्था का समुचित समावेश रखा गया है। धर्मपत्नी के साथ बच्चों के साथ, भाई-बहिनों के साथ, माता-पिता के साथ, परिजनों के साथ, कैसी स्थिति में किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार, कितना क्या व्यवहार किया जाये, उस व्यवहार में कितना उतार-चढ़ाव रहे, यह एक पूरा पारिवारिक व्यवहार शास्त्र है। इसकी ठीक जानकारी न रहने से परिवार में क्लेश, द्वेष, अव्यवस्था फैलती है। यह प्रशिक्षण बतायेगा कि कुटुम्ब को स्वस्थ, सुव्यवस्थित एवं समृद्ध बनाने का क्या तरीका है? कुटुम्ब वस्तुतः एक समाज एवं राष्ट्र है, उसके संचालन में भी वैसी ही योग्यता अपेक्षित है जैसी किसी देश के प्रधान मंत्री में होनी चाहिए। साम, दाम, दण्ड, भेद का उसमें समुचित उपयोग करना पड़ता है। यह कैसे किया जाये, जिससे परिवार में स्वर्ग अवतरित हो-यह शिक्षा-व्यवस्था इस पाठ्यक्रम का प्रमुख अंग है।

घर से बाहर समाज के अन्य लोगों से साथ समुचित व्यवहार करके उनकी सहानुभूति, सद्भावना एवं सहायता सम्पादित करना लौकिक जीवन को समुचित बनाने के लिए नितान्त आवश्यक है। अपने कर्मचारियों से, मालिकों से, पड़ौसियों, रिश्तेदारों से, मित्रों से, शत्रुओं से, किस अवसर पर कैसे बरता जाता है, इसका व्यावहारिक ज्ञान कितना लाभप्रद है- इसे साधारण लोग नहीं समझते, जो समझते हैं वे उसका आशाजनक प्रतिफल उपलब्ध करते हैं। लोक-व्यवहार का जानना आवश्यक समझकर उसे इस शिशा-पद्धति में समन्वित रखा गया है।

(7) भावात्मक विकास के लिये-आत्मबल बढ़ाने के लिए जिस उत्कृष्ट दृष्टिकोण की, आस्थाओं की, मान्यताओं की आवश्यकता है, उसकी पूर्ति आध्यात्मिक ज्ञान एवं धर्मशास्त्र के आधार पर होती है। गीता, रामायण, वेद, अपनिषद् आदि के आधार पर इस विषय का प्रशिक्षण भी चलेगा। भारतीय धर्म एवं संस्कृति की विशेषताएँ व उपयोगिताएं तुलनात्मक ढंग से पढ़ाई जायेंगी।

जन नेतृत्व करने के लिए भाषण की कला जानना आवश्यक है। छात्रों को यह अभ्यास कराया जाता रहेगा कि वे घर में, मित्रों में, गोष्ठियों में तथा सभा सम्मेलनों में किस प्रकार अपने विचारों को धारा-प्रवाह किन्तु सुसन्तुलित ढंग से व्यक्त कर सकते हैं। नव-निर्माण के लिए जिन रचनात्मक प्रवृत्तियों का प्रसार किया जाता है, उनकी शिक्षा भी इसी वर्ग के अंतर्गत दी जाती रहेगी।

(8) आजीविका उपार्जन के लिये ऐसे शिल्प-व्यवसायों का भी इस शिक्षा -व्यवस्था में समावेश है जिसके आधार को कोई भी व्यक्ति अपने पारिवारिक भरण-पोषण के उपयुक्त आजीविका आसानी से कमा सके और बचे हुए समय को आत्म-निर्माण, परिवार-निर्माण तथा समाज-निर्माण के कार्यों में लगाकर जीवन को लौकिक और पारलौकिक दोनों ही दृष्टियों से सफल बना सकें।

एक वर्षीय शिक्षण में (1) प्रेस-व्यवसाय (2) साबुन व्यवसाय दो उद्योगों की शिक्षा रखी गई है। उनके साथ ही रबड़ की मुहरें बनाना तथा मोमबत्ती बनाना, दो छोटे सहायक उद्योग भी हैं। यह क्लास इस चार वर्षीय शिक्षा-क्रम के प्रथम वर्ष में भी रहेगा। शेष तीन वर्षों के लिये अन्य उद्योगों की व्यवस्था बनाई जा रही है-(1) घड़ी-साजी (2) रेडियो-ट्रांजिस्टरों की मरम्मत तथा उनका निर्माण (3) मोजे, बनियान आदि हौजरी-उद्योग (4) निवाड़ उद्योग (5) ड्राई क्लीनिंग-पेट्रोल से तुरन्त ऊनी, रेशमी सूती कपड़े धो देना (6) खिलौने-प्लास्टिक के, टीन के, कागज की लुगदी के बनाना (7) बिस्किट, डबल रोटी, लेमनजूस की गोलियाँ बनाना। (8) मधुमक्खी पालन जैसे उद्योगों के बारे में व्यवस्था बनाई जा रही है। हर वर्ष इनमें से दो उद्योग बढ़ाए जायेंगे। तीन वर्ष वालों को 6 और चार वर्ष वालों को 7 उद्योग सीखने का अवसर मिल सकता है। छात्र को एक उद्योग में उसकी रुचि के अनुसार विशेषज्ञ बनाया जाएगा। शेष की सामान्य जानकारी रहेगी। उपरोक्त सभी उद्योग ऐसे हैं जिनके आधार पर कोई जानकार रोटी कमाने की समस्या को आसानी से हल कर सकता है और स्वतन्त्र स्वाभिमानी जीवन बिता सकता है।

आरंभ के वर्ष में प्रेस तथा साबुन दो ही उद्योगों का प्रबंध किया है। छात्रों की अभिरुचि के अनुरूप अगले वर्षों में हर साल दो उद्योगों की शिक्षा व्यवस्था बढ़ाई जाती रहेगी। इस प्रकार आगामी 4 वर्ष में यह शिल्प शिक्षा व्यवस्था एक-एक कदम आगे बढ़ती हुई सर्वांगपूर्ण हो जायेगी।

इस सारे प्रशिक्षण की कोई फीस नहीं है। निवास, बिजली आदि की व्यवस्था भी निःशुल्क है। छात्रों को जो खर्च करना है वह उनके अपने खाने पहनने-भर का है। दो-दो, तीन-तीन छात्र मिलकर अपना भोजन पका लिया करेंगे। जब तक उन्हें बनाना अच्छी तरह न आ जायेगा तब तक शिक्षक उन्हें साथ बैठ कर सिखाते रहेंगे। इस तरह थोड़े ही दिनों में हर छात्र इस दिशा में स्वावलम्बी हो जायेगा और अपनी स्थिति के अनुरूप सस्ते या महंगे में गुजारा कर सकेगा।

साधारणतया हर विषय का प्रशिक्षण भाषणों द्वारा किया जाया करेगा। छात्र उनके नोट लिखा करेंगे। इनके लिए काफी, स्याही, कलम अपनी खर्च होंगी। इन विषयों की विशेष जानकारी के लिए पुस्तकें लाइब्रेरी में रहेंगी जिन्हें छात्र सुविधानुसार पढ़ते रह सकते हैं। शिल्प तथा व्यायाम तथा शस्त्र शिक्षा के साधन भी विद्यालय ही निःशुल्क उपलब्ध करेगा। छात्रों को इसके लिए कुछ भी खर्च नहीं करना है।

पोशाक सभी छात्रों की एक सी होगी। कुर्ता, जाकेट, धोती, कंधे पर दुपट्टा। जाड़े के दिनों में यही पोशाक गरम रह सकती है। भीतर स्वेटर पहना जा सकता है। व्यायाम एवं शस्त्र शिक्षा के लिए खाकी नेकर तथा खाकी आधी बाँहों की कमीज प्रयुक्त होगी। छात्र अपने साथ पहनने, ओढ़ने, बिछाने के आवश्यक वस्त्र तथा भोजन पकाने खाने के बर्तन लेकर आवेंगे।

उपरोक्त प्रशिक्षण जूनियर हाई स्कूल वालों के लिए 4 वर्ष का और हाई स्कूल वालों के लिए 3 वर्ष का है। जिन्हें दाखिला लेना हो वे अप्रैल के अन्त तक अपने आवेदन पत्र भेज दें। स्थान सीमित रहने से इस वर्ष थोड़े ही छात्र लिए जायेंगे।

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