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Magazine - Year 1967 - Version 2

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विशेष प्रयोजन के लिए, विशिष्ट आत्माओं का विशेष अवतरण

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अगले दिनों निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी घटना घटित होने वाली है। इतनी बड़ी जिसकी तुलना में इतिहास की पिछली सभी परिवर्तन चर्चाएं फीकी पड़ जायेंगी। प्राचीन काल में विज्ञान का इतना विकास नहीं हुआ था। जनसंख्या की दृष्टि से मनुष्य इतने अधिक नहीं बढ़े फैले थे, और न यातायात की इतनी त्वरा सुविधाएं थीं जितनी आज हैं। आज तो सारा संसार एक नगर की गली मुहल्ले जैसा हो गया है। उन दिनों विद्वान तो थे पर सर्वसाधारण तक विचार शीलता की हवा नहीं पहुँची थी। थोड़े ही लोग शक्ति सम्पन्न होते थे इसलिये उन्हीं की हार-जीत संसार की स्थिति बदल देती थी। पर आज स्थिति एवं शक्ति का स्रोत नागरिकों तक जा पहुँचा है। इसलिये अब हर क्षेत्र का दायरा बहुत बढ़ गया है। इसी दृष्टि से भावी परिवर्तन अब तक के सभी परिवर्तनों की अपेक्षा अधिक बड़ा, अधिक व्यापक और अधिक उथल-पुथल भरा होगा।

क्या राजनैतिक, क्या दार्शनिक, क्या वैज्ञानिक, क्या समाज-शास्त्री, क्या अर्थ विशेषज्ञ, क्या अध्यात्मवादी सभी एक स्वर से यह अनुभव करते हैं कि जिस रास्ते पर आज दुनिया चल पड़ी है वह गलत और अनुचित है। इसकी प्रतिक्रिया हमें हर बीसवें साल एक ऐसा महायुद्ध लड़ने के लिये विवश करती है जिसमें उत्तरोत्तर धन जन की अपार हानि होती है और नई-नई समस्याएं, उलझनें और गुत्थियाँ उठ खड़ी होती हैं। इसके अतिरिक्त मानव जाति की वर्तमान विचारधारा जन साधारण के जीवन को दिन-दिन अधिक बोझिल अधिक अशान्ति और अधिक जटिल, अधिक कष्टकर और अधिक असफल बनाती चली जा रही है। आज भी कम विपन्नता नहीं है, आज भी सर्व साधारण को इन परिस्थितियों के कारण बहुत असंतोष, बहुत रोष और बहुत कष्ट है फिर यदि यही वातावरण बना रहा और जैसी कि सम्भावना है अगले दिनों और भी बिगड़ा तो यह दुनिया मनुष्यों के रहने लायक न रह जायगी। उलझनें इतनी अधिक बढ़ेंगी कि लोग उन्हीं से उलझ उलझ कर बुरी तरह मर-खप कर नष्ट हो जायेंगे।

यह परिस्थिति हर विचारशील को यह सोचने के लिए विवश करती है कि आज की रीति-नीति को बदला जाना चाहिये। बदलाव के स्वरूपों और तरीकों में अन्तर है पर यह निष्कर्ष सर्व सम्मत है कि आदमी को नेक और उदार होना चाहिये तथा उसकी गतिविधियाँ ऐसी हों जो एक दूसरे से टकराने की नहीं स्नेह सहयोग की स्थिति पैदा करें। साधनों को विनाश के लिये नहीं विकास के लिये प्रयुक्त किया जाय। यही युग की पुकार है, यही महाकाल की आकांक्षा। पर दुनिया एक नशे बाज की तरह हैं, जिसे अपने पुराने ढर्रे के दोष विदित होते हुए भी उसे बदलने में बड़ी कठिनाई प्रतीत होती है। परिवर्तन की बात सुन कर उसका जी घबराता है, डर लगता है। जो है सो ठीक। जो ढर्रा चल रहा है उसी लकीर पर लुढ़कते रहने में लोग सुविधा सोचते हैं। विवेक एवं औचित्य के स्थान पर सर्वसाधारण की रुचि पुराने ढर्रे पर चलते रहने की है। यदि इस रुचि को बदला न जाय, लकीर के फकीर बने रहने की रूढ़ि गत परम्पराओं से चिपके रहने की आदतों को न सुधारा जाय तो फिर तेजी से सर्वनाश के निकट जा पहुँचना ही एकमात्र परिणाम शेष रह जायगा।

अस्तु भावनात्मक एवं क्रिया पद्धति की वर्तमान रीति-नीति में साधारण सुधार नहीं भारी परिवर्तन आज की एक अनिवार्य आवश्यकता बनकर सामने आया है और वह पूरा होकर रहेगा। जन मानस में यह अभिलाषा अव्यक्त रूप से काम कर रही है। वे स्वयं बदलना भले ही पसन्द न करें पर परिस्थितियों को जरूर बदला देखना चाहते हैं। ऐसी जन आकाँक्षा को अध्यात्मवादी दैवी प्रेरणा के रूप में देखते हैं। विश्व की सूक्ष्म परिस्थितियों का ज्ञान रखने वाले तत्वदर्शी इस प्रवाह के पीछे परब्रह्म परमात्मा की महा प्रेरणा को कर्म करता हुआ मानते हैं। महाकाल ऐसी ही ईश्वरी शक्ति है जो अवाँछनीय परिस्थितियों में अवाँछनीयता को बदल देने का अपना काम अनादि काल से अभीष्ट अवसरों पर बड़ी खूबी के साथ सम्पन्न करती रही है। उसी महाशक्ति की हलचलों को इन दिनों हर तत्वदर्शी अनुभव करता है और भावी परिवर्तन को अवश्यंभावी मानता है। स्वभावतः ऐसे व्यापक परिवर्तनों के अवसर पर अवाँछनीय तत्व प्रतिरोध करते हैं, गड़बड़ फैलाते और बाधा डालते हैं। उन्हें इस उद्धतता का सबक सिखाने के लिये दैव दंड के करारे प्रहार होते हैं। जितने बड़े परिवर्तन होते हैं उतने ही उसके प्रतिरोध भी खड़े होते हैं और उतने ही कड़े वज्र दंड बरसते हैं। पहले भी यही होता रहा है अगले दिनों भी यही होने वाला है। जुलाई के अंक में इसी सम्भावना की चर्चा है। इस अक्टूबर अंक में इतिहास की उन थोड़ी सी घटनाओं का वर्णन हैं जिनसे परिवर्तनकाल में घटित होने वाले क्रिया-कलाप का दिग्दर्शन हो सकता है। इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करता रहता है। अब फिर लगभग उसी आधार पर थोड़े हेर-फेर के साथ घटनाचक्र प्रवर्तित होने वाला है।

यह महत्वपूर्ण जानकारियाँ इसलिये प्रस्तुत की गई हैं कि यदि सम्भव है तो समय रहते अपने को और दूसरों को बदलने की चेष्टा की जाय, इससे महाकाल के कार्य में सरलता होगी, कष्टों में संसार को बहुत कुछ राहत मिल जायगी और उपद्रवों की उग्रता अनावश्यक विक्षोभ पैदा करने में रुक जायगी। जिम्मेदार, ईमानदार और थोड़े ऊंचे उठे हुये लोगों को करना भी यही चाहिये। आपत्तिकाल में तो आपत्ति धर्म पालन करना ही चाहिये, आग को बुझाने के लिये अपने दैनिक कार्यों और सुविधाओं को छोड़ना ही उचित है। इसी औचित्य का उद्बोधन इस रहस्योद्घाटन का लक्ष्य है। अगला समय कैसा आयेगा उससे बदली हुई रीति-नीति किस प्रकार की होगी, इसकी चर्चा अगले अंक में- नवम्बर की अखण्ड ज्योति में परिजन देख सकेंगे। अच्छा हो कि हम अपने को और दूसरों को उसी दिशा में झुकाने की और महाकाल की क्रिया पद्धति में अनुकूलता उत्पन्न करने की चेष्टा करें।

यहाँ यह बात भली प्रकार समझ लेनी चाहिये कि इस परिवर्तन प्रक्रिया की अभीष्ट पृष्ठभूमि तैयार करने की ईश्वरीय जिम्मेदारी कुछ विशेष आत्माओं पर सौंपी गई है। उनमें से बहुत कुछ को अखण्ड ज्योति परिवार के अंतर्गत संगठित कर दिया गया है। जो बाहर हैं वे भी अगले प्रवाह में साथ हो लेंगी। यों देखने में हम लोग एक साधारण स्तर का जीवन जीते हैं और बाहर से कोई विशेषता अपने अन्दर दिखाई नहीं पड़ती, फिर भी “परमार्थ प्रयोजनों के लिये बहुत कुछ कर गुजरने की अभिलाषा” एक ऐसा तत्व है जिसे ईश्वरीय प्रकाश एवं पूर्व जन्मों के संचित उत्कृष्ट संस्कारों का प्रवाह कह सकते हैं। अपनी यही विशेषता है। जिसकी उत्कृष्ट आकाँक्षाएं मर गई वस्तुतः वही मृतक है। जिसके भीतर जितनी ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोगी बनने की तड़पन है वह उतना ही दिव्य आत्मा है। तड़पन पानी के सोतों की तरह है जो पहाड़ जैसी कठोरता को चीर कर बाहर निकल आती है। साधारण परिस्थिति के लोग भी उपयुक्त अवसर पर अपनी तड़पन को क्रियान्वित करने का जब साहस कर बैठते हैं तब वह साहस ही ईश्वरीय अवतरण के रूप में उन्हें सूर्य, चन्द्रमा की तरह चमका देता है। तड़पन का फूट पड़ना, इसी का नाम अवतरण है।

अपने परिवार में एक से एक बढ़ कर उत्कृष्ट स्तर की आत्माएं इन दिनों मौजूद हैं। वे जन्मी भी इसी प्रयोजन के लिये हैं। ऐसे महान अवसरों पर उत्कृष्टता सम्पन्न सुसंस्कारी आत्माएं ही बड़ी भूमिकाएं प्रस्तुत करने का साहस करती हैं। आन्तरिक साहस उनकी साँसारिक सुविधाओं को मकड़ी के जाले की तरह तोड़-फोड़ कर रख देता है और लगता है कि यह व्यक्ति अपनी विषम परिस्थितियों के कारण कोई कहने लायक काम न कर सकेगा। देखा जाता है कि वही ऐतिहासिक महापुरुष स्तर के काम करता है। यह और कुछ नहीं उत्कृष्ट सुयोजनों के लिये दुस्साहस कर बैठने की हिम्मत ही है, जिसे ईश्वरीय प्रेरणा के रूप में परखा जा सकता है। हममें से अनेकों परिजन अभी अपनी ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करने की बात सोच रहे हैं। कई उसके लिये कदम बढ़ा रहे हैं। कई दुस्साहसपूर्वक अग्रगामी होने की स्थिति को छू रहे हो। यह शुभ लक्षण है। यह इस बात के प्रमाण हैं कि जो कार्य हमें सौंपा गया हैं, जिसके लिये अपना यह महत्वपूर्ण जन्म है अब उसकी पूर्णता के लिए अभीष्ट प्रकाश एवं साहस अपने अन्दर उत्पन्न हो चला और वह करने का समय आ गया जो इन दिनों- ठीक इन्हीं दिनों करना आवश्यक है।

इतिहास अपनी पुनरावृत्ति कर रहा है। अपना परिवार एक ईश्वरीय महान प्रयोजन की पूर्ति में सहायक बनने के लिये पुनः आ इकट्ठा हुआ है। अच्छा हो हम अपने को पहचानें और अतीत काल की सूखी स्मृतियों को फिर हरी कर लें। निश्चित रूप से हम एक अत्यन्त घनिष्ठ और निकटवर्ती आत्मीय परिवार के चिर आत्मीय सदस्य रहते चले आ रहे हैं। समय आने पर इसका रहस्य भी खुल जायगा, पर अभी जब तक वह समय नहीं आया। हम लोग एक हल्की सी झाँकी इस रूप में पा सकते हैं कि परस्पर हम में से किसका क्या संबंध रहा है। और कितने समय पूर्व, किसने, किस प्रकार की दिव्य भूमिकाएं सम्पादित की थीं। थोड़ा सा प्रयत्न करने पर यह अनुभव आसानी से हो सकते हैं। ऐसी जानकारी आत्मज्ञान की दृष्टि से श्रेयस्कर एवं सहायक ही होगी। रात्रि के अन्तिम भाग में प्रायः अन्तः चेतना अधिक स्पष्ट एवं निर्मल होती है। उस समय आँख खुलने पर बिस्तर में पड़े-पड़े ही अन्तःकरण को सामान्य विचारों से खाली करके इस अनुभव के लिये खुला छोड़ देना चाहिये कि अपने अतीत जन्मों एवं क्रिया-कलापों की हलकी सी अनुभूति उससे प्रस्फुटित हो। कई दिन ऐसा प्रयास करते रहने से अनुभव में स्थिरता आ जायगी। हिलते हुये पानी की लहरों में प्रतिबिम्ब ठीक से नहीं दिखता पर जैसे-जैसे पानी का हिलना स्थिर होता जाता है प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखने लगता है। ठीक उसी प्रकार आरम्भ के दिनों में इस प्रकार की अनुभूति अस्त-व्यस्त रहेंगी, उसमें एक दूसरे से भिन्न प्रकार के-परस्पर विरोधी एवं विसंगत अनुभव भी आयेंगे पर थोड़े ही दिनों में कुछ अनुभूतियाँ बार बार, अधिक स्पष्ट और अधिक वास्तविक प्रतीत होने लगेंगी। वे कई जन्मों की होंगी। इस प्रकार की अनुभूतियों को नोट करते रहा जाय तो स्थिति की बहुत कुछ सफाई हो सकती है। कम से कम तीन महीने के प्रयास जारी रखने पर उसमें जो आभास मिले उसका स्पष्टीकरण करने में हम भी सहायता कर सकते हैं, यह अनुभव परिजनों में यह विश्वास उत्पन्न करेंगे कि हम लोग किस सुदृढ़ घनिष्ठता एवं प्रगाढ़ आत्मीयता के स्नेह सूत्र में परस्पर आबद्ध चले आ रहे हैं और अब एक विशेष प्रयोजन के लिये विवाह शादी के अवसर पर इकट्ठे होने वाले स्वजन सम्बन्धियों तरह पुनः एकत्रित हो गये हैं। शरीर से दूर रहते हुए भी हम लोग वस्तुतः कितने अधिक निकट हैं।

रात्रि को सोते समय और प्रातः उठते समय हम लोग परस्पर मित्रता, घनिष्ठता, समीपता और अभिन्नता का ध्यान कर सकें तो उससे एक महत्वपूर्ण प्रगति होगी। हम लोगों के व्यक्तित्वों में एक दूसरे का समावेश होने लगेगा। यह आत्मिक आदान-प्रदान दोनों के लिए उपयोगी हैं। हमें चार वर्ष बाद एक अनुपम तपश्चर्या में संलग्न होना है। उस समय तक अपने व्यक्तित्व में अनेक आत्माओं का समावेश हो जायगा तो वह तपश्चर्या प्रखर होगी और उसका श्रेय एवं प्रतिफल भी उतने ही अंशों में उन्हें मिलता रहेगा, अंडों को चिड़िया अपनी छाती के नीचे दबाए बैठे रहती है तो चिड़िया की गर्मी से अंडे पकते रहते हैं। यह परम्परा आध्यात्मिक क्षेत्र में भी चलती रहती है। अधिक सामर्थ्यवान गुरुजन अपने से स्वल्प शक्ति वालों को अपने शक्ति कोष में से एक अंश देते रहते हैं। इस आदान-प्रदान में समीपता की आवश्यकता होती है। यह समीपता दूर रहते हुए भी उपरोक्त प्रकार से घनिष्ठता, समीपता, एकता एवं अभिन्नता का ध्यान करने से भी सम्भव हो सकती है। ध्यान जितना ही भावनापूर्ण होगा उतना ही उसका परिणाम भी अधिक स्पष्ट होगा। इस क्रम को अपना कर हम एक दूसरे के अधिक निकट आ सकते हैं और अपने वास्तविक स्वरूप एवं कर्त्तव्य को अधिक अच्छी तरह पहचान सकते हैं।

जो हो हमें युग परिवर्तन की वास्तविकता को समझना चाहिये और प्रबुद्ध आत्माओं की तरह अपने कंधों पर कार्य उत्तरदायित्वों को पूरा साहस समेट कर वहन करना ही चाहिये। हमें उस दिशा में अग्रसर होना ही चाहिये जिसके लिये इन विषम परिस्थितियों में अपना विशेष अवतरण हुआ है।

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