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Magazine - Year 1967 - Version 2

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महाकाल और उनका रौद्र रूप

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सृजन के देवता-ब्रह्म, पोषण के अधिष्ठाता-विष्णु और संहार के व्यवस्थापक भगवान शंकर है। त्रिदेवों की एक पूरक व्यवस्था के अंतर्गत ही इस विश्व ब्रह्मांड का क्रिया कलाप गतिशील हो रहा है। उत्पादन की प्रक्रिया प्राणधारियों तथा पदार्थों सहित चलते रहने से संसार की बढ़ोतरी होती है। जो उत्पन्न हुआ है उसका पोषण, अभिवर्धन होते रहने से प्रौढ़ता और परिपक्वता आती है। और जो उपजा है, बढ़ा है, पुष्ट हुआ है वह अन्ततः जराजीर्ण होने पर अनुपयोगी बन जाने के कारण कूड़ा-करकट मात्र रह जाता है, तब उसकी अन्त्येष्टि भी अभीष्ट होती है। विनाश-उत्पादन का अन्तिम छोर है। बीज का विनाश ही नये पौधे के उत्पादन का आधार है। पुरानी फसल कटने के बाद ही नई फसल के बोने उगाने का क्रम बनता है। प्राणी की मृत्यु न हो तो उसे नया जन्म धारण करने का अवसर कैसे मिले? सृष्टि का चक्र उत्पादन, अभिवर्धन और अवसान के चक्र पर घूम रहा है। अवसान न हो तो फिर उत्पादन के लिए नया पदार्थ कहाँ से आये? विधाता ने सृष्टि के आदि से जितना पदार्थ सृजा था उसी की उलट-पुलट होती रहती है और उसी की हेरा-फेरी से इस संसार में हलचल दीखती रहती है। अस्तु उत्पादन जितना क्राँतिमय हैं उतना ही अवसान भी। अवसान को अभिनव सृजन का शुभारम्भ कहा जाय तो यह सर्वथा उचित ही होगा।

भगवान शंकर का निवास स्थान श्मशान है। वे गले में मुण्ड-माला धारण करते हैं। मृत्यु के काल-पाश-महासर्प उनके कंठ में भुजाओं में, यज्ञोपवीत में लिपटे हुए हैं। तीक्ष्ण त्रिशूल उनका शस्त्र है। जब वे तीसरा नेत्र खोलते हैं तब चारों ओर आग बरसती है। कुपित होकर वे तीसरे नेत्र से जिसे भी देखते हैं वह जल-वल कर भस्म हो जाता है। कामदेव की मृग मरीचिका को एक बार उनके वीरभद्र, भैरव एवं नन्दी गण कितने विकराल हैं इसकी कल्पना करने मात्र से रोमाँच हो उठता है। जब प्रलय की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है तब वे ताण्डव नृत्य करने खड़े होते हैं। उनके चरणों की थिरकन जैसे-जैसे गतिशील होती चलती है वैसे ही जराजीर्ण कूड़ा-करकट प्रभूत दावानल में जल-जल कर अनन्त अन्तरिक्ष में विलय होता चला जाता है। पाप-पुरुष उनके चरणों में आ गिरता है। शिव-ताण्डव-नृत्य के चित्रों में एक उकड़ूं उलटे मुँह पड़ा हुआ भयभीत जीव दिखाई पड़ता है। उसी की पीठ पर नटराज के चरणों की थिरकन गतिशील होती है। यह पाप पुरुष मानव अन्तःकरण में निवास करने वाले पशु ही हैं, इसी की समय-समय पर असुर शब्द से भर्त्सना की जाती रहती है। ताण्डव नृत्य का प्रयोजन इस पाप पुरुष को परास्त करना उसकी माया मरीचिका को निरस्त करना ही है।

पाप पुरुष- असुरत्व मानवीय अन्तः चेतना में अनेक छन्द रूप धारण कर प्रवेश करता रहता है और उसे संकीर्ण स्वार्थ परता के- वासना और तृष्णा के- जाल जंजाल में फसाने के लिये विविध प्रलोभन एवं आकर्षण दिखाता रहता है। अविवेकी जीव इसी प्रलोभन में फंसता चला जाता है और अपनी ललक लिप्साओं की पूर्ति के लिए एक से एक अनोखे प्रपंच रचता रहता है। पाप पुरुष की प्रवंचना से जकड़ा हुआ प्राणी केवल वासना एवं तृष्णा की पूर्ति में ही रस लेता है, जीवनोद्देश्य एवं कर्त्तव्य धर्म की ओर तो आँख उठा कर देखने की भी इच्छा नहीं होती। इच्छा नहीं तो आवश्यकता कहाँ? सुविधा कहाँ? कामनाओं का इतना बड़ा पर्वत उसके सामने आ खड़ा होता है जिस पर चढ़ते-चढ़ते उसकी सारी शक्ति चुक जाती हैं, अभाव ही अभाव उसे चारों ओर दीखते हैं, जो उपलब्ध है वह अति न्यून दिखाई पड़ता है। ऐसी दशा में तुर्त-फुर्त बहुत कुछ समेट लेने, बहुत कुछ बरतने, बहुत कुछ भोग लेने के लिए अनीति का मार्ग ही एकमात्र अवलम्बन शेष रह जाता है। पाप पुरुष के जाल जंजाल में जकड़ा हुआ जीव अनीति ही सोचता है। अनीति ही बर्तता है। मर्यादाओं का पालन करने में उसे दरिद्रता पल्ले बंधती दीखती है। संचय रूखा और नीरस लगता है। अतएव उसे संचय और उपभोग की दिशा में दौड़ने में ही बुद्धिमानी प्रतीत होती है। इस घुड़दौड़ में कर्त्तव्य और आदर्श पिछड़ जाते हैं, अनीति ही एक मात्र सहचरी रह जाती है।

इस दयनीय दुर्दशा में पड़े हुए जीवधारी का उद्बोधन प्रबोधन करने समय-समय पर देवदूत, ऋषि, मनीषी, महापुरुष और अवतारी आते रहते हैं। उनके द्वारा समय-समय पर सामयिक मरहम पट्टी भी होती रहती है। मरम्मत से कुछ काम चल जाता है। प्रभावशाली धर्मोपदेष्टा अपने समय में एक सामयिक परिवर्तन भी उत्पन्न का देते हैं। उनके प्रयास कुछ सफल होते हैं। पर अन्ततः एक अवस्था ऐसी आ जाती हैं जब उस जरा-जीर्ण स्थिति को तोड़-फोड़ कर पुनः निर्माण का एक अभिनव सूत्रपात नये सिरे से करना पड़ता है। क्योंकि पाप पुरुष के चंगुल में फंसा हुआ व्यक्ति जब उद्बोधनों का भी कोई प्रभाव ग्रहण नहीं करता, मनोभूमि चिकने घड़े की तरह हो जाती है, एक दूसरे को उपदेश देने की विडम्बना रचते हैं और धर्माडम्बर का ढोंग रचने की कला में इतनी प्रवीणता बढ़ जाती है कि सुधारवाद के सारे प्रयत्न उस दंभ-प्रवाह में तिनके की तरह उड़ते-बहते चले जाते हैं। धर्मध्वजी दीखने वाले व्यक्ति ही जब धर्मद्रोह पर उतारू हों तब समझना चाहिये कि अब सुधार प्रयत्नों का अवसर चला गया अब मरहमपट्टी की स्थिति भी नहीं रही। इस विष-व्रण के लिए अब ‘मेजर आपरेशन’ की भयानक चीरफाड़ की अनिवार्य आवश्यकता उत्पन्न हो गई।

बाह्य दृष्टि से आज का संसार प्राचीन काल की अपेक्षा अधिक समृद्ध, अधिक साधन सम्पन्न और अधिक समर्थ है। लगता है हम प्रगति के पथ पर तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं। यह भौतिक मूल्याँकन सही भी हो सकता हैं। पर आत्मिक क्षेत्र में स्थिति बिलकुल उलटी है। भावनाओं में से उत्कृष्टता और आदर्शवादिता उठती सी चली जा रही है। आदर्श चरित्र के व्यक्ति जिनका भीतरी और बाहरी स्वरूप एक हो, ढूँढ़े नहीं मिलते। परस्पर आत्मीयता सहयोग सेवा और उदारता दरिद्रता इतनी व्यापक हो चली है कि किसी भी भयानक दुर्भिक्ष से उसकी विभीषिका लाखों गुनी अधिक है। यही मानव जाति का संसार का- सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। इसी कमी के कारण साधन सामग्री की दृष्टि से यह समुन्नत समय आज नरक की आग में जल रहा है जबकि इतनी साधन सम्पन्नता मिलने पर सर्वत्र स्वर्गीय वातावरण परिलक्षित होना चाहिए था।

इस अभाव की पूर्ति पुनर्निर्माण से ही सम्भव हैं। पीतल के बर्तन जब टूट फूट जाते हैं तब उन्हें गला कर दुबारा नया ढाला जाता है। प्रेस के टाइप जब घिस जाते हैं जब उन्हें फौन्ड्री में गलने और नये सिरे से ढलने के लिए भेज दिया जाता हैं। मनुष्यों के अन्तःकरण भी अब टूटे बर्तनों और घिसे टाइपों की तरह दंभी होने के कारण बेकार हो गये हैं। अब उन्हें नये सिरे से गलना और ढलना पड़ेगा। गलाने और ढालने की फैक्ट्रियों में तेज आग की भट्टी जलती रहती है उन रद्दी धातुओं का प्रथम संस्कार उन्हीं से होता है। उनकी कठोरता को कोमलता में बदलने के लिए सब से प्रथम अग्नि संस्कार का ही आयोजन होता है। धातुओं को ढालने की छोटी भट्टियाँ मनुष्यों द्वारा बनाई जा सकती हैं। पर करोड़ों अरबों हृदय हीन घिसे टूटे मनुष्यों को उनके वास्तविक और उपयोगी स्वरूप में परिवर्तित करने के लिए जो भट्टी जलाई जायेगी उसके लिए बहुत बड़ी, बहुत व्यापक व्यवस्था होगी। महाकाल इसी की विधि व्यवस्था में इन दिनों लगा हुआ है।

महाप्रलय का अन्तिम ताण्डव नृत्य तब होता है जब पंचतत्वों से बनी प्रकृति जराजीर्ण हो जाती है। तत्व बूढ़े होने के कारण अपना काम ठीक तरह समयानुसार नहीं कर पाते। ऋतुएं समय पर नहीं आतीं और उत्पादन, पोषण, विनाश की क्रम व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है। धरती की उत्पादन और धारण शक्ति बीत जाती और ग्रह नक्षत्र अपना काम नियत समय से पूरा करने में असमर्थता प्रकट करते हैं। ऐसी स्थिति में महाकाल का अन्तिम ताण्डव नृत्य इस ब्रह्माण्ड को चूर्ण विचूर्ण कर छितरा बिखरा देने वाली महाज्वालायें प्रचण्ड करता है और एक नयी सृष्टि के सृजन की भूमिका सम्पादित करने के लिए महाकाली- फिर अपने प्रसव प्रजनन की तैयारी में लग जाती है। कालरात्रि की उस महानिशा का- महारात्रि का बड़ा शृंगार पूर्ण वर्णन पुराणों में मिलता हैं। महानिशा समाप्त होने पर फिर सृष्टि नये सिरे से उत्पन्न होती है।

यह महाप्रलय करोड़ों वर्ष बाद होती है। पर युग परिवर्तन के अवसर पर खण्ड प्रलय जैसा एक भयानक विस्फोट प्रायः होता रहता है। यह महाकाल के खण्ड नर्तन हैं, यों कहा इन्हें भी ताण्डव नृत्य ही जाता है। जब मानवीय मनोभूमि अत्यधिक दूषित होकर उस स्तर पर पहुँच जाती है कि सुधारक के सामान्य क्रिया कलाप निरर्थक सिद्ध होने लगें तो महाकाल को अपने तीव्र अस्त्रों का ही प्रयोग करना पड़ता है। प्रायः ऐसी ही परिस्थितियों में जन समाज को कड़े दंड देने के लिए लोमहर्षक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इस भयानक क्रूर कर्म को करने के लिए अवसान के देवता-शंकर-जब रौद्र रूप धारण करते हैं और उथल-पुथल की रक्त रंजित क्रिया पद्धति अपनाते हैं तब उन्हें रुद्र कहते हैं। इस कल्प के आरम्भ से लेकर अब तक महाकाल को ग्यारह बार रुद्र रूप धारण करना पड़ा है। पुराणों में एकादश रुद्रों के नाम दिखाये गये हैं और उनके चरित्रों का विस्तृत वर्णन है।

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