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Magazine - Year 1970 - Version 2

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मंत्र परम लघु जासुवश विधि हरि हर सुर सर्व

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First 18 20 Last

मंत्र, योग साधना का एक ऐसा शब्द और विज्ञान है कि उसका उच्चारण करते ही किसी चमत्कारिक शक्ति का बोध होता है। ऐसी धारणा है कि प्राचीन काल के योगी, ऋषि और तत्वदर्शी महापुरुषों ने मंत्रबल से पृथ्वी, देव-लोक और ब्रह्माण्ड की अनन्त शक्तियों पर विजय पाई थी। मंत्र शक्ति के प्रभाव से वे इतने समर्थ बन गये थे कि इच्छानुसार किसी भी पदार्थ का हस्तान्तरण, शक्ति को पदार्थ और पदार्थ को शक्ति में बदल देते थे। शाप और वरदान मंत्र का ही प्रभाव माना जाता है। एक क्षण में किसी का रोग अच्छा कर देना, एक पल में करोड़ों मील दूर की बात जान लेना एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र की जानकारी और शरीर की 72 हजार नाड़ियों के एक-एक जोड़ की जानकारी तक मंत्र की ही अलौकिक शक्ति थी। इसलिये भारतीय तत्वदर्शन में मंत्र शक्ति पर जितनी शोधें हुई हैं, उतनी और किसी पर भी नहीं हुई। मंत्रों के आविष्कारक होने के कारण ही ऋषि मंत्र दृष्टा कहलाते थे। वेद और कुछ नहीं एक प्रकार के मंत्र विज्ञान हैं जिनमें विराट् ब्रह्माण्ड की उन अलौकिक सूक्ष्म और चेतन सत्ताओं और शक्तियों तक से सम्बन्ध स्थापित करने के गूढ़ रहस्य दिये हुए हैं, जिनके सम्बन्ध में विज्ञान अभी “क ख ग“ भी नहीं जानता।

मंत्र का सीधा सम्बन्ध उच्चारण या ध्वनि से है। इसलिये इसे “ध्वनि विज्ञान” भी कह सकते हैं। अब तक इस दिशा में जो वैज्ञानिक अनुसंधान हुए और निष्कर्ष निकले हैं वह यह बताते हैं कि सामान्य भारतीय मंत्र शक्ति पर भले ही विश्वास न करें पर वैज्ञानिक अब उसी दिशा में अग्रसर हो रहें है। वह समय समीप ही है जब ध्वनि विज्ञान की उन्नति ऋषियों जैसे ही कौतूहलवर्द्धक कार्य करने लगेगी। उदाहरण के लिये “ट्रान्स्डूयसर” यंत्र से सूक्ष्म से सूक्ष्म आपरेशन किया जा सकता है। वह शब्द को कर्णातीत शक्ति का ही फल है। प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री डॉ. फ्रिस्टलाव ने “अल्ट्रासोनोरेटर” नामक एक ऐसा मंत्र तैयार किया है जो दो रासायनिक द्रव्यों को थोड़ी ही देर में मिला सकता है। इस पद्धति में एक ‘खे’ का उपयोग किया जाता है। कर्णातीत ध्वनि खे को प्रभावित करती है खे इतनी तीव्रता से कम्पन करता है कि भारी मात्रा में भरा हुआ जल कड़ाही में खौलते पानी की तरह मंथन करने लगता है। वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि एक दिन वह आयेगा जब कर्णातीत ध्वनि से सृष्टि के किसी भी अदृश्य भाग के प्राकृतिक परमाणु में तीव्र हल-चल उत्पन्न कर किसी भी क्षेत्र को मथ डालना या उसमें परिवर्तन उत्पन्न कर देना सम्भव हो जायेगा। कई कीटाणु ऐसे होते हैं जो किन्हीं रसायनों में इस कदर घुल मिल जाते हैं कि उन्हें किसी बाह्य उपचार द्वारा नष्ट करना संभव नहीं होता, कर्णातीत या सूक्ष्म ध्वनि कम्पन उन्हें भी नष्ट कर देते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि भारतीय तत्वदर्शी मंत्र शक्ति से किसी के रोग अच्छा कर देने, विष उतार देने, लोगों के रोग और उन्माद नष्ट कर देने के प्रयोग सफलतापूर्वक करते रहे हैं तो यह कोई आश्चर्य न होकर वैज्ञानिक प्रक्रिया ही है और धीरे-धीरे प्रकाश में आ रही है।

आज मंत्र विज्ञान के नाम पर भारी अन्धविश्वास फैला हुआ है और सीधे-सीधे भारतीयों का मंत्रों पर अनादि विश्वास झूठे दृष्टाओं ओझाओं की सहायता करता है। ये ओझा और तथाकथित मंत्रविद जानते कुछ नहीं, लोगों की श्रद्धा का दोहन करते रहते हैं पर सचमुच ही यदि मंत्र शक्ति के विज्ञान को समझकर उसे प्रयोग करने की विधि जान ली जाये तो जो शक्ति आज लोगों को बरगलाने में प्रयुक्त हो रही है, वह लोक-मंगल के काम आ सकती है आज यह बात विज्ञान भी मानता है।

कैलीफोर्निया अमेरिका में हुए एक प्रयोग में एक वैज्ञानिक ने एक सैकिण्ड में पाँच करोड़ से अधिक कम्पन वाली ध्वनि पैदा कर दी उस क्षेत्र में रुई का टुकड़ा पड़ा था वह अकस्मात जल उठा वैज्ञानिकों के कपड़े इतने गर्म हो उठे कि यदि वे कुछ देर के लिये उस क्षेत्र से अलग नहीं हो जाते और ध्वनि का कम्पन थोड़ा और तीव्र हो जाता तो उनके शरीर के कपड़े भी जलने लगते।

प्रयोग का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने बताया है कि मनुष्य कम से कम 20 और अधिक से अधिक 20000 कम्पन वाली ध्वनि सुन सकता है। कुछ व्यक्ति खास कर वृद्ध लोग इसके अपवाद हो सकते हैं अन्यथा इस सीमा से बाहर वाले कंपनों की ध्वनि कानों से सुनी नहीं जा सकती पर उसका अस्तित्व इतना शक्तिशाली होता है कि बादलों के गर्जन से जिस प्रकार सारे प्राकृतिक परमाणु काँप जाते हैं उसी प्रकार यह ध्वनि कम्पन जहाँ से भी गुजरते हैं तीव्र हलचल उत्पन्न कर देते हैं। जीवों को नष्ट कर देना परमाणुओं को उछाल कर उड़ा ले जाना, उन्हें शक्ति में बदल देना, यह सब कर्णातीत ध्वनि की तीव्रता पर निर्भर करता है। योग पद्धति में मंत्र के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि को शब्द-शक्ति ही विद्युत प्रदान करती है जबकि मानवीय इच्छा-शक्ति उस पर नियंत्रण करके कोई भी कार्य कर सकने में समर्थ होती है। जप और ध्यान, नाद (शब्द या ध्वनि कम्पन) और बिन्दु साधना का सम्मिलित रूप है उससे सृष्टि के विराट से विराट और अणु से अणु कण का भेदन भी संभव हो जाता है। इसलिये मंत्र की शक्ति को अकूत माना जाता है और अनुमान किया जाता है कि इस शक्ति की उल्लंघन विधि (ब्रह्मा) विष्णु महेश तथा कोई अन्य देवता भी नहीं कर सकता।

इंग्लैंड की बी. एफ. गुडरिच कंपनी के रिसर्च डाइरेक्टर डॉ. एल सेमान, इस बात के परीक्षण कर रहे हैं कि सूक्ष्म ध्वनि तरंगें प्राकृतिक व कृत्रिम परमाणु की संरचना पर किस प्रकार प्रभाव डालती हैं और इनका उपयोग पृथ्वी के अंतराल ग्रह नक्षत्रों के अन्तराल का पता लगाने में किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है। गायत्री उपासना द्वारा सूर्य के अंतराल का वेधन करके वहाँ के परमाणुओं में हलचल उत्पन्न होना इसी सिद्धान्त के अंतर्गत है जैसा कि चमगादड़ के उदाहरणों से स्पष्ट है। एक बार इटली के जीव विशेषज्ञ स्पालानजानी ने चमगादड़ को अन्धा करके उड़ाया। चमगादड़ में एक अलौकिक क्षमता यह होती है कि कितने ही तीव्र अन्धकार में बारीक से बारीक धागों की सैकड़ों बाधाओं को पार करता हुआ बराबर एक ही गति से उड़ता रहता है। किसी भी डोरे से टकराता नहीं। स्पालानजानी ने चमगादड़ के मुँह, तथा नाक बन्द करके परीक्षण किये तो एक बात स्पष्ट हो गई कि चमगादड़ बाधाओं को पार करने में कर्णातीत ध्वनि का उपयोग करता है पीछे इस बारे में नये तथ्य प्रकाश में आये और पता चला कि चमगादड़ भागते समय हलकी चीख निकालता है वह वस्तु से प्रतिध्वनित होकर लौटती है और चमगादड़ के “रेटीक्युलर फार्मेशन” (मस्तिष्क का वह भाग जहाँ हिन्दू चोटी रखते हैं) की संवेदनशील नाड़ियों द्वारा उसको यह सूचना दे देते हैं कि वस्तु कैसी है। किस दिशा में है आदि। मंत्रधारण में कर्णातीत ध्वनि निकलती है। उसे भावनाओं की विद्युत शक्ति जितनी अधिक मात्रा में मिलती है उतनी ही तीव्रता से यह आकाश के परमाणुओं को कँपाती हुई ध्यान वाले स्थान तक दौड़ी चली जाती है। यह जानने वाली-बात है कि आकाश भी शून्य नहीं है। उसमें करोड़ों सूक्ष्म परमाणु बाल्टी में पानी की भाँति भरे और गतिशील हैं। साधारणतया ध्वनि चारों दिशाओं में फैलती है पर मंत्रों में शब्द इस प्रकार गुंफित होते हैं कि उसकी ध्वनि तरंगें विशेष प्रकार की हो जाती हैं। गायत्री मंत्र की ध्वनि तरंगें तार के छल्ले जैसी ऊपर उठती हैं और यह सूक्ष्म अन्तराल के परमाणुओं के माध्यम से सूर्य तक पहुँचती हैं और जब यही ध्वनि सूर्य के अन्तराल से प्रतिध्वनित होकर लौटती है तो अपने साथ प्रकाश अणुओं की (गर्मी, प्रकाश व विद्युत सहित) फीज जप करने वाले के शरीर में उतारती चली जाती है। साधक उन अणुओं से शरीर ही नहीं मन और आत्मा की शक्तियों का विकास करता चला जाता है। और कई बार वह लाभ प्राप्त करता है जो साँसारिक प्रयत्नों द्वारा कभी भी संभव न होते।

साधक के अन्तःकरण में इन्द्रियातीत दृश्यों की अनुभूति, भविष्य की सूचना वाले स्वप्न भी यंत्र जप के परिणाम होते हैं यही स्थिति एक दिन नाद की उच्चतम अवस्था “ऊँ” कार की स्थिति तक पहुँचा देती है। प्रमाण स्वरूप पिट्सबर्ग (अमरीका) की वेस्टिंग हाउस कि सर्च लैबोरेटरी के इंजीनियरों सर्व श्री डब्लू-एच पाकला, जे-एच-थामसन और आर-ए-लेस्टर द्वारा बनाये उस उपकरण को प्रस्तुत किया जा सकता है जो इन दिनों बिजली के लीकेज का पता लगाने में प्रयुक्त होता है। विद्युत जहाँ से लीक होती है वहाँ हलका लीलम प्रकाश भी पैदा करती है और चटखने की आवाज भी। गति कोई भी हो उसमें स्पन्द के और प्रत्येक स्पन्दन (वाइब्रेशन) की एक सूक्ष्म ध्वनि होती है। पर इसे हमारे कान नहीं सुन सकते। इस यंत्र में दो 20 के लगभग ट्रान्स डयूगर और टेलिस्कोप लगाये जाते हैं जो उस स्थान पर जहाँ से बिजली लीक होने से कर्णातीत कम्पन पैदा हो रहे थे, इसी और स्थिति का ज्ञान करा देते हैं। अर्थात् उस स्थान से शब्दों का आया हुआ कम्पन उस स्थान की स्थिति के दृश्य और शब्दों तक का ज्ञान करा देता है। यही मंत्र-जप के साधकों के साथ भी होता है। आवश्यकता केवल भावनाओं की तीव्रता भर की होती है।

सूक्ष्म ध्वनि शक्ति से इन दिनों चिकित्सा और औद्योगिक क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हो रहें हैं। चिमनी से निकले धूएं को 95 प्रतिशत में बदल देने, रोग ठीक करने, इस्पात की चदरों की कटाई, लाण्ड्री, सिंचाई के साधनों में इस शक्ति का उपयोग बिजली की तरह होने लगा है। इससे कोहरा दूर करके यह सिद्ध कर दिया गया है कि शब्द प्रकृति को भी जीत सकता है। इस दिशा में इंग्लैंड और अमेरिका में तत्परतापूर्वक खोजें हो रही हैं और आशा की जाती है कि कर्णातीत ध्वनि से एक दिन खगोल विज्ञान में आश्चर्यजनक प्रगति होगी। इन प्रगतियों ने एक बार फिर से हमें उस स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ से आवाज आती है-क्यों न हम अपने मंत्र विज्ञान को फिर से जागृत कर उसकी महान शक्ति से लाभान्वित हों। इस शक्ति से भौतिक और आध्यात्मिक सभी तरह के लाभ प्राप्त किये गये हैं किये जा सकते हैं।


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