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Magazine - Year 1970 - Version 2

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हिमालय में अमर आत्माओं का रहस्य

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पश्चिमी कमान के सैनिक कमाण्डेन्ट श्री एल. पी. फैरेल एक बार कुमायुँ नरेश के साथ हिमालय की यात्रा पर गये। बात लगभग 1940 की है तब यहाँ अँग्रेजों का शासन था। एक उच्च पदाधिकारी होते हुए भी उनकी धर्म में बड़ी आस्था थी, उन्होंने गहन आध्यात्मिक तथ्यों का पता लगाया जिनका उल्लेख उन्होंने अपने जीवन परिचय में किया है।

एक दिन उनकी भेंट एक महात्मा से हुई। महात्मा ने पराशक्ति द्वारा प्रेरणा देकर भारत के मैदानी भाग से एक युवक को बुलाया था। उन्होंने उस युवक से कहा-वत्स! मैं तुम्हारा एक जन्म का नहीं कई जन्मों का मार्गदर्शक हूँ। तुम्हें इसलिये बुलाया है कि तुम भी अन्य व्यक्तियों की तरह ही आत्मिक शक्ति साँसारिक सुखोपभोग और तुच्छ इन्द्रिय वासनाओं में खर्च मत कर देना। भारतवर्ष की आध्यात्मिक जागृति के लिये मैं तुम्हें सदैव से ही तपाता चला आ रहा हूँ। अब भारत में स्वर्ण-युग आने वाला है उसके लिये लोगों को आध्यात्मिक धार्मिक एवं नैतिक शिक्षण का काम तुम्हें करना है। इसके लिये तुम्हारे अन्दर जो शक्ति जागृत होगी उसके लिये पहले साधना करनी पड़ेगी। तुम्हें उन साधनाओं की जानकारी के लिये ही यहाँ बुलाया है।

इस घटना का उल्लेख करते हुए श्री फैरले लिखते है कि-युवक ने प्रश्न किया-भगवन् मेरी बुद्धि पर अज्ञान का पर्दा चढ़ा है मैं कैसे जानूँ कि आप मेरे बहुत समय से मार्गदर्शक रहे हैं? इस पर महात्मा ने एक प्रयोग दिखाया ठीक चल-चित्र की भाँति। वह चित्र मैंने स्वयं देखा। महात्मा ने किसी अज्ञात शक्ति से ऐसा किया। वह चित्र देख कर मुझे ऐसा लगा कि इन महात्मा की आयु 1000 वर्ष भी हो सकती है बल्कि इससे भी अधिक हो सकती है।

उनकी शारीरिक बनावट में क्रमशः अन्तर होता गया था जिससे पता चलता था कि इन्होंने कई बार स्थूल शरीर का कायाकल्प किया है। यह सब मैं उनकी कृपा से ही जान पाया उसके बाद न तो मैं दुबारा उन सन्त के दर्शन कर सका और न ही उस युवक के बारे में ही कुछ जान सका जिससे उन महात्मा ने कहा था-आने वाले युग में लोगों की जीवन पद्धति क्या हों, जिसमें धर्म अध्यात्म, भारतीय संस्कृति का भी समावेश रहे, इसका तुम्हें मार्गदर्शन करना है।

“योगी की आत्म-कथा” के परिच्छेद 34 में सुप्रसिद्ध भारतीय योगी श्री श्यामाचरण लाहिड़ी के जीवन की घटना का भी एक ऐसा ही उल्लेख है जिससे पता चलता है कि उन्हें भी किसी हिमालयवासी महात्मा ने आत्म-प्रेरणा से बुलाकर योग-विद्या सिखाई जिससे योग को नष्ट होने से बचाया जा सके। कुछ दिन पूर्व कल्याण में एक साधु की हिमालय के दुर्लभ प्रान्तों की यात्रा का वर्णन छपा था। वर्णन अतिरंजित जैसा था उसमें यह बताया गया था कि उसने हिमालय में महाभारत काल के मनीषियों को समाधिस्थ देखा है। वहाँ अग्नि-धूनियाँ जल रही हैं बरगद के वृक्ष खड़े हैं वहाँ का दृश्य बिलकुल ऋषि आश्रमों जैसा आज भी है।

यह श्रद्धा पोषित घटनायें कही जा सकती हैं। पर पिछले दिनों एवरेस्ट पर चढ़ने के जितने भी अभियान हुये हैं उन सब में एक प्रश्न चिन्ह हिम-मानव का उभरा है। ऊँचे चढ़ने वाले पर्वतारोहियों में से प्रायः सभी ने या तो हिम-मानव की आकृति अथवा पैरों के निशान देखे जाने का जिक्र किया है। किन्तु इस हिम-मानव के सम्बन्ध में अब तक कोई सुनिश्चित जानकारी नहीं दे सका। प्रश्न अब भी रहस्यमय बना हुआ है।

शिव, भैरव, हनुमान, अश्वत्थामा आदि प्राचीन देवी-देवताओं और सिद्ध महापुरुषों के अमर होने का उल्लेख भारतीय धर्म ग्रन्थों में बहुतायत से मिलता है। कल्कि पुराण में एक आख्यायिका आती है-जब कल्कि भगवान् ने देखा कि सारा संसार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि विकारों में आकंठ डूबा पड़ा है आत्माओं का प्रकाश नष्ट हो चुका है तो उन्होंने अज्ञानान्धकार में भटकते लोगों के उद्बोधन और उन्हें स्वर्ग और बन्धन मुक्ति का मार्ग दिखाने का निश्चय किया। अन्धकार बड़ा गहरा था। लौकिकता भौतिकता और इन्द्रिय वासनाओं से सारा संसार बुरी तरह जकड़ा हुआ था कल्कि भगवान ने मोहान्धकार में डूबे विश्व को जगाने के लिये जो शक्ति चाहिए उसमें कमी अनुभव की, तब उन्हें उनके गुरु परशुराम ने हिमालय बुलाया और जहाँ स्वयं उन्होंने तप किया था वहाँ तप कराकर उनमें उस प्रचंड शक्ति का जागरण कराया जो युग-परिवर्तन के लिये अनिष्ट थी।

भगवान परशुराम का जन्म कई सतयुगों से पूर्व वैदिक-युग का है कलियुग में भी उनकी उपस्थिति उनकी अमरता का द्योतक है और इस बात का घोषणा पत्र भी कि उन जैसी अमर आत्मायें अभी भी हिमालय में हैं। डॉ. हरिदत्त भट्ट शैलेश ने धर्मयुग के 23 अगस्त 1964 के अंक में अपने “जाँवली (गढ़वाल) पहाड़ी जो 22000 फुट ऊँची है, के पर्वतारोहण का रोचक वर्णन देते हुए स्वीकार किया है कि वहाँ पर हिमस्खलन की एक भयंकर दुर्घटना से किसी शक्ति ने ही-बलात् बचाया अन्यथा हम सब के सब वहीं दब कर मर गये होते। यह सब घटनायें इस तथ्य की ही पुष्टि करती हैं कि हिमालय में प्रचंड अतीन्द्रिय क्षमताओं वाली अमर आत्मायें अभी भी हैं और अनन्त काल तक रहेंगी।

अमरता भारतीय योग की ही उत्कण्ठा नहीं है आज के वैज्ञानिक भी अमरता की शोध बड़ी तत्परता से कर रहे हैं। रूस, फ्रान्स, ब्रिटेन, जर्मनी सभी देशों के जीव-वैज्ञानिक वृद्धावस्था और मृत्यु के कारणों की खोज लम्बे अर्से से करते आ रहे हैं। अकेले अमरीका में एक हजार से अधिक दल इस दिशा में सक्रिय हैं और उन्होंने अपनी अब तक की उपलब्धियों के आधार पर भी यही निष्कर्ष निकाले हैं कि मृत्यु कोई आवश्यक घटना नहीं, वृद्धावस्था एक प्रकार का रोग है। यदि उसका उचित उपचार मिल जाये तो मनुष्य हजारों वर्ष तक जी सकता है। आयुर्वेद में कायाकल्प के जो विधान दिये हैं वह भी इसी सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं। अब तो विज्ञान स्पष्ट रूप से उन बातों को स्वीकार करने लगा है।

मृत्यु वस्तुतः काल की सीमा नहीं वरन् शरीर की व्यवस्था में व्यतिक्रम का परिघटित रूप मात्र है। युवावस्था में जिस शरीर की माँसपेशियों का भार 100 पौण्ड होता है वृद्धावस्था में कुल 70 पौण्ड रह जाता है। उसी के अनुरूप शारीरिक शक्ति भी कम हो जाती है। युवा शक्ति का हृदय 6 लीटर रक्त पंप करता है। वृद्ध का 3 ही लीटर फेफड़े अपनी आधी क्षमता खो देते हैं। मस्तिष्क से शरीर और शरीर से मस्तिष्क को समाचार लाने ले जाने वाले तंत्रिका तंतुओं की शक्ति में 15 प्रतिशत का ह्रास हो जाता है। मस्तिष्कीय द्रव्य का भी भार 3.03 पौण्ड से घटकर 2.27 पौण्ड रह जाता है। शारीरिक क्षमताओं में धीरे-धीरे ह्रास ही वृद्धावस्था का कारण और जीवन गति का रुक जाना ही मृत्यु है। यदि जीवन की गति को प्रखर रखा जा सके और शरीर को बनाने वाले कोशों के नवीनीकरण की क्रिया में अंतर न आने दिया जाये तो मनुष्य को चिरकाल तक जीवित रखा जा सकता है, जीवन तत्व (जीन्स) अमर पदार्थ है यदि वह नष्ट नहीं होता तो शरीर के नष्ट होने का कोई कारण नहीं होना चाहिये यह तो हमारी जीवन पद्धति का दोष है कि हम अपने जीवन प्रवाह को कमजोर बनाकर शरीर को भी कमजोर बना डालते हैं।

आयुर्वेद पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि प्राचीन काल के ऋषि मनीषियों ने उन पौधों, जड़ी-बूटियों, फलों और रसायनों का पता लगा लिया था जो शरीर के स्थूल कोशों को निरन्तर बदलते रहने में सहायक होते हैं। यह बात अब विज्ञान भी मानता है और विज्ञान जगत का यह एक बहुचर्चित मुहावरा बन गया है कि- “मनुष्य आहार नहीं खाता, आहार स्वयं मनुष्य को खाता है”। हमारा स्थूल शरीर रक्त से पोषण पाता है। रक्त नाड़ियों के रूप में सारे शरीर को ऑक्सीजन देता है। ऑक्सीजन और दूसरे “नर्क्स फलूड” ही शरीर में चेतना का संचार करते हैं। यह सब भावनाओं द्वारा होता है। विचार और भावनायें ही शरीर में हारमोन्स का स्राव करती हैं। यह हारमोन्स ही शरीर की सारी गतिविधि (मेटाबॉलिज्म) का नियंत्रण करती हैं। इससे प्रकट होता है कि अन्तिम रूप से शरीर के पोषण और उसे स्वस्थ रखने का सर्वाधिक उत्तरदायित्व भावनाओं और विचारों या वास्तविक जीवन तत्व को ही है। साल्योन नामक पक्षी को देखा गया है कि वह अंडा देने के बाद ही रोग का शिकार हो जाती है। खोज करने से पता चला है कि अंडा देने के बाद उसकी पिचुट्री ग्रन्थि (यही विचार या भाव संस्थान है।) उत्तेजित हो उठती है और उससे ए.सी.टी.एच. हारमोन्स भारी मात्रा में स्रावित होने लगता है जिससे वह बीमार पड़ जाती है। ऐसा कई जीव जन्तुओं के बारे में होता है। इससे यह प्रतिपादित होता है कि यदि मनुष्य अपनी विचार-प्रणाली को सशक्त बनाकर काम ले और अपना आहार सूक्ष्म रखे तो वह इच्छानुसार आयु बनाये रखने में समर्थ हो सकता है।

विचार नियंत्रण प्रणाली का अभी तक पाश्चात्य वैज्ञानिक ज्ञान नहीं कर सके। अपनी भावनाओं में क्या ऐसी भी शक्ति है कि वे आकाश में तैरते हुए जीवन प्रवाह (जीन्स) को बिलकुल शुद्ध रूप में ग्रहण कर सकें यह विद्या अभी केवल भारतीय योगी जानते हैं पर अब वैज्ञानिक भी उसकी पुष्टि करने लगे हैं उदाहरण के लिये सन् 1929 में स्ट्रासबर्ग के कुछ जीव वैज्ञानिकों ने बत्तखों पर “जीन्स” बदलने का प्रयोग किया। कैम्पबेल और पेकिस जाति की दो बत्तखें चुनी गईं। एक के डी.एन.ए. (कोश का पैड़ी नुमा वह सूक्ष्म भाग जिसमें जीवन रहता है) दूसरे के दूसरे के पहले में प्रवेश कराये। इससे दोनों के रंग में परिवर्तन दिखाई देने लगा। कुछ ही दिन में कैम्पबेल का खाकी रंग पेकिस में उभरने लगा और कैम्पबेल की गर्दन श्वेत पड़ने लगी।

विज्ञान ऐसे थोड़े प्रयोग कर सकता है। एक दो गुण-सूत्र बदल लेना सफलता की प्रारम्भिक सीढ़ी है। 10 अरब मनुष्य के प्रजनन कोशों में “न्यक्लिऔआइड़ों” के लगभग दस अरब जोड़े होते हैं। प्रत्येक जोड़े में 46 गुण सूत्र। अभी इन में परिवर्तन करके मनुष्य के स्वभाव में ही परिवर्तन करना कठिन हो रहा है। अभी तो शरीर में कुछ ऐसे कोश हैं जो एक बार बनने के बाद कभी भी बदलते नहीं उन्हें स्वस्थ रखे जाने का प्रश्न तो और भी टेढ़ा है विज्ञान को वहाँ तक पहुँचने में लम्बा समय लग सकता है पर योग विज्ञान और भारतीय रसायन पद्धति में वह ज्ञान पहले से ही विद्यमान है यदि उसे खोजा जा सके तो मनुष्य को इच्छानुसार जीवित रख सकना कोई कठिन बात नहीं जैसा कि हिमालय के उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है।

यह सब कठिन साधनाओं के अतिरिक्त उपयुक्त वातावरण पर भी निर्भर है। अनेक वैज्ञानिकों ने उसके लिये ऐसे तापमान की आवश्यकता बताई है जो शून्य से भी कम हो। ‘स्पेश ओडिसी’ में श्री क्लार्क ने भी लिखा है कि 200-200, 400-400 वर्षों में पूरी होने वाली अन्तरिक्ष यात्राओं में मनुष्य को सुषुप्त रखकर उन्हें लम्बी आयु प्रदान करने में शून्य तापमान से कम तापमान आवश्यक होगा। इन सब उदाहरणों से स्पष्ट है कि यदि हिमालय में ऐसी कोई अमर आत्मायें हों तो उसे आश्चर्य न मानकर सत्य माना जाये यदि यह आत्मायें इस देश को जागृत करने और अध्यात्म ज्ञान की एक नई दिशा देने का प्रयत्न कर रही हों तो इसे भी आश्चर्य न मानकर तथ्य और सत्य ही माना जाना चाहिये।


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