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Magazine - Year 1970 - Version 2

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क्षमया वशीकृते लोके

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First 15 17 Last
अब वे तृतीय वय में प्रवेश पा चुके थे। एक दिन उनकी धर्म परायणा पत्नी प्रभावती ने कहा - स्वामी! धार्मिक मर्यादा के अनुसार अब हमें राज्य-शासन राजकुमार अभीचि को सौंप देना चाहिये और अपने को परमार्थ एवं परलोक की तैयारी के लिए मुक्त कर लेना चाहिए। उद्रायण राजमाता की यह सम्मति पाकर अतीव प्रसन्न हुए। राजकुमार अभीचि के राज्याभिषेक की तैयारी होने लगी।

महाराज उद्रायण की एक बहन भी थी। उसका एक पुत्र केशीकुमार इन दिनों सिन्धु-सौवीर के संरक्षण में ही पल रहा था। केशीकुमार के पिता किसी अन्य राज्य के शासक थे पर एक युद्ध में वह मारे गये थे। तब सम्राट् उद्रायण की बहन सिन्धु-सौवीर ही चली आई थी। एक दिन पति वियोग में जब वह परलोक प्रयाण करने लगी थी। तब उसने ही केशीकुमार को सौंपा था। महाराज ने वचन दिया था कि उसे अपने पुत्र राजकुमार अभीचि से अधिक ध्यान देकर रखेंगे। अपने कर्त्तव्य का उन्होंने अब तक अक्षरशः पालन किया था। शिक्षा-दीक्षा तथा आमोद-प्रमोद के जो साधन अभीचि को उपलब्ध होते थे, वह केशीकुमार के पास पहले पहुँचा दिए जाते थे, तब भी केशीकुमार के मन में फणिधर के विष की तरह अभीचि के प्रति अज्ञात दुर्भाव पनपता रहा। हर शंकालु व्यक्ति की तरह उसे अभीचि से सदैव भय बना रहता था।

राज्याभिषेक की तैयारियाँ अभी प्रारम्भ भी नहीं हुईं कि केशीकुमार महाराज के पास जा पहुँचा। धूर्तों को सजगता ही तो होती है कि उन्हें कभी-कभी अनायास सफलता भी हाथ लग जाती है। उसने सम्राट् को उनके दिये वचन की याद दिलाई और कहा- अब तक प्राप्त प्राथमिक सुविधाओं के समान क्या सिन्धु-सौवीर के राज्य-सिंहासन पर मेरा प्रथम अधिकार नहीं?

प्रश्न बड़ा टेढ़ा आ पड़ा। मंत्रीगण, सचिव और सेनापति सब इस पक्ष में थे कि राजकुमार अभीचि ही राज्य के उत्तराधिकारी और योग्य प्रशासक हैं, किन्तु महाराज उद्रायण ने जब अपनी स्थिति देखी तो पाया कि वे वचनबद्ध हैं। यों वह केशीकुमार के दुष्ट स्वभाव को जानते थे। दुष्ट को दबाना पाप नहीं होता पर अपयश का भय धर्म के नाम पर एक प्रकार की हीनता ही कही जायेगी, जीवन भर एक क्षत्र, क्षात्र धर्म का पालन करने वाले सम्राट् उद्रायण से उतना भी साहस करते न बना। राज्याभिषेक उन्होंने केशीकुमार का ही कर दिया।

बन्दर के हाथ तलवार वाली कहावत हो गई। दुष्ट स्वभाव के मनुष्य को शक्ति और साधन देना तो दुष्टता का अभिसिंचन और परिपोषण करना ही होता है। राज्य पाकर केशीकुमार का जीवन और उद्दण्ड हो गया। प्रजा के हित की चिन्ता न रही। मार्ग की एक मात्र बाधा अभीचि को भी उसने राज्य से निष्कासित कर मुट्ठी भर समर्थकों के साथ भोग-विलास का जीवन जीने लगा। अभीचि अपने मौसेरे भाई चंपापति के राजकुमार कुणिक के पास चला गया।

उद्रायण ने महाश्रमण महावीर से धर्म-दीक्षा ग्रहण की और आत्म-कल्याण की साधना में रत हो गये। साधना और लोक-सेवा में तत्पर श्रमण उद्रायण बहुत समय तक देश का भ्रमण और तीर्थाटन कर अपनी आत्मिक क्षमतायें बढ़ाने में लगे रहे। धर्म साधना के क्षेत्र में भी उनका यश पहले की ही भाँति सारे संसार में फैल गया।

कुठीचक के रूप में रह रही प्रभावती का देहावसान हो गया तब श्रमण उद्रायण अकेले ही लोकहित में परिव्रज्या करने लगे। बहुत दिनों के बाद उनके मन में अपनी राजधानी सिन्धु-सौवीर की स्मृति ताजा हो उठी। वे वीतभय की ओर प्रस्थान कर गये और कुछ ही दिन में सिन्धु-सौवीर जा पहुँचे। अपने भूतपूर्व धर्मप्रिय शासक को पाकर प्रजा ने अपना सारा प्यार उन पर उड़ेल दिया। यह अंतर्स्नेह ही तो व्यक्ति को धर्म और सदाचरण की प्रेरणा देता है, अन्यथा आज संसार में दुष्ट, दुराचारियों का ही प्रभुत्व रहा होता।

सब अच्छे ही नहीं होते, इस संसार में बुरे भी कम नहीं एक ओर जहाँ प्रजा अपने भूतपूर्व शासक के स्वागत में तल्लीन थी, वहाँ दूसरी ओर निहित स्वार्थ के चापलूस पदाधिकारी केशीकुमार को भड़का रहे थे कि महाराज प्रजा का समर्थन लेकर आपको राज्यच्युत करने वाले हैं और राजकुमार अभीचि को पुनः राज्य-सिंहासन दिलाने वाले हैं।

कृतघ्नता नीचता की पहली और अन्तिम कसौटी है। किसी के किये हुये उपकार के प्रति श्रद्धा नहीं रखता, उससे बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं हो सकता। केशीकुमार ने दस व्यक्तियों के प्रभाव में आकर घोषणा कर दी कि सिन्धु-सौवीर का जो भी नागरिक श्रमण उद्रायण को आश्रय प्रदान करेगा, उसकी सम्पूर्ण संपत्ति छीन ली जायेगी और उसे मृत्यु-दंड भी दिया जायेगा।

ज्येष्ठ की चिलचिलाती धूप में श्रमण उद्रायण भिक्षाटन के लिये निकले पर भिक्षा देना तो दूर जिसने भी उन्हें देखा द्वार बन्द कर दिए, मुख छुपाकर लोग घरों में घुस जाते। इसी से तो भय को भी पाप कहा गया है। भयभीत व्यक्ति अन्याय का प्रतिकार भी नहीं कर सकता है। जो प्रजा कल तक उद्रायण के लिये अपना सर्वस्व तक न्यौछावर करने को तैयार रहती थी, आज वही लोग भयवश अपने कर्त्तव्य पालन से भी विमुख हो रहे थे।

ऐसे समय एक कुम्भकार ने आगे बढ़कर उद्रायण का स्वागत किया और यह दिखा दिया कि साहसी व्यक्ति सत्य के समर्थन में किसी भी भय से विचलित नहीं होते, चाहे मृत्यु-दंड की ही आशंका क्यों न हो। उसने उद्रायण की समुचित सेवा की और विश्राम दिया। उसके इस साहस ने श्रीमन्तों के सिर लज्जा से झुका दिए। अब तो और लोग भी उनके स्वागत को उद्यत हो गये।

केशीकुमार तक यह समाचार पहुँचा पापी में साहस कितना। वह कुम्भकार के साहस का भी सामना नहीं कर सका। उसने छलपूर्वक उद्रायण को मरवा देने का निश्चय किया कुम्भकार के समीपवर्ती एक ग्वाले के हाथ विष भरा दुग्ध भिजवा कर उसने उन्हें मार डालने की योजना निश्चित कर दी।

सायंकाल का समय था। उद्रायण ने दुग्धपान कर लिया। विष का प्रभाव शरीर में फैलने लगा। उद्रायण भयंकर पीड़ा से कराह उठे। सारे नगर में यह समाचार बिच्छू के विष की तरह फैल गया। नगरवासी विद्रोह कर उठे। महाराज उद्रायण की आज्ञा लेने और केशीकुमार की सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए मतवाली भीड़ कुम्भकार के द्वार पर जा पहुँची।

उद्रायण ने एक बार सिर ऊपर उठाया और धीमे बहुत धीमे स्वर में कहा -आप लोग केशीकुमार का प्रतिकार न करना। वह क्षमा के पात्र हैं, शरीर तो आज नहीं कल नष्ट होना ही था।

उद्रायण के प्राण-पखेरू उड़ गये पर उनके अन्तिम शब्द केशीकुमार के कानों में जा पड़े। उसका हृदय पश्चाताप से जल उठा। आज वह अपनी ही दृष्टि में गिर चुका था। इस भयंकर आत्म-दाह में ही उसने अपने प्राण त्यागे।

=कहानी=============================

भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में जैतवन की ओर जा रहे थे। मार्ग में कुछ लोग एक पशु को बाँधकर बलि दे रहे थे। उन्हें देखकर बुद्ध भगवान् ने ऐसा करने से रोका, तब एक ग्रामीण ने कहा-महाराज बलि से देवता प्रसन्न होते हैं और वरदान देते हैं।

बुद्ध ने कहा-अपने सुख के लिये जो दूसरे को मारता है, वह दूसरे जन्म में घोर कष्ट पाता है। उसी दिन से ग्राम-वासियों ने जीव हिंसा छोड़ दी।

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