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Magazine - Year 1970 - Version 2

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श्रेय और प्रेय पथ के परिणाम

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First 6 8 Last
अनेक बार समझदार लोग भी यह कहते सुने जाते हैं कि, यह जानते हुए भी कि संसार में लिप्त रहने से कष्ट-क्लेश ही मिलते हैं। भगवान की ओर से विमुखता सी बनी रहती है और सारा जीवन जाल-जंजालों में फँसा हुआ नष्ट हो जाता है, तथापि मन उसी की ओर, संसार के जाल-जंजालों की ओर ही दौड़ता रहता है। भगवान् की माया ही कुछ ऐसी प्रबल है कि न चाहते हुये भी उसके वशीभूत हुए, संसार में ही मरते खपते रहते हैं।

लोगों की यह बात सुनकर ऐसा लगता है कि यह लोग माया को भगवान् की कोई ऐसी शक्ति मानते हैं, जो मनुष्यों को संसार के जाल-जंजालों में फँसाये रखने के लिये नियुक्त की गई है और वह भगवान् की आज्ञा पालन का अपना कर्त्तव्य बड़ी तत्परता से करती रहती है। भला भगवान् की इस आज्ञाकारिणी शक्ति माया के सम्मुख मनुष्य की बिसात हो क्या? माया एक यन्त्र की तरह उसे खींचकर जाल-जंजाल में डाल देती है और मनुष्य न चाहते हुए भी उसमें फंस जाता है।

किन्तु विचार करने की बात है कि क्या करुणा-सिन्धु दीन-बन्धु भगवान् मनुष्य के साथ ऐसा छल कर सकता है? क्या अपने अंश, अपने पुत्रों, मनुष्यों को जिनको कि उसने उत्पन्न किया है, किसी ऐसी शक्ति का बन्दी बना सकता है, जो उन्हें कष्ट-क्लेशों, शोक-सन्तापों अथवा अशाँति -असन्तोष के कंटकाकीर्ण मार्गों पर खींचती रहे। क्या उसको अपनी सन्तानों का दुःख, देखकर सुख मिल सकता? भगवान् ऐसा क्रूर हो यह सम्भव नहीं।

वास्तविकता यह है कि परमात्मा ने जीवों और मुख्यतः मनुष्यों को संसार में इस उद्देश्य से उत्पन्न किया है कि वह वहाँ आनन्दपूर्वक रहें और अन्त में अपनी बुद्धिमत्ता तथा प्रयत्नों के बल पर उसकी परमानन्दमयी गोद में आ जाएं- उसका स्वरूप बन जाएं। इस सदाशय की पूर्ति के लिए उसने मनुष्यों को हर प्रकार की शक्ति तथा साधन भी दिये हैं। भगवान् अपनी माया शक्ति द्वारा मनुष्यों को भुलाता, भटकाता है, ऐसा कहना उस परमपिता की न्यायशीलता, कारुण्य तथा कृपालुता पर लाँछन लगाना है, जो किसी प्रकार उचित नहीं।

तथापि अनुभव बतलाता है कि कोई ऐसी बात है अवश्य कि मनुष्य, जिसके कारण इच्छा न रहते हुये भी, परिणाम जानते हुए भी और मन में सोच-संकोच व लज्जा रहते हुए भी उन मार्गों पर चला जाता है, जहाँ दुःख, कष्ट-क्लेश आदि के दारुण आघातों को सहना पड़ता है। इसी को अधिकाँश लोग अज्ञान-वश भगवान् की माया बतलाया करते हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि मनुष्य के भटकाव सम्बन्धी रहस्य से भगवान् का कोई सम्बन्ध नहीं इसके लिये उसे दोष लगाना या अपने कष्ट-क्लेशों के कारण का दायित्व उसके कन्धों पर डालना सर्वथा अनुचित एवं अशोभनीय है।

धर्म-ग्रन्थों में जिसको माया कहकर पुकारा गया है और जिसकी भूरि-भूरि भर्त्सना की गई है और मनुष्यों को उससे बचे रहने के लिये पग-पग पर चेतावनी तथा उपदेश दिया गया है, वह और कुछ नहीं, मनुष्य की अपनी त्रुटि, दुर्बलता, अविद्या, मूर्खता अथवा अदूरदर्शिता ही है। किन्तु खेद है कि मनुष्य अपनी कमी का दायित्व भगवान पर डालता रहता है। अपना दोष दूसरों पर थोपने का स्वभाव स्वयं एक विडम्बना है, जिससे सत्य-असत्य, वास्तविकता-अवास्तविकता का बोध नहीं हो पाता। मनुष्य अपने को निर्दोष कल्पना किये रहता है, जिसके फलस्वरूप अपने सुधार से विरत रहकर दंड भोगा करता है।

संसार में मनुष्य जीवन की दो ही गतियाँ मानी गई हैं। एक उत्थान, दूसरी पतन। मनुष्य इनमें से कोई भी एक उत्थान अथवा पतन की गति अपने लिये निर्धारित कर सकता है। वह चाहे तो मानवता का पूर्ण विकास कर उसकी आदर्श महानताओं को अपनाकर देवत्व तक उठ जाए और स्वर्गीय सुख की परिस्थितियों का आनन्द प्राप्त करे अथवा उसके विपरीत मनुष्यता का त्याग कर पशुत्व को अपनाने और असुरता की स्थिति में गिरकर अशाँति, असन्तोष अथवा शोक-सन्तापों की नारकीय परिस्थिति में विविध यातनायें भोगे। ऐसा करने के लिये कोई भी एक स्थिति चुनने के लिये, वह पूर्ण स्वतन्त्र है। यह सर्वथा उसके विवेक विचार पर निर्भर है कि वह अपने लिये स्वर्ग का निर्माण करता है अथवा नर्क भोगने की योजना कार्यान्वित करता है।

संसार में कदाचित ही कोई ऐसा हतबुद्धि मनुष्य मिले जो जानबूझ कर नरक भागने की इच्छा करता हो, अन्यथा आबाल, वृद्ध, स्त्री-पुरुष अपने लिये स्वर्गीय सुख की कामना करते हैं। किन्तु यह देखकर कम आश्चर्य नहीं होता कि अधिकाँश लोग नर्क की ओर ही बढ़ते और पढ़ते दिखाई देते हैं।

इन दोनों विपरीत अवस्थाओं के दो मार्ग परस्पर विपरीत दिशाओं में ही जाते हैं, जिन पर चलकर मनुष्य स्वर्गीय अथवा नारकीय परिस्थितियों अथवा उत्थान-पतन की अवस्था में पहुँचता है। उन दोनों में से एक स्वार्थ का और दूसरा परमार्थ का मार्ग है। इन्हीं को शास्त्रीय भाषा में ‘प्रेय’ अथवा ‘श्रेय’ पथ भी कहा गया है। इनमें से स्वार्थ अथवा प्रेय मार्ग मनुष्य को पतन की ओर और परमार्थ अथवा श्रेय मार्ग उत्थान की ओर ले जाता है।

प्रेय पथ के पथिक की दृष्टि बड़ी ही संकुचित और विचार बहुत ही संकीर्ण होते हैं। उसकी दृष्टि सदैव तात्कालिक लाभ की ओर ही लगी रहती है। फिर वह लाभ कितना ही छोटा, ओछा और भविष्य के लिये कितना ही भयप्रद क्यों न हो, उसके संकीर्ण विचार उसे त्याग कर भविष्य के बड़े और ऊंचे लाभ के लिये प्रतीक्षा करने में विश्वास नहीं रखते। संसार के छोटे-छोटे प्रलोभनों पर वह पग-पग पर फिसलता रहता है। उसमें उस किसान जैसा धैर्य नहीं होता है। जो प्राप्त थोड़े से बीजों को तत्काल खा-पीकर बराबर न करके उन्हें खेतों में बोता है और एक लम्बे समय तक खून-पसीना एक करके उनका पोषण करता है- भविष्य में समय आने पर उनका सैकड़ों गुना लाभ उठाकर एक बड़ी फसल काटता है- इस प्रकार एक स्थायी लाभ की व्यवस्था कर लेता है। उसमें उस माली जैसी बुद्धिमता नहीं होती, जो अपने पौधों की एक लम्बे समय तक सेवा करता रहता है और जिसके फलस्वरूप फल-फूलों का प्रचुर लाभ उठाया करता है। उसमें उस विद्यार्थी जैसी कष्ट सहिष्णुता एवं दूरदर्शिता नहीं होती, जो दसवीं कक्षा के बाद ही मिलती है, छोटी सी- नौकरी के प्रलोभन में न आकर एम. ए. तक शिक्षा प्राप्त करता है और आगे चलकर किसी उच्च एवं संतोषप्रद पद का अधिकारी बन जाता है। तात्कालिक लाभ के लोलुप और दूर के उन्नत एवं उज्ज्वल भविष्य की ओर न देखने वाले प्रेय-पथ के ही पथिक हुआ करते हैं, जो पग-पग पर फिसलते गिरते हुये जीवन समाप्त कर देते हैं और किसी प्रकार की उन्नति के अधिकारी नहीं बन पाते।

श्रेय पथ के पथिक दूर दृष्टि से काम लेते हैं, वे वर्तमान में वही करते और वही अपनाते हैं, जो उनके भविष्य को अधिकाधिक उन्नत एवं उज्ज्वल बनाने में उपयोगी होता है। वर्तमान के तात्कालिक लाभ का लोभ उन्हें विचलित नहीं कर पाता। वे अच्छी तरह जानते हैं कि वर्तमान का अपना कोई अस्तित्व नहीं है, वह तो केवल भविष्य की भूमिका उसकी आधार शिला मात्र है। वर्तमान में जो कुछ किया जाता है। उसका परिणाम भविष्य में ही प्राप्त होता है।

वर्तमान का परिश्रम तत्काल कोई लाभ नहीं देता। उसका लाभ भविष्य में ही प्राप्त होता है। वर्तमान का भोग, तत्काल किसी प्रकार की हानि प्रदर्शित नहीं करता। उसकी सारी हानियाँ भविष्य में ही सामने आती हैं। जवानी का संयम तथा संचय किया हुआ स्वास्थ्य भविष्य का संबल बनता है। श्रेयकामी व्यक्ति आरम्भ में तप, त्याग, परिश्रम, पुरुषार्थ का कष्ट उठाते हैं, वे इनका विनिमय छोटे-छोटे लाभों से नहीं करते चलते, वे छोटे-छोटे लाभों को त्याग कर भविष्य का कोई बड़ा लाभ, कोई उच्च श्रेय प्राप्त करने के लिये पर्याप्त धैर्य तथा सहिष्णुता रखते हैं। उन्हें सुख भोगने सुख पाने और लाभ उठाने की कोई शीघ्रता नहीं होती है।

प्रेम प्रधान पुरुष शरीर तथा पदार्थों को उपभोग की वस्तु समझता है और लगे हाथ उन्हें भोगता हुआ क्षीण करता चलता है और अन्त में जाकर खाली हाथ हो जाता है, बिना कुछ किये और लिये काल-कवल बनकर संसार से चला जाता है। जहाँ प्रेयवादी शरीर और विषयों के संयोग से क्षणिक सुखों की आराधना करते हैं, वहाँ श्रेय का श्रद्धालु उनके संयोग से योग की साधना में तत्पर रहता है वह शरीर तथा वस्तुओं के संपर्क से तपपूर्ण कर्मों की योजना करता है और उनके फल को अक्षय परिपाक के लिये बिना भोगे, छोड़ता चलता है। वह संसार के विषय से लेकर उपासना तक के सारे कर्तव्य अभोगी वृति से करता हुआ भविष्य के स्वर्ग का निर्माण करता चलता है। वह न तो इतना लोलुप होता है ओर न अधैर्यवान् कि तुरन्त के छोटे-छोटे लाभों तथा सुखों का भोग लिये बिना चैन से न रह सके।

श्रेय साधक बड़ा ही सूक्ष्म, दूर, स्पष्ट तथा यथार्थवादी होता है। वह संसार की जादू नगरी में चारों और फैले प्रलोभनों, छलनाओं तथा मरीचिकाओं से सदा सजग तथा सावधान रहता है। वह अपनी वृत्तियों को विवेक बल से पूरी तरह वश में रखता है। उन्हें इतनी छूट ही नहीं देता कि वे अबोध मृग की भाँति मरीचिका में अथवा लुब्ध मछली की भाँति चारा देखकर मछुये के काँटे में कण्ठ फंसाकर मृत्यु का मेहमान बन जायें। वह अच्छी तरह जानता है कि संसार में यह जो मनमोहन रूप, शृंगार और सौन्दर्य दिखलाई देता है वह सब धोखा है। इसके पीछे यथार्थ का कोई तत्व नहीं है। इन पर मूढ़ पतंगे की भाँति प्राण निछावर कर देना, आत्म प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यह हाड़-माँस गन्दगी गलीज के पंजर पर चमक-दार पत्री भर चढ़ी हुई है। जो कुछ ही समय में उतर जायेगी और फिर उसकी उपासना में त्यागे अपने सारे श्रेयों के लिये पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त न होगा।

वह सोने चाँदी और धन-दौलत की असलियत से अच्छी तरह परिचित होता है। इसलिये इनका चमत्कार भी उसे भूला-भटका नहीं पाता। उसे पता रहता है कि धन का आवश्यकतानुसार उपार्जन और उसका सीमान्त सदुपयोग ही इसका उचित मूल्य एवं महत्व है। इसके अतिरिक्त इसका संचय अथवा अपव्यय दोनों ही व्यर्थ विडम्बनाएं हैं जिसमें फंसकर मनुष्य-मनुष्य न रहकर न जाने क्या बन जाता है। इसके अपव्ययी, अपकारी, व्यसनी, व्यभिचारी, अत्याचारी आदि कुछ भी बन सकता है। इसका संचयी शोषक, क्रूर, धूर्त, अन्यायी भ्रष्टाचारी आदि किसी भी कुरूप को धारण कर सकता है इसके अपव्ययी जहाँ आगे चलकर अभाव अथवा अकाल की मौत मरते हैं। पाई-पाई के लिये हाथ फैलाते और रिरियाते हैं ,वहाँ संचयी जाते समय हसरत भरी निगाह से इसे टुकर-टुकर देखा करते हैं और जमा की हुई उनकी दौलत अपनी प्रभा में मुस्काती हुई कहा करती है- तुम्हारे जैसे न जाने कितने मूर्ख यों ही मुझे हसरत भरी निगाह से टुकुर-टुकुर देखते हुये, इस संसार से कूच कर गये और मैं इसी संसार में इसी जादुई नगरी में एक के बाद एक उत्तराधिकारियों के हाथों में खेलती और उनकी प्रेम व पूजा की अधिकारिणी बनती रही और आगे भी बनती रहूँगी। मेरा जादू सच्चा जादू है। मैंने तुम्हारे जैसे न जाने कितने अदूरदर्शी पथिकों को श्रेय पथ से विचलित कर पतन के मार्ग पर डाल दिया है और जो भी असावधान होकर चलेगा उसे डालती ही रहूँगी।

श्रेयवादी इतना दृढ़, धीर, वीर और साहसी होता है कि संसार का कोई जादू उस पर कारगर नहीं होता। उसका सम्बन्ध स्वार्थ से नहीं, परमार्थ से होता है। भोग से नहीं, योग से रहता है। वह शरीर को भोग की वस्तु नहीं पर सेवा का साधन समझता है। सम्पत्ति का उसकी दृष्टि में इतना ही महत्व होता है कि उससे अपनी सामान्य आवश्यकतायें पूरी कर ली जायें और शेष को परोपकार, दान-पुण्य और लोक-रंजन में लगा दिया जाये। वह लोक नहीं परलोक संग्रह में विश्वास करता है। जिसके फलस्वरूप वह लोक में यश और परलोक में सद्गति का अधिकारी होता है। उसकी आत्मा दिन-दिन उन्नत होकर देवत्व की सीमा में पहुँच जाती है और वह युग-युग तक लोक में सुख संतोष का, स्वर्ग का आनन्दपद भोगता है। जबकि प्रेय पथ का अबोध पथिक छोटे-छोटे भोगों, नगण्य सुखों और तुच्छ स्वार्थों की शंख-सीपियाँ संचय करता हुआ, इसी भवसागर में घड़ियाली तथा मगरमच्छ जैसे भयानक प्रलोभनों के बीच मर-खपता और डूबता उतरता रहा करता है।

----***----

कथा-

First 6 8 Last


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