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Magazine - Year 1975 - Version 2

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ईश्वर का द्वारा सबके लिए खुला है।

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ईश्वर का द्वारा सबके लिए समान रुप से खुला है। उसमें जो भी चाहे प्रवेश कर सकता है।

सूरज नित्य उदय होता और अपनी राह चला जाता है। हम चाहें तो धूप में पहुँचकर उससे मिल सकते हैं। यदि घर में बैठे रहें और आँखें बन्द कर लें तो फिर उससे मिलना कठिन है। सूर्य से कृपा की याचना र्व्यथ है वह तो अनवरत रुप से बरसा ही रहा है। बन्द तो हमने अपने दरवाजे और अपनी आँखें कर ली है। खोलना इन्हीं को है। कृपा तो अपने ऊपर अपने आपको करती है। अन्धा यह सोचे कि मेरी आँखें ठीक हैं केवल दुनिया ही अँधेरी हो गई, तो फिर वस्तुस्थिति को समझना कठिन है। भगवान रुष्ट हो गये हैं और मैं अपनी स्थिति पर सन्तुष्ट हूँ, यह माना जाता रहा तो फिर कोई समाधान मिल न सकेगा।

ईश्वर हमारे लिए अपरिचित है। हम केवल अपने परिचित अज्ञान और मनोविकारों को ही जानते हैं। परिचितों का स्वागत किया जाता है और अपरिचितों को आश्रय देने में संकोच पड़ता है। ईश्वर को अपने में आत्मसात करना अथवा अपने को उसमें धुला देना यह दोनों ही स्थितियाँ हमें अत्यन्त कठिन होती हैंः फिर परम् प्रभु से मिलन कैसे हो।

हम ईश्वर को जिस गज से नापते हैं वह बहुत छोटा है। अपने गज से महामानवों तक को लोग न नाप सके, उनके रहते उनका उपहास और असहयोग करते रहे। फिर इतने विशाल परमेश्वर को अपना छोटापन रहते किस प्रकर जानें? उसे कैसे पावें? और कैसे अपनावें?

ईश्वर का स्वरुप है-’महानता’। इन विशाल ब्रह्माण्ड को उसकी एक छवि के रुप में देखा जा सकता है और इस सुविस्तृत विस्तार के अर्न्तगत हो रही ज्ञात और अविबात हलचलों को उस महासागर की तरंगें समझा जा सकता है। इसे प्राप्त करने को हमें अपनी संकीर्णता छोड़नी पड़ेगी और उतनी महानता अपनानी पड़ेगी जिसके सहारे उस महान परमेश्वर को देखा जा सके। गड्ढे में बैठकर छोसी-सी परिधि ही दिखाई देगी। समतल भूमि पर बैठ कर कुछ मील तक के दृश्य दृष्टिगोचर हो सकते हैं किन्तु यदि सुविस्तृत अन्तरिक्ष की झाँकी करनी हो तो अधिकाधिक ऊँचाई पर पहुँचने और वहाँ से दृष्टि पसारने के अतिरिक्त और किसी प्रकार अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती।

हम जितने ही संकीर्ण हैं, ईश्वर से उतनी ही दूर हैं। उदात्त दृष्टिकोण और उदार रीति-नीति अपनाकर ही उसके समीप पहुँचाने वाली मंजिल पर अग्रसर हो सकते हैं। छोटे पात्र में बड़े पदार्थ नहीं रखे जा सकते हैं। जितना सामान हो उसे रखने के लिए पात्र भी उतना ही बड़ा होना चाहिए। बड़ी जलराशि गहरे तालाब में ही भरी जा सकती है। ईश्वर महान है। महानता के रुप में ही उसकी स्थापना अन्तःकरण में हो सकती है। महामानवों को ही दूसरे शब्दों में ईश्वर भक्त कह सकते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता की धुन्ध जितनी मात्रा में निरस्त करते हैं उतने ही स्पष्ट दर्शन भगवान के हो सकते हैं।

ईश्वर खुला आकाश है-कोई व्यक्ति नहीं। हम आकाश में उड़ें उसका आँचल खुला पड़ा है। आकाश हमें खींचकर ऊपर नहीं उड़ावेगा। अपना लक्ष्य और प्रयत्न हों तो साधन बन जायेंगे।

समुद्र न तो नदियों को बुलाता है और न रोकता है। कोई नदी चाहे तो तालाब में रुक जाय। कोई चाहे तो बहती चले और समुद्र में मिल जाय। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए उसे समझना आवश्यक है। मिन्नतें करके और मनौती मनाने की उलझी पगडंडी पर चलकर उस तक नहीं पहुँचा जा सकता। उदात्त चिन्तन और परिष्कृत व्यक्तित्व के राजमार्ग पर चलकर ही उस परम प्रभु तक पहुँचा जा सकता है, जिसे पाना हमारा जीवन-लक्ष्य है।

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