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Magazine - Year 1981 - Version 2

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ऊँचाई की मनःस्थिति और परिस्थिति

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पृथ्वी के धरातल पर सब कुछ सामान्य है। जितना ऊँचा उठना होगा अन्तरिक्ष विचरण में उतना ही आनन्द मिलेगा। जमीन पर पड़े खड़े होने वाले को इर्द-गिर्द की चीजें ही दीखती हैं। पर पहाड़ की चोटी पर खड़ा या वायुयान पर चढ़ा व्यक्ति दूर-दूर तक के क्षेत्र का पर्यवेक्षण कर सकता है। यह आँखों की विशेषता नहीं, ऊँचाई पर पहुँचने पर सहज ही मिलने वाली विशालता की उपलब्धि है।

जमीन पर धूलि उड़ती, धुँध छाई और गर्मी अनुभव होती है, पर यदि कुछ ऊँचाई पर पहुँचा जाय तो इनमें से एक भी गड़बड़ी शेष नहीं रह जाती। सब कुछ साफ स्वच्छ दिखता है। मैदानी इलाकों की अपेक्षा पहाड़ी स्थानों पर रहने वाले अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ रहते हैं। गर्मी के दिनों में साधन सम्पन्न लोग पहाड़ी स्थानों पर चले जाते हैं। शीतलता अनुभव करते और स्वास्थ्य लाभ करते हैं। यह ऊँचा चढ़ने का चमत्कार है। सर्वविदित है कि जितना ऊँचा उठा जायेगा उतनी ठण्डक मिलेगी। जीवन क्रम में उत्कृष्टता की दिशा में उठना व्यक्तित्व का मूल्य बढ़ाता और सुख-शाँति प्राप्त करता है।

पृथ्वी की एक सीमा तक ही वायुमण्डल है और थोड़ी दूर तक गुरुत्वाकर्षण। उस परिधि को पार कर लेने पर राकेट अन्तरिक्ष में पहुँचकर अपने को भार रहित स्थिति में पाते हैं। इतना ही नहीं वे बिना किसी ईंधन की सहायता के अन्तरिक्ष में परिभ्रमण करने लगते हैं। धरातल पर थोड़ी-सी दूर चलना भी कठिन पड़ता है और वाहनों को गति देने के लिए ईंधन का प्रबन्ध करना पड़ता है किन्तु ऊँचा उठ जाने पर ऐसे किसी अवरोध का सामना नहीं करना पड़ता। अवरोध, विग्रह और संकट नीचे के स्तर पर रहने वालों को ही हैरान करते हैं। ऊँचे पर खड़े होने वाले पर नीचे से फेंके गये पत्थर पहुँचते ही नहीं, वरन् उलटकर उसी के सिर पर गिरते हैं। जबकि नीचे खड़े या गड्ढे में गिरे व्यक्ति पर एक बच्चा भी पथराव करके कचूमर निकाल सकता है। प्रकृति के यही सिद्धान्त मानव जीवन की अगति-अवगति पर भी लागू होते हैं।

परिधियों के पार करने में ही प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। थोड़ा ऊँचा उठ जाने पर तो सर्वत्र आनन्द और सन्तोष ही शेष रह जाता है। राकेट ऊपर उछालते समय भारी शक्ति नियोजित करनी पड़ती है। आवाज भी होती है और खतरा भी रहता है। पर जैसे ही निचली परिधि से आगे उठ सकना सम्भव हुआ कि सब कुछ सरल ही सरल बन जाता है। राकेटों से लेकर मनुष्यों तक को एक ही तरह का अनुभव होता है।

पृथ्वी से 95 मील की ऊँचाई तक वायुमण्डल की सामान्य प्रकृति में विशेष अन्तर नहीं आता। इससे ऊपर सूर्य वायु के अणुओं को परमाणुओं में-आक्सीजन को ओजोन में तोड़ने की प्रक्रिया द्वारा ही दिन रात गर्म किये रहता है।

अन्तरिक्ष में एक स्थान वह आता है जहाँ वायु अत्यधिक विरक्त हो जाती है। वहाँ की गर्मी को तेज गर्मी कहने की अपेक्षा “विकिरण की अवशोषण” क्रिया कहना अधिक उपयुक्त है। अर्थात् वायु प्राणभूत होती रहती है। सूर्य की ऊष्मा एक तरह से यहीं वायु कणों में सवारी करती है।

ऊँचाई की स्थिति ही ऐसी है जहाँ सूर्य जैसे देवताओं को अपने अनुदान अधिक मात्रा में देने का अवसर मिलता है। हलकी-फुलकी स्थिति ही उसे अवधारण भी कर सकती है।

स्वर्ग कहाँ है? इसका उत्तर ऊपर उँगली उठाकर ऊपर आसमान की ओर इशारा करके ही दिया जाता है। ईश्वर कहाँ रहता है इसका उत्तर भी ऊपर की ओर देखने से मिलता है। ऊर्ध्वगमन, ऊर्ध्वरता, उत्थान, उत्कर्ष आदि शब्दों में ऊपर उठने का ही संकेत है। सद्गति के- उन्नति के यही चिन्ह हैं। इस सबके पीछे एक ही मर्म है- उत्कृष्टता अपनाना। सामान्य लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले दृष्टिकोण, क्रिया-कलाप एवं इच्छा आकाँक्षाओं की अपेक्षा अपना स्तर ऊँचा रखना। इसी को सन्त परम्परा कहते हैं। महामानव इसी रीति-नीति को अपनाते हैं। आत्मबल-सम्पादन, ईश्वर का अंचल ग्रहण इसी कसौटी पर परखा जाता है कि व्यक्ति नर-पशुओं जैसी संकीर्ण-स्वार्थपरता अपनाए हुए है या आदर्शवादी उत्कृष्टता का परिचय दे रहा है।

पृथ्वी के ऊपर पाये जाने वाले अयन मण्डल की अनेकानेक विशेषताएँ हैं। ऐसी जिन्हें चमत्कारी विभूतियाँ या उच्चस्तरीय विशेषताएँ कह सकते हैं। पृथ्वी वाले उनकी कल्पना ही कर सकते हैं यदि उस क्षेत्र में पहुँचने का और आँखें पसार कर देखने का अवसर मिल सके तो किसी अद्भुत लोक में जा पहुँचने की ही अनुभूति उसे होगी। चमत्कारों की कल्पनाएँ करने वाले- देवलोक की अलौकिकताओं के संबंध में जिनने कुछ सुना-पढ़ा है वे उस क्षेत्र को लगभग मिलता-जुलता ही अनुभव कर सकते हैं। ऊँचाई अपने आप में चमत्कार है। उस दिशा में जो जितना उठता है उसे अपनी मनःस्थिति ही नहीं बाहर की परिस्थिति भी जादुई, प्रसन्नतादायक एवं उल्लासभरी अद्भुत दिखाई पड़ती है।

अयन मण्डल-आयनोस्फियर केवल सूर्य की ही अति बैंगनी किरणों के प्रभाव को कम नहीं करता, अपितु अन्य ग्रह-नक्षत्रों और तारों से जो प्रकाश और उनका विकिरण पृथ्वी की ओर प्रवाहित करता है, उसे भी संशोधित करता रहता है। परन्तु ‘आयनोस्फियर’ अधिकाँशतः सूर्य से प्रभावित होते हैं। उन पर सूर्य के द्वारा प्रक्षेपित किरणों के प्रभाव से ही ऋतुओं के परिवर्तन होते हैं। ये प्रभाव कभी कम और कभी अधिक होते हैं।

आयनोस्फियर के मुख्यतः चार स्तर होते हैं। इन स्तरों को वैज्ञानिकों ने डी, ई, एफ-वन और एफ-टू अक्षरों द्वारा सम्बोधित किया है। डी क्षेत्र केवल दिन के समय बनता है। पृथ्वी की सतह से इसकी ऊँचाई 35 से 45 मील ऊपर तक है। ‘ई’ क्षेत्र अधिक आयनीकृत है। यह 45 से 70 मील ऊपर तक है। इसके 120 मील ऊपर तक एफ-वन स्तर है और फिर 250 मील की ऊँचाई तक एफ-टू। एफ-टू सबसे ज्यादा अस्थायी होता है और यह सर्दियों के मौसम में एफ-वन स्तर से मिलकर एक रूप हो जाता है।

सूर्य से निःसृत होने वाली शक्तिशाली किरणों में कुछ अदृश्य किरणें ऐसी भी होती हैं, जिनसे हमारी चमड़ी का रंग बदल सकता है। इन अदृश्य किरणों को परा बैंगनी किरणें कहा जाता है। यदि ये अधिक मात्रा में आने लगें तो शरीर निष्प्राण भी हो सकता है। अयन मण्डल इन किरणों के घातक प्रभाव को ऊपर ही रोक लेता है।

आयनोस्फियर की उपस्थिति पृथ्वी के ऊपरी धरातल पर रेडियो-तरंगों के प्रसारण का कारण है। इसके कारण दूसरे अन्य ग्रहों के प्रभाव पृथ्वी तक नहीं पहुँच पाते। सूर्य में होने वाले परिवर्तनों का इस अयन-मण्डल (आयनोस्फियर) पर भी प्रभाव पड़ता है। सूर्य की अल्ट्रावायलेट विकिरण तथा विद्युत प्रभावित कणों की शक्तिशाली धाराएँ, जो सूर्य के ऊपरी धरातल से तेजी से निकल रही हैं, उस समय, जब सूर्य पर कोई परिवर्तन होते हैं, हलचलें होती हैं तो उसका प्रभाव अयन मण्डल के कवच को प्रभावित करता है। उस समय पृथ्वी का वातावरण अचानक बदलने लगता है, उस समय पृथ्वी पर सबसे अधिक संख्या में चुम्बकीय तूफान, अयन मण्डल में जलजलाहटें तथा रेडियो सम्बन्धों के कटाव होते हैं। इसी समय मध्यरात्रि में अक्षाँशों तक में ध्रुवीय आभाऐं विचित्र प्रकाश रश्मियाँ आदि देखे जाते हैं।

पृथ्वी के ऊपरी वातावरण की परिस्थितियों को देखने से लगता है यह पृथ्वी को अनिष्ट से बचाने वाला छाता तथा अनेकानेक उपयोगी अनुदान बरसाने वाला मेघ मण्डल है। सूर्य को -अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों को धरती निवासियों के लिए अनेकों अनुदान भेजने का माध्यम यह आयनोस्फियर ही है।

मनुष्य जीवन को भूलोक माना जाय तो उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही- उसका आयनोस्फियर है। उसकी सहायता से ही सुरक्षा और प्रगति- शान्ति और समृद्धि के बहुमुखी उद्देश्य पूरे होते हैं।

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