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Books - मन की प्रचंड शक्ति

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Language: HINDI
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मनोबल न गिरायें, साहस प्रदान करें

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पौधे को खाद-पानी से सींचा जाता है और व्यक्तित्व को प्रोत्साहन से। आत्म गौरव का अनुभव किया जाना चाहिए और कराया जाना चाहिए। गलतियां बताना और सुधारना एक बात है और व्यक्तित्व हेय तथा हीन सिद्ध करना दूसरी। प्रायः लोग एक बड़ी भूल करते हैं कि गलती की भर्त्सना करते हुए, निराकरण की अपेक्षा रखते हुए ऐसे कदम उठाते हैं जिन्हें आक्रमण की संज्ञा दी जा सकती है। बच्चों के साथ बड़े कहे जाने वाले अभिभावक लोग भी प्रायः ऐसी ही भूल जान या अनजान में करते रहते हैं जिससे उनके व्यक्तित्व को भारी आघात पहुंचता है।
किसी गलती को मूर्खता कहा जा सकता है और उसे सुधारने पर बुद्धिमान कहलाने का रास्ता बनाया जा सकता है। किन्तु किसी को मूर्ख, मंदबुद्धि, असभ्य, बेशऊर आदि कहते रहने से अनायास ही बड़ों के उस निर्देश अनुदान को अंतः चेतना स्वीकार करती चली जाती है और क्रमशः हीनता के परत इतने मजबूत हो जाते हैं कि बच्चा सचमुच ही मंदबुद्धि, बेशऊर और मूर्ख बन जाता है। व्यक्तित्व की धुरी आत्म मान्यता है। यदि अपने आपको अयोग्य, अभागा, अविकसित और पिछड़ा हुआ मान लिया जाय तो फिर समझना चाहिए कि उस मान्यता के इर्द-गिर्द ही जीवन चक्र घूमता रहेगा। दुर्भाग्यग्रस्तता की स्थिति से मरण पर्यंत पीछा न छूट सकेगा।
लड़कियों और लड़कों की प्रतिभा में अंतर किसी शारीरिक अथवा मानसिक बनावट के कारण नहीं वरन उनके साथ होने वाले भेदभाव पूर्ण व्यवहार के कारण होता है। बेटे को अधिक लाड़-प्यार और अधिक सुविधा साधन मिलते हैं और बेटी को डांट-डपट, उपेक्षा, अवज्ञा। फलतः लड़की का अंतःकरण यह स्वीकार करता चला जाता है कि वह वस्तुतः हेय और हीन है। इस हेय मान्यता के कारण वह आजीवन डरी, सहमी, सकुची और पिछड़ी स्थिति में रहती है। यह कुसंस्कार बहुत प्रयत्न करने पर भी निकलते नहीं, अधिक प्रयत्न किया जाय तो वे उद्धत प्रदर्शन या उच्छृंखल व्यवहार में फूट पड़ते हैं। महिलाओं का अधिक फैशन बनाना, सजधज दिखाना, उनकी आत्महीनता का उद्धत प्रदर्शन है। कभी-कभी वे अधिक झगड़ालू, बच्चों को पीटने वाली, रूठने वाली, आत्महत्या की धमकी देने वाली देखी जाती हैं। उनके इस चंडीरूप से उनका उच्छृंखल व्यवहार ही फूटता है। वस्तुतः यह आत्महीनता का ही दूसरा रूप है। अत्यधिक संकोची, बात-बात में रो पड़ने वाली, न हो तो पग-पग पर उफनने वाली सही, दो परस्पर विरोधी दिशाओं में एक ही प्रवाह फूटता है।
लड़कों के बारे में भी यही बात है। उन्हें अनावश्यक लाड़-प्यार देकर या तो अहमन्यता ग्रसित बना दिया जाता है या फिर मूर्ख, दुष्ट, अभागा, चोर, आलसी कहकर उसके अंतः में यह विश्वास जमा दिया जाता है कि वह हेय स्तर का है। सामान्य मनुष्य जैसा नहीं वरन् उससे गया-गुजरा है। प्रभावशाली, बड़े कहलाने वाले लोग अपनी छाप छोटों पर छोड़ते ही रहते हैं। बालक अपनी हीनता स्वीकार करता चला जाता है और बड़े होने पर या तो कायर, आलसी, चोर, मंद बुद्धि रह जाता है या फिर दुष्ट-दुर्गुणी बनकर उद्धत पाप करता हुआ दृष्टिगोचर होता है।
प्रतिभा के विकास में मनुष्य को स्वाभिमानी, आत्मावलंबी तथा आत्मविश्वासी होना चाहिए और किसी के भी द्वारा थोपे गए आत्महीनता के निर्देशों को अस्वीकार कर देना चाहिए। गलती ढूंढ़ने, पूछने और सुधारने का प्रयत्न जारी रहना चाहिए। वस्तुतः अधिक योग्य बनने का रचनात्मक प्रयास और उत्कर्ष का क्रमिक विकास तो महान से महान व्यक्तियों को भी इसी प्रकार अपनाना पड़ा है। प्रगति का अर्थ ही गलती सुधारने में तीव्रता उत्पन्न होना है। यह क्रम पूछने-बताने से और भी अधिक सही होता है। पर वह रचनात्मक होना चाहिए।
मनुष्य का, मनुष्यता का मूल्य समझने वाले प्रत्येक विवेकवान व्यक्ति का दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि किसी के व्यक्तित्व पर आक्रमण न करे। बड़ा सांड़ छोटे बछड़े के पेट में सींग घुसेड़ सकता है, बड़ा कुत्ता छोटे कुत्ते की गर्दन दांतों से फफेड़ सकता है, पर ऐसा व्यवहार मनुष्य को मनुष्य के साथ तो नहीं ही करना चाहिए।
व्यक्तित्व को छोटा, घटिया, गया-बीता बताना, उसके भविष्य को अंधकारमय बताना उतना ही बुरा है जितना उसके साथ किए गए किसी भी दुर्व्यवहार को माना जा सकता है। बलवान दुर्बल को पछाड़ कर उसका कचूमर निकाल सकते हैं, इसी प्रकार प्रभावशाली, शक्ति संपन्न व्यक्ति छोटे लोगों को हेय, हीन ठहरा कर उसके मनोबल को तोड़ सकते हैं। यह बुद्धि एवं प्रतिभा का आक्रमणात्मक दुरुपयोग है।
हमें रचनात्मक सूझाव देने चाहिए। यह काम बुरा हुआ इसकी उतनी अधिक व्याख्या करने की जरूरत नहीं है जितनी कि सुधार के लिए जो किया जा सकता है उसका सूझाव देने की। सुझाव रचनात्मक होते हैं। उनसे दिशा मिलती है और लाभ होता है, किन्तु भर्त्सना से मन छोटा होता है। तिरस्कार के फलस्वरूप द्वेष-दुर्भाव की खाईं चौड़ी होने के अतिरिक्त और कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। गलती से होने वाली हानि और सुधार का तरीका अपनाने का लाभ तुलनात्मक रीति से समझाया जा सकता है।
दूसरे के दबाव से, परिस्थितियों से, अपनी आत्म अवज्ञा से आत्महीनता की मनोवैज्ञानिक ग्रंथि बनती है और उसके कारण व्यक्तित्व बहुत ही दीन और दुर्बल बन जाता है। ऐसे व्यक्ति दब्बू, संकोची, चापलूस, हां में हां मिलाने वाले, असहमति को प्रकट न कर सकने वाले, भीतर ही भीतर खीझे-रूठे रहने वाले होते हैं। उनसे कोई बेगार ले सकता है, ठग सकता है, साहस के अभाव में वे यह तक प्रकट नहीं कर सकते कि उनसे जो कुछ कराया जा रहा है, जो वे कर रहे हैं उसमें उनकी स्वेच्छा नहीं है।
मनोविज्ञानी जे0सी0 राबर्टस ने अपनी ‘दैनिक जीवन में मनोविज्ञान’ विषय की पुस्तक में इस बात पर बहुत जोर दिया है कि हर मनुष्य को अपने भीतर से साहस का उदय करना चाहिए। अपने आपको सबसे बड़ा न सही कम से कम सबसे अयोग्य मानना तो बंद कर ही देना चाहिए। परमात्मा ने प्रत्येक व्यक्ति को लगभग समान स्तर की क्षमता प्रदान की हैं। सबके भीतर प्रगति के बीज छिपे पड़े हैं, और हर कोई अपनी सामर्थ्य को विकसित करने में समर्थ है। अंतर इतना ही रहता है कि साहसी लोग अपने को पहचानते हैं, अपने ऊपर भरोसा करते हैं और अपनी श्रेष्ठता से साथियों को प्रभावित करके अपना सम्मान, सद्भाव एवं सहयोग संपादित करते हैं। इसके विपरीत दब्बू लोग यह छाप छोड़ते हैं कि इनसे किसी को कुछ मिलता तो है नहीं, उल्टे सदा भार और सिरदर्द सिद्ध होते रहेंगे। इसलिए इनसे तो बचना ही ठीक है। हर व्यक्ति एक दूसरे से कुछ चाहता है और इस आशा से मैत्री करता है कि उनके संपर्क में प्रसन्नता और प्रगति की संभावना बढ़ेगी। जो इस कसौटी पर खरे उतरते हैं उनके स्नेही, समर्थक और सहयोगी सहज में ही बढ़ते जाते हैं। इसी संचय से मनुष्य उन साधनों से संपन्न बनता है जो अंतरंग-बहिरंग प्रगति का पथ प्रशस्त करते हैं।
आत्महीनता से ग्रसित व्यक्ति का मित्र वह है जो सदा उसके गुणों की चर्चा करे, प्रतिभा को निखारे, प्रशंसा करे और प्रोत्साहन प्रदान करे। साहस की अभिवृद्धि धन संपत्ति, विद्या, रूप-सौंदर्य आदि सभी विभूतियों से बढ़ी-चढ़ी उपलब्धि है। साहस जीतता है, आत्मबल सबसे बड़ा बल है। आत्मविश्वास और हिम्मत के साथ जिस दिशा में भी बढ़ा जायेगा, उसी में सफलता मिलती चली जायगी, यदि यह तथ्य समझ लिया जाय तो आत्महीनता की निकृष्ट दरिद्रता से पीछा छुड़ाना हर किसी का प्रथम कर्तव्य प्रतीक होगा।
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