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Books - पंच तत्वों से— सम्पूर्ण रोगों का निवारण

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वायु चिकित्सा

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तत्वों में वायु बहुत सूक्ष्म है। पृथ्वी, जल, अग्नि की अपेक्षा वायु की सूक्ष्मता अधिक है। इसलिए उसका गुण और प्रभाव भी अधिक है। अन्न और जल के बिना कुछ समय मनुष्य जीवित रह सकता है पर वायु के बिना एक क्षण भर भी काम नहीं चल सकता। शरीर में अन्य तत्वों के विकार उतने खतरनाक नहीं होते जितने कि वायु के विकार। जिस स्थान पर वायु विकृत होगी वही अंग तीव्र वेदना का अनुभव करेगा और अपनी सारी शक्ति खो बैठेगा। वायु प्राण है इसलिए प्राण वायु पर जीवन की निर्भरता मानी जाती है। सांस रुक जाय या पेट फूल जाये तो मृत्यु को कुछ देर नहीं लगती। लोग वायु सेवन के लिए जरूरी काम छोड़ कर समय निकालते हैं। जहां की हवा खराब हो जाती है वहां नाना-प्रकार की बीमारियां, महा बीमारियां फैलती हैं इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति वहां रहना पसन्द करते हैं जहां की वायु अच्छी हो। प्राणायाम करने वाले जानते हैं कि विधि पूर्वक वायु साधन करने से उन्हें कितना लाभ होता है। निस्संदेह वायु का स्वास्थ्य से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है और वायु के प्रयोग द्वारा अपनी बिगड़ी हुई तंदुरुस्ती को ठीक कर सकता है।चिकित्सा जितनी स्थूल होती है उतना ही कम प्रभाव डालती है। चूर्ण, चटनी, अवलेह आदि के रूप में ली हुई दवा पहले पेट में जाती है, वहां पचती है तब रक्त बनकर समस्त शरीर में फैलती और अपना असर दिखाती है। यदि पाचन न हुआ तो वह दवा मल मार्ग से निकल जाती है और अपना असर नहीं दिखाती। जिनकी पाचन शक्ति ठोस नहीं होती उन्हें ‘‘पुस्टाई के पाक’’ कुछ भी फायदा नहीं करते क्योंकि वे दवाएं बिना पचे मल द्वारा बाहर निकल जाती हैं। ऐसी दशा में पतली पानी के रूप में तैयार हुई दवाएं अधिक काम करती हैं क्योंकि स्थूल आहार की अपेक्षा जल जल्दी पच जाता है। इन्जेक्शन द्वारा खून में मिलाई हुई दवाएं और भी जल्दी शरीर में फैल जाती हैं। हवा का नम्बर इससे भी ऊंचा है। वायु द्वारा सांस के साथ शरीर में पहुंचाई हुई हवा बहुत जल्द असर करती है। जुकाम जैसे रोगों में सूंघने की दवाएं दी जाती हैं। क्लोरोफार्म सुंघाने से जितनी जल्दी बेहोशी आती है उतनी जल्दी उसे खाने से नहीं आ सकती।इन सब बातों का ध्यान रखते हुए भारतीय ऋषि मुनियों ने यज्ञ हवन की बड़ी ही सुन्दर वैज्ञानिक विधि का आविष्कार किया है। हवन में जलाई हुई औषधियां नष्ट नहीं होतीं वरन् सूक्ष्म रूप धारण करके अनेक गुनी प्रभावशालिनी हो जाती हैं और अनेकों को आरोग्य प्रदान करती हैं। लाल मिर्च के एक टुकड़े को जब आग में डाला जाता है तो वह सूक्ष्म होकर हवा में मिल कर चारों ओर फैलता है और दूर तक बैठे हुए लोगों को खांसी आने लगती है। इससे प्रकट है कि जलने पर कोई वस्तु नष्ट नहीं होती वरन् सूक्ष्म होकर वायु में मिल जाती है और उस वायु के सम्पर्क में आने वालों पर उस वस्तु का असर पड़ता है। हवन के धार्मिक रूप को छोड़ दें तो भी अग्निहोत्र की रोग निवारण सम्बन्धी महत्ता स्वीकार करनी ही पड़ती है।बाजार में कृमि नाशक फिनाइल की भांति की एक अंग्रेजी दवा फार्मेलिन बिकती है। इससे बीमारियों के कीड़े नष्ट हो जाते हैं। यह दवा फार्मिक आलडी डाइड गैस से बनती है। फ्रांस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर ट्रिले ने बताया है कि उपरोक्त गैस लकड़ियां जलाने या खांड़ जलाने से उत्पन्न होती है। जो काम बहुत कीमत खर्च करने पर फार्मेलिन जैसी दवाओं से होता है वह कार्य अग्निहोत्र द्वारा अधिक उत्तमता से हो जाता है। दवा तो वही असर करती है जहां छिड़की जाती है पर अग्निहोत्र द्वारा तो वह कार्य वायु द्वारा बड़े पैमाने पर हो जाता है।फ्रांसीसी वैज्ञानिक टिलवर्ट की शोध है कि शकर जलाने से जो गैस उत्पन्न होती है उससे हैजा, तपैदिक, चेचक आदि रोगों का विष दूर होता है। डॉक्टर हैफकिन का परीक्षण है कि घी जलाने से उत्पन्न होने वाली गैस चर्मरोग, रक्त विकार, शुष्कता, दाह, एवं अन्त्र रोग उत्पन्न करने वाले विष कीटाणुओं को नष्ट करती है। डॉक्टर टाटलिट ने दाख के धुंए को टाइफ़ाइड और निमोनिया ज्वर को मिटाने वाला बताया है।सूर्य के द्वारा पृथ्वी पर जो गर्मी आती है उसे उपयुक्त मात्रा में कायम रखने के लिए कार्बनडाइ ऑक्साइड गैस बड़ा महत्वपूर्ण कार्य करती है। यह गैस हवा में करीब 1-230 होती है। यदि यह परमाणु थोड़ा भी घट बढ़ जाता है तो उसका पृथ्वी के मौसम पर बड़ा भारी असर पड़ता है। यदि यह परिणाम शून्य हो जाय तो इतनी गर्मी बढ़ सकती है कि कहीं बर्फ के दर्शन भी न हों और यदि यह आधी रह जाय तो समस्त भूमण्डल बर्फ से ढक जाये।उपरोक्त गैस जहां ज्यादा बनती है वहां आकाश में गर्मी ज्यादा बढ़ जाती है फलस्वरूप वर्षा भी अधिक होती है। ज्वालामुखी पहाड़ों से वह वायु निकली है इसलिये वहां वर्षा अधिक होती है और हरियाली छाई रहती है। फ्रांस के यूवरीन चश्मे से यह गैस निकलती है फलस्वरूप वहां वर्षा और वनस्पति की अधिकता रहती है। हवन द्वारा भी वही कार्बनडाइ ऑक्साइड गैस उत्पन्न होती है। जहां हवन अधिक होते हैं वहां वर्षा और वनस्पति की अधिकता रहती है फलस्वरूप वहां की आवहवा भी स्वास्थ्य कारक होती है। गीता में भी ऐसा ही संकेत किया गया है।हवन जहां एक धार्मिक कृत्य है वहां वह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करने वाला भी है। यज्ञ में लोक कल्याण के लिये समिष्टि आत्मा-परमात्मा की उपासना के लिये अपनी वस्तुओं का त्याग-समर्पण-होम करने से परमार्थ, त्याग, उदारता एवं पवित्रता की मनोभावनायें उत्पन्न होती हैं ऐसी भावनाओं का उदय होना अनेक प्रकार के मानसिक रोगों को निर्मूल करने के लिए सर्व श्रेष्ठ उपचार है। डायाकानव गैस बढ़ने से वर्षा की अधिकता द्वारा संसार की समृद्धि बढ़ती और आवहवा शुद्ध होती है। स्वस्थता प्रदान करने वाला और रोग नाशक औषधियां अग्नि की सहायता से सूक्ष्म रूप धारण करके शरीर में व्याप्त हो जाती है और निरोगता की स्थापना में बड़ा महत्वपूर्ण कार्य करती है। फेंफड़े और मस्तिष्क के रोगों के लिये तो हवन द्वारा पहुंची हुई औषधि मिश्रित वायु बहुत ही हितकर सिद्ध होती है। होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के आविष्कार डालटन हनीमेन ने अपनी पुस्तक आर्गेमन आफदी मेडीसन्स की 190वीं धारा में औषधियां सूंघने की महत्ता को स्वीकार किया। ऐलोपैथिक डॉक्टर भी Kreosote और Eucalyptus Oil आदि का Inhalation बनाकर सुंघाते हैं। आयुर्वेद तो धूनी देने, धूम्रपान करने आदि के विधानों से भरा पड़ा है।जिन स्थानों की आवहवा स्वास्थ्य के लिये विशेष रूप से लाभदायक मानी जाती है वहां की हवा में ओजोन नामक एक गैस पाई जाती है वह एक प्रकार की तीव्र ऑक्सीजन है। यदि हवा में इसका पच्चीस लाखवां भाग हो तो भी वहां की वायु बहुत उपयोगी होती है। हवन द्वारा ओजोन गैस उचित मात्रा में प्राप्त होती है। इस प्रकार साधारण स्थानों में भी शिमला नैनीताल जैसी शुद्ध हवा घर बैठे मिल जाती है।सोने का एक टुकड़ा यों ही किसी को खिला दिया जाय तो कुछ लाभ न होगा। किन्तु उसी सोने को सूक्ष्म करके भस्म या वर्क बनाकर खिलाया जाय तो अधिक फायदा होगा। बादाम यों ही खाये जायें तो उनका लाभ न होगा पर यदि उन्हें पत्थर पर पानी में घिसकर खाया जाय तो अधिक लाभ होगा। कारण यह है कि किसी वस्तु को जितना सूक्ष्म बना लिया जाता है उतनी ही वह लाभदायक हो जाती है। औषधियों के बारे में भी वही बात है, पीपल का एक टुकड़ा यों ही खालें तो उसकी कुछ विशेष उपयोगिता नहीं परन्तु चौसठ प्रहर लगातार घोटने के बाद जो ‘चौसठ पहरा पीपल’ बनती है वह बहुत लाभप्रद सिद्ध होती है। सूक्ष्मता से शक्ति उत्पन्न होती है। होम्योपैथी में सूक्ष्मता के अनुपात से ही पोटेन्सी बढ़ती जाती है। यज्ञ द्वारा औषधियां सूक्ष्म होकर बहुत उपयोगी हो जाती हैं। और तुरन्त लाभ दिखाती हैं। जो पोषक पदार्थ हवन में जलाये जाते हैं वे रोगी के शरीर में प्रवेश करके उसकी बल-वृद्धि करते हैं। ग्लूकोज का एक छोटा इंजेक्शन एक सेर अंगूर खाने की अपेक्षा अधिक शक्तिवर्धक होता है इसी प्रकार छटांक भर घी खाने की अपेक्षा रोगी व्यक्ति उसके हवन द्वारा अधिक बल प्राप्त कर सकता है।साधारणतः दैनिक कार्यक्रम में हवन को भी एक नित्य कर्म की तरह स्थान देना चाहिए। शास्त्रों ने नित्य पंचयज्ञ करने के लिए हर ग्रहस्थ को आदेश दिया है। पूरा भजन के समय थोड़ा सा हवन नित्य कर लेना चाहिये। शास्त्रीय विधि व्यवस्था के अनुसार हवन विधि न मालूम हो तो गायत्री मंत्र या ‘‘ॐ भूर्भुवः स्वः’’ इन व्याहृतियों से जितनी सामर्थ्य हो उतनी घी और सामग्री लेकर हवन कर लेना चाहिये। समिधा की लकड़ी आम, पीपल, बड़, गूलर, छोंकर, बेल, ढाक आदि के पुराने पेड़ की खूब सूखी हुई लेनी चाहिये। चन्दन, देवदारु सरीखी सुगंधित लकड़ियां भी थोड़ी बहुत मिला ली जायं तो और भी अच्छा है। हवन सामग्री में निम्न वस्तुएं होनी चाहिए:—चन्दन, इलायची, जायफल, जावित्री, केशर, गिलोय, अगर, तगर, असगंध, वन्शलोचन, गूगल, लौंग, ब्राह्मी, पुनर्नवा जीवन्ती, कचूर, छार, छबीली, शतवारि, खस, कपूर, कचरी, कमलगट्टा, शीतलचीनी, तासील पत्र, वच, नागकेशर दालचीनी रास्ना, आंवला, जटामासी, इन्द्र जौं, मुनक्का, छुहारा, नारियल की गिरी, चिरौंजी, किशमिश, पिस्ता, अखरोट। यह चीजें साधारणतः समान भाग होनी चाहिये पर केशर बंसलोचन जैसी अधिक महंगी चीजें आर्थिक कारणों से कम भी डाली जा सकती हैं। सामग्री नई, ताजी सूखी और साफ होनी चाहिए। सामग्री कूट कर उसमें तिल, जौ, चावल, उर्द, शकर और घी मिला लेना चाहिये। इस सामग्री का हवन करने से हवन के निकटस्थ लोगो को बल वर्धक; मानसिक शांतिदायक और रोग नाशक तत्व प्राप्त होते हैं। फलस्वरूप उनके स्वास्थ्य की स्थिति उन्नत एवं सन्तोष जनक होने लगती है।यदि किसी रोग विशेष की चिकित्सा के लिए हवन करना हो तो उसमें उस रोग को दूर करने वाली ऐसी औषधियां सामग्री में और मिला लेनी चाहिये जो हवन करने पर खांसी न उत्पन्न करती हों। यह मिश्रण इस प्रकार हो सकता है—(1) साधारण बुखारों में—तुलसी की लकड़ी तुलसी के बीज, चिरायता करंजे की गिरी (2) विषम ज्वरों में—पाढ़ की जड़, नागरमोथा, लाल चन्दन, नीम की गुठली, अपामार्ग (3) जीर्ण ज्वरों में—केशर, काकड़ासिंगी, नेत्रपाला, त्रावमाण, खिरेंटी, कूट, पोहकर मूल (4) चेचक में—वंशलोचन, घमासा, धनियां, श्योनाक, चौलाई की जड़, (5) खांसी में—मुलहटी अडूसा, कांकड़ा सिंगी, इलायची, बहेड़ा, उन्नाव, कुलंजन (6) जुकाम में—अनार के बीज, दुब की जड़, गुलाब के फूल, पोस्त गुल वनफसा (7) श्वांस में—धाय के फूल, पोस्त के डौंडे, बबूल का वक्कल मालकांगनी, बड़ी इलाइची, (8) प्रमेह में—तालमखाना, मसली, गोखरू बड़ा, शतवारि सालममिश्री, लजवंती के बीज (9) प्रदर में—अशोक की छाल, कमल केशर, मोचरस, सुपाड़ी माजूफल, (10) वात व्याधियों में—महजन की छाल, रास्ना, पुनर्नवा, घमासा, असगन्ध, विशरीकंद, मेंधी, (11) रक्त विकार में—मजीठ, हरड़ बावची मरफोंका, जबासा, उसवा (12) हैजा में—धनियां, कासनी, सोंफ, कपूर, चित्रक (13) अनिद्रा में—काकजंघा, पीपलामूल, भारङ्गी (14) उदर रोगों में चव्य, चित्रक, तासील पत्र, दालचीनी, जीरा, आलू बुखारा, पीपर, (15) दस्तों में—अतीस, बेलगिरी, ईसबगोल मोचरस मौलश्री की छाल, तालमखाना, छुहारा। (16) पेचिस में—करोड़ फली, अनारदाना, पोदीना, आम की गुठली, कतीरा (17) मस्तिष्क संबंधी रोग में—गोरखमुंडी शंखपुष्पी, ब्राह्मी, बच, शतवारि (18) दांत के रोगों में—शीतलचीनी, अकरकरा, बबूल की छाल, इलाइची, चमेली की जड़ (19) नेत्र रोगों में—कपूर लोंग लालचन्दन, रसोत, हल्दी, लोंग (20) घावों में—पभाख, दूब की जड़, बड़ की जटाएं, तुलसी की जड़, तिल, नीम की गुठली, आंवाहल्दी। (21) बन्ध्यात्व में—शिवलिंगी के बीज जटामसी, कूट, शिलाजीत, नागरमोथा, पीपलवृक्ष के पके फल, गूलर के पके फल, बड़ वृक्ष के पके फल, भट कटाई। इसी प्रकार अन्य रोगों के लिये उन रोगों की निवारक औषधियां मिलाकर हवन सामग्री तैयार कर लेनी चाहिये। इस संबंध में इस पुस्तक के लेखक से पाठकगण जबानी पत्र द्वारा सलाह ले सकते हैं।स्वस्थ्य मनुष्य को अपनी तन्दुरुस्ती कायम रखने और उसे बढ़ाने के लिए नित्य गायत्री मन्त्र के साथ हवन करना चाहिये। इससे अध्यात्मिक लाभ भी होता है। रोगी मनुष्य यदि चल फिर सकता हो तो उसे आसन पर पूर्व की ओर मुंह करके बैठना चाहिये और स्वयं हवन करना चाहिये। यदि रोगी अशक्त हो तो उसे हवन के समीप मुलायम बिस्तर पर लिटा देना चाहिये। जिस कमरे में रोगी को रहना होता हो उस कमरे की खिड़कियां खोल कर यदि हवन किया जाय तो बहुत अच्छा है। परन्तु इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कमरे में जरूरत से ज्यादा गैस भर जाने के कारण रोगी को कष्ट न हो। हवन की अग्नि प्रज्वलित रहनी चाहिये धुंआ सदा हानिकारक होता है, चाहे वह लकड़ी का हो चाहे सामग्री का हो। जलती हुई अग्नि से ही औषधियों की सूक्ष्मता ठीक प्रकार होती है। घर में हवन की वायु के बस जाने से अनेक प्रकार के अस्वास्थ्य कर विकारों का निवारण हो जाता है।हवन के समय हलके ढीले और कम वस्त्र पहनने चाहिये। यदि ऋतु अनुकूल हो तो नंगे ही बैठना चाहिये। जिससे कि यज्ञ की वायु शरीर को बाहर भी स्पर्श करे। स्नान करके बैठना सबसे अच्छा है पर यदि स्थिति अनुकूल न हो तो हाथ मुंह धोकर भी काम चल सकता है। यदि विधिवत् हवन न हो सके तो एक मिट्टी के सकोरे में लकड़ियां जला कर उस पर घी और हवन सामग्री डालकर रोगी के समीप रख देना चाहिये। एक तरीका यह भी हो सकता है कि सामग्री को कूटकर घी के साथ उसकी बत्ती सी बनाली जाय और धूपबत्ती की तरह उसे जलने दिया जाय। हवन के लिए प्रातःकाल का समय सबसे अच्छा है। बिना विशेष आवश्यकता के रात्रि में हवन न करना चाहिये।हवन के समीप जल का भरा हुआ एक पात्र रखना कभी न भूलना चाहिये। यदि बड़ा हवन हो तो हवन कुण्ड के चारों ओर पानी के भरे पात्र रख देने चाहिये। कारण यह है कि हवन में जहां उपयोगी वायु निकलती है वहां कार्बन सरीखी हानिकारक गैस भी निकलती है। पानी उस हानिकर गैस को खींच कर अपने में चूस लेता है। इस पानी को सूर्य के सम्मुख अर्घ के रूप में फैला देने का विधान है। इस जल को पीने आदि के काम में न लाना चाहिये।हवन के अतिरिक्त वायु चिकित्सा का दूसरा तरीका प्राणायाम है। हम अपनी ‘‘आसन और प्राणायाम’’ पुस्तक में इसका वर्णन कर चुके हैं। प्राणायाम के द्वारा अनेक कठिन रोगों के रोगी स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर चुके हैं। विशेष रोगों के लिए विशेष प्राणायाम भी हो सकते हैं। पर साधारण और सर्व रोगोपयोगी प्राणायाम यह है कि (1) खुली हवा में प्रातःकाल मेरुदंड सीधा कर पद्मासन से समतल भूमि पर एक छोटा आसन बिछाकर बैठे (2) फेफड़ों में जितनी हवा भरी हो उस सबको धीरे धीरे बाहर निकाल दें (3) जब फेफड़े बिलकुल खाली हो जावें तो धीरे धीरे सांस खींचना प्रारंभ करें और जितनी वायु छाती एवं पेट में भरी जा सके भरलें। (4) जितने सैकिंड में हवा खींची गई हो उसके एक तिहाई समय तक वायु को भीतर ही रोकें (5) अब धीरे धीरे वायु को बाहर निकालना आरंभ करें और पेट को बिलकुल खाली करदें (6) जितनी देर में हवा बाहर निकाली गई हो उसके एक तिहाई समय तक बिना वायु के रहें (7) फिर पूर्ववत् वायु खींचना आरंभ करदें यह एक प्राणायाम हुआ। ऐसे प्राणायाम सामर्थ्य के अनुसार एक समय में 10-15 या न्यूनाधिक किये जा सकते हैं। घंटे दो दो घंटे के अन्तर से यह प्राणायाम करते रहने चाहिए। साथ में ‘‘ॐ’’ का या गायत्री मंत्र का जप भी करते रहना चाहिए। जैसे आंधी आने से आकाश में वायु की शुद्धि हो जाती है उसी प्रकार प्राणायाम से वायु की प्रचण्ड हलचल द्वारा भीतरी विकार उमड़ कर सांस द्वारा बाहर निकल जाते हैं। फेफड़े, मस्तिष्क हृदय, आमाशय, पेडू और गुर्दे को इस प्राणायाम द्वारा बल मिलता है और आवश्यक व्यायाम हो जाता है। जिससे निर्बल अंगों में सबलता बढ़ती है और बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य सुधरता है।
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