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Books - बच्चों की शिक्षा ही नहीं दीक्षा भी आवश्यक

Media: TEXT
Language: HINDI
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स्कूल भेजने के साथ यह भी ध्यान रहे

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स्कूल में भर्ती कराने के बाद बच्चों का एक नया संसार प्रारम्भ होता है। अब तक वे अपने मां के शासन में रहने का अनुभव करते थे स्कूल जाना आरम्भ करने के बाद किसी दूसरे व्यक्ति का, जो परिवार से बाहर का है शासन अनुभव होता है। अब तक वे परिवार के या आस-पड़ोस के बच्चों के साथ रहते थे स्कूल में प्रवेश करते ही उनके अनुभव में बाहर के बच्चों का अहसास होता है। हर तरह के बच्चों के लिए पहली बार स्कूल जाना अपने ढंग से नया अनुभव है। प्रौढ़ दृष्टि से देखने पर भले ही इस बात का कोई महत्व न लगे परन्तु बच्चों के लिए यह एक नयी, अति महत्वपूर्ण और चौंका देने वाली घटना है। उस समय की अनुभूतियां वयस्क होने तक बहुत कुछ विस्मृत हो जाती हैं पर फिर भी याद की जाय तो घबराहट, हैरानी और आश्चर्य की एक झलक तो मिल ही सकती है।

यही कारण है कि स्कूल में घुसते ही बच्चे हिचकिचाने लगते हैं। वहां उनका जी घुटने लगता है। स्कूल का वातावरण उन्हें एक कारगर की तरह लगता है जहां से वे जल्दी से जल्दी बाहर निकल जाना चाहते हैं। अतः बच्चों का स्कूल भेजते समय काफी मनोवैज्ञानिक समझबूझ रखने की आवश्यकता है। अन्यथा बच्चों के मन में स्कूल के प्रति एक स्थायी अरुचि घर कर जाती है और वे चाहकर भी कभी अच्छा विद्यार्थी नहीं बन सकते।

मनोवैज्ञानिक बातों का ध्यान रखते हुए भी बच्चों के मन से यद्यपि समूची हिचकिचाहट तो दूर नहीं की जा सकती। पर उनके मन में वह क्षमता अवश्य उत्पन्न की जा सकती हैं जो नये वातावरण के अनुकूल बनने का आत्म विश्वास दिला सके। बच्चा स्कूल में प्रारम्भिक दिनों में उस प्रकार प्रवेश करता है जैसे बतख का बच्चा तालाब में उतर रहा हो; जान पड़ रहा है— यह विवशता है और जाने का मन नहीं है क्योंकि आस-पास सब कुछ नया ही नया और अनदेखा सा है।

अतः स्कूल भेजने से पूर्व बच्चों को ऐसा साथी ढूंढ़ने में मदद देनी चाहिए जो उसी की उम्र का हो सके आस-पास के ही बच्चे तलाश करना चाहिए ताकि बच्चा अपने आस-पास फैले नये वातावरण में किसी को तो अपना विश्वस्त साथी पा सके। नये पन की हिचकिचाहट दूर करने के लिए कुछ और पूर्वाभ्यास भी किये जा सकते हैं जैसे अपनी मौजूदगी में उसे किसी नये स्थान पर जाना, पास ही कहीं किसी काम से नयी जगह पर अकेले भेजना।

स्कूल में उसे कई बच्चों का साथ मिलता है जिनकी संख्या काफी बड़ी होती है बच्चा अक्सर भीड़-भाड़ से भी घबराता है। अतः उसे पहले अपने समवयस्क बच्चों के साथ मेल-जोल बढ़ाने का अवसर देना चाहिये ऐसा होने पर उसे स्कूली साथियों के साथ हिल-मिल जाने में काफी सहायता मिलेगी।

स्कूल में भर्ती करा देने के बाद ही अपनी सावधानियों से सन्तोष नहीं कर लेना चाहिए। बाद में भी अनवरत उसके स्कूली जीवन के प्रति स्वयं रुचि लेनी चाहिए और उसका उत्साह बढ़ाना चाहिए। आरम्भ में बच्चे स्कूल भर्ती कराने के बाद अनियमितता बरतने लगते हैं। चार छः घंटे एक स्थान पर बंधे रहना उन्हें रुचिकर नहीं लगता। अतः वे अपने दूसरे अन्य साथियों के साथ स्कूल से भाग आते हैं और कहीं पर खेलते रहते हैं। अतः इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा नियमित रूप से स्कूल जा रहा है अथवा नहीं, यदि नियमितता की यह आदत उस समय अच्छी तरह डाली जा सके तो आगे वे अपना जीवन सुव्यवस्थित रखने के अभ्यस्त हो सकते हैं। स्कूल जाने में अनियमितता बरतने का कारण भी वहां के वातावरण का अजनवीपन है। अतः माता-पिता दोनों को मिलकर उसे वहां के अजनवी वातावरण के प्रति जिज्ञासु और श्रद्धालु बनाना चाहिए। इस दिशा में उनसे स्कूली कार्यकलापों के सम्बन्ध में प्रश्न वहां के अध्यापकों की बातें, साथियों और सहपाठियों की जानकारी आदि प्रश्न जानते रहना चाहिए। माता-पिता के लिए ये जानकारियां भले ही व्यर्थ हों, पर इनसे बच्चों में एक जिज्ञासा का भाव उत्पन्न होता है और वह स्कूल के प्रति और भी तीव्र लगन रखने लगता है।

पाठशाला जाते समय बच्चों को स्नेहपूर्वक विदा करना, प्रोत्साहन देना तथा लौटने पर प्रशंसात्मक बातें करना तुरन्त प्रभाव उत्पन्न करता है। पाठशाला से लौटने पर बच्चे थक से जाते हैं। स्कूली टाइम में अनवरत श्रम करते रहने के कारण उनकी बातें सुलभ शक्तियां सहलाये जाने की अपेक्षा करती हैं। ऐसी परिस्थितियों में इस प्रकार की बात उनके लिए टानिक का काम करती हैं। ऐसे वक्त पर तो भूलकर भी ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए जिससे बच्चों को कष्ट अनुभव हो। थक जाने पर प्रौढ़ व्यक्तियों को भी बहुत जल्दी क्रोध आता है और उस समय व्यक्ति की सम्वेदना काफी नम रहती है। फिर वे तो बच्चे ठहरे। अतः उन्हें ऐसी बातें कहकर व्यर्थ नाराज करना उत्साह तोड़ देना जैसा है। जैसे बच्चा स्कूल से लौट कर कहता—मां हम आ गये। झिड़क कर यह कहने की बजाय कि अच्छा किया। कौन सा तीर मार लाये, यह कहा जाय कि राजा बेटा आ गया। कब आये यह तो आपने पता ही नहीं चलने दिया। बच्चे की सुखद अनुभूतियों को कितना चेतन करता है।

स्कूली जीवन आरम्भ करने के साथ बच्चों में स्वावलम्बन की आदत डालने का प्रयास भी उसी समय किया जा सकता है। रुचिकर समय मिलने पर उन्हें कपड़े पहनना, बालों में कंघी करना, जूते पहनना जैसी बातें सिखाना चाहिए। यह नहीं कि किसी काम में लगे रहने पर खुद ही तैयार हो जाओ कह दें, वरन् जब अपने पास भी समय हो तब उसे प्रोत्साहित करते हुए इन कार्यों का प्रशिक्षण दें। दैनिक कार्यों का प्रशिक्षण व्यस्तता या शीघ्रता के लिए नहीं संस्कार स्वभाव के लिए देना चाहिये। और इसके लिए शांत वातावरण ही अधिक उपयुक्त है।

अपने नये जीवन में बच्चा नये समवयस्क लड़कों के सम्पर्क में आता है और अनेकों से प्रभावित होता तथा अनेकों से घृणा करता है। जिन बच्चों से प्रभावित होता है उनका साथ करने की भी चेष्टा करता है। ऐसे समय में पूरी सावधानी रखनी चाहिए और वह कैसे बच्चों के साथ रह रहा है तथा उनकी प्रवृत्ति और स्वभाव कैसा है, इनका ध्यान रखना चाहिए। पाठशाला में संगति के सम्बन्ध में बच्चे के दूसरे साथियों, अध्यापकों और स्वयं बच्चों से जाना जा सकता है। उसके व्यवहार, रहन-सहन और आदतों में आये परिवर्तनों से भी इन बातों का पता चलाया जा सकता है। कहना नहीं होगा कुसंगति से बचाया जाना चाहिए तथा अच्छे बच्चों का साथ करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

बच्चे स्वभाव से चंचल और गैर गम्भीर होते हैं। परन्तु कक्षा में उन्हें एकाग्रता और शान्ति से बैठना पड़ता है। शरारती बच्चों को भी पढ़ाई के समय अपने पर अंकुश रखना पड़ता है। यही कारण है कि बच्चे छुट्टी होने पर जब स्कूल से निकलते हैं तो जोर से शोर करते हैं एक प्रकार से उनके स्वभाव में आयी थकान का ही यहां निराकरण होता है। इस प्रवृत्ति को घर पर ही दिशा देनी चाहिए और वे संध्या समय थोड़े बहुत खेलों में अपनी मानसिक थकान मिटा लें इसका प्रबन्ध करना चाहिए।

यदि बालक को शिक्षित बनाना चाहते हैं तो अभिभावकों को बालक की शिक्षा के प्रति जो उदासीनता है, उसे त्यागना होगा। बच्चा स्कूल की अपेक्षा घर पर अधिक समय व्यतीत करता है। इस समय यदि उसे कोई निर्देश नहीं मिल पाया तो बालक भी अध्ययन के प्रति आधा मन रखेगा। अस्तु, अभिभावक इस उत्तरदायित्व का वहन ऐसा समझ कर करें कि यह उनका महत्वपूर्ण कर्तव्य है।, जिसे उन्हें पूरा करना ही है। यदि अभिभावक इस ओर आगे बढ़ गये तो बालक को शिक्षा के विकास में बहुत बड़ी सहायता मिलेगी। शिक्षा और दीक्षा दोनों ही इस प्रकार समुचित व्यवस्था करने पर बालकों के व्यक्तित्व का उत्कृष्ट बनते चले जाना स्वाभाविक ही सुनिश्चित हो जाता है।
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