• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • गायत्री की सिद्धियां
    • गायत्री से सिद्धियां
    • साधकों के स्वप्न निरर्थक नहीं होते
    • सफलता के कुछ लक्षण
    • सिद्धियों का दुरुपयोग न होना चाहिए
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login


Back to Books

Books - गायत्री की सिद्धियां

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


सफलता के कुछ लक्षण

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 3 5 Last
गायत्री-साधना से साधक में एक सूक्ष्म दैवी चेतना का आविर्भाव होता है। प्रत्यक्ष रूप से उसके शरीर या आकृति में कोई विशेष अन्तर नहीं आता, पर भीतर ही भीतर भारी हेरफेर हो जाता है। आध्यात्मिक तत्वों की वृद्धि से प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष और मनोमय कोषों में जो परिवर्तन होता है, उसकी छाया अन्नमय कोष में बिलकुल ही दृष्टिगोचर न हो, ऐसा नहीं हो सकता। यह सच है कि शरीर का ढांचा आसानी से नहीं बदलता, पर यह भी सच है कि आन्तरिक हेर-फेर के चिह्न शरीर में प्रकट हुए बिना नहीं रह सकते।सर्प के मांस कोष में जब एक नई त्वचा तैयार होती है तो उसका लक्षण सर्प के शरीर पर परिलक्षित होता है, उसकी देह भारी हो जाती है, तेजी से वह नहीं दौड़ता, स्फूर्ति और उत्साह से वह वंचित हो जाता है, एक स्थान पर पड़ा रहता है। जब वह चमड़ी पक जाती है तो सर्प बाहरी त्वचा को बदल देता है, इसे केंचुली पलटना कहते हैं। केंचुली छोड़ने के बाद सर्प में एक नया उत्साह आता है, उसकी चेष्टाएं बदल जाती हैं, उसकी नई चमड़ी पर चिकनाई, चमक और कोमलता स्पष्ट रूप से दिखलाई देती है। ऐसा ही हेर-फेर साधक में होता है। जब उसकी साधना गर्भ में पकती है तो उसे कुछ उदासी, भारीपन, अनुत्साह एवं शिथिलता के लक्षण प्रतीत होते हैं, पर जब साधना पूर्ण हो जाती है तो दूसरे ही लक्षण प्रकट होने लगते हैं। माता के उदर में जब गर्भ पकता है, तब तक माता का शरीर भारी, गिरा-गिरा सा रहता है उसमें अनुत्साह देखा जाता है, पर जब प्रसूती से निवृत्ति हो जाती है तो वह अपने में एक हलकापन, उत्साह एवं चैतन्य अनुभव करती है।साधक जब साधना करने बैठता है तो अपने अन्दर एक प्रकार का आध्यात्मिक गर्भ धारण करता है। तन्त्र शास्त्रों में साधना को मैथुन कहा है। जैसे मैथुन को गुप्त रखा जाता है, वैसे ही साधना को गुप्त रखने का आदेश किया गया है। आत्मा जब परमात्मा से लिपटती है, उसका आलिंगन करती है तो उसे एक अनिर्वचनीय आनन्द आता है, इसे भक्ति की तन्मयता कहते हैं। जब दोनों का प्रगाढ़ मिलन होता है, एक दूसरे में आत्मसात् होते हैं तो उस स्खलन को ‘समाधि’ कहा जाता है। आध्यात्मिक मैथुन का समाधि सुख अन्तिम स्खलन है। गायत्री उपनिषद् और सावित्री उपनिषद् में अनेक मिथुनों का वर्णन किया गया है। वहां बताया गया है कि सविता और सावित्री का मिथुन है। सावित्री की, गायत्री की आराधना करने से साधक अपनी आत्मा को एक योनि बना लेता है जिसमें सविता का तेज पुंज, परमात्मा का तेज वीर्य गिरता है। इसे शक्तिपात भी कहा गया है। इस शक्तिपात विज्ञान के अनुसार अमैथुनी सृष्टि से उत्पन्न हो सकती है। कुन्ती से कर्ण का, मरियम के पेट से ईसा का उत्पन्न होना असम्भव नहीं है। देव-शक्तियों की उत्पत्ति इसी प्रकार के सूक्ष्म मैथुनों से होती है, समुद्र-मन्थन एक मैथुन था, जिसके फलस्वरूप चौदह रत्नों का प्रसव हुआ। ऋण और धन (निगेटिव और पाजेटिव) परमाणुओं के आलिंगन से विद्युत प्रवाह का रस उत्पन्न होता है। तन्त्र शास्त्रों में स्थान-स्थान पर जिस मैथुन को अशंसित किया गया है वह यही साधना मिथुन है।आत्मा और परमात्मा का, सविता और सावित्री का मिथुन जब प्रगाढ़ आलिंगन में आबद्ध होता है तो उसके फलस्वरूप एक आध्यात्मिक गर्भ धारण होता है। इसी गर्भ को आध्यात्मिक भाषा में भर्ग कहते हैं। भर्ग का जो साधक जितने अंशों में धारण करता है उसे उतना ही स्थान अपने अन्दर इस नये तत्व के लिए देना होता है। नये तत्वों की स्थापना के लिये पुरानों तत्वों को पदच्युत होना पड़ता है, इस संक्रांति के कारण स्वाभाविक क्रिया-विधि में अन्तर आ जाता है और उस अन्तर के लक्षण साधक में उसी प्रकार प्रकट होते हैं, जैसे गर्भवती स्त्री को अरुचि, उबकाई, कोष्ठबद्धता, आलस्य आदि लक्षण होते हैं, वैसे ही लक्षण साधक को भी उस समय तक जब तक कि उसकी अन्तः योनि में गर्भ पकता रहता है, परिलक्षित होते हैं। केंचुली में भरे हुए सर्प की तरह वह भी अपने को भारी-भारी, बिंधा हुआ, जकड़ा हुआ, अवसादग्रस्त अनुभव करता है। आत्मविद्या के आचार्य जानते हैं कि साधनावस्था में साधक को कैसी विषम स्थिति में रहना पड़ता है, इसलिये वे अनुयायियों को साधनाकाल में बड़े आचार-विचार के साथ रहने का आदेश करते हैं। रजस्वला या गर्भवती स्त्रियों से मिलता-जुलता आहार-विहार साधकों को अपनाना होता है। तभी वे साधना संक्रांति को ठीक प्रकार से पार कर पाते हैं।अण्डे से बच्चा निकलता है, गर्भ से सन्तान पैदा होती है। साधक को भी साधना के फलस्वरूप एक सन्तान मिलती है, जिसे शक्ति या सिद्धि कहते हैं। मुक्ति, समाधि, ब्राह्मीस्थिति, तुरीयावस्था आदि नाम भी इसी के हैं। यह सन्तान आरम्भ में बड़ी निर्मल तथा लघु आकार की होती हैं। जैसे अण्डे से निकलने पर बच्चे बड़े ही लुंज-पुंज होते हैं, जैसे माता के गर्भ से उत्पन्न हुए बालक बड़े ही कोमल होते हैं, वैसे ही साधना पूर्ण होने पर प्रसव हुईं नवजात सिद्धि भी बड़ी कोमल होती हैं। बुद्धिमान साधक उसे उसी प्रकार पाल-पोस कर बड़ा करते हैं, जैसे कुशल माताएं अपनी सन्तान को अनिष्टों से बचाती हुई पौष्टिक पोषण देकर पालती हैं।साधना जब तक साधक के गर्भ में पकती रहती है, कच्ची रहती है, जब तक उसके शरीर में आलस्य और अवसाद के चिह्न रहते हैं, स्वास्थ्य गिरा हुआ और चेहरा उतरा हुआ दिखाई देता है पर जब साधना पक जाती है और सिद्धि की सुकोमल सन्तति का प्रसव होता है, तो साधक में एक तेज, ओज, हलकापन, चैतन्य, उत्साह आ जाता है, वैसा, जैसा कि केंचुली बदलने के बाद सर्प में आता है। सिद्धि का प्रसव हुआ या नहीं, सफलता मिली या नहीं, इसकी परीक्षा इन लक्षणों से हो सकती है। यह दस लक्षण नीचे दिए जाते हैं :—1—शरीर में हलकापन और मन में उत्साह होता है।2—शरीर में से एक विशेष प्रकार की सुगन्ध आने लगती है।3—त्वचा पर चिकनाई और कोमलता का अंश बढ़ जाता है।4—तामसिक आहार-विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्विक दिशा में मन लगता है।5—स्वार्थ का कम और परमार्थ का अधिक ध्यान रहता है।6—नेत्रों में तेज झलकने लगता है।7—किसी व्यक्ति या कार्य के विषय में वह जरा भी विचार करता है, तो उसके सम्बन्ध में बहुत सी ऐसी बातें स्वयमेव प्रतिभाषित होती हैं, जो परीक्षा करने पर ठीक निकलती हैं।8—दूसरों के मन के भाव जान लेने में देर नहीं लगती।9—भविष्य में घटित होने वाली बातों का पूर्वाभास मिलने वाला है।10—शाप या आशीर्वाद सफल होने लगते हैं। अपनी गुप्त शक्तियों से वह दूसरों को बहुत कुछ लाभ या बुरा कर सकता है।यह दस लक्षण इस बात के प्रमाण हैं कि साधक का गर्भ पक गया और सिद्ध का प्रसव हो चुका। इस शक्ति-सन्तति को जो साधक सावधानी के साथ पालते-पोसते हैं, उसे पुष्ट करते, वे भविष्य में आज्ञाकारी सन्तान वाले बुजुर्ग की तरह आनन्दमय परिणामों का उपभोग करते हैं। किन्तु जो फूहड़ जन्मते ही सिद्धि का दुरुपयोग करते हैं, अपनी स्वल्प शक्ति का विचार न करते हुए उस पर अधिक भार डालते हैं, उनकी गोदी खाली हो जाती है और मृतवत्सा माता की तरह उन्हें पश्चाताप करना पड़ता है।
First 3 5 Last


Other Version of this book



गायत्री की सिद्धियां
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • गायत्री की सिद्धियां
  • गायत्री से सिद्धियां
  • साधकों के स्वप्न निरर्थक नहीं होते
  • सफलता के कुछ लक्षण
  • सिद्धियों का दुरुपयोग न होना चाहिए
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj