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Books - हमारी अंतश्चेतना ही वास्तविक गायत्री

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हमारी अंतश्चेतना ही वास्तविक गायत्री

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गायत्री मंत्र हमारे साथ- साथ- 
ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्। 
मित्रो! मनोनिग्रह हेतु अब और भी आगे बढे़। इसके लिए क्या करें? '' मातृवत् परदारेशु, लोष्ठवत् परद्रथ्येपु आत्मवत् सर्वभूतेषु '' ये तीन आधार हैं, ये तीन कसौटियों हैं, जिनके ऊपर कसा जा सकता है कि आप फल प्राप्त करने के अधिकारी भी हैं कि नहीं और आत्मबल आपको मिल भी सकता है कि नहीं, आत्मबल आप सँभाल भी सकते हैं कि नहीं और आत्मबल की जिम्मेदारी वहन करने के लायक आपके भीतर कलेजा  और हिम्मत है भी कि नहीं। ये बेटे तीन परीक्षाएँ हैं; ये तीन पेपर हैं पी० एम० टी० के। मेडिकल कॉलेज में भरती होने के लिए तीन पेपर दीजिए। इम्तिहान दीजिए पास होइए। पी० एम० टी० में डिवीजन लाइए और हम आपको दाखिल कर लेंगे। नहीं साहब, धक्का- मुक्की चलेगी। हम तो धक्के मारेंगे और धक्के मारकर सबसे आगे निकल जाएँगे। बेटे पहले रेलवे स्टेशनों पर ऐसा होता था हमारे जमाने में। जो धक्के मारता था  वो सबसे आगे चला जाता था। टिकट वही ले आता था। बाकी रह जाते थे। अब तो '' क्यू सिस्टम '' हो गया है ना। आप कमजोर हैं ना। सबसे पीछे खड़े हो जाइए। नहीं साहब, वह पीछे वाला पहलवान खड़ा हुआ है। हटाइए उनको, नंबर से खड़ा होना पड़ेगा। जो धक्के मारेगा, वह आगे चला जाएगा, यह सब पुराने जमाने में चलता था और धक्के मारने वाला टिकट ले आता था, पर अब धक्केशाही चलती नहीं। साहब हम तो धक्के मारेंगे, किसमें मारेंगे, भगवान जी को धक्के मारेंगे और सबसे पहले वरदान ले आएँगे। धक्केशाही नहीं चलेगी अब, लाइन में खड़ा हो, क्यूँ ?? में खड़ा हो और अपनी जगह साबित कर और हैसियत साबित कर और वह वरदान ले आया, ताकत ले आ। 
गायत्री का अनुग्रह हर सुपात्र के लिए 
गायत्री मंत्र क्या हो सकता है, यह मैं आपको समझा रहा था। यह समझा रहा था कि गायत्री की कृपा और गायत्री का अनुग्रह हर आदमी को नहीं मिल सकता, माला घुमाने से नहीं मिल सकता। माला घुमाने से मिला होता तो आप में से हर एक को मिल गया होता। आप गायत्री मंत्र की माला कब से घुमा रहे हैं? अरे साहब, बहुत दिन हो गए। आपको- छह वर्ष, आपको- ग्यारह वर्ष, आपको- तीस वर्ष हो गए पर आपको क्या मिला? महाराज जी, बस यही मिला है कि नाक कट गई तो कह दिया कि नाक की ओट में भगवान छिपा हुआ है, अब कट गई तो भगवान दिखने लगा है। बस इसी तरह ग्यारह माला जप करते हुए हमें २२ वर्ष हो गए और हम यूँ कहें कि हमें कुछ फायदा नहीं होता, तो सब लोग यही कहेंगे कि अरे तू बड़ा पागल है तूने काहे को नाक कटा ली, इसीलिए हम तो यही कहते रहते हैं हर एक से कि गायत्री माता अभी है, हमको प्रत्यक्ष तो नहीं दिखाई पड़ती, पर रात को सपने में दिखाई पड़ती हैं। सपने में दिखाई पड़ती हैं, तो क्या लेकर आती हैं तेरे लिए? नहीं महाराज जी, लेकर तो कुछ नहीं आती मेरे लिए वैसे ही खाली हाथ आ जाती हैं। धत तेरे की। अबकी गायत्री माता मिलेगी खूब गालियाँ सुनाऊँगा। हमारे यहाँ तो कुछ लेकर आए हो। हाँ महाराज जी, देखिए हम तो केला लेकर आए हैं। हाँ बेटा, खाली हाथ साधु के यहाँ नहीं आते। केला लेकर जरूर  आना चाहिए और तू लेकर भी आया है। जब हम किसी के घर जाते हैं, तो बच्चों और छोटों को देख लेते हैं। बच्चे घर में हैं क्या। टॉफी लेकर के जाते हैं। लेमनचूस लेकर के जाते हैं। कुछ लेकर जाते हैं। गुरुजी आए हैं, प्रसाद लेकर के आए हैं। मथुरा वृन्दावन का प्रसाद लेकर के आए हैं। बेटे, कुछ लेकर के जाते हैं? खाली हाथ नहीं जाते। रात में सपने में हनुमानजी तेरे लिए कुछ लेकर के आते हैं। नहीं महाराज जी, खाली हाथ आते हैं। धत तेरे की। अब मुझे मिलेगा तो मैं गाली सुनाऊँगा हनुमानजी को। कहूँगा तू मेरे बेटे के यहाँ गया था और सपने में दिखाई पड़ा, पर तुझसे यह भी नहीं बन पड़ा कि पाँच सौ रुपयों के नोटों की गड्डी तो दे जाता। नहीं महाराज जी, वह तो कभी नहीं दे गए। धन्य हैं तेरे सपने के हनुमानजी। बेटे! सपने का हनुमान कोई चीज नहीं दे सकता। 
ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त करनी हो तो हंस बनें 
मैं यह चाहता था कि सब गायत्री की शिक्षा, गायत्री की वास्तविकता आपको बताऊँ। कलेवर के बाद में वह बात सिखाऊँ जहाँ से गायत्री के चमत्कार, गायत्री की सिद्धियाँ, गायत्री का गौरव छिपा हुआ है। बेटा यह सब वहाँ छिपा हुआ है, जिसको हम ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। वास्तव में गायत्री का अर्थ आज ऋतम्भरा प्रज्ञा करना पड़ेगा। ऋतम्भरा प्रज्ञा कैसी होती है? बेटे ऐसी होती है ऋतम्भरा प्रज्ञा जिसको जो कोई भी आदमी अपने काम में लाएगा उसको कई तरीके अख्तियार करने पड़ेंगे। गायत्री का वाहन हंस है। गायत्री किस पर सवार होगी? हंस पर सवार होगी और किस पर सवार होगी? कौवे पर। नहीं महाराज जी, कौवे पर नहीं हो सकती गायत्री, हंस पर सवार होती है। हंस किसे कहते हैं? हंस एक प्रतीक है। तू समझता क्यों नहीं है? अरे ये प्रतीक है। हंस पर गायत्री नहीं बैठ सकती। हंस पर कैसे बैठ सकती है, हंस तो जरा सा होता है और गायत्री कितनी बड़ी होती है, बता और इतनी बड़ी गायत्री हंस पर बैठेगी, तो क्या हो जाएगा बेचारे का? बेचारे का कचूमर निकल जाएगा। हंस पर क्या करेगी बैठकर? गायत्री को बैठना होगा तो मोटर मँगा देंगे। हैलिकाप्टर मँगा देंगे। गायत्री माँ को बैठना होगा तो हवाई जहाज दिला देंगे। गायत्री माँ को जाना होगा तो बेचारे गरीब हंस पर क्या बैठना होगा? हंस पर नहीं, उस पर तो पैर समेटने की भी जगह नहीं है, पालथी मारकर भी नहीं बैठ सकती। जैसे चेयर होती है पैर पसारने की, वैसी भी जगह नहीं है उस पर, टाँग को समेटकर बैठे तो भी उस पर नहीं बैठ सकती। अत: वह हंस पर क्या बैठेगी? हंस की आफत आएगी। फिर क्या है हंस? हंस बेटे! वह व्यक्ति है जिसकी दृष्टि ऋतम्भरा प्रज्ञा के अनुकूल है। ऋतम्भरा प्रज्ञा कैसी होती है, जैसे हंस की होती है। हंस की कैसी होती है? हंस कीड़े, नहीं खाता। वह मोती खाता है अर्थात जो मुनासिब है, जो ठीक है, जो उचित है, उसको करेगा, पर जो गैरमुनासिब है, अनुचित है, उसके बगैर काम नहीं चलेगा तो मर जाएगा, भूखा रह लेगा, चाहे मरना ही क्यों न पड़े, पर न कुछ अनुचित करेगा और न अभक्ष्य खाएगा। वह सोच लेगा कि न खाने से क्या आफत आ जाएगी? अच्छा साहब मरेंगे, पर गलत काम नहीं करेंगे। ऐसी क्रिया का नाम है, सफेद- स्वच्छ- निर्मल हंस। हंस उस व्यक्ति का नाम है, जो नीर और क्षीर का  भेद करना जानता है। पानी और दूध को मिलाकर दीजिए। नहीं साहब, पानी हमें नहीं लेना है। हमको दूध लेना है। दूध को फाड़कर अलग कर देगा। पानी को फेंक देगा और दूध को ले लेगा। यहाँ भी वही स्थिति है। हंस केवल उचित को ही ग्रहण करता है, अनुचित को नहीं। ऋतम्भरा प्रज्ञा उसी चीज का नाम है। इसे ही जाग्रत करने के लिए हम आपको गायत्री की साधना कराते हैं। 
साधना का प्राण समझें 
मित्रो! साधना उपासना का प्राण है- समर्पण। बस समर्पण कर लीजिए फिर देखिए ऐसे ही मारा- मारी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मैं पहले ही कहे देता हूँ कि माला मत फिरा, समर्पण करना सीख। बेटा ऐसा कर, इसमें बाँस की बाँसुरी की तरह अपने को खाली कर दे। फिर देख मजा आ जाएगा। नहीं गुरुजी, आप तो कर्मकाण्ड बता दीजिए क्रियाकृत्य बता दीजिए। बेटे अभी हम इसी कलेवर की बात कह रहे थे, लेकिन बेटे कलेवर ही सब कुछ नहीं है। प्राण को भी समझ। प्राण किसे कहते हैं? प्राण उसे कहते हैं, जिसमें हमें अपनी चेतना का परिमार्जन करना पड़ता है और चेतना को साफ करना पड़ता है। चेतना की जो गलतियाँ हैं, चेतना की जो भूलें हैं, चेतना में जो दोष हैं, चेतना के ऊपर जो भ्रम- आवरण और मल- विक्षेप चढ़े हुए हैं, उनको हमें धोना पड़ता है, साफ करना पड़ता है और ऐसी लड़ाई करनी पड़ती है जैसे कि जंग खाए हुए लोहे के बरतन को साफ करने के लिए चमकाने के लिए ऐसे लड़ना पड़ता है, कभी जूट से रगड़ते हैं, तो कभी ईंट से रगड़ते हैं, कभी बालू से रगड़ते हैं। बार- बार लड़ते हैं, नहीं साफ होता है, तो फिर रगड़ते हैं और जब तक जंग साफ नहीं हो जाती है, जब तक चमकने नहीं लगता, तब तक लड़ते ही रहते हैं। अपनी अंतश्चेतना पर भी जो मल, आवरण और दोष के तीनों आवरण चढ़े हुए हैं, इनको साफ करने के लिए जो हमको मेहनत करनी पड़ती है, मशक्कत करनी पड़ती है, लड़ाई लड़नी पड़ती है, सख्ती बरतनी पड़ती है, उसको साधना कहते हैं, '' मन साधे सब सधे '' यही साधना का स्वरूप है। 
मैं अब आपको समझाने की कोशिश करूँगा कि साधना का स्वरूप क्या हो सकता है? असली साधना क्या है? नकली की तो मैं क्या कहूँगा आपसे। असली साधना कैसे की जाती है? यह बताता हूँ आपको। असली साधना करता है किसान। किसके साथ जमीन के साथ। जमीन के साथ में क्या काम करता है? बेटे! धूप में खड़ा रहता है। रगड़ता रहता है, खोदता रहता है, गोड़ता रहता है। साल भर तक अपना शरीर और अपना पसीना इस मिट्टी में मिला देता है। ठीक साल भर बाद इस मिट्टी में पसीना मिलाने के बाद में क्या करता है? फसल पैदा होती है। अनाज पैदा होता है और मालदार हो जाता है। अपने आप के साथ में करेगा रगड़, तो गेहूँ का खेत जिस तरीके से फल देने लगता है उसी तरीके से हमारी परिष्कृत चेतना फसल दे सकती है और मैं बताऊँ? अभी मैं बताता हूँ कि उपासना कैसे की जाती है? उपासना ऐसे की जाती है, जैसे कि अपने शरीर को पहलवान अभ्यास द्वारा मजबूत बना लेता है। कमजोर वाला आदमी जब शरीर के साथ मशक्कत करना शुरू कर देता है और उस पर चढ़े मुलम्मों को दूर करना शुरू कर देता है, निग्रह करना शुरू कर देता है और अपने आहार- विहार को नियमित बनाना शुरू कर देता है तो बेटे वह चंदगीराम पहलवान हो जाता है। टी० बी० की शिकायत उसकी दूर हो जाती है और वह मजबूत हो जाता है, साधना करने से। शरीर की साधना यदि आप करें तो बीमार होते हुए भी चंदगीराम पहलवान के तरीके से २२ वर्ष की उम्र में टी० बी० के मरीज होते हुए भी आप अपनी इसी जिंदगी में पहलवान बन सकते हैं। अगर आप शरीर की साधना करना चाहें तब। साधना किसे कहते हैं? अभी तो मैं बता चुका हूँ कि साधना मलाई को कहते हैं और रगड़ाई को कहते हैं। जैसे किसान अपने शरीर की और मिट्टी की मलाई करता है और रगड़ाई करता है। शरीर के साथ में मलाई कीजिए और आप पहलवान बन जाइए। यह तो हुई साधना शरीर की। आप अपनी अक्ल और दिमाग के साथ में रगड़ शुरू कीजिए मलाई कीजिए घिसाई कीजिए और देखिए कि आपका दिमाग गया- गुजरा होते हुए भी घटिया होते हुए भी, बेअक्ल होते हुए भी, आप कालिदास के तरीके से विद्वान बनते हैं कि नहीं बनते। आप विद्वान बन सकते हैं, कालिदास के तरीके से रस्सी को पत्थर पर हम बार? बार घिसते हैं तो निशान बन जाता हैं। बेटे हमारी रगड़ इतनी जबरदस्त है कि अगर हम अपनी भोंडी अक्ल के साथ भी रगड़ करना शुरू कर दें, तो हम विद्वान बन सकते हैं। राजा के तरीके से और कालिदास के तरीके से। बेटे अगर हम रगड़ करना शुरू कर दें, तो प्रगति के किसी भी क्षेत्र में हमारे पास सिद्धियाँ आ सकती हैं और चमत्कार आ सकते हैं।

पैसा भी आएगा तो मनोयोग से ही 
अक्ल की बाबत हमने कहा और शरीर की बाबत हमने कहा। लीजिए अब पैसे की बाबत बताते हैं। बाटा नाम का एक मोची था, बारह वर्ष की उम्र में उसकी माताजी का देहांत हो गया था, पिताजी का देहांत हो गया था। जूते सीना सड़क पर उसने शुरू किया। लेकिन इस विश्वास के साथ शुरु किया कि जूते की मरम्मत के साथ सिद्धांत जुड़े हुए हैं और हमारा प्रत्यक्ष प्राण जुड़ा हुआ है। प्रेस्टिज प्वाइंट जुड़ा हुआ है कि जूता ऐसा न  बन जाए कहीं कि कोई आदमी हमसे ये कहे कि ये जूता घटिया बनाकर के दे दिया। वाहियात बना करके दे दिया। जो भी काम हाथ में लिया तो उसे प्रेस्टिज प्वाइंट मानकर लिया कि अपने हाथ से की हुई मरम्मत कहीं ऐसी न हो जाए कि आदमी कहे कि किस बेवकूफ ने मरम्मत की है। सारी अक्ल खरच कर दी, फिर भी उसने सही मरम्मत नहीं की। कई आदमियों ने उसकी प्रशंसा की और कहा कि अरे मरम्मत करने वाला तो सबसे अच्छा लड़का वह है, जो नीम के दरख्त के नीचे बैठा रहता है। वह बारह साल का लड़का है, उससे बीसियों आदमियों ने मरम्मत कराई और उसने ऐसी बढ़िया मरम्मत की कि लोग बाग- बाग हो गए। उसने पुराने जूतों को नया बना दिया। लोगों ने बहुत मरम्मतें कराई। लड़का बडा हो गया, लोगों ने कहा- बाटा क्या तू वह कर सकता है कि हमारे लिए अच्छे नए जूते बना दे। नए जूते मैं कहाँ से बना सकता हूँ। मेरे पास चमड़ा भी नहीं है, सामान भी नहीं है, दराँती भी नहीं है, चीजें भी नहीं हैं। अगर यह मुझे मिल जाता तो मैं बना देता। लोगों ने कहा- अच्छा दराँती हम देंगे, तू बना दिया कर। लोगों ने सामान लाकर के दिया। बाटा ने जूता बना दिया। जो जूते छह महीने चला करते थे, वे एक साल चले, लोगों ने अपने परिचितों से कहना शुरू किया कि अच्छे जूते पहनने हैं, मुलायम जूते पहनने हैं, तो आप बाटा की दुकान पर चले जाइए और इस तरह बाटा की दुकान चलते- चलते एक शानदार जगह पर जा पहुँची जहाँ आज सारे हिंदुस्तान में ही नहीं, वरन विश्वभर में बाटा का जूता प्रसिद्ध हो गया। कहीं भी आप चले जाइए, देहात में चले जाइए मैं भी तो एक बार अमेरिका गया, वहाँ भी हर जगह वही बाटा का जूता देखने को मिला। हिंदुस्तान में भी वही, यहाँ भी वही बाटा। सब जगह वही। अफ्रीका के गाँव में भी मुझे बाटा की दुकान मिली। न केवल हिंदुस्तान  बल्कि अफ्रीका में भी छाया हुआ था बाटा। मैं देखकर के आया हूँ। बाटा एक करोड़पति उद्योगपति का नाम है। 
मित्रो! कहाँ से आता है पैसा? कहीं से नहीं आता। पैसा रगड़ से, मेहनत से आता है। रगड़ता चले जा। रगड़ता तो है ही नहीं। शरीर को बचाए- बचाए फिरता है। काम से बचता फिरता है, दूर- दूर रहता है। हरामखोर और कामचोर कहता है कि हमको पैसा नहीं मिलता। हमारी उन्नति नहीं होती, आर्थिक उन्नति नहीं होती। न तो योग्यता बढ़ाता है, न श्रम में विश्वास करता है और न श्रम के साथ मनोयोग लगाता है। श्रम के साथ मन तो लगाता नहीं है। मनोयोग लगा। शरीर से बेकार धौंकनी के तरीके से कोल्हू के बैल के तरीके से, उलटा- सुलटा काम करके फेंक दिया। योग्यता बढ़ाता ही नहीं है। बाटा के जमाने में योग्यता थी। नवीं दर्जे तक पढ़ा हुआ है। अभी विदेशों में जाटव और धोबी, मोची और भटियार रात को दो घंटे नाइट स्कूलों में पढ़ने के लिए जाते रहते हैं और जिंदगी गुजारने तक एम० ए० कर लेते हैं और पी- एच० डी० बन जाते हैं और आपको फुरसत ही नहीं मिलती है। हरामखोरी और कामचोरी में समय बरबाद करते रहते हैं। न योग्यता बढ़ाते हैं, न अपनी सामर्थ्य बढ़ाते हैं, न क्षमता बढाते हैं, न मेहनत में दिलचस्पी लेते हैं और न मेहनत में मन लगाते हैं। ताकत घटिया कामों, बेकार कामों से नहीं मिलती। क्या हाल हो रहा है, भीतर वाली कमजोरी निकलती नहीं, योग्यता बढ़ती नहीं, तो उन्नति कैसे होगी? भीतर वाले को योग्यता के रूप में विकसित करना होगा। मन से काम करना सीखना होगा, मशक्कत से काम करना सीखना होगा और बेटे मैं किसके संबंध में बताऊँ? धन के संबंध से लेकर तू प्रतिभा- प्रतिष्ठा तक कहीं भी चला जा, परिश्रम करने वाले को ही सफलता मिलती है। 
सारी शक्तियाँ बीज रूप में हमारे अंदर ही 
साधना के साथ में भी परिश्रम जुड़ा हुआ है। सच्ची साधना करता है- वैज्ञानिक। छोटे वाले दर्जे के साथ में बड़ा वैज्ञानिक बडी मेहनत करता है और ताकतवर एटम बम बना देता है, यदि वह फट जाए तो सैकड़ों मील का सफाया कर दे। यह ताकत कहाँ से आती है? एटम में से आती है? एटम में से नहीं आती है, बेटे। साधना से आती है। साधना से ताकत को उभारा, ताकत को निखारा, ताकत को काम में लाया, ताकत को इस्तेमाल किया जाता है। ताकत को तो निखारता है नहीं, उभारता है नहीं। फिर सिद्धियाँ कहाँ से आएँ? साधना किस चीज का नाम है? साधना बेटे, इस चीज का नाम है, जिसमें हम अपनी भीतर वाली क्षमता का, भीतर वाली चेतना का विकास करते हैं और उसको उभारते हुए चले जाते हैं, विकसित करते हुए चले जाते हैं। चेतना का तो आप मूल्य भी नहीं समझते, मैं क्या करूँ? चेतना का तो आप मूल्य भी नहीं पहचानते, आप तो बाहर ही बाहर तलाश करते हैं। इस देवता के सामने नाक रगड़ते हैं। इस मंत्र के सामने नाक रगड़ते हैं, उस गुरु के सामने नाक रगड़ते हैं, इस पड़ोसी के सामने नाक रगड़ते हैं, उस अफसर के सामने नाक रगड़ते हैं, उस बॉस के सामने नाक रगड़ते हैं। आपको तो नाक रगड़ने की विद्या आ गई है। किसी की खुशामदें कीजिए किसी की चापलूसी कीजिए, किसी के हाथ जोडिए और वहाँ से काम बनाकर लाइए। बेटे, किसी के सामने चापलूसी करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारे भीतर सामर्थ्य का स्रोत भरा पड़ा है, सामर्थ्य की शक्ति भरी पड़ी है। उसको उभारने में हम समर्थ हो सकें, उसे काम में लाने में समर्थ हो सके तो मजा आ जाए हमारी जिंदगी में। हमारी जिंदगी में क्या- क्या होता है? हमारी भीतर वाली शक्ति कितनी है? बेटे यह समझो कि सारे सौरमंडल में जितनी ताकत और जो ढर्रा है, वह सब ढंग और ढर्रा छोटे से एटम के भीतर भरा पड़ा है। वृक्ष जो है, उसका पूरा रूप छोटे से बीज के भीतर दबा पड़ा है। छोटे से बीज के भीतर में पत्तियाँ और टहनी, फल और फूल सबका नक्शा, सबका खाका, सबका आधार इस बीज के अंदर भरा पड़ा है। इसी तरह ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, हमारे पिंड में दबा पड़ा है और भगवान में जो कुछ भी है हमारी जीवात्मा में दबा पड़ा है। भगवान के सारे के सारे ब्रह्मांड में जो शक्तियाँ और ताकतें हैं, वे सब बीज रूप में हमारे भीतर विद्यमान हैं। बीज को हम बोएँ, उगाएँ, बढ़ाएँ, खिलाएँ- पिलाएँ तो उससे पूरा का पूरा बरगद पेड़ हो सकता है। साधना इसी का नाम है। बीज को विकसित करके बरगद कैसे बनाया जा सकता है? साधना उसी प्रक्रिया का नाम है। साधना और कुछ नहीं है? अपनी जीवात्मा को, अपनी अंतश्चेतना को विकसित करते- करते हम महात्मा एक देवात्मा दो और परमात्मा तीन, यहाँ तक जा पहुँचते हैं। इसे प्राइमरी  स्कूल, हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और कॉलेज की पढ़ाई समझ सकते हैं। यही है आत्मा से परमात्मा तक विकसित होने की प्रक्रिया। 
चेतना का महत्त्व समझें 
महात्मा, देवात्मा और परमात्मा और कुछ नहीं अपने आपे का विकास विस्तार है। अपने आप का विकास ही साधना है और कुछ नहीं है। साधना और कोई करके देता है क्या? नहीं कोई नहीं देता, हम अपने आपका  विकास स्वयं करते हैं, अपने आपका निखार स्वयं करते हैं। आत्मशक्ति को आपने देखा नहीं। इंजन कितना बड़ा होता है। इंजन साहब कई लाख रुपए का आता है, लेकिन ड्राइवर केवल कुछ हजार रुपए का आता है। ड्राइवर घसीटता है इंजन को। उसने कहा खड़ा हो जा, इंजन खड़ा हो जाता है। और हवाईजहाज? हवाईजहाज को चलाता कौन है? हवाईजहाज कितने का आता है? कई करोड़ रुपए का। कौन चलाता है? बेटे पायलट चलाता है। पायलट नहीं होगा तो हवाईजहाज रखा रहेगा। मशीनें कितनी बड़ी क्यों न हों, ऑटोमैटिक क्यों न हों, कम्प्यूटराइज्ड क्यों न हों, लेकिन आदमी के बिना नहीं चल सकतीं। चेतना का मूल्य, चेतना की शक्ति कितनी बड़ी हो सकती है? चेतना की शक्ति इतनी बड़ी है, जिसको उभारने की प्रक्रिया हम आपको सिखाते हैं, गायत्री मंत्र के माध्यम से। चेतना, जो आपकी सो गई है, जो खो गई है, चेतना जो आपकी मर गई है, जिसको आपने गँवा दिया है। जिस चेतना का आपने महत्त्व नहीं समझा, उस चेतना को हम, आपको उभारना सिखाते हैं। गायत्री साधना उसी का नाम है। चेतना हमारी कितनी ताकतवर है? यह हमारी भौतिक और चेतन दोनों क्षेत्रों का मुकाबला करने में सक्षम है। इसका मैं उदाहरण देना चाहूँगा। ये पृथ्वी कितनी बड़ी है? साहब बहुत बड़ी है।

पृथ्वी का वजन कितना है? अरे साहब क्या कहने पृथ्वी के बहुत वजन है। और पृथ्वी की चाल? पृथ्वी की चाल साहब एक घंटे में छह हजार मील है। बहुत बड़ी है न। हों बहुत बड़ी है पृथ्वी। जहाँ इसका उत्तरी ध्रुव है, वहाँ अगर एक इनसान का बच्चा चला जाए जहाँ पृथ्वी का '' बैलेसिंग प्वांइट '' है और उस जगह पर एक बच्चा घूँसा मार दे खींचकर, तो पृथ्वी अपनी नींव पर से डगमगा जाएगी। वह जिस कक्षा में घूमती है, उस कक्षा में न घूम करके अगर घूमना बंद कर दे अथवा कोई  और कक्षा बना ले या हो सकता है कि वह बड़ी बना ले, हो सकता है ये कक्षा बहुत छोटी हो जाए। बच्चे का घूँसा लगे, तो संभव है यह पृथ्वी भागती हुई चली जाए और किसी ग्रह से टकरा जाए। मान लीजिए मंगल ग्रह में टक्कर मार दे और मंगल ग्रह का चूरा हो जाए और हमारी पृथ्वी का भी चूरा हो जाए या यह हो सकता है कि बड़े दिन होने लगें। ३६५ दिन की अपेक्षा संभव है २० २० दिनों का एक वर्ष हो जाए। संभव है २४ घंटों की अपेक्षा ६ घंटे का दिन हो जाए अथवा छह हजार घंटे का दिन हो जाए। कुछ पता नहीं, कुछ भी हो सकता है। एक बच्चे की चपत खाकर, घूँसा खाकर। चेतना के सामने जड़ तो कुछ भी नहीं है। चेतना, जिसको आप भूल गए? चेतना जिसको आपने समझा ही नहीं? चेतना जिसका आप मूल्य ही नहीं समझते? चेतना जिसका विकास ही नहीं करना चाहते? यही है गायत्री साधना का उद्देश्य कि आप अपनी चेतना को परिष्कृत करें, समर्थ बनाएँ। 
चेतना कितनी सामर्थ्यवान है? बेटे, चेतना की सामर्थ्य दिखाने के लिए मैं आपको बीस लाख वर्ष पहले ले जाना चाहूँगा, जबकि पृथ्वी छोटे- छोटे जंगली जीवों और जानवरों से भरी पड़ी थी और इस पृथ्वी पर ऊबड़- खाबड़ गड्ढे जैसा चंद्रमा पर सब जगह गड्ढे -टीले दीखते हैं, उसी तरह पृथ्वी पर हर जगह गड्ढे- टीले थे। ऊबड़- खाबड़ बड़ी कुरूप पृथ्वी थी और उसमें बहुत भयंकर जानवर घूमा करते थे। इसमें बाद में क्या कुछ परिवर्तन हुए। यह आदमी की अक्ल और आदमी की चेतना है, जिसने सारी की सारी पृथ्वी को कैसा बना दिया है। फूल जैसे कहीं ताजमहल बने हुए हैं, कहीं पार्क बने हुए हैं, हजारों एकड़ जमीन समतल बनी हुई है। किसी जमाने में जहाँ झाड़- झंखाड़ थे, अब पता नहीं क्या से क्या हो गया। चंबल जहाँ डाकुओं के रहने की जगह थी, देखना थोड़े दिनों बाद क्या हो जाता है? बेटे, वहाँ बगीचे लहलहाते हुए दिखाई पड़ेंगे, कितनी फसलें उगती हुई दिखाई पड़ेगी। धान पैदा होता हुआ दिखाई पड़ेगा और वहाँ गाँव और शहर बसे हुए दिखाई पड़ेंगे। आदमी की अक्ल, आदमी की चेतना की सामर्थ्य का क्या कहना?

प्राणी जब पैदा हुआ था, तब आदिमानव के रूप में था, बंदर के रूप में था। चेतना ने आवश्यकता समझी कि तुम्हें काम करना चाहिए और हमारे हाथों की उँगलियाँ बंदर की अपेक्षा ये दसों उँगलियाँ ऐसी बेहतरीन उँगलियों बन गई कि दुनिया में किसी के पास नहीं हैं, जैसी हमारे पास हैं। ऐसा बेहतरीन हाथ दुनिया में और किसी के पास नहीं है, जो यहाँ से भी मुड़ता हो, वहाँ से भी मुड़ता हो। जो हर जगह से मुड़ जाता हो। ऐसा किसी जानवर का हाथ नहीं है। कहीं नहीं है। यह सब कैसे हो गया? हमारी इच्छाशक्ति ने पैदा किया। सारी चीजें पैदा कर दीं। सारे के सारे चमत्कार ये चेतना के हैं, जमीन की सफाई से लेकर सभ्यता, संस्कृति और  वाहन और विज्ञान सब किसका है? ये आदमी की चेतना का चमत्कार है। तू समझता क्यों नहीं है। चेतना को अगर सँवारा जा सके, चेतना को अगर सँजोया जा सके तो आदमी क्या हो सकता है? हम नहीं कह सकते कि आदमी क्या हो सकता है? कहते हैं कि आदमी और भगवान एक हो सकते हैं। आदमी इतना विकसित हो सकता है, जितना भगवान। चेतना का परिष्कार, चेतना का सुधार इसी का नाम साधना है। जो चीजें ऊबड़- खाबड़ हैं, बेतुकी हैं, उन्हें ठीक तरीके से ठीक बना देने का नाम साधना है। 
हमारी अंतश्चेतना ही वास्तविक देवी है 
साथियो! मैं आपको एक बात बताना चाहूँगा कि मनुष्य जीवन कैसा ऊबड़ -खाबड़, बेघड़, कुसंस्कारी है। हमारा जीवन कैसा संस्कारविहीन, दिशाविहीन, लक्ष्यविहीन, क्रियाविहीन, अनुशासनविहीन और अस्त- व्यस्त है। इन चीजों को अगर ठीक तरीके से बना लिया जाए, विचारणाओं को अगर ठीक तरीके से बना लिया जाए, भावनाओं को ठीक तरीके से बना लिया जाए क्रियाशक्ति को ठीक तरीके से बना लिया जाए तो मित्रो! हम कैसे सुंदर हो सकते हैं? हम कैसे सुघड़ हो सकते हैं? मैं आपको क्या बताऊँगा, मैं तो एक ही शब्द में कह सकता हूँ कि अगर आपने चमत्कार वाली बात सुनी हो, लाभ वाली बात सुनी हो, वरदान वाली बात सुनी हो, आशीर्वाद वाली बात सुनी हो, वैभव वाली बात सुनी हो, अध्यात्म की महत्ता वाली बात सुनी हो, अक्ल की बात सुनी हो, अध्यात्म की कभी कोई गरिमा आपने भी सुनी हो, वरदान और आशीर्वाद वाली बात आपने सुनी हो तो समझना कि ये सारी की सारी विशेषताएँ जो बताई जा रही हैं, वे आदमी की अंतश्चेतना के विकसित स्वरूप की बताई जा रही हैं और किसी की नहीं बताई जा रही हैं। देवी की बताई जा रही हैं। तो चलिए देवी क्या हो सकती है? यह बताता हूँ आपको। हमारी अंतश्चेतना के अलावा कोई देवी नहीं है। हमारी अंतश्चेतना जब विकसित होती है तो कैसी हो जाती है? ऐसी हो जाती है जिसको सिद्धि कहते हैं, जिसको हमको सँभालना और सँजोना आता है, इसे जीवन में हम संस्कृति कहते हैं। सभ्यता कहते हैं। जीवन में साधना इसी को कहते हैं। नाई क्या करता है? नाई हमारी हजामत बना देता है और हमें ऐसा बना देता है जैसे मूँछें अभी निकली ही नहीं। यह मिरैकिल- जादू है, हजामत बनाने वाले का। हमको खूबसूरत बनाने वाले का। दर्जी, जो हमारे फटे- पुराने से कपड़े थे, उनका कुरता बना देता है। जॉकेट बना देता है। अरे बेटे, यह कपड़ा तो वही है ढाई गज, जो सवेरे पड़ा हुआ था। अब कैसा सुंदर बना हुआ है? कमाल है। यहाँ भी बटन यहाँ भी कच्चा। यहाँ भी गोट। यहाँ भी बाजू। देख ले ये किसका कमाल है? दर्जी का कमाल। है अभी कैसा था कपड़ा? मैला- कुचैला उलटी- सीधी सिलवटें पड़ी हुईं थी। नील लग करके आ गई। टिनोपाल लग करके आ गया। ये क्या चीज है? ये चमत्कार है। ये साधना है। कपड़े की साधना किसकी है? ये धोबी की साधना है। मूर्तिकार की साधना है? पत्थर का एक टुकड़ा नाचीज सा छैनी और हथौड़े को लेकर के मूर्तिकार जा बैठा और घिसने लगा, ठोकने लगा, घिसने और रगड़ने लगा। दो- चार दिन पीछे ऐसी बढ़िया लक्ष्मी की मूर्ति बन गई कि मालूम नहीं पड़ा कि यह वही पत्थर का टुकड़ा है, कि लक्ष्मी जी हैं। बेटे ये क्या है? ये साधना है और क्या है? 
साधना अर्थात अनगढ़ से सुगढ़ 
अभी आपको मैं साधना का महत्त्व बता रहा था। ये घटिया वाली जिंदगी, बेकार जिंदगी, पत्थर जैसी जिंदगी को आप बढ़िया और शानदार बना सकते हैं। सोने का एक टुकड़ा ले जाइए साहब! अरे हम क्या करेंगे? कहीं गिर पड़ेगा। अच्छा तो अभी हम आते हैं। उसका क्या बना दिया? ये कान का बुंदा बना दिया। ये अँगूठी बना दी, मीना लगी हुई। अरे साहब बहुत सुंदर बन गया है यह। क्या यह वही टुकड़ा है? हो यह सुनार का कमाल है। सुनार की साधना है। उसने खाबड़- खूबड़ धातु के टुकड़े को कैसी सुंदर अँगूठी बना दिया, कैसा जेवर बना दिया? कैसा नाक का जेवर बना दिया? कैसा कैसा जेवर बना दिया? ये हमारी जिंदगी, बेतुकी जिंदगी, बेसिलसिले की जिंदगी। बेतुकी जिंदगी। बेहूदी जिंदगी को हम जिस तरह से सँभाल पाते हैं- साधना इसका नाम है। असल में साधना इसी का नाम है। वह जो हमने अभ्यास कराया था शुरू में कि आपको तमीज सिखाएँ और तहजीब सिखाएँ। कौन सी? मैं इसको बताऊँगा कि पालथी मारकर बैठ। अरे तमीज से सीख। कभी ठीक काम करता है, कभी अक्ल से काम करता है, कभी नहीं करता है। कमर ऐसी करके बैठना। हाँ साहब, ऐसे ही करके बैठूँगा। मटक नहीं, सीधे बैठ। मचक- मचक करता है। मित्रो! ये सारे के सारे अनुशासन, सारी की सारी डिसीप्लीन, यह आज का विषय नहीं है। कभी समय मिला तो आपको बताऊँगा कि आपको जो भी साधना के बहिरंग क्रिया- कलाप सिखाते हैं। आखिर क्या उद्देश्य है इनका? क्रिया का कोई उद्देश्य होना चाहिए। क्यों साहब, पालथी मारकर क्यों बैठते हैं? पद्मासन में क्यों बैठते हैं, हम तो ऐसे ही बैठेंगे, टाँग पसारकर। नहीं बेटे, टाँग पसारकर मत बैठिए। नहीं साहब हम तो टाँग लंबी करेंगे, इसको छोटी करेंगे, नहीं बेटे, ये भी गलत है। नहीं हम तो यूँ माला जप करेंगे। सिर के नीचे तकिये लगाकर। नहीं बेटे, ऐसे मत करना। ये ठीक नहीं है। यह क्या है? डिसीप्लीन है। साधना के माध्यम से हम अपने व्यावहारिक जीवन को किस तरीके से अनुशासित रूप दे सकते हैं, किस तरीके से उसे ढाल सकते हैं, किस तरीके से अपने कमी को, अपने विचारों को अपनी इच्छाओं को, आस्थाओं को परिष्कृत एवं अनुशासनबद्ध कर सकते हैँ, क्रमबद्ध कर सकते हें। असल में साधना इसी का नाम है। 
स्वर्णकार के तरीके से, कलाकार के तरीके से, गायक के तरीके से और वादक के तरीके से जो अपने को साध लेता है। उसे ही सच्चा साधक कहा जाता है। उसकी ही सही रागिनी निकलती है। सुर निकलता है। कैसे निकलता है? बा ! अरे बेटे ये क्या बोलता है? यूँ मत बोल। तो फिर कैसे बोलूँ? तू ऐसे बोल, जैसे कि भैरवी रागिनी गाई जाती है। गुरुजी सिखाइए। बेटा तू आ जाना हमारे पास, हम तुझे सिखाएँगे नया राग सिखाएँगे। अब तू ऐसे बोल जैसे कोयल बोलने लगती है, अभी तू जैसे चिल्ला रहा था इसे सुर नहीं कहते। बेटे, ऐसे फिर मत बोलना। सुर को, गले को इस तरीके से साध कि ऐसी मीठी- मीठी आवाज आए कि बस मजा आ जाए और ये धागे और तार जो सितार में बँधे हुए थे, उन्हें हिला। इसे भन- भन- भन के तरीके से नहीं, हम जैसे बताएँ उस तरीके से बजा। इस तार के बाद उसे बजा, इसके बाद इसे बजा, फिर देख किस तरीके से इसमें से कैसी- कैसी सुरलहरी निकलती है, तरंगें निकल सकती हैं। कैसी- कैसी ध्वनि निकल सकती हैं? जिन पर तू थिरकने लगेगा और नाचने लगेगा, तो महाराज जी ये कैसे बजेगा? बेटे यह एक साधना है, किसकी? धागों की, तारों की। यह किसकी है साधना? गले की। यह है साधना पत्थर की। ये किसकी है साधना? हर चीज की है। सोने की साधना, मुख की साधना और जीवन की साधना कि इसे कैसे जिया जा सकता है? जीवन कैसे उद्यमशील बनाया जा सकता है? इसे कैसे देवोपम बनाया जा सकता है? जीवन की अस्तव्यस्तता का उदारीकरण कैसे किया जा सकता है? जीवन ठीक तरीके से कैसे जिया जा सकता है? अगर ठीक तरीके से आप इसे जान पाएँ तो बेटे आप धन्य हो सकते हैं, सब कुछ बन सकते हैं। आप बाहर का ख्याल निकाल दीजिए जो चीज बाहर दिखाई पड़ती है, वास्तव में वह भीतर से ही आती है। बाहर तो उसकी खुशबू, बिखरती चली जाती है। जैसे कस्तूरी हिरण की नाभि में होती है, परंतु उसे यह मालूम पड़ता है कि हवा में से पूरब से वह आती है। पश्चिम से आ रही है। बेटे, सुगंध कहीं बाहर से नहीं आती? भीतर से निकलती है। आज की बात समाप्त ::। 
।। ऊँ शांति: ।। 
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