आत्म-सुधार से ही सच्ची शान्ति सम्भव है
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संसार में फैली हुई अनेकों विषमताओं और विफलताओं को पूर्णतः बदल सकना सुधार सकना अपने बस की बात नहीं है। सृष्टि के आदि काल से लेकर अब तक यह प्रयत्न बराबर किये जाते रहे हैं कि विभिन्न क्षेत्रों में फैली हुई बुराइयों का सुधार हो, दुष्टताओं का दमन हो। इस प्रयत्न के लिये अनेकों ऋषि, महात्मा, ज्ञानी, योगी, सन्त, सुधारक तथा अवतारी आत्माओं के समय-समय पर अवतरण होते रहे हैं। उनके प्रबल परिश्रम से बहुत कुछ सुधार भी हुए और असन्तुलन को मिटाकर सन्तुलन भी कायम किये गये। पर यह स्थिति देर तक नहीं। फिर वही विकृतियां आरम्भ हो गईं और फिर उनको संभालने के लिये महापुरुषों को आना पड़ा। यह क्रम चलता ही रहता है। कुत्ते की पूंछ की तरह यह दुनिया ऐसी है कि बार-बार सीधी करने पर भी वह हाथ से छूटते ही फिर टेढ़ी हो जाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि सुधार की दिशा में कुछ प्रयत्न ही न किया जाय या इसकी कुछ आवश्यकता एवं उपयोगिता ही नहीं है। यह तो अतीव आवश्यक है। यदि सुधार के प्रयत्न शिथिल या बन्द कर दिये जायें तब तो विकृतियां इतनी शीघ्र इतनी अधिक मात्रा में एकत्रित हो जायं कि कुछ ही समय में संसार का सामान्य कार्य चलना ही रुक जाय। मेहतर रोज टट्टी साफ करता है, वह फिर रोज गन्दी हो जाती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जब टट्टी रोज ही गन्दी होती है, सफाई का इतना प्रयत्न करने पर भी वह शुद्ध नहीं रह पाती तो इसके लिये प्रयत्न ही क्यों किया जाय? यदि मेहतर लोग ऐसा मान लेंगे तो थोड़े ही दिनों में इतनी गन्दगी एकत्रित हो जायगी कि दुर्गन्ध से ठहरा न जायगा और हैजा सरीखे रोग फूट पड़ेंगे। सफाई की भांति ही इस दुनिया का सुधार भी होते रहना आवश्यक है, उसकी आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। यहां इतना ही कहना है कि प्रयत्न करते रहने पर भी संसार में बुराइयां और विषमतायें रहेंगी ही, उनका सर्वथा अभाव कभी भी नहीं हो सकेगा। सतयुग में भी नहीं हो सका था। हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, होलिका सरीखे असुर सतयुग में भी पैदा हुए थे। इस तथ्य को हमें स्वीकार कर ही लेना चाहिये कि बुराइयों की मात्रा घटती-बढ़ती भले ही रहे पर वे रहेंगी सदा ही। जो बात संसार व्यापी परिस्थिति के बारे में कही जा सकती है वही बात व्यक्तिगत क्षेत्र में भी लागू होती है। कोई व्यक्ति चाहे कितना ही विद्वान्, धार्मिक या सदाचारी क्यों न बन जाय कुछ न कुछ दोष उसमें रहेंगे ही। जब तक उसमें कुछ दोष हैं तभी तक वह इस संसार में है। पूर्ण निर्दोष होते ही आत्मा बन्धन-मुक्त हो जाती है। फिर उसे इस संसार में रहने का कोई प्रयोजन शेष नहीं रह जाता। इसलिये ऐसे व्यक्ति ढूंढ़ना जिनमें कोई दोष न हो एक प्रकार से असम्भव ही है। प्रत्येक में कुछ न कुछ बुराई मिलेगी, चाहे वह मात्रा में स्वल्प या महत्त्व में कम ही क्यों न हो। यही बात सुखदायक परिस्थितियों के बारे में भी समझनी चाहिये। सदा किसी को अनुकूल ही अवसर मिलते रहें, प्रिय व्यक्ति, प्रिय पदार्थ और प्रिय परिस्थितियां ही सदैव बनी रहें, यह आशा करना भी दुराशा मात्र ही है। जब हम सदा शुभ ही शुभ विचार और कार्य नहीं करते, जब हमारे मन से दुर्भाव और शरीर से दुष्कर्म होते ही रहते हैं तो उनके फलस्वरूप कष्ट, हानि, विछोह, शोक एवं विपत्ति भोगनी ही पड़ेंगी। शुभ और अशुभ कर्मों का फल भोगना निश्चित है। जो हमने किया है उसका भोग मिलना ही ठहरा। जब शुभ कर्मों के सुखद फल हम भोगते हैं तो अशुभ कर्मों के दुष्परिणामों को भोगने के लिये भी हमें ही तैयार रहना होगा। संसार में सज्जनता की तथा आनन्ददायक परिस्थितियों की कमी नहीं है पर यह भी मान लेना चाहिये कि दुष्टता और विपत्ति भी साथ ही पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। हमें दोनों से ही निपटना होगा। केवल श्रेष्ठता, सुन्दरता, भलाई और आनन्द की ही हम इस दुनिया में आशा करें और नीचता, कुरूपता, बुराई और दुःख से सर्वथा बचे रहना चाहें तो यह इच्छा कदापि पूर्ण न हो सकेगी। हमें अपनी मनोभूमि को दुःखों को सहने और बुराइयों से निपटने के लिये भी उसी तरह सुशिक्षित करना पड़ेगा, साधना पड़ेगा, जिस प्रकार वह सुखों के लिये सज्जनता से सान्निध्य के लिये खुशी-खुशी तैयार रहती है। धूप और छांह की भांति, रात और दिन की भांति प्रिय और अप्रिय दोनों ही प्रकार के संयोग हमारे जीवन में आते रहने वाले हैं। इन दोनों ही की सम्भावना सुनिश्चित है। फिर हम एक के लिये—सुख के लिये, प्रिय के लिये तो हंसें-उछलें और दूसरे के लिये—दुःख के लिये, अप्रिय के लिये खिन्न हों, खेद मानें तो इसमें कोई बुद्धिमत्ता न होगी। इसे हमारा मानसिक बचपन ही कहा जायगा। बच्चे जिस तरह जरा-सी बात में रोने लगते हैं, रूठते और मचलते हैं, उसी प्रकार का आचरण हमारा भी हो तो इसे समझदारी नहीं कहा जायगा। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि तीन गुणों से बने हुए इस संसार में जहां सतोगुण और रजोगुण का अपना-अपना स्थान है वहां तमोगुण भी रहेगा ही। दुनिया में से उसे पूर्णतया हटाना या मिटाना सम्भव नहीं। इतना मान लेने के बाद अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि उनके दुष्प्रभावों से अपने को बचाने के लिये हमें क्या करना चाहिये? इस प्रश्न को यदि ठीक तरह हल कर लिया जाय तो हमारे जीवन की आधे से अधिक परेशानियां हल हो सकती हैं। यह ध्यान में रखने की बात है कि दुनिया में जो कांटे-कंकड़ फैले हुए हैं उन्हें बीन कर अपनी यात्रा के सभी मार्गों को हम निरापद बनाने का प्रयत्न करें तो इसमें सफलता मिल सकना कठिन है क्योंकि कांटों-कंकड़ों की संख्या अधिक है। विभिन्न रास्ते जिन पर हमें समय-समय पर चलना पड़ता है उनकी लम्बाई भी हजारों मील बैठती है। कांटे बीनने पर हम खड़े भी हों तो जीवन की अवधि भी इतनी लम्बी नहीं है कि जब तक सब कांटे बीने जा सकते हों तब तक जीवित रहें, फिर यदि जीवित भी रहें तो इसका भी कोई निश्चय नहीं कि जब तक यह बीने जाने की प्रक्रिया पूर्ण होगी तब तक फिर और नये कांटे उस मार्ग पर न बिखर जायेंगे। इन परिस्थितियों में यही उचित प्रतीत होता है कि कांटे बीनने की प्रक्रिया को सीमित करके हम अपने पैरों में जूते पहनने का उपाय पसन्द करें। यह अपेक्षाकृत सरल और सीधा उपाय है। थोड़ा पैसा और थोड़ा प्रयत्न करके ही हम अच्छे जूते पहन सकते हैं और फिर चाहे किसी मार्ग पर कितने ही कांटे-कंकड़ क्यों न बिखरे पड़े हों, निर्भय होकर जा सकते हैं। जूतों के तले उन कांटे-कंकड़ों का मुंह कुचलते रहेंगे और हमारे पैरों को तनिक भी आघात न पहुंचने देंगे। संसार के हर दुर्जन को सज्जन बनाने की, हर बुराई को भलाई में बदल जाने की आशा करना वैसी ही आशा है जैसी सब रास्तों पर से कांटे-कंकड़ हट जाने की। अपनी प्रसन्नता और सन्तुष्टि का यदि हमने इसी आशा को आधार बनाया हो तो निराशा ही हाथ लगेगी। हां, यदि हम अपने स्वभाव एवं दृष्टिकोण को बदल लें तो यह कार्य जूता पहनने के समान सरल होगा और इस माध्यम से हम अपनी परेशानी को बहुत अंशों में हल कर सकेंगे। अपने स्वभाव और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर सकना कुछ श्रमसाध्य, समयसाध्य और निष्ठासाध्य अवश्य है, पर असम्भव तो किसी भी प्रकार नहीं है। मनुष्य चाहे तो विवेक के आधार पर अपने मन को समझा सकता है, विचारों को बदल सकता है और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर सकता है। इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं जिनसे प्रकट है कि आरम्भ से बहुत हलके और ओछे दृष्टिकोण के आदमी अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करके संसार के श्रेष्ठ महापुरुष बने हैं। इसी प्रकार ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जिनके विचार जब तक ऊंचे रहे तब तक वे प्रतिष्ठा के उच्च आसन पर अवस्थित रह, पर जब उनका अन्तःकरण कलुषित हो गया, विचार घटिया हो गये तो उनका जीवन-क्रम भी पतनोन्मुख हो गया और वे अधोगति को प्राप्त हुए। सामाजिक, नैतिक, धार्मिक और राजनैतिक विचारों में अनेकों बार परिवर्तन करने पड़ते हैं, इसी प्रकार यदि मनुष्य चाहे तो विभिन्न समस्याओं पर अपना विचार करने के अपने तरीके को, सोचने के ढंग को भी बदल सकता है। अपनी विचार शैली की त्रुटियों को समझ सकना और इनके सुधार में संलग्न होना यद्यपि बहुत बुद्धिमत्ता और उच्च साहस का काम है, वह कठिन भी है, लेकिन असम्भव नहीं माना जा सकता। यह दुरंगी दुनिया जैसे भी कुछ है, परमेश्वर की बनाई हुई है। इसमें विचित्रतायें रहेंगी ही। इनसे खीझने, झुंझलाने और परेशान होने से काम न चलेगा वरन् एक ऐसा व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा जिसके अनुसार जैसे भी कुछ यहां के लोग हैं, जैसी भी कुछ यहां की परिस्थितियां हैं उनके साथ अपना तालमेल बैठा सकें, कामचलाऊ समझौता कर सकें और जीवन की गाड़ी को किसी प्रकार लुढ़काते हुए समय को पूरा कर लें। हम अपनी मनमर्जी का अपने सब निकटवर्ती लोगों को, स्वजन सम्बन्धियों को, स्त्री-पुत्रों को देखना चाहें तो यह उचित न होगा। जितना सम्भव हो, उतना उन्हें झुकाने, समझाने और अपनी मनमर्जी का बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। परन्तु यह आशा कभी न रखनी चाहिये कि जैसा हम चाहते हैं पूर्णतः वे वैसा ही बन जावेंगे। क्योंकि हर व्यक्ति एक स्वतन्त्र धातु का बना हुआ है। जिस प्रकार वृक्षों की पत्तियां एक-सी लगने पर भी हर पत्ती एक-दूसरे से भिन्नता लिये हुए होती है, उसी प्रकार हर मनुष्य अपनी कुछ खास रुचि, अभिलाषा, प्रकृति एवं प्रतिभा को लेकर बना है। हजारों जन्मों के, हजारों योनियों के विविध प्रकार के कार्यों और घटना-क्रम के आधार पर उसका यह वर्तमान जीवन बना है। कोई जीव इससे पिछले जन्म में विषधर सर्प था—उसे दूसरे को काटने और क्रोध से फुफकारते रहने की आदत थी। अब वह इस जन्म में मनुष्य हो गया तो उस पिछले जन्म के क्रोधी और आक्रामक संस्कारों का एक ही जन्म में पूर्ण समाधान हो सकना कठिन है। वह बेचारा अपने में कितना ही सुधार करे तो भी वे पिछले दुर्गुण किन्हीं अंशों में बने ही रहेंगे। वह भी मजबूर है। इतनी तेज प्रगति कर सकना उसके लिये भी कठिन है कि वर्ष-छः महीने में ही उन पुरानी सब आदतों को भुला दे और वैसे संस्कार धारण करले, जैसे कितने ही जन्म मनुष्य शरीर में व्यतीत करने के बाद उत्पन्न होते हैं। इन परिस्थितियों में उस सर्प से मनुष्य में आने वाले अपने किसी स्वजन सम्बन्धी से असन्तुष्ट रहना, उसकी आदतें हमारी इच्छानुसार न बदल सकने पर दुःखी रहना हमारे लिये उचित नहीं है। दूसरों की परिस्थितियों और मजबूरियों पर हमें वैसी ही सहानुभूति के साथ विचार करना होगा जैसी कि बच्चों की, रोगियों की स्थिति का ध्यान रखते हुए उनकी अशिष्टताओं और असमर्थताओं को उदारतापूर्वक सहन किया जाता है। हमारे निकटवर्ती स्वजन सम्बन्धी हमारी आज्ञा या इच्छानुसार पूर्णतया नहीं चलते तो हमें बड़ा क्रोध आता है और असन्तोष भी होता है। क्योंकि हम यह मानते हैं कि जिस प्रकार अपने पालतू पशुओं को कहने के अनुसार काम करने, जैसा चाहें उसी प्रकार रहने के लिये मजबूर किया जा सकता है, वही बात अपने स्वजनों सम्बन्धियों पर, स्त्री–पुत्रों पर भी लागू होनी चाहिये। उन्हें भी वैसा ही आज्ञानुवर्ती होना चाहिये। यही हम भूल करते हैं। पशुओं पर जैसा अपना स्वामित्व होता है वैसा मनुष्यों पर नहीं है। जिस प्रकार पशु अपनी सम्पत्ति हैं और सब प्रकार हमारे अधीन है, वह स्थिति स्त्री-पुत्रों की, भाई-भतीजों की नहीं है। किसी मनुष्य का किसी दूसरे पर चाहे वह स्त्री या सन्तान ही क्यों न हो, पशुओं जैसा अधिकार नहीं है और न हम उनके स्वामी ही हैं। प्रत्येक मनुष्य एक-दूसरे के साथ एक कर्तव्य सूत्र में बंधा हुआ है। उसकी मर्यादा इतनी ही है कि अपने आश्रितों, परिजनों, स्वजनों या सम्बन्धित व्यक्तियों का उचित मार्गदर्शन करे। उनकी मनोभूमि को सुसंस्कृत बनाने के लिये आवश्यक दीक्षा का, स्वाध्याय सत्संग का तथा अनुभव एकत्रित करने का अवसर दे जिससे उनका ज्ञान एवं विवेक स्वतः इतना विकसित हो जाय कि वे लाभ-हानि, बुराई-भलाई, उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य का अन्तर स्वतः समझ सकें और जिस मार्ग पर हम चलाना चाहते हैं उस पर वे अपने विकसित विवेक के आधार पर स्वतः चल सकें। ज्ञान, अनुभव और संस्कार एकत्रित करने के लिये समुचित अवसर यदि हम अपने आश्रितों एवं सम्बन्धियों के लिये जुटा सकें तो उनके बहुत कुछ उसी ढांचे में ढल जाने की आशा है जैसा कि हम चाहते हैं। ऐसा न करके केवल आदेश मात्र देने से सम्भव है उनकी अविकसित मनोभूमि हमारी शिक्षा को हृदयंगम न कर सके और वे आज्ञानुवर्ती न बन सकें। ऐसी दशा में झुंझलाने या रुष्ट होने की कोई बात नहीं है। हमें अपना कर्तव्य पालन करते रहने का अधिकार है। उन्हें समझाने-बुझाने, आगा-पीछा सुझाने का कोई अवसर नहीं चूकना चाहिये, किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि हर किसी का, यहां तक कि एक छोटे बच्चे का भी एक व्यक्तित्व और स्वाभिमान होता है। जो कुछ कहना या समझाना हो यह इस प्रकार होना चाहिये कि उसके सम्मान और स्वाभिमान को चोट न पहुंचे। हमारी वाणी में कटुता, क्रोध, अधिकार, अहंकार एवं आवेश नहीं होना चाहिये। एक चतुर वकील किसी न्यायाधीश को जिस धैर्य और शान्त मुद्रा में अपने पक्ष को दलीलों और प्रमाणों के साथ समझाता है हमारे समझाने का तरीका भी वैसा ही होना चाहिये। इसी से दूसरों को हमारी बात सुनने और समझने की इच्छा होती है। यदि क्रोध और आवेश के साथ कहा जा रहा है तो फिर वह कितना ही उचित या सत्य क्यों न हो सामने वाला उसे हृदयंगम न करेगा वरन् क्रोध की प्रक्रिया में उसे भी क्रोध उत्पन्न होने लगेगा और वह अच्छी बात का भी विरोध करने लगेगा। यदि हमने अपना स्वभाव नहीं सुधारा है, यदि हमें दूसरों को समझाने या सुधारने के लिये आवश्यक मधुरता, आत्मीयता उपलब्ध नहीं है, तो यही मानना पड़ेगा कि हम समझाने के अयोग्य हैं और किसी को भूले रास्ते से लौटा कर सीधे रास्ते पर लाने में सर्वथा असमर्थ रहेंगे, उल्टे वैर, विरोध बढ़ा लेंगे। माना कि दूसरों को समझाने और सुधारने की आवश्यकता है, पर उससे भी पहली आवश्यकता यह है कि इस आवश्यक कार्य को करने से पूर्व अपने आपको समझाने और सुधारने का प्रयत्न करें। अपने में नम्रता, मधुरता, शिष्टाचार, स्नेह, सौजन्य, धैर्य को इतनी पर्याप्त मात्रा में भर दें कि सामने वाले को प्रभावित कर सकना हमारे लिये सम्भव और सुगम हो सके। झगड़ालू, जिद्दी वकील जिस प्रकार उथले शब्दों का प्रयोग करके घटिया दर्जे की बहस करता है और न्यायाधीश को क्रुद्ध करके अपने पक्ष को ही खराब कर लेता है, उसी प्रकार दुर्भावना, व्यंग, लांछन से भरे हुए शब्दों में सामने वालों की नीयत पर हमला करते हुए, उन्हें मूर्ख साबित करते हुए यदि कुछ कहा-सुना या समझाया-बुझाया गया है तो निश्चय ही उसका परिणाम कुछ भी सन्तोषजनक न होगा। दूसरों को सुधारने से पूर्व हमें अपने को सुधारना पड़ेगा और यह समझना पड़ेगा कि लाठी के बल पर किसी को कुछ देर के लिये चुप या विवश किया जा सकता है पर उसे बदला या सुधारा नहीं जा सकता। जब तक विवशता रहेगी तब तक वह चुप रहेगा, पर अवसर मिलते ही वह दूने वेग से उल्टा आचरण करके अपने अपमान का बदला चुकावेगा। जो पति अपनी पत्नियों पर या जो पिता अपनी सन्तान पर बहुत कड़ाई बरतते हैं, उन्हें मारते-पीटते, अपमानित करते या सताते हैं, उन्हें उसका बदला उस समय मिलता है जब वे बुड्ढे हो जाते हैं या अन्य असमर्थताओं के कारण उनके हाथ में कुछ शक्ति नहीं रहती। उन दिनों उनको घर वाले तरह-तरह से तिरस्कृत करते और सेवा-सहायता से जी चुराते हैं। ऐसी विषम अवस्था उनकी नहीं होती जिन्होंने युवावस्था में अपने स्वजनों के साथ स्नेह उदारता एवं सम्मान का व्यवहार किया होता है। यह संसार कुंए की आवाज की तरह है, जैसा हम बोलते हैं वैसी ही प्रतिध्वनि लौट कर आती है। इसीलिये यदि हमें अपने प्रति दूसरों का व्यवहार सज्जनता का देखने की इच्छा हो तो पहले हमें अपने को इस योग्य सिद्ध करना होगा कि हम वस्तुतः उसके अधिकारी हैं। तीनों गुणों से भरी हुई परिस्थितियों तथा व्यक्तियों वाली इस दुनिया में हम अपने लिये केवल अच्छाई ही उपलब्ध करें, बुराइयों और विपत्तियों से बच कर सीधा शान्तिमय जीवन व्यतीत करें तो बाहर की हर प्रतिकूल परिस्थिति पर खीझने और झुंझलाने की आदत हमें छोड़ने पड़ेगी। अपने अन्दर सहिष्णुता का, सहनशीलता का, भूलने और क्षमा करने का गुण अधिकाधिक मात्रा में एकत्रित करना पड़ेगा। अपना सुधार यदि हम नहीं कर पाते, अपने में अनुदारता, अहंकार उत्तेजना और दोष भरे हुए हैं तो सामने वालों को अपने अनुकूल बनाना तो दूर उल्टे जिस प्रकार दर्पण में अपना चेहरा दीखता है, उसी प्रकार सामने वाले भी अपने ही दुर्गुणों की छाया से आच्छादित, अपेक्षाकृत और भी अधिक दुर्गुणी दीखेंगे।


