अपने को बदलें तो जमाना बदले
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बाह्य वातावरण का प्रभाव हम अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप ही ग्रहण करते हैं। किस खाद्य पदार्थ का स्वाद कैसा है इसका कुछ निश्चित उत्तर नहीं हो सकता। जीभ से जैसे टपकते हैं उसके सम्मिश्रण से खाद्य पदार्थ का जो स्वरूप बनता है उसके आधार पर तथा जीभ में फैले हुए ज्ञान-तन्तुओं की रचना के आधार पर स्वाद का अनुभव होता है। ऊंट को नीम की पत्ती वैसी कड़ुवी नहीं लगती जैसी हमें लगती है। बकरी आक के पत्ते मजे से खाती है जबकि दूसरे जानवर उसे सूंघते ही हट जाते हैं। मनुष्य मनुष्य में भी यही भेद रहता है। एक व्यक्ति को मांस जैसे पदार्थ, शराब जैसे नशे बड़े मनभावन लगते हैं पर दूसरे को उनकी गन्ध तक नहीं सुहाती। खाने को तो वे किसी भी प्रकार तैयार नहीं हो सकते। इस तथ्य पर विचार करने से यह विदित होता है कि एक ही वस्तु विभिन्न प्राणियों को अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार प्रिय और अप्रिय लगती है। इससे प्रधानता पदार्थ की नहीं अपनी स्थिति की रही। ठीक इसी प्रकार संसार की विभिन्न परिस्थितियों का भला-बुरा प्रभाव हमारी अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुसार पड़ता है। बहादुर सैनिक युद्ध-घोषणा सुनकर अपना जौहर दिखाने एवं कर्तव्य पालन करने का अवसर सामने आया देख कर प्रसन्न होता है और उत्साहपूर्वक अपने कार्य में लगता है। इसके विपरीत कायर सैनिक इसी युद्ध-घोषणा को सुनकर अपनी मौत सामने नाचती देख कर भयभीत एवं उद्विग्न होने लगता है। यह युद्ध-घोषणा की प्रधानता नहीं, अपनी मनोभूमि की प्रधानता है जिसकी भिन्नता के कारण एक ही जगह रहने वाले, एक ही जैसे शरीर वाले दो व्यक्तियों को दो भिन्न प्रकार के अनुभव हुए। संन्यासी को सुख-सुविधायें छूट जाने की प्रसन्नता होती है। वह उन्हें अपने आत्म-कल्याण में बाधक समझ कर खुशी-खुशी परित्याग करता है और अपरिग्रही होकर बड़ा हल्कापन एवं सन्तोष अनुभव करता है। इसके विपरीत एक लोभी को थोड़ी सी धन-हानि हो जाने पर भी बड़ी व्यथा होती है। वह बहुत दुःख पाता और पछताता है। धन दोनों का गया—पर एक ने इसे गंवा कर सन्तोष लाभ लिया, दूसरे ने पीड़ा अनुभव की। इस भिन्नता में धन अथवा उसकी हानि कारण नहीं वरन् इन व्यक्तियों की भिन्न-भिन्न मनोदशा ही कारण है। ठीक इसी प्रकार इस संसार की विभिन्न परिस्थितियां विभिन्न स्तर के व्यक्तियों को विभिन्न प्रकार के परस्पर विरोधी अनुभव प्रदान करती हैं। हमें यह भली भांति जान लेना चाहिये कि बाह्य परिस्थितियां, व्यक्ति अथवा पदार्थ ही हमारे सुख-दुःख का कारण नहीं होते वरन् हमारा अपना सोचने का ढंग भी इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण भूमिका उपस्थित करता है। स्वार्थपरता के संकीर्ण दृष्टिकोण को लेकर चलें तो हमें हर किसी से शिकायत बनी रहेगी। उसने हमारे साथ यह उपकार नहीं किया, यह प्रत्युपकार नहीं दिया, हमारे इस काम नहीं आया आदि-आदि सोचता रहेगा और सामने वाले को घृणित, नीच, दुष्ट आदि मानने लगेगा। पर यदि अपनी दृष्टि कृतज्ञतापूर्ण उदार हो तो जिससे जितना भी थोड़ा-बहुत सत्कार मिल गया, उतने को भी बहुत बढ़ा-चढ़ा कर सोचेगा और उसे धन्यवाद देगा, उदार मानेगा। अपने द्वारा जो नेकी किसी के साथ की गई वह अपना कर्तव्य पूरा किया और दूसरे ने जो थोड़ा भी प्रत्युपकार किया उसे उसकी उदारता, महानता माना तो बस सारा संसार देवताओं से भरा-पूरा लगेगा और अपने सन्तोष एवं आनन्द में तनिक भी कमी न आवेगी। इसके विपरीत हम हर किसी के छिन्द्रान्वेषण करते रहने के आदी हो गये तो गुण-दोष या संसार में बुराइयां कमियां भी हर जगह मिल जायंगी और अपने को उनसे क्षोभ, उद्वेग असन्तोष एवं रोष भी हर घड़ी उत्पन्न होता रहेगा। संसार को अपनी इच्छा आवश्यकता एवं रुचि के अनुसार बना सकना नहीं हो सकता। यहां विभिन्न प्रकृति के मनुष्य रहते हैं और विभिन्न स्तरों का व्यवहार होता है। सब कुछ हमारे अनुरूप ही बन जाय यह संभव नहीं। इसलिये यदि क्षोभ और असन्तोष के कारण उत्पन्न होने वाली मानसिक व्यथा से छुटकारा पाना हो तो एक ही उपाय है कि हम अपना दृष्टिकोण बदलें, अपने को सुधारें, अपने सोचने का तरीका बदलें। इस परिवर्तन के साथ-साथ संसार की सभी परिस्थितियां बदली हुई दिखाई देने लगेंगी। जिनके प्रति हम आदर भाव रखते हैं और उपकारी मान कर कृतज्ञ रहते हैं वे हमारे लिये सहयोगी एवं प्रशंसक ही बन कर सामने आवेंगे और सबके लिए अपेक्षाकृत अधिक सुविधाजनक परिस्थितियां विनिर्मित होंगी।
****समाप्त*
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