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Media   >   Social Media   >   Daily Update

Monday 14, September 2026

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 12 September 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी:- जहाँ साधना होती है वहीं तीर्थ बनते हैं -पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



 तीर्थ कब हुए हैं जहां किसी समय में किसी ऋषि ने कोई खास उपासना की वह आदमी वहां जाने के बाद जाते ही आदमी एक शांति अनुभव करता है एक आदमी उल्लास अनुभव करता है एक प्रकाश अनुभव करता है महर्षि रमण के आश्रम में मैं कुछ दिन तक रहा हूं महर्षि रमण का आश्रम महर्षि रमण के आश्रम में मैंने कई चमत्कार देखे यह तो मैंने यह देखा एक क्या नाम है बंदर बंदर जो था जब उनके व्याख्यान का समय होता तो चुपचाप आकर के अपने नियत स्थान पर बैठ जाता पेड़ पर रहता था पालतू नहीं था जंगली बंदर था जंगली बंदर था आकर बैठ जाता महर्षि जब बाहर निकलते तो उनका व्याख्यान होता व्याख्यान उनका मौन होता मैं जैसे बोलता हूं वैसे नहीं बोलते थे मौन आ करके बस बैठ जाते थे बैठ जाते हैं बाकी सब लोग बैठ जाते उनका व्याख्यान शुरू हो जाता है जबान से नहीं परा वाणी से परा वाणी से बस सब लोग निकलते पूछते आपने क्या क्या सुना हर आदमी यह कहता रहता मैंने यह सुना मैंने यह सुना हर एक को अलग-अलग बुला लीजिए पूछिए आपने क्या सुना हर एक एक ही बात बताएगा मैंने यह सुना इस तरीके से वहाँ छोटे छोटे जानवर चिड़िया है यह क्या नाम है गिलहरियां है कौन-कौन मोर सब धीरे धीरे धीरे धीरे जैसे यह आश्रम का सत्संग का समय हुआ सब आ करके लाइन से बैठ जाते हैं ऐसा मैंने वह चमत्कार देखा समय का जो बहुत ठीक बैठता है स्थान की विशेषता व्यक्ति की विशेषता वातावरण की विशेषता वातावरण बनाया जाता है बड़े श्रम से पूजा का स्थान जो मेरा है अखंड दीपक जलता रहता है वहां उसका एक विशेष वातावरण है मैं दूसरों को प्रवेश नहीं करने देता बाहर कोई आते हैं दर्शन करने के लिए कहता हूं बाहर से दर्शन करो भीतर मत जाओ क्यों अनेक मनुष्यों के अनेक संस्कार होते हैं और वह संस्कार उस स्थान के वातावरण को घटा भी सकते हैं बढ़ा भी सकते हैं बढ़ा भी सकते हैं घटा भी सकते हैं इस तरीके से मैं अलग लिखता रहता हूं हम और हमारी धर्मपत्नी दो ही आते हैं पहले बूढ़ी माता भी आती थी हमारी वह दीपक को संभालती थी घी वगैरह को संभालती थी और दूसरा काम करती थी अब बूढ़ी माता जी ज्यादा बुड्ढी हो गई हैं अब उनका शरीर उनकी आंखें उतनी ज्यादा काम नहीं करती अब उनको 90 वर्ष करीब होने को आए तो बेचारी को छुट्टी भी कर दिया हमने अब उनके ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं है भूल भी जाती है वह कई बार इसीलिए वह हम और हमारी पत्नी दो ही उस दीपक को संभालते हैं वातावरण बनाते हैं उस वातावरण में हम जब बैठते हैं कभी तब तब न जाने कैसे उल्लास कैसे मन कैसे क्या हो जाता है सिंहासन पर टीले पर बैठ कर के जो लकड़हारे की गडरिये की स्थिति हो जाती है ऐसी स्थिति मेरी हो जाती है उन उन घंटों में बाहर निकलकर मैं सामान्य मनुष्य हो जाता हूं यह बात मैं आपको उपासना वाली बात बता रहा हूं |

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 
 

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अखण्ड-ज्योति से



एक न्यायप्रिय राजा सादे वेश में अपनी प्रजा की खैर-खबर लेने निकला। अब कभी वह जनता के दुःख दर्द को सुनने निकलता तो किसी अंगरक्षक को संतरी या मंत्री को साथ में नहीं लेता था और न राज्य के अधिकारियों को किसी प्रकार की सूचना देता।

कितने ही व्यक्तियों से संपर्क करते हुए वह एक बगीचे में पहुँचा। वहाँ एक वृद्ध माली नया पौधा लगा रहा था। उसे देखकर राजा ने पूछा- “यह तो अखरोट जैसा पौधा मालूम पड़ता है।

“हाँ हाँ। भैया तुम्हारा अनुमान ठीक है”, माली का उत्तर था।

“अखरोट तो बीस-बाईस वर्षों में फलता है, तब तक क्या इस पौधे के फल खाने के लिए बैठे रहोगे?

“बात यह है कि हमारे बाप-दादा ने इस बगीचे को लगाया था। खून-पसीना एक करके इसको सींचा, देखभाल की और फल हम लोगों ने खाए। अब हमारा भी तो कर्तव्य है कि कुछ वृक्ष दूसरों के लिए लगा दें। अपने खाने के लिए पेड़ लगाना तो स्वार्थ की बात होगी। मैं यह नहीं सोच रहा हूँ कि आज इस पौधे की क्या उपयोगिता है यह भविष्य में दूसरों को फल प्रदान करे बस यही इच्छा है।”

वृद्धमाली की बात सुनकर राजा बहुत प्रभावित हुआ।

 अखण्ड ज्योति जनवरी  (1988)

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