Wednesday 30, September 2026
🌸🙏परम वंदनीया माताजी के अवतरण दिवस पर शत-शत नमन 🙏🌸
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 30 September 2026 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी:- साधना का सबसे बड़ा भ्रम -पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
मैं क्या कहूं दुनिया वाले लोगों को क्या मिला मैं नहीं जानता अगर मिला होता तो इनमें से भगवान के भक्ति जरूर पैदा हो गए होते इनमें से कोई सुदामा दिखाई पड़ते कोई नरसी मेहता कुछ उनमें से मीराबाई दिखाई पड़ती कुछ उनमें से संत तुलसीदास कुछ उसमें से कुछ उसमें से सूरदास दिखाई पड़ते कुछ उसमें से कौन लेकिन मित्रों कोई भी नहीं पड़ता दिखाई जैसे कि जैसे कि भूखे के नंगे संतोषी माता का शुक्रवार के दिन उपवास किया और चना गुड़ चबाया चना गुड़ चबाया और यह ख्याल आया कि शायद चना गुड़ चबाने के बाद में संतोषी माता खुश हो जाएगी और जो हम चाहते हैं वह दौलत देकर के चली जाएगी चना गुड़ चबाने और खटाई न खाने की कीमत के ऊपर संतोषी माता को प्रसन्न करने की हमने इच्छा की और संतोषी माता बेचारी क्या दे सकती हैं कितना दे सकती हैं उतना ही देंगी जितना कि आपने चना गुड़ से बचत की थी रोटी खाने में चवन्नी खर्च होती थी और चना गुड़ आपने तीन आने का खाया एक आने का बचा लिया एक आने का क्या कर लेंगे इतना संतोषी माता भी दे देंगी आपको बस बात है बड़ी चीज आ नहीं पाती …….बड़ी चीजों के लिए मेरे गुरुदेव ने कहा तुझे तपाया जाना चाहिए और तुझे मजबूत बनाया जाना चाहिए मैंने कहा हां मैं मजबूत बनूंगा और मैं तपाये जाने के लिए तैयार रहूंगा
मेरे जीवन की शुरुआत मेरे जीवन की शुरुआत जब उन्होंने गायत्री मंत्र की महत्ता बतानी शुरू की तो मैं आंखें फाड़ फाड़ करके देखता रह गया उन्होंने कहा बच्चे इस विश्व में एक महानतम सट्टा शक्ति है अगर आदमी इसको छुए तो न जाने कैसा कैसा हो जा सकता है उन्होंने मुझे संक्षेप में गायत्री मंत्र का माहात्म्य बताया और पांच नाम के बारे में थोड़ी सी जानकारी कराई उन्होंने मुझे बताया गायत्री मंत्र उस पारस पत्थर का नाम है जिसको छू करके लोहा सोना बन जाता है और उन्होंने मुझे बताया यह कि यह गायत्री मंत्र उस अमृत का नाम है कि जिसको पी करके मरा हुआ आदमी जिंदा हो जाता है और गायत्री मंत्र उस कल्पवृक्ष का नाम है जिसके नीचे बैठ करके आदमी अपनी सारी कल्पनाएं पूरी कर लेता है और गायत्री मंत्र उस कामधेनु का नाम है जिसको पी करके बूढ़ा आदमी जवान बन जाता है और गायत्री मंत्र उस ब्रह्मास्त्र का नाम है जिसकी चोट आदमी के व्यक्तिगत जीवन के अभावो को चकनाचूर कर सकती है और उसकी मुसीबत में उसके मार्ग में आने वाले अवरोधों को तहस-नहस करती रह सकती है ऐसी है यह गायत्री महामंत्र मेरे गुरुदेव ने मुझे बताया मेरे गुरुदेव ने मुझे बताया आपके तरीके से मेरे मुंह में भी पानी भरके आ गया और मैंने कहा ऐसी बढ़िया चीज है तो मैं चाहता हूं कि वह बढ़िया चीज मुझे मिलनी चाहिए और मैं गुरुदेव से प्रार्थना की आप समय लगाने की अपेक्षा आप जल्द ही गायत्री मंत्र को प्राप्त करने की विधि बता दीजिए और मैं उसको खुशी-खुशी करने के लिए तैयार हूं और उन्होंने मुझे विधि बता दी विधि बहुत सरल विधि है और मैं फूल करके बहुत खुश हुआ हमने कहा इससे सरल विधि तो दुनिया में कुछ हो ही नहीं सकती उन्होंने मुझे बताया एक लकड़ी की चंदन की तुलसी की माला ले आ और उंगलियों से माला घुमाना शुरू करो मैं बहुत खुश हुआ भाई यह तो बहुत सस्ता धंधा हाथ लग गया चरखा कातती है बुढ़िया चरखे को कातने में बुढ़िया को बहुत अकल खर्च करनी पड़ती है चरखे में जो माल है उसमें चिपचिपाहटपन अगर नहीं होता तो उसमें लाख लगाती है ताकि वह जो चरखे की रस्सियाँ और उसका तपुरा इन दोनों के बीच में चिपचिपाहट का जो तरीका है वह कायम रखा जा सके वह चिपचिपाहट खत्म हो जाती है तो बुढ़िया तुरंत चरखा कातना बंद कर देती है और वह लाख लाती है और वह लाती है लाख वह चिपकती है ताकि वह चरखा घूमना शुरू कर दे अकल का काम है चरखा कातना और अकल का काम है कि हाथ से कैसे सूत को काता जाए और कितना मोटा हो गया कि महीन हो गया कि ऊंचा हो गया कि नीचा हो गया बुढ़िया बहुत अकल का ध्यान रखती है और बुढ़िया हाथ को बहुत तेज नहीं चलाती धीरे चलाती है धीरे-धीरे चलाती है हाथ तब वह चरखा चलता है तब चरखे कातने से सूत पैदा होता है और दिन भर में चवन्नी कमाती है मुझे बड़ी खुशी हुई माला में यह सब दिक्कतें नहीं है और माला में कोई लाख नहीं लगानी पड़ती और चिपचिपाहट पैदा नहीं करनी पड़ती और माला में कोई हिसाब का अंदाज नहीं लिखना पड़ता है चाहे तो आप 11 माला जप लीजिए महीने भर में घंटे भर में चाहे तो आप 21 जप डालिए कोई रोकने वाला नहीं है चाहे तो आप छः ही जपिये कुछ कोई घबड़ाने की बात नहीं है दो उंगलियां ऐसे खट खट खट खट घुमाते हुए चले जाइए मैंने कहा यह तो बहुत सस्ता है और इस सस्ते में मुझे गायत्री माता मिल जाएंगी और मुझे अमृत मिल जाएगा और मुझे पारस मिल जाएगा और मुझे कामधेनु मिल जाएगी बस अब मैंने मारा मोर अब यह हुआ मुझे बहुत खुशी हुई और मेरे गुरु ने जो मुझे बताया कि पंचपात्र में पानी रखना चाहिए और तीन बार आचमन करना चाहिए सर पर हाथ रखना चाहिए प्राणायाम करना चाहिए मैंने कहा इसमें कौन मुश्किल की बात है कसरत मैंने बहुत दिन सीखी थी और मुझे आसान सिखाए गए थे और मुझे प्राणायाम सिखाए गए थे अमुक बात दिखाई गई थी इसके मुकाबले में यह क्या खट से तीन-तीन बार आचमन कर लो तीन बार क्या मैं तीन गिलास पानी पी जाऊं तीन बार आचमन से क्या होगा मैंने कहा भाई यह बहुत सस्ता धंधा हाथ लगा यह बहुत सस्ता धंधा हाथ लगा और इतने कम दाम में इतनी चीजें मिल जाएंगी बस अब मैं मालदार हुआ और अब मैं मालदार हुआ और गुरु मुझे कहता चला गया मैं फूल फूल कर कुप्पा होता चला गया और वह छोटी-छोटी बातें बताता गया उसने कहा तुमको माला जपनी चाहिए पालथी मार करके बैठ जाना चाहिए नहा करके बैठ जाना चाहिए और ऐसे करके बैठ जाना चाहिए गायत्री माता का एक फोटो ले आना चाहिए धूप बत्ती जलानी चाहिए मैंने कहा अरे बाबा यह भी कोई बात है मैं ऐसे खर्च कर दूंगा इसमें क्या लगता है चार आने का एक बंडल आता है धूपबत्ती का और एक धूपबत्ती रोज जला दूंगा एक धूप बत्ती जला दूंगा चवन्नी महीने का खर्च है चवन्नी तो खट से बच जाती चवन्नी में क्या होगा खट धूप बत्ती जला दिया करूंगा मेरा क्या बिगड़ता है बस यह सब बातें मुझे सुगम सुगम सुगम सुगम मुझे मालूम पड़ीं और यह मालूम पड़ा कि गायत्री मंत्र की उपासना बहुत सुगम है और इसके द्वारा बहुत फायदा उठाया जा सकता है इतना कम दाम इतना कम दाम में इतना फायदा उठाया जा सकता है मैंने लाटरियां रखी देखी हैं जिसमें ऊपर यह लिखा रहता है कि पाँच लाख रुपया इनाम मिलेगा और एक रुपया खर्च करना होगा और मैंने लाटरियां बिकती देखी हैं जिसमें लिखा रहता है कि हजार रुपए की लॉटरी में 3 लाख और यूपी की लॉटरी में 3 लाख मे 5 लाख और पंजाब की लॉटरी में इतने लाख और फैलाने की लॉटरी में इतने लाख इतने लाख लाख रुपए की छपे हुए बड़े-बड़े रंगीन वाले वह तस्वीरें वह बिकती रहती है रसीदें और एक रुपया दिया और एक लाख रुपया पाँच लाख रुपया मिलेगा बस रुपया तो गया और ख्वाब यह आया कि अब आए 5 लाख और अब आए 5 लाख और 5 लाख रुपए में से 3 लाख रुपए का मकान और लाख रुपए का व्यापार और लाख रुपए का सोना और लाख रुपए बैंक में और लाख रुपए बच्चों के नाम बस सारी की सारी स्कीम बनना शुरू हो जाती हैं बस मेरी भी ठीक इसी तरीके से स्कीम बनना शुरू हो गई जब मुझे सस्ते वाली लॉटरी लगाना मेरे गुरुदेव ने सिखा दिया मैंने कहा ऐसा गुरु भगवान करे सबको मिल जाए और मेरा आशीर्वाद है ऐसा गुरु आपको भी मिल जाए |
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
प्रभु की माया अपार है, माया को प्रभु आप ही जानते हैं। उनके सिवाय उसे कोई नहीं जानता, न जान ही सकता है। प्रभु की माया नहीं जानी जा सकती। हाँ, प्रभु जाने जा सकते हैं। जो प्रभु में लय हो जाता है, प्रभु के साथ एक ही भाव को प्राप्त हो जाता है, वही प्रभु को जान भी लेता है-
प्रभु ही सारे जगत में फैले है, परन्तु कोई भी पूर्ण रूप से नहीं है इसी कारण प्रभु की पूर्ण माया को कोई नहीं जानता। जो जानता है, अंश रूप में ही जानता है। सब इतना ही जान सकते हैं, ज्ञान की इतनी ही गम्य है, विद्या की इतनी ही गति है, बुद्धि की इतनी ही बलिहारी है। यही प्रभु की माया है।
इतना जानना भी हर किसी का काम नहीं है। जानने की इच्छा तो चाहे सब में हो, परन्तु यत्र तो कोई सा ही करता है और उनमें से भी कोई विरला ही जान पाता है। जो जान जाता है प्रभु उसका भी मुँह बन्द कर देते हैं, विधि तो वह बतला सकता है, पर उससे क्या मिलता है- यह नहीं बतला सकता। कुछ पूछो तो इतना ही कह सकता है कि प्रभु प्रभु? कहाँ? और प्रेम में गदगद हो गया। जिस पर प्रभु कृपा करते हैं उसी की यह अवस्था होती है। यही प्रभु की माया है।
परन्तु सब एक ही एक है तो फिर कौन जाने? किसे जाने? और क्या जाने? जानने वाला (ज्ञाता) और जाना जानने वाला (ज्ञेय) दोनों एक ही हैं। एक हो रहे हैं, अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय ज्ञानरूप हो गए हैं। जानने वाला जानकर सब कुछ भूल गया, फिर अब ज्ञाता क्या बतावे? प्रेमी चुप है, ज्ञानी गुम है। यही प्रभु की माया है।
तो सुनो, ज्योति वर्तिका पर ठहरती है, पर उसे स्नेहासिक्त होना चाहिए और हाँ उसे धारण करने के लिए ऐसा पात्र जो सीधा रह सके और स्नेह को स्वयं ही न पी जाए। यह सब कर सको, तो फिर ज्योति पाने की तैयारी। कुछ ने सार्थक प्रयास किया, दीपक ने उन्हें स्पर्श किया, वे प्रकाशित हुए और चल पड़े। शेष शिकायत करते रहे।
अब दूसरी बात सोचिए। जो अंशरूप में जानता है और अहंकार करता है। जो अंशरूप में ही जान कर फूल जाता है, वह ढिंढोरा पीटता है कि मैं जानता हूँ। पर तत्वतः वह अभी अधूरा ही जानता है। और जो अहंकार वश होकर, प्रभु के प्रेमरूप को नहीं देखता, प्रेम नहीं करता वह अधूरा ही रहता है, कोरा ज्ञान और निरी विद्वत्ता निष्फल जाती है। वह प्रभु का पूरा रूप नहीं जानता न जान ही सकता है। यही प्रभु की माया है।
पेवरिन की आँखों में आँसू छलक आए। उन्होंने उस सच्चे व्रती दंपत्ति को हृदय खोलकर आशीर्वाद दिया और काम में जुटा दिया। उनके आदर्श ने अनेकों को प्रेरणा दी और वैसे ही व्रतधारी स्वयं सेवक एक हजार की संख्या में भर्ती हो गये।
इसी कारण जो जानता है, वह कहता नहीं फिरता, जो अंश में जानता है—वह जानना न जानने के तुल्य है। जो थोड़ा सा जानता है वही कहता फिरता है। जो कहता है, वह खो देता है। जो कहता फिरता है, वास्तव में वही नहीं जानता है। यही प्रभु की माया है।
अखण्ड ज्योति दिसम्बर (1940)
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