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Tuesday 22, September 2026

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


अमृतवाणी:- क्या आप जानते हैं आपका जन्म क्यों हुआ है -पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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!! शांतिकुंज दर्शन 22 September 2026 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



ब्रह्म साक्षात्कार और आत्म साक्षात्कार आध्यात्मिकता के दो महत्वपूर्ण अध्याय माने जाते हैं और ये दो काम जो आदमी कर लेता है वो सिद्ध पुरुष माना जाता है और परमहंस माना जाता है और पहले दिन गायत्री का पहला क्षण जब मुझे सीखने के लिए मिला तो वो चरण थे जिसको मैंने जब पूरी तरीके से प्राप्त कर लिया तो मैं सिद्ध पुरुष हो गया और परमहंस हो गया। शुद्ध पुरुष और परमहंस होने के दो ही तरीके हैं। आत्मा का ज्ञान और परमात्मा का ज्ञान। परमात्मा का ज्ञान विश्व मानव में फैला हुआ है भगवान और और धर्म और संस्कृति सराचरण और शिष्य का के बीच बीच में विद्यमान मानो ये विचार जब मेरे समझ में आया तब मुझे ऐसा मालूम पड़ने लगा भगवान मेरे पास है और मैं भगवान के पास हूं और जब मैंने अपने आप का स्वरूप देखा तो मेरे जीवन की समस्याओं में अमूल परिवर्तन हो गया। पहले पहले मेरा ये ख्याल था कि मैं दुनिया में बड़ा आदमी बनने के लिए पैदा हुआ हूं। मैं मजा उड़ाने के लिए पैदा हुआ हूं। मैं अपना अहंकार और बड़प्पन की छाप दूसरों पर डालने के के लिए पैदा हुआ हूं। लेकिन मेरा सारे का सारा मजा गायब हो गया और मुझे जब आत्म साक्षात्कार हुआ तो मुझे यह मालूम पड़ा कि मैं भगवान का नन्ना मुन्ना बच्चा और भगवान ने सारी की सारी कला और सारी की सारी अपनी विभूति को समेट करके मुझ जैसे ना प्राणी को बनाया और मैं उसका सहायक और मैं उसका शिल्पक और मैं उसका आशीष उसकी इस खूबसूर इसकी इस दुनिया में ज्यादा खूबसूरती लाने के लिए और खुशबू पैदा करने के लिए मेरा जीवन का लक्ष्य और जीवन के लिए उद्देश्य पैदा हुआ |

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

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अखण्ड-ज्योति से



आज साधु तो बहुत हैं, पर साधना नहीं है। साधन के बिना साधुता कागज के फूलों की तरह है। जिनमें बहुरंगी आकर्षण तो भरपूर है, लेकिन सुगंध का एकदम अभाव है। सब तरफ आज ऐसे ही कागज के फूल दिखाई देते हैं। इसी वजह से धर्म की प्रखरता-तेजस्विता मंद पड़ गई है। साधनों के अभाव में धर्म असंभव है।

धर्म की जड़े साधना में हैं। साधना के अभाव में साधु का जीवन या तो मात्र अभिनय हो सकता है या फिर दमन हो सकता है। ये दोनों ही बातें शुभ नहीं हैं। तप-साधना का मिथ्या अभिनय पाखंड है। जबकि कोरा दमन और भी महाघातक है। उसमें संघर्ष की यातना तो है, पर उपलब्धि कुछ भी नहीं। जिसे दबाया जाता है, मरता नहीं, बल्कि और गहरी परतों में सरक जाता है। साधनाविहीन साधु को एक ओर वासना की पीड़ाएँ सताती है; उनकी ज्वालाओं में उसका जीवन तपता-झुलसता रहता है; तृष्णा की दुष्पूर दौड़ उसे हर पल दुःख देती रहती है; दूसरी ओर उसे दमन और आत्म उत्पीड़न की अग्निशिखाएँ जलाती है। एक ओर कुआं है तो दूसरी ओर खाई। सच्चे साधन के बिना इन दोनों में से किसी एक में गिरना ही पड़ता है।

सच्ची साधना न तो भोग में है और न दमन में। यह तो आत्मजागरण में है। इन दोनों अतिओं के द्वंद्व से उबरने और परमेश्वर में स्वयं को विसर्जित करने में है। साधना वेश-विन्यास की विविधता या कौतुक भरे प्रदर्शन का नाम नहीं है। यह नर से नारायण बनने की अंतर्यात्रा है, जो पशु-भाव का दमन करके नहीं, उसे सर्वथा छोड़कर परमात्मा-भाव में प्रतिष्ठित होने में ही संपन्न होती है।

सच्ची साधना का अर्थ किसी को पकड़ना नहीं है, वरन् सारी पकड़ को एक साथ छोड़ना है। सारी अतियों से, सभी द्वंद्वों से ऊपर उठना-उबरना है। इस सच्ची साधना से जो अपनी चेतना की लौ को द्वंद्वों की आँधियों से मुक्त कर लेते हैं, वे उस कुँजी को पा लेते हैं, जिससे सत्य का द्वार खुलता है और तभी वह साधुता प्रकट होती है, जिसकी अलौकिक सुगंध से अनेकों दूसरी सुप्त और मुरझाई आत्माएँ भी जाग्रत होकर मुस्कराने लगती है।

अखण्ड ज्योति जुलाई  (2000)

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