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सकारात्मक विचार

सकारात्मक विचार जीवन का आधारभूत मर्म है। इस मर्म में अनेक तथ्य सन्निहित हैं, जिनके प्रकटीकरण से जीवन सुरभित, सुगंधित एवं सौंदर्य से अभिमंडित हो जाता है। सकारात्मक विचार सौंदर्य का प्रतीक एवं पर्याय बन जाता है। यह जीवन को ऊर्जा से भर देता है। ऊर्जा से भरा हुआ जीवन अपने चरम पर विकसित होता है, अनेकों अनेक गुप्त एवं सुप्त आयाम खुलते हैं, जिनके कारण जीवन आशा, उत्साह, उमंग एवं उपलब्धियों से भर जाता है। यह ऐसी उपलब्धि दे जाता है, जिसकी कल्पना भी हम नहीं कर पाते हैं। सकारात्मक विचार शारीरिक एवं भावनात्मक विकास की बेजोड़ कड़ी हैं।

सकारात्मक विचार से मन प्रसन्न होता है एवं मन में उत्साह, उमंग भर उठता है। मन प्रकाशित हो उठता है तथा विचारों एवं कल्पनाओं की ऊँची उड़ान भरता है। विचार श्रेष्ठ हों एवं कल्पनाएँ सुखद हों तो भी ऊर्जा न होने से ये पंखविहीन होकर फड़फड़ाने लगते हैं एवं अपने इर्द- गिर्द घूमते रहते हैं। ऊर्जा ही है जो इसे अपनी सीमित सीमाओं से निकालकर अनंत आसमान की ओर उछाल देती है। फिर वहाँ से विचार अपने समधर्मी विचारों के संग मिलकर पुष्ट होते हैं, बलशाली होते हैं एवं इन सकारात्मक विचारों का सघन बादल बन जाते हैं। जो भी व्यक्ति इन विचारों के संपर्क- सान्निध्य में आता है, इन विचारों से सराबोर हो जाता है एवं अनायास ही नए एवं मौलिक विचारों से भर जाता है। यह सब सकारात्मक विचारों के द्वारा ही संभव है।

नकारात्मक विचार हमारे अंदर की ऊर्जा को अवशोषित कर हमें कमजोर एवं दुर्बल बनाते हैं। इससे हमारा मन अंधकार से भरकर छटपटाने लगता है। यह अंधकार इतना सघन एवं लिजलिजा होता है कि उससे दुर्गंध फैलने लगती है, मन घुटन से भर जाता है। नकारात्मक विचार गुड़ में मक्खियों के समान ऐसे चिपक जाते हैं कि वहाँ फँसे पड़े रह जाते हैं और चाहते हुए भी निकल नहीं पाते। बड़ा भयावह मंजर होता है। जीवन की सारी गतिविधियाँ सिमट कर रह जाती हैं। इसका एकमात्र समाधान है—सकारात्मक विचार।

सकारात्मक विचार की दो अवस्थाएँ होती हैं। एक को पॉजिटिव कॉग्निटिव स्टेट (सकारात्मक संज्ञानात्मक अवस्था) एवं दूसरे को पॉजिटिव इमोशनल स्टेट (सकारात्मक भावनात्मक अवस्था) कहते हैं। संज्ञानात्मक अवस्था के अंतर्गत—आशा, आशावादिता, आत्मविश्वास, आत्मिक क्षमता, साहस, प्रज्ञा, द्रष्टाभाव तथा लक्ष्य के प्रति अटूट निष्ठा का भाव आते हैं। सकारात्मक भावनात्मक अवस्था में व्यक्ति स्वयं में पवित्र एवं उत्कृष्ट भावनाओं को अनुभव करता है। इसके अंतर्गत प्रसन्नता एवं अनुभूतियाँ आती हैं।

सकारात्मक विचारों से एक नवीन आशा का उद्भव होता है, जिससे वह सदा आगे की ओर अग्रसर होने लगता है। आशा एवं उत्साह जीवन में विकास के कई आयाम खोलते हैं; जबकि निराशा इसको अवरुद्ध कर देती है। इससे अनेक प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगों का उद्भव होता है। इस संदर्भ में नॉर्मन कजिन्स की चॢचत किताब ‘दि बॉयोलॉजी ऑफ होप एंड दि हीलिंग पावर ऑफ द ह्यूमेन स्पीरिट’ में उल्लेख किया गया है कि आशा हमारे स्नायु संस्थान को सुदृढ़ एवं मजबूत बनाती है। इससे इलेक्ट्रोकेमिकल कनेक्शन (विद्युत रसायन संचार संबंध) की प्रक्रिया में बढ़ोत्तरी होती है। इसके बढ़ने से शारीरिक एवं मानसिक प्रतिरक्षा प्रणाली सुचारु रूप से कार्य करती हैं। शारीरिक प्रतिरक्षा प्रणाली के सुदृढ़ होने से सरदी, जुकाम, खाँसी, सिरदरद, पेटदरद एवं अन्य अनेक रोगों से व्यक्ति स्वयं का बचाव करते हैं। साइको इम्यूनिटी के बढ़ने से चिंता, अवसाद, अपराधबोध, निराशा, हताशा, कुंठा, आक्रामकता आदि से मुक्ति मिलती है। इसलिए नॉर्मन कजिन्स कहते हैं कि व्यक्ति को सदा आशा एवं उत्साह से सराबोर रहना चाहिए।

आशावादी दृष्टिकोण से जीवन की अनेक समस्याओं, कठिनाइयों एवं चुनौतियों से उबरकर व्यक्ति आगे बढ़ने का साहस सँजो पाते हैं। इस विषय पर एक न्यूरोसाइन्टिस्ट का कहना है कि आशावादिता हमारे मस्तिष्क के भावनात्मक केंद्र एमाइग्डेला को सक्रिय करती है। इससे यह केंद्र सेरोटोनीन नामक हॉर्मोन स्रावित करता है, जिससे अवसाद दूर होता है। अवसाद नकारात्मक सोच का स्रोत है। अवसाद की कमी आने से सकारात्मक सोच की दिशा में सार्थक बदलाव आता है। इस संदर्भ में मनोविज्ञानी वांदूरा का कहना है कि आशा एवं उत्साह का संबंध मस्तिष्क के फ्रंटल एवं प्रीफ्रंटल लोब से होता है। उत्तम विचार इन केंद्रों को क्रियाशील करते हैं। इससे कैटेकोलामाइन नामक एक हॉर्मोन का स्राव बढ़ जाता है, जो हमारे शरीर में तनाव को दूर करता है। तनाव से अनेक प्रकार की पाप भावना एवं मनोग्रंथियाँ पैदा होती हैं, लेकिन श्रेष्ठ विचारों के द्वारा इन चीजों से मुक्ति पाई जा सकती है।

सकारात्मक विचार के अंतर्गत हमारे अंदर सेल्फ इफीकेसी (आत्मक्षमता) बढ़ती है। इसका सीधा संबंध हमारी उन सुप्त एवं गुप्त क्षमताओं की ओर है, जिनसे हम सर्वथा अपरिचित होते हैं। यह क्षमता हमें यह सुदृढ़ विश्वास प्रदान करती है कि हम अपने वांछित लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं और ऐसा करने से हमें कोई रोक नहीं सकता है। हमारे बढ़ते कदमों को कोई थाम नहीं सकता, हम किसी भी बाधा एवं कठिनाइयों को चीरते हुए आगे अग्रसर हो सकते हैं।

इस क्षमता को मेडक्स ने ‘ऑक्सफोर्ड हैंडबुक ऑफ पॉजिटिव साइकोलॉजी’ में उल्लेख करते हुए कहा है कि इनसान यदि सतत श्रेष्ठतम सोच एवं विचार का अभ्यास कर ले तो उसके अंदर एक ऐसी कुशलता का प्रादुर्भाव हो जाता है, जो उसे किसी भी प्रकार की कठिन से कठिन परिस्थितियों से निकालकर सफलता की सुनिश्चित राह की ओर बढ़ा देती है।

सकारात्मक विचारों से पवित्र भावना का गहरा संबंध है। अच्छे विचार होंगे तो भाव भी अच्छे होंगे। बुरे एवं कुटिल विचारों के अंदर अच्छे भाव पनप नहीं सकते हैं, मुरझा जाते हैं। श्रेष्ठ विचार संवेदनशील भावनाओं को सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करते हैं, ताकि भावनाएँ अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न कर सकें। दूसरी ओर भावनाएँ विचारों को पुष्ट एवं सबल बनाती हैं, कल्पनाओं को नया पंख प्रदान करती हैं, ताकि अनंत आकाश में वे अंतहीन यात्रा कर सकें और वहाँ से कल्याणकारी विचारों को मानव मन में उतार सकें। भावनाओं के बिना विचार शुष्क, दुर्बल एवं निस्तेज हो जाते हैं। कोमल भावनाएँ इनसान के अंदर न केवल अच्छे विचारों को जन्म देती हैं, बल्कि प्रसन्नता व अनगिनत अनुभूतियों से भर देती हैं।

सकारात्मक विचार जीवन को एक नया आधार प्रदान करने के साथ बहुआयामी विकास की राह खोलते हैं। इससे मन प्रकाशित हो उठता है और प्रकाशित मन के अंदर शंका, संदेह, भ्रम आदि की कोई गुंजाइश नहीं होती है। पाँच वर्ष तक सतत सकारात्मक विचार करने से हम मौलिक विचारों एवं नवीनतम योजनाओं के मालिक बन सकते हैं। यह जीवन की सफलता एवं उपलब्धियों का स्रोत है, अत: सदा सकारात्मक विचारों का सहारा लेना चाहिए।

एक सुंदर से महल के पीछे एक हवेली खड़ी थी। हवेली के दरवाजे-खिड़कियाँ सब ओर से बंद थे, कहीं से जरा सी रोशनी अंदर को नहीं जाती थी। एक दिन हवेली महल को ताना देते हुए बोली—‘‘महल महाशय! आपसे ज्यादा अच्छी सामग्री मुझे बनाने में लगी है, पर तुम्हारी तारीफ करने को तो इतने सारे लोग घूमते हैं, मेरे पास कोई नहीं आता। ऐसा भेदभाव क्यों?’’ महल बोला—‘‘हवेली बहन! तुम जरा अपने खिड़की-दरवाजे खोलो तो तुम्हारे यहाँ भी मिलने वालों का ताँता लगे। जब हृदय खुलेगा, तभी तो प्यार मिलेगा।’’ अनुग्रह-अनुदान उन्हें ही मिलते हैं, जो ग्रहणशील होते हैं। जो अपने द्वार बंद करके बैठते हैं, भगवान को उनके दरवाजे पर आकर लौटना पड़ता है।
 

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