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Tuesday 07, July 2026

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परम वंदनीया माताजी का अंतिम संदेश, Param Vandaniya Mata Ji Ka Antim Sandesh | Mata Ji Last Message

परम वंदनीया माताजी का अंतिम संदेश, Param Vandaniya Mata Ji Ka Antim Sandesh | Mata Ji Last Message

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जहाँ साधना होती है वहीं तीर्थ बनते हैं। Jahaan Saadhana Hoti Hai, Vahin Teerth Bante Hain. अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

जहाँ साधना होती है वहीं तीर्थ बनते हैं। Jahaan Saadhana Hoti Hai, Vahin Teerth Bante Hain. अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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 संसार क्या है और हम कैसा जीवन जिये? | Sansaar Kya Hai Aur Hum Kaisa Jeevan Jiyen | Dr Chinmay Pandya

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 07 July 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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ऋण मुक्ति के लिए आप समाज सेवा करिये। अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



 आपने असंख्यों की सहायता  से जीवन का वर्तमान स्वरूप प्राप्त किया है, तो आपका यह फर्ज हो जाता है कि उसी समाज का, जिसके के भिन्न-भिन्न प्रकार से भिन्न-भिन्न प्रकार से आपको सहयोग देकर के पढ़ा-लिखा बनाया है, शिक्षक बनाया है, सभ्य बनाया है,   उद्योग-धन्धों को चला सकने वाला बनाया है, अफसर बनाया है, गृहस्थ बनाया है, उस समाज के ऋण को चुकाने के लिए आपको उसकी सेवा करनी चाहिए। सेवा अगर इनसान न करे तब, तब कर्जदार होकर मरेगा और कर्जदार हो करके मरेगा तब तो इस जीवन में आपने जो भी पा लिया हो, वह बात अलग है लेकिन यह सारे-के-सारे  कर्जे जो आपको इस जीवन में समाज के भिन्न-भिन्न पक्षों के द्वारा मिले हैं, आप को कर्ज चुकाने पड़ेंगे और चैरासी लाख योनियों में  रह-रह करके और घूम-घूम करके, जिन-जिन लोगों के अहसान आपने इनसान की जिन्दगी में जमा कर लिये हैं, सब चुकाने पड़ेंगे   इसलिए ऋण-मुक्ति के हिसाब से, ऋण-मुक्ति के हिसाब से भी आपको आपको समाज की सेवा करनी चाहिए।

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अखण्ड-ज्योति से



चाहें किसी भी धर्म को न मानता परन्तु ‘मनुष्य’ बनकर रहना बहुत अच्छा है। मूढ़ धर्म को मानना अच्छा नहीं है। मूढ़ धर्म का अर्थ है धर्म का सत्य, सुन्दर और शिवरूप नष्ट करके अथवा धर्म में से मनुष्यता निकाल कर उसे मिथ्याचार, पशुता और क्रूरता से जोड़ देना। आजकल वास्तविक धर्म का स्थान इसी मूढ़ धर्म ने ले लिया है और निःसंदेह यह घृणा करने के योग्य है।

ऐसे धर्म में ‘मनुष्यता’ नहीं रहती। जहाँ मनुष्यता है, वहाँ चाहे धर्म का नाम हो न हो, ‘धर्म’ वहाँ अवश्य रहता है। धर्म और मनुष्यता पृथक नहीं किए जा सकते। मनुष्य बनने के लिए धर्म है। यदि मनुष्य न होता तो आज धर्म ही न होता, मनुष्य का इतिहास भी न होता, संस्कृति, सभ्यता और विकास भी न होता और हमारा जीवन, जीवन के रस से शून्य जड़ के समान अथवा ज्ञानहीन पशु के जीवन से महत्वपूर्ण न होता।

यह धर्म ही है, जिसने दया, प्रेम, सेवा, सत्य, अहिंसा और ब्रह्मचर्य का संदेश दिया। वह धर्म ही है किसने शिक्षा, कला-कौशल, सम्पूर्ण ज्ञान और विज्ञान को सुरक्षित रखा। धर्म मनुष्य की आत्मा है, वह देखने में नहीं आता। यदि दीख गया तो वह धर्म नहीं रहता। अन्दर रहकर धर्म जीवन में प्राण भरता है और उसे ज्योतिर्मय करता है।

ऐसे सच्चे, वास्तविक, धर्म से चिढ़ना उससे घृणा करना और उसके सत्य रूप को न जानकर उसे छोड़ देना भयंकर पतन की सूचना है और उससे भी बड़ा पतन है, धर्म में मूढ़ता को जोड़कर उनका स्वाँग बनाना।

अखण्ड ज्योति जुलाई 1947

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