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Magazine - Year 1940 - Version 2

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महाबन्ध मुद्रा

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(लेखक-श्री उमेश चन्द्र जी, श्रीराम तीर्थ योगाश्रम 288 सेन्डहर्स्ट रोड़, बम्बई 4)

जब साधक योग के अन्तरंग साधन में प्रविष्ट होता है, तब उसे अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होने लगते हैं, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि इन चारों को योग के अंतरंग साधन कहते हैं, प्रत्याहार और धारणादि के अभ्यास काल में कुँडलिनी शक्ति जाग्रत करनी पड़ती है, कुण्डलिनी शक्ति के उत्थान के समय में और होने के पश्चात् साधक की बुद्धि अत्यन्त तीव्र हो जाती है, शरीर अत्यन्त तेजोमय बनता है, कुण्डलिनी उत्थान के लिये खेचरी मुद्रा, महामुद्रा, महाबन्ध मुद्रा, महा वेद मुद्रा, विपरीत करणी मुद्रा, ताड़न मुद्रा, परिधान युक्ति, परिचालन मुद्रा और शक्तिचालन मुद्रा आदि उत्कृष्ट अनेक मुद्राओं का अभ्यास करना पड़ता है। आगे एक ऐसी मुद्रा का उल्लेख किया जाता है।

महाबन्ध मुद्रा करने की रीति

प्रथम बायाँ पैर शिवनी (अंडकोष और गुदा का मध्य स्थान) में और दाहिने पैर की एड़ी को बाँये पैर की जंघा के मूल (स्वाधिष्ठान कमल के बाजू) में रखें। बाई हथेली और दाहिनी हथेली को दाहिने पैर के घुटने पर रखें, कमर पीठ रीढ़ और सिर सीधा रखें, छाती को जरा आगे की तरफ झुका कर रखें, आँखें बन्द रखें, शरीर को साधारण कड़क रखें, फिर दोनों नासिका संघर्षण (एक बार श्वांस को फेफड़े में भरना और तुरन्त ही खाली कर देना उसे एक घर्षण कहते हैं) कर के बाई नासिका से पूरक कर (श्वांस भीतर लेना) कुँभक के समय दोनों हाथों से दाहिने पैर के घुटने को पकड़े रहे, जालंधर बंध (दाढ़ी को कंठ कूप में लगाना) रखें, और यथाशक्ति कुँभक करने के पश्चात् दाहिनी नासिका से शनैः-2 रेचक करें, रेचक के समय में उड्डियान बंध (पेट को अंदर पीठ की तरफ ले जाना) करें। कुम्भक समय में उत्कृष्ट भावना करें। जैसे कि :- मैं आज से उन्नति मार्ग पर चढ़ रहा हूँ “मेरे शरीर में जो दुर्बलता, अपवित्रता न्यूनता रूपी दोष हैं वह आज से और इसी क्षण से दूर हो रहा है, मैं इस दुनिया में आज से शुभ कार्यों में ही जुट गया “सर्व दिशा, सर्व देवता, सर्व प्राणी, एवं चराचर वस्तु में से आनन्द ही आनन्द ही लूट रहा हूँ, देख रहा हूँ, सुन रहा हूँ, और उसी में तल्लीन तदाकार हो रहा हूँ” आज से मेरा मन अत्यन्त शुभ स्फटिकमणि के समान परम पवित्र हो रहा है।

जिसे मोक्ष का ही पथिक बनना हो, “तो मेरा पंचप्राण एकत्र हो रहा है” ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र गणपति आदि सर्व देवता, मूलाधार चक्र स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र , विशुद्ध चक्र और ब्रह्म रंध्र में अत्यन्त संतप्त हो रहे हैं “स्वाधिष्ठान चक्र में अनेक काल से कर्माशय कोष को वैघृत (वेष्ठित) कर गाढ़ निद्रा में सोई हुई कुण्डलिनी उत्थान होने की तैयारी कर रही है” मूलाधार चक्र से लेकर ब्रह्म रंध्र तक का रास्ता खुल रहा है “सुषुम्ना नाड़ी अत्यन्त शुद्ध होकर प्राण को उर्ध्व गति को ले जाने की तैयारी कर रही हैं” “सारे शरीर की नाड़ियाँ शुद्ध हो रही हैं” आदि विचार प्रवाह को चालू रखें।

उपरोक्त विधि के अनुसार बायें पैर बाजू से एक बार पूरक, कुँभक, और रेचक होने पर तुरन्त ही पैर को बदली करें। अर्थात् दाहिने पैर को सिवनी में रखे और बाँये पैर को दाहिने पैर की जंघा मूल में (उसकी बाजू में रखें) इस समय दाहिनी नासिका से पूरक करें, यथाशक्ति कुम्भक के पश्चात् बायाँ नासा रंध्र से शनैः-2 रेचक करें। इसी प्रकार एक बार बायीं बाजू और तुरन्त ही दूसरी बार दाहिनी बाजू पाँच-पाँच घर्षण तथा पूरक कुम्भक और रेचक करें, तब एक महाबंध मुद्रा सम्पूर्ण हुई समझना। मुद्रा के समय में उत्कृष्ट भावनायें अवश्य करें और तीन बंध ही नियमित रूप से करें।

पूरक, कुम्भक, रेचक का समय का जिस व्यक्ति को मुद्रा के विषय में अनभिज्ञ हों वे व्यक्ति अनुलोम विलोम प्राणायाम का अभ्यास करें, क्योंकि फेफड़ा को एकदम अधिक प्रमाण में परिश्रम नहीं होना चाहिये, यद्यपि जिसको बिना प्राणायाम सीखे मुद्रा का अभ्यास करना हो तो वह स्त्री पुरुष, मुद्रा के अभ्यास काल में घर्षण खूब जोर से नहीं करे किन्तु सामान्य रूप से करें। एक मात्रा :- एक सेकेंड समझना। भूतकाल में योगाभ्यास नहीं किये हुये स्त्री पुरुष प्रथम थोड़े दिन तक चार मात्रा कुम्भक करे, और आठ मात्रा रेचक करे जैसा जैसा फेफड़े में विकास इन्द्रिय स्वाधीन, प्राण काबू में मन निरोध, बुद्धि स्थिर, अहंकार शमन तथा चित्त शाँत बनता जाय वैसा-2 मात्रा की संख्या को बढ़ाते जायं, सामान्य तथा व्यवहार में कुशलता मिलाने के लिये इच्छा रखने वाले स्त्री पुरुष 16 मात्रा पूरक 64 कुम्भक और 32 मात्रा रेचक करें। मुमुक्षु वर्ग (मोक्ष गामी) होवे तो 64 से अधिक मात्रा कुम्भक कर सकते हैं किंतु कम से कम 16 मात्रा पूरक और 32 मात्रा तक रेचक होना आवश्यक है।

मुद्रा का प्रमाण

5 दिन तक दो बार 5 से 12 दिन 4 बार 12 से 20 दिन तक 5 बार 20 से 30 दिन तक बार 30 दिन के पश्चात् यथाशक्ति 9 से 12 बार नित्य नियम पूर्वक करता रहे, इस मुद्रा को 12 वर्ष के 100 वर्ष तक स्त्री पुरुष कर सकते हैं।

इससे लाभ

इस मुद्रा के अल्प समय के अभ्यास से शरीर में एक प्रकार का आनन्द मालूम होता है, मन की खराब वृत्तियाँ नष्ट होती है, खराब व्यसनों से मुक्त होने के लिये मुद्रा एक अमूल्य साधन हैं, मुमुक्षुओं के शरीर की नाड़ियाँ शुद्ध हो जाती हैं, प्राण, अपान, समान, उदान, और व्यान वायु एकत्र होकर सुशुम्ना नाड़ी में प्रवेश करने लगती है, उदान वायु समान वायु में, समान वायु व्यान वायु में, व्यान वायु अपान वायु में अपान वायु प्राण चक्र में लय होती है, उस समय अनहद आनन्द मालूम होगा, मन में असीम सुख का भरन होता है एवं आत्मानंद की प्राप्ति होती है।

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