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Magazine - Year 1940 - Version 2

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दूसरों से कैसा व्यवहार करें?

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ले. श्री विद्या विनोद व्यास मेरठ

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसे अपना सारा जीवन दूसरों के साथ बिताना पड़ता है। आपस में मिलने- जुलने की, बातचीत करने की, पूछताछ की और देन- लेन की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। दूसरों से कोई ताल्लुक न रख कर अब जिन्दगी भी कायम नहीं रखी जा सकती। मनुष्य ने जब से अपनी जंगली दशा छोड़कर समाज में रहना सीखा है तभी से उसकी आवश्यकताओं और रहन सहन के अंगों में ऐसा परिवर्तन हो गया है कि वह रीछ की तरह एकान्त जीवन नहीं बिता सकता। जब सारा जीवन ही उसे दूसरों के सहयोग के आधार पर बिताना है तो स्वभावतः से यह सीखना चाहिये कि दूसरों से कैसा व्यवहार करे? समाज शास्त्रियों ने इस प्रश्न का विस्तृत विवेचन करके थोड़े से शब्दों में इसका उत्तर दिया है कि दूसरों के साथ वैसा व्यवहार करें जैसा अपने लिए चाहते हैं। हर कोई चाहता है कि हमारे साथ भलमनसाहत का बर्ताव किया जाय। इसके लिए यह जरूरी है दूसरों से भी वैसी ही भलमनसाहत के साथ बरतें।

कई व्यक्तियों से मिलने की पुरानी याद हमें अभी तक बनी हुई है। एक सज्जन का स्वभाव बड़ा रुखा था। उनके घर पर मिलने गये तो पहले तो बहुत देर तक अपने काम में लगे रहे। पीछे रूखे स्वर में पूछा, कहिये कैसे आये? मैं उन्हीं के लाभ का कुछ सन्देश लेकर गया था। इस प्रकार की रुखाई को देखकर मुझे धक्का लगा और जिस लाभ को विस्तार के साथ बताकर उन्हें पूरी जानकारी कराना चाहता था, उसकी चर्चा न करके यों ही आपके दर्शनों के लिए आया था कहकर दो मिनट बाद उठ आया। वे अपने सम्बन्धी होते हैं फिर भी उस दिन की रुखाई मेरे दिल में चुभ गई और फिर इतने वर्षों में शायद एक बार ही किसी अत्यन्त जरूरी कार्यवश कुछ क्षण के लिए मिला हूँ।

मेरे एक दूसरे मित्र के स्वभाव में बड़ी नम्रता है। देखते ही अपने आसन से उठ खड़े होंगे। अभिवादन के पश्चात् कुशल समाचार पूछेंगे और किसी जरूरी काम में लगे होंगे तो उस काम को निपटा कर बातें करने की आज्ञा मांगेंगे। कभी कभी एक एक घन्टे बाद वे बात करने का समय निकाल पाते हैं पर उनके पास बैठकर इतना समय खर्च करते हुए भी किसी को बुरा नहीं लगता। बातचीत में प्रेम और सौजन्यता सनी होती है। उनसे बात करते हुए ऐसा मालूम होता है मानों किसी सगे भाई बन्धु से घुलकर बातें कर रहे हैं। बातचीत करने का ऐसा सुन्दर ढंग उन्हें है कि कुछ ही मिनटों में स्नेह पूर्वक आगन्तुक को आने का अभिप्राय पूछ लेते हैं और उसका उचित उत्तर दे देते हैं। अपना या दूसरे का समय व्यर्थ की बातों में नष्ट करने का या बार बार बैठने का वे आग्रह नहीं करते फिर भी थोड़े ही समय में चाय, पानी, पान, इलाइची से उन्हें जो कुछ सत्कार करना होता है, और जो बातें कहनी सुननी होती है उन्हें करके थोड़े ही समय में विदा दे देते हैं।

एक अन्य अपरिचित सज्जन जिनका नाम पता मुझे बिना डायरी देखें याद नहीं आ सकता भलमनसाहत में अद्भुत दीखे। हम उस वर्ष प्रयाग कुम्भ मेले पर इटावा स्टेशन से साथ हुए थे। रेल के डिब्बे में भीड़ अधिक थी। सब लोग धक्का मुक्का कर रहे थे। इन सज्जन ने डिब्बे में घुसने के बाद पास वाले लोगों को प्रेम पूर्वक समझाना आरम्भ किया। आत्मीयता से भरे उनके वाक्यों ने कुछ ही क्षण में डिब्बे में शान्ति कर दी। उन्होंने सब यात्रियों को बिना माँगे अपनी सेवा दी। जिनका सामान बेढंगे तौर से रखा था, उसे ठीक रखवाया, जिनके बच्चे प्यासे थे उनको पानी पिलाने का खुद इन्तजाम किया और भी जिसको जैसी छोटी मोटी तकलीफ थी, दूर करवाई। प्रयाग पहुँचते पहुँचते वे उस डिब्बे के सारे यात्रियों के नेता बन गये। स्टेशन से वे अलग होना चाहते थे, पर साथियों ने ऐसा नहीं करने दिया। चार रोज तक सब लोग गंगा तट पर ठहरे और भोजन ,, दर्शन, स्नान, मनोरंजन, खरीद करने का सारा प्रोग्राम उन्हीं की अध्यक्षता में हुआ। जब विदा हुए तो सब बारी- बारी उनसे गले मिले थे। उस बात को बीते एक मुद्दत गुजर गई पर मैं उस स्मृति को भूल नहीं सका हूँ।

ऐसे लोग तो रोज बहुत से मिलते हैं जिन्हें अपने मतलब से मतलब। काम की बात की, झंझट काटा। दूसरों के प्रति न तो उन्हें कोई सहानुभूति होती है और न रंच।

व्यवहार की श्रेणी में यों तो बहुत सी बातें आ जाती है पर आज इस लेख में हमारा तात्पर्य केवल बोल चाल, आव भगत से है। जब तक दूसरों के व्यवहार करने की कला को आप नहीं सीख लेते तब तक काम चलाऊ पन से आगे नहीं बढ़ सकते। दूसरे अपने कैसे हो जाते हैं? परदेशी भी भाई से अधिक मददगार कैसे बन जाते हैं और मुसीबत के समय वे मुक्त हस्त से सहायता कैसे देते हैं? हर जगह अपने अनुकूल परिस्थितियाँ कैसे बन जाती हैं? चारों ओर मित्र ही मित्र क्यों दिखाई देते हैं? इस प्रश्नों का उत्तर एक ही शब्द में निहित है- अपनी भलमनसाहत के कारण। कहते हैं कि आप भला तो जग भला। हम खुद भले हैं तो हमारे लिए संसार जरूर भला हो जायेगा।

दूसरी व्यवहारिक बातों की शिक्षा बाहरी लोगों से मिल जाती है। भोजन करने के लिए किस प्रकार बैठना चाहिए, कुल्ला कहाँ करना चाहिए, स्नान करने में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, अभिवादन में क्या शब्द कहने चाहिए, किसे किस स्थान पर बिठाना चाहिए आदि नियम अपने घर वालों, पड़ोसी या मित्रों से पूछकर सीख सकते हैं। किन्तु भलमनसाहत के व्यवहार की न तो कोई शिक्षा प्रणाली है और न शिक्षा स्थान। भिन्न- भिन्न अवसरों पर किससे क्या व्यवहार किया जाय, इसकी शिक्षा कोई किस प्रकार दे सकता है? अगणित प्रकार के अवसर आ सकते हैं और उन अवसरों पर विभिन्न लोगों के साथ विभिन्न प्रकार का व्यवहार करना पड़ सकता है। ऐसी दशा में बहरी शिक्षा कहाँ तक काम देगी? और फिर यदि बनावटी शिष्टाचार या नकली नम्रता सीख भी ली तो झूठी और मुलम्मा होगी। बाहर से भलमनसाहत दिखावे और भीतर से कपट भरा हो तो महात्मा गाँधी के शब्दों में यह नम्रता नहीं लुचपन होगा।

भलमनसाहत सद्व्यवहार की जड़ में बन्धुत्व, आत्मीयता, प्रेम, दूसरों का हित चिन्तन और निस्वार्थ भावनाऐं होनी चाहिए। दूसरों को अपना समझकर उनके हित का ध्यान रखते हुए उदारता पूर्वक जो बर्ताव किया जाता है वही उत्तम व्यवहार है। यदि आप दूसरों को अपना बनाना चाहते हैं, दूसरों से ऐसा व्यवहार कराना चाहते हैं जिसे आप अपने लिए पसन्द करें तो स्मरण रखिये, आपको यह कला सीखनी पड़ेगी कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करें? यह व्यवहार केवल भलमनसाहत का बर्ताव हो सकता है। भले बनिये भलमनसाहत का बर्ताव कीजिए। आप देखेंगे आपके चारों ओर मित्र ही मित्र हैं और सब तरफ से प्रेम एवं सहानुभूति के पुष्पों की वर्षा हो रही है।

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