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Magazine - Year 1940 - Version 2

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क्या मूर्ति पूजा अवैज्ञानिक है?

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(ले. प्रो. पी. डबल्यू. रेले, न्यूयार्क)

गतांक से आगे

पूजा के पश्चात मुफ्त बँटने वाले चरणामृत दूध, दही या अन्य भोज्य पदार्थों में तुलसी के पत्ते डाले जाते हैं। यह कितनी प्रसन्नता की बात है। रोग नाशक वनस्पतियों में तुलसी का स्थान सर्वोपरि है। अल्ट्रा वायलेट नामक विद्युत किरण तुलसी में से सदैव प्रवाहित होती रहती हैं एवं आक्सीजन और नाइट्रोजन गैसों का ऐसा सुन्दर संमिश्रण तुलसी द्वारा वायु को मिलता है, जो स्वास्थ्य के लिए अमृत तुल्य है। उपरोक्त विद्युत किरणें मानवीय शरीर में धँसे हुए विजातीय द्रव्यों को भाप की तरह उड़ा देने की सामर्थ्य रखती है। विद्युत चिकित्सक इन किरणों को यन्त्रों द्वारा आविर्भूत करके रोगियों को रोग मुक्त करने की क्रिया करते हैं। मलेरिया के ज्वरों में उपरोक्त चिकित्सा आश्चर्य जनक असर दिखाती है। यही विद्युत किरणें तुलसी के हरे भरे पौधों में पाई जाती है। आपने देखा होगा कि मच्छड़ अक्सर तुलसी के पत्तों पर नहीं बैठते। क्योंकि वे किरणें उन्हें अपने लिए घातक मालूम होती हैं। तुलसी का स्पर्श करके जो हवा आती है वह भी विचित्र गुण रखने वाली होती है। पैरिस नगर में ऐसे कई चिकित्सा मंदिर खुले हैं जिनमें तुलसी के पौधों के उपयोग से ही समस्त रोगों का इलाज किया जाता है। इन चिकित्सा गृहों में तुलसी के बड़े- बड़े बगीचे लगे हुए हैं, जिसकी वायु सेवन से ही रोगी को बहुत कुछ शान्ति मिल जाती है।

ऐसी उत्तम वस्तु का भोज्य पदार्थों में मिश्रण होना बड़ा ही लाभदायक है। तुलसी के कुछ पत्ते पानी में डालकर आप पीवें तो वह एक गिलास शर्बत के बराबर बल दे सकते हैं। मुफ्त का पंचामृत सचमुच एक पौष्टिक द्रव है, जिसे भारतीय पुजारी बिलकुल मुफ्त बाँटते हैं। हमारे यहाँ इस न्यूयार्क शहर में यदि कोई इस प्रकार की वितरण शाला खोले तो उसे पंचामृत का दाम भी चाय के एक प्याले की बराबर रखना पड़ेगा। मैं इस बात से प्रसन्न हूँ कि बिना वैज्ञानिक यन्त्रों का परीक्षण किये हुए भी पुजारी लोग यह जानते हैं कि उस लाभकारी पौधें के पत्तों को दाँतों से कुतरना या पीसना हानिकारक हैं क्योंकि एक तो इससे मसूड़ों को हानि पहुँचती है दूसरे बड़े टुकड़ों के रूप में पेट के अन्दर जाकर वे जितना लाभ पहुँचा सकते हैं उतना बिलकुल पीसे होने पर नहीं। मेरा खयाल है कि यदि कदाचित हिन्दू मूर्ति पूजक इस बात को जानते न होते तो वे पानी में टुकड़े- टुकड़े करके तुलसी दल डालने की अपेक्षा उसे पीसकर पंचामृत बनाने की क्रिया करते।

चन्दन लगाने का विधान भी ऐसा ही है। यों तो वह सुगन्धित काष्ट कोई विशेष महत्व नहीं रखता। परन्तु जितना इसे बारीक घिसा जाता है उतनी ही इसकी गुप्त शक्ति भीतर से उक्स आती है। चन्दन के चूर्ण और घिसे हुए प्रवाही लेप की परीक्षा करने पर दोनों में एक दूसरे से बहुत ही भिन्न गुण मालूम होते हैं। घिसा हुआ द्रव रूप चन्दन एक औषधि बन जाता है जिसका किसी स्थान पर पोतना शीतलता और शान्ति दिये बिना नहीं रह सकता। शरीर के समस्त अंगों में शिर को सबसे अधिक शीतलता की आवश्यकता होती है। इसलिए उसी स्थान पर इसका लेप करने की व्यवस्था सराहनीय है। इस स्थल पर एक बात कहे बिना मैं नहीं रह सकता कि लेप सूख जाने पर हानि पहुँचाते हैं। चन्दन में तेल की स्वल्प मात्रा पाई जाती है। इससे इस लेप में कुछ तो नमी रहती है फिर भी वह सूखकर कड़ा हो जाता है और हानि कर सकता है। विचारशील पुजारियों का ध्यान इस ओर आकर्षित होने की आवश्यकता है।

पूजा में पुष्पों को प्रमुख स्थान मिलना ही चाहिए था। पुष्प एक दैवी उपहार है। प्रकृति से मनुष्य को जितनी भी......(missing page)

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