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Magazine - Year 1941 - Version 2

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महर्षि दधीचि का त्याग

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(ले-श्री मन्शाराम विद्यार्थी, गवर्नमेंट हाईस्कूल, एटा)

त्वष्टा का पुत्र विश्वरूप देवताओं का पुरोहित और असुरों का भानजा था। वह प्रत्यक्ष रूप से तो देवताओं को भाग (यज्ञ भाग) देता और असुरों की छिपे-छिपे देता था।

तब हरणकशिपु को अगुआ बना कर असुरों ने विश्वरूप की माता-अपनी बहन से कहा-हे बहिन ! यह तुम्हारा पुत्र, त्यष्टासन् विश्वरूप त्रिशिरा जो कि देवताओं का पुरोहित है, देवताओं को तो प्रत्यक्ष रूप से भाग देता है और हमें छिपा कर। इसलिये देवता बढ़ते और हम नष्ट (दुबले) होते जाते हैं। तुम इसे रोको, जिससे यह हमारा साथ देवें।

असुरों की इच्छानुसार विश्वरूप से माता ने कहा-”हे पुत्र ! तू शत्रु पक्ष को बढ़ाता हुआ मातुल पक्ष का क्यों नाश करता है? तुझे यह करना उचित नहीं।” वह विश्वरूप ‘माता का वचन उल्लंघन करने योग्य नहीं’ यह समझ कर और उसे आदरपूर्वक ग्रहण करके हिरणकशिपु के पास गया। इधर ब्रह्म पुत्र वशिष्ठ ने हिरणकशिपु को शाप दिया हुआ था कि चूँकि तूने दूसरे को होता बना लिया अतएव यज्ञ पूर्ण बिना हुए ही तू अपूर्व प्राणी से मारा जायगा। उसके शाप देने से ही हिरणकशिपु वध को प्राप्त हुआ।

तब मातृ पक्ष को बढ़ाने वाला विश्वरूप घोर तप करने में लगा, उसका तप नष्ट करने के लिये इन्द्र ने बहुत सी रूपवती अप्सरा भेजीं। उन्हें देख कर उसका मन चंचल हो गया। तुरन्त ही वह उन अप्सराओं में फंस गया। उसको फंसा हुआ जान कर अप्सराओं ने कहा कि-हम अपने स्थान को जाती हैं।

त्वष्टा पुत्र विश्वरूप ने उनसे कहा-”कहाँ जाओगी ! यहाँ मेरे पास ही बैठो, तुम्हारा कल्याण होगा।” उन्होंने उससे कहा-’हम देवताओं की स्त्रियाँ अप्सराएं हैं, हम सब कामनापूर्ण करने वाले समर्थ इन्द्र को ही वरेंजीं। विश्वरूप ने उनसे कहा-” आज ही इन्द्र सहित सब देवता न रहेंगे, नष्ट हो जायेंगे।” तब उसने मंत्र का जाप किया। इन मंत्रों के प्रभाव से वह बढ़ा और उसके तीन सीर हो गये। उसने एक मुख से तो सब लोकों में अग्निहोवादि करने वाले ब्राह्मण द्वारा विधिपूर्वक आहुत सोम का पान किया, एक (दूसरे से) अन्न और (तीसरे से) देवताओं को भक्षण करना प्रारम्भ किया।

तब सोमपान से पुष्ट शरीर वाले उस विश्वरूप को बढ़ता हुआ देख कर इन्द्र देवताओं सहित चिंतन में पड़ गया। इन्द्र सहित देवता ब्रह्मा के पास पहुँचे। उन्होंने कहा-”विश्वरूप सब यज्ञों में हवन किया सोम पी जाता है, हमारा भाग ही न रहा इसलिये असुर बढ़ रहे हैं और हम क्षीण हो रहे हैं। आप अब हमारा कल्याण कीजिये।”

ब्रह्मा ने उनसे कहा-”भृगु पुत्र दधीचि ऋषि तप कर रहे हैं। जाकर उनसे वर माँगो। ऐसा करो जिससे वह अपना शरीर त्याग दें, तब उसकी हड्डियों से वज्र बनाओ।” तब देवता लोग भगवान दधीचि ऋषि जहाँ तप कर रहे थे, वहाँ पहुँचे। इंद्र सहित देवता उनके पास जाकर बोले।

दधीचि ने उनसे कहा-”आप लोगों का स्वागत है, कहिये क्या करूं? जो आप लोग कहेंगे, उसे मैं पूरा करूंगा।” उन्होंने उनसे कहा-”लोक के कल्याण के लिये आप अपना शरीर परित्याग कर दीजिये।”

तब सुख-दुख को समान समझने वाले महा-योगी दधीचि ने बिना किसी प्रकार का दुःख प्रकट किये आत्मा को समाधिस्त कर शरीर छोड़ दिया। शरीर से जीवन के निकल जाने पर ब्रह्मा ने वे हड्डियाँ ले वज्र बनाया। न टूटने वाले दुर्जेय ब्राह्मण की हड्डी से बने हुए विष्णु आविष्ट उस वज्र से इन्द्र ने विश्वरूप को मारा और उसके सर काट लिये। संसार पर आई हुई विपत्तियों का निवारण करने के लिये साधु पुरुष अपने शरीर का भी परित्याग कर देते हैं।

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