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Magazine - Year 1941 - Version 2

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(ले-पं श्रीकाँत शास्त्री, नारायणपुर)

निविड़तम-निशीथ का दर्शनीय दृश्य ! चन्द्रदेव की चमकती हुई चाँदनी पृथ्वी की निश्छल छाती पर रंगरेलियाँ मचा रही थी। सौरभमय सगर्व पवन का सुमधुर सन-सन समस्त प्राणियों में नव-जीवन भर रहा था। लताओं की कमनीय कलियों की मन्द मुस्कुराहट, मादकता उड़ेलने में व्यस्त थी, पर इस मनोरम बेला में भी कृष्णभक्त गोप बालाओं को क्षणिक सुख भी प्रदान करने में सर्वथा असमर्थ थी। उन पर सुधाँशु की सुस्निग्ध किरणें भी विष-वर्षण कर रही थीं ज्योत्स्नापूर्ण विभावरी भी अन्धकाराच्छन्न थी। कारण? कारण उनका सर्वस्व श्री कृष्ण आज इस समय तक गायब थे। उनका हृदय, आशा, निराशा, भय, आशंका, क्षोभ और ग्लानि का केन्द्र बन रहा था। इतने में पदध्वनि डूबने की आधायिका हुई। उनकी आँखें खुलीं तो वह तृप्त हो गईं। गद्-गद् हो गईं। ‘देखत बने न देखते’ की उदाहृति बन गईं। उफ ये तो आनंदकंद श्री कृष्णचंद अपराधी सी मुद्रा बनाये खड़े हैं। देर हो गई प्रिये ! देर हो गई प्रिये क्षमा करो।’ भगवन् ब्रज-वैभव नन्द-नन्दन ने कहा। गोप-कन्याओं के हृदय बाँसों उछल पड़े। मान की सोची हुई सारी बातें काफूर हो गई, ब्रज-विहारी ने फिर गम्भीर स्वर में कहना प्रारम्भ कियाः क्या इस वियोग ने प्रेम-परीक्षा में हमें नीचे गिराया है? नहीं, वियोग की बिसात ही क्या है, जो प्रेम का उन्मूलन कर सके। क्या आकाश और अवनि का अन्यतम अन्तर भी कमल और कमल-प्रसादक सूर्य के प्रेम को निर्मूल करता है? गोपिकाऐं वसंत की कोकिलाओं के समान कुहुक उठीं-तो फिर आज यह अत्यधिक प्रतीक्षा का अवसर आया ही कैसे? वासुदेव ने कहा-हृदयेश्वरी! आज इसका कारण गुरुदेव दुर्वासा का सौभाग्य गमन है।

वे यमुना पार माँडीर बन में ठहरे हैं। उनकी सेवा-सुश्रूषा ने इतना समय ले लिया, गोप-वालाओं की आशंका ने विस्मय का स्वरूप धारण किया। वे सार्श्चय बोल उठीं। गुरु? गुरु? आपके भी गुरु? भगवान् कृष्ण का चेहरा कुछ और गम्भीर हो उठा और कहना प्रारम्भ किया। इसमें आर्श्चय की बात क्या है प्रिये ! गुरु के बिना किसकी जीवन-यात्रा सफल हुई है सुभगे? स्मरण रक्खो, जिसने सच्चा गुरु खोज कर अपनी व्यवहारिकता को गुरु के प्रति ईश्वर की तरह लगा दी है, वह आज ही नहीं तो कल उसे कौन अमुक्त कने का दुस्साहस करेगा? गोप-सुताओं की जिज्ञासा ने अब दिशा का स्वरूप ग्रहण किया। वह आकुलचित हो कर बोल उठीं-तो हम उन्हें देखना चाहती हैं। क्या इस दुस्समय में भी उनका दर्शन कर कृतकृत्व हो सकती हैं? श्री कृष्ण ने अपनी सफलता की क्षीण आशा देख तत्परता के साथ कहा-हाँ ! हाँ ! अभी जा सकती हो सुन्दरी!

तो यमुना पार करने का सुगम-साधन? गोपियों ने उत्कंठा पूर्ण स्वर में कहा। ब्रज नन्दन ने गम्भीर मुद्रा में उत्तर दिया-जाओ यमुना से यह कह कर मार्ग माँगना। ‘यमुने ! यदि कृष्ण बाल-ब्रह्मचारी हैं, तो हमारी राह दे दे। वह दे देगी। जाने की पूर्ण तैयारी की गई। उपहार के लिये तरह-तरह की चीजें तैयार हुईं और वे चल खड़ी हुई। यमुना ने मार्ग दे दिया। दिशा ने रास्ते के शूल, फूल बना दिये। दुर्वासा का निवास सामने आया। गोप-रमणियों ने दुर्वासा को दंडवत किया और आने की सारी कथा कही। बाद अपना भोजन करने को सभी बाध्य करने लगीं। दुर्बासा ने मन्द-स्वर में कहा-सौभाग्यनि ! मैं परमहंस हूँ, अतः अपने हाथ से खा नहीं सकता, मुँह फाड़ता हूँ, जिससे जो हो देती जाओ। दुर्वासा ने अपना मुख कन्दरा सा फाड़ दिया। सभी की थालियाँ साफ होने लगीं और साफ हो कर रहीं। फिर भी दुर्वासा का मुख फटा था। बाद आचमन करा कर चलने की आज्ञा माँगी। दुर्वासा ने क्षीण स्वर में कहा-जा सकती हैं ! ऋषि ने मूक-सखियों की मनोभावना समझी और फिर कहना प्रारम्भ किया-यमुना पार की समस्या हल करना चाहती हो न? वह तो हो जावेगी, जाकर यमुना से कहना-यदि दुर्वासा की जिह्वा ने आज तक दूर्वारस के सिवा अन्य रसों का स्वाद नहीं लिया हो तो हमें मार्ग दे दे। वह राह दे देगी। गोपियाँ उल्टे पाँव लौटीं, फिर मार्ग मिल गया।

घर आने पर श्री कृष्ण से त्यौरी पूर्ण भाषा में कहा-देख तो आईं जैसे झूठे आप, वैसे वे ! क्या आप ब्रह्मचारी हैं? और वे दूर्वारस पाकी? आँखों देखी बातों पर भी हरताल लगाना? श्री कृष्ण ने उनके अभाव को समझा और सुस्मित शब्दों में कहना आरम्भ किया? ‘प्रिये, जिस प्रकार मैं निर्मम, साभ्यदृष्टा, रागद्वेषातीत और निर्गुण होते हुए भी भक्तों की कल्याणकांक्षा करते हुए अपने आचरण को बदलता हूँ, वही गति महात्माओं की है। विद्वान वही है, जो संयमशील हो और सभी कुछ करके भी उसमें क्षणिक आसक्त नहीं होता। उसके सभी कर्म, ज्ञानाग्नि भस्म हो जाते हैं। संयम-प्रवीण कर्म योगी दैनिक कृत्य करता हुआ भी मुक्त ही है। अनासक्त चित्त से किया हुआ दुर्ष्कम भी पाप के प्रतिकूल है। यदि मैं सहस्त्रों गोपिकाओं से रमण करता हूँ और मेरी आत्मा उस आनन्द से वंचित रहती है तो मैं ब्रह्मचारी ही कहा जाऊंगा। इसी तरह मिष्ठान्नों का आस्वादन कर दुर्वासा दूर्वा-रस पाकी ही कहे जायेंगे।

गोपबालाएं श्री कृष्ण के पतिन-पावन चरणों पर मूर्छित हो गिर गई। उन्होंने कर्म-कलाप के अन्तर्भेंदों को जान लिया था, जो मानव-जीवन का चरम श्रेय है और जिसका ज्ञान चर्म-चक्षुओं को फोड़ कर तीसरे नेत्र विवेक को ज्योतिर्मय कर देता है। कैसी सौभाग्यशालिनी थीं वह ! क्या हमें भी वह............।

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