हँसना, सौ रोगों की दवा
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(इसी मास अखण्ड ज्योति कार्यालय से प्रकाशित ‘स्वस्थ और सुन्दर बनने की विद्या’ के कुछ पृष्ठ)
एक अनुभवी विद्वान् का कथन है—”मनुष्यों के शारीरिक धर्मों के आधार पर हम यह घोषणा कर सकते हैं, कि हँसो और मोटे बनो”। देखा जाता है, कि मोटे आदमी हँसोड़ होते हैं। लोग समझते हैं कि कदाचित यह मोटे होने के कारण हँसते हैं, परन्तु वास्तविक बात इससे उलटी होती है। यथार्थ में वे हँसने की आदत के कारण मोटे होते है। यह अच्छी तरह अनुभव कर लिया गया है कि खिलखिला कर हँसने से अच्छी भूख लगती है, पाचन शक्ति बढ़ती है और रक्त का संचार ठीक गति से होता है। क्षय जैसे भयंकर रोगों में हँसना अमृत तुल्य गुणकारी सिद्ध हुआ है। अमेरिका की एक क्षय ग्रस्त तरुणी श्रीमती बाटसेन, चारपाई पर पड़ी हुई अपने मृत्यु के दिन गिन रही थी, क्योंकि बहुमूल्य औषधियों का उस पर कुछ भी प्रभाव न होता था। इस तरुणी के एक परिचित मनोवैज्ञानिक डॉक्टर ने उसे खूब खिलखिला कर हँसने की सलाह दी। उसने इसे अंगीकार कर लिया और हँसने की अमोघ औषधि द्वारा वह मृत्यु के पंजे में से छूट कर बिलकुल स्वस्थ हो गई। एक बार एक व्यक्ति तीव्र ज्वर से पीड़ित पड़ा हुआ था। डॉक्टर ने उस पीने की दवा दी। बीमार का एक पालतू बन्दर था। मालिक को दवा पीते देखकर बन्दर को भी उसकी नकल करने की सूझी। उसने भी मौका पाकर दवा को पी लिया। दवा कड़वी थी, पीते ही बन्दर बुरा मुँह बनाने लगा और इसमें मालिक का दोष समझ कर उसकी तरफ घुड़ काने लगा। बन्दर की तरह-तरह की भाव-भंगिमाएं देख कर बीमार को बड़ी हँसी आई, वह हँसते हँसते लोट पोट हो गया और इसी तरह लगातार आध घण्टे तक हँसता रहा। डॉक्टर ने दो घण्टे बाद आकर देखा, तो बीमार का खतरनाक ज्वर बिलकुल उतर गया था। वह उसी क्षण से बिलकुल अच्छा हो गया।
खिलखिला कर हंसने से मुँह, गरदन, छाती और उदर के बहुत उपयोगी स्नायुओं को आवश्यकीय कसरत करनी पड़ती है, जिससे वे प्रफुल्लित और दृढ़ बनते हैं। इसी तरह माँस-पेशियों, ज्ञान तन्तुओं और दूसरी आवश्यक नाड़ियों को हँसने से बहुत दृढ़ता प्राप्त होती है। हंसने का मुँह, गाल और जबड़े पर बड़ा अच्छा असर पड़ता है। मुँह की माँस-पेशियों और नसों का यह सब से अच्छा व्यायाम है। जिन्हें हंसने की आदत होती हैं, उनके गाल सुन्दर, गोल और चमकीले रहते हैं। फेफड़ों के छोटे छोटे भागों में अक्सर पुरानी हवा भरी रहती है, आराम की साँस लेने से बहुत थोड़ी वायु फेफड़ों में जाती है और प्रमुख भाग से ही हवा का आदान प्रदान होता है शेष भाग यों ही सुस्त और निकम्मा पड़ा रहता है, जिससे फेफड़े सम्बन्धी कई रोग होने की आशंका रहती है। किन्तु जिस समय मनुष्य खिलखिला कर हँसता है, उस समय फेफड़ों में भरी हुई पहिले की हवा पूरी तरह बाहर निकल जाती है और उसके स्थान पर नई हवा पहुँचती है, इस क्रिया से फेफड़े में पलते रहने वाले रोग बड़ी आसानी से भाग जाते हैं और निर्बल भाग शुद्ध एवं सशक्त बन जाते हैं। मुँह की रसवाहिनी गिलटियाँ हंसने से चैतन्य होकर पूरी मात्रा में लार बहाने लगती है। पाठक यह जानते ही होंगे कि भोजन में पूरी मात्रा में लार मिल जाने पर उस का पचना कितना आसान होता है।
स्वास्थ्य के विशेषज्ञ एक डॉक्टर का कथन है, कि—जो आदमी स्वस्थ रहना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि हँसने की आदत डालें। यह पेट की सब से बढ़िया कसरत है, जो पाचन क्रिया को सुधार कर आमाशय और आँतों की सफाई करती है। पुराने कब्ज के मरीज इस व्यायाम से अच्छे होते देखे गये हैं। शरीर को निरोग रखने और ज्ञान-तन्तुओं का पोषण करने के लिये मेद की आवश्यक मात्रा देह में रहनी चाहिए। उसके घट जाने से ज्ञान-तन्तुओं का पोषण रुक जाता है और बढ़ जाने से अंग अधिक मोटे होकर भार रूप बन जाते हैं।
हँसने से मेद की वृद्धि होती है और यदि बढ़ा हुआ है तो घट जाता है। हँसने के जोश अथवा आवेश की छोटी-मोटी आँधी से तुलना की जा सकती है। आँधी से जमे हुए बादल बिखर जाते हैं, वैसे ही हंसी के आवेश से तन्तुओं में एक प्रकार की विशेष हल चल मच जाती हैं। उससे मस्तिष्क पर जमे हुए चिन्ता के दुखदायी बादल जो बहुधा मस्तिष्क को अन्धकारमय कर देते हैं, बिखर जाते हैं।
हँसने की कला सीखने में कुछ विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता। साइकिल पर चढ़ने या तैरने में जितना अभ्यास करना पड़ता है, हँसने की आदत डालने में उससे भी कम परिश्रम करना पड़ता है। जब अकेले में बैठो तो आपबीती या दूसरे पर बीती मनोरंजक घटनाओं का स्मरण करो और अपने आप हँस पड़ो। हँसी न आवे तो भी हँस पड़ो। दर्पण के सामने बैठ कर हँसो। हँसने में कितने सुन्दर लगते हो यह देख देखकर खूब प्रसन्नता की हँसी हँसो। दूसरों से बात करो तो प्रसन्नतापूर्वक जरा हँसकर मुँह खोलो। इस बात को बार-बार याद कर लो कि “जब किसी से बात करूंगा मुसकराते हुए करूंगा”। इसका प्रयोग अपने घर से आरम्भ होना चाहिए। घर के छोटे बच्चों को इकट्ठा करो और उनसे बातचीत करो। अपने छोटे से ज्ञान के आधार पर वे तुतलाती हुई भाषा में जो उत्तर देंगे उसमें हंसने का काफी मसाला मिलेगा। विवाहित हो तो पत्नी के साथ हँस-हँस कर प्रेमालाप कीजिए। कहानियाँ कहने का अभ्यास कीजिए। छोटे बच्चे ही नहीं घर के बड़े बूढ़े भी सुनने के लिए इकट्ठे हो जायेंगे। अपनी हँसी में प्रेम का पुट देते रहिए। निस्वार्थ और सरल हृदय से रहिए। दिन में कम से कम एक बार खिलखिला कर हंसिए। आप के मन पर लदे हुए कुविचारों का बोझ उतर जाएगा और मन हलका हो जाएगा। इसका जो जादू जैसा प्रभाव स्वास्थ्य और सौंदर्य पर पड़ेगा उसका सुखदायक फल, आप एक दो सप्ताह बाद देखने लगेंगे।

