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Magazine - Year 1941 - Version 2

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ईश्वर से माँगिए

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कई लोग समझते हैं कि ईश्वर केवल निस्वार्थ भक्ति करने योग्य तत्व है। अत्यन्त उच्च और मोक्ष प्राप्त करने की दृष्टि से यह ठीक भी है, क्योंकि किसी से कुछ न माँगना यहाँ तक कि परमात्मा से भी कुछ न माँगना परम सन्तोष प्राप्त करने का अभ्यास करना है। ऐसे अभ्यास से जीव संसार से विरक्त होता जाता है और अपने अन्दर ही आत्म सन्तोष प्राप्त करता हुआ परम तत्व में लीन हो जाता है। यह हुई ऊँची कक्षा; परन्तु ऊँची कक्षा का अभ्यास ऊँची दशा का है। जब हम आत्मज्ञान की भूमिका में आगे बढ़ चलें, तो अवश्य ही अयाचक बन जाना चाहिए। साधारण या आरंभिक स्थिति में ऐसा नहीं हो सकता। लोक व्यवहार में माँगना और देना दोनों ही एक सी वस्तुएं हैं। हमारे दरवाजे पर जब कोई अतिथि या भिक्षुक आता है, तो उसे देते हैं, देते समय किसी प्रकार का भय संकोच नहीं होता और न लज्जा ही आती है, क्योंकि दूसरे लोगों के पास जिन वस्तुओं का अभाव है, उन्हें वह वस्तु देने में कुछ भी बुराई प्रतीत नहीं होती, बल्कि अपना कर्तव्य पालन करने के कारण प्रसन्नता होती; किन्तु किसी से माँगते समय ऐसी स्थिति नहीं रहती। जब हम स्वयं भिक्षुक की तरह किसी से कुछ माँगने जाते हैं, तो बड़ी लज्जा आती है, हाथ पसारते समय बड़ा संकोच होता है और याचना के साथ-साथ अपने अन्दर परास्त होने, दीन होने के विचार उदय होते हैं। तुम जानते हो कि देने और लेने में इस प्रकार का अन्तर होने का कारण क्या है? कारण यह है, देते समय किसी हद तक हम अपने को देने में समर्थ समझते हैं और विश्वास करते हैं कि हमारे अन्दर देने की योग्यता है। इससे आत्मोदय होता है और प्रसन्नता बढ़ती है, किन्तु यदि कोई याचक माँगने आवे और तुम्हारी देने की सामर्थ्य न हो, तो भी भय, लज्जा और दीनता के भाव तुम्हारे मन में उठेंगे और अपनी अशक्ति पर दुःख प्रकट करोगे। तात्पर्य यह है कि देने और लेने की क्रियाओं में जो भलाई, बुराई है, वह सामर्थ्य और असमर्थता के कारण हैं।

माँगने में लज्जा इसलिए आती है कि हमारा गुप्त मन जानता है कि जिसके आगे हम हाथ फैलावेंगे, उसमें उतनी सामर्थ्य न होगी। यदि वस्तु उसके पास है तो भी अनुदारता या लोभ वृत्ति के कारण वह अपाहिज बन रहा होगा और शायद हमें न दे या कम दे। दूसरे उसके पास जरूरत भर ही वस्तुएं हुईं, तो देने में उसे कष्ट होगा। लेने और माँगने में लज्जा, संकोच, दीनता और अधर्म मानने का असली हेतु यही है। जहाँ देने योग्य वस्तु की प्रचुरता होती है और उदारता का पता लगता है, वहाँ से लेने में कुछ भी संकोच नहीं है। लेने से अपनी जरूरतें पूरी होती हैं। इससे सुख मिलता है, देने की अपेक्षा लेना सच में प्रिय होता है, परन्तु लेने में जो लज्जा आती है, वह और किसी कारण नहीं, केवल देने वाले की असमर्थता के कारण ही होती है। गर्मी के दिनों में दूसरों के लगाये हुए बगीचों में आराम करते हैं, दान से चलने वाली प्याऊ पर पानी पीते हैं। धर्मशालाओं में ठहरते हैं, निःशुल्क वाचनालय में अखबार, पुस्तकें पढ़ते हैं। इसमें किसी को लज्जा या संकोच नहीं होता क्योंकि हम जानते हैं कि इससे देने वाले को कोई कष्ट नहीं होगा और इन चीजों को देने में समर्थ है।

हमें तरह-2 की जरूरतें रोज रहती हैं। कई झूठी और तृष्णा के कारण होती हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ईश्वर से याचना करनी चाहिये, क्योंकि वह देने में समर्थ है, उसके पास सब कुछ है और तुम्हें थोड़ा सा दे देने पर उसके भंडार में कुछ भी कमी नहीं आती। असमर्थता और अनुदारता भी ईश्वर में नहीं है। फिर ईश्वर से माँगने में क्या हर्ज है? बच्चे को जिस चीज की जरूरत होती है, उसे बाहर के व्यक्तियों से न माँग कर केवल माता से ही माँगता है, क्योंकि वह जानता है कि माता दे देगी। ईश्वर हर घड़ी हमें देता है। जरा ध्यानपूर्वक देखें और शान्त चित्त से विचार करें, तो हमारे पास जितनी वस्तुएं, धन-सम्पदा आदि हैं, वह ईश्वर का ही दिया हुआ मालूम पड़ेगा। क्योंकि अपने प्रयत्न से तो हम कोट का एक बटन भी नहीं बना सकते, जलाने के लिए एक वृक्ष भी नहीं उत्पन्न कर सकते, फिर हवा, पानी, भोजन एवं आनन्द की असीम वस्तुओं का तो कहना ही क्या? एक पैसा देने वाले को दानी समझा जाता है, तब जो बिना माँगे ऐसी—ऐसी वस्तुएं प्रचुर परिमाण में देता है, जिसका एक-एक कण करोड़ों रुपये की कीमत का हो सकता है, उसे तो बहुत ही बड़ा दानी मानना चाहिए। ऐसे दानी के दरबार में हम क्यों खाली हाथ खड़े रहें, जब सभी लोग अपनी इच्छानुसार माल खजाना उसके भण्डार में से बिना रोक-टोक ले रहे हैं, तो हम ही क्यों अभावों से दुःखी रहें?

वेदों का आधा भाग ऐसे मन्त्रों से भरा हुआ है, जिससे बल, बुद्धि, विद्या, धन, सन्तान, सुख, सौभाग्य आदि के लिए ईश्वर से याचना की गई है। प्रार्थना या उपासना में सब लोग अपनी इच्छानुसार कुछ न कुछ माँगते हैं। फिर क्या कारण है कि हम अपनी जरूरत की वस्तुओं को उससे न माँगें?

यहाँ एक सन्देह उत्पन्न होता है कि क्या ईश्वर यह वस्तुएं दे सकता है या देगा? शास्त्रों के पन्ने—पन्ने पर इसका उत्तर लिखा हुआ है। रावण, कुंभकरण, हिरण्यकश्यप, भस्मासुर आदि असुरों ने भी जब माँगा था, तो उन्हें मिला था। पार्वती ने तो आग्रहपूर्वक शंकर जैसे योगी और काम के शत्रु को पति रूप में प्राप्त कर लिया था। तपस्या से प्राचीन काल में कितने ही लोगों ने अनेक प्रकार के वरदान प्राप्त किये थे और आज भी प्राप्त करते देखे जाते हैं। ईश्वर को विशेष रूप से प्रसन्न करके विशेष प्रकार की वस्तुएं मिलती हैं। तपस्या ईश्वर की सब से प्रिय वस्तु है, जो इस भेंट से उन्हें प्रसन्न कर लेता है, उसे वे खजाने की ताली दे देते हैं कि इसमें से तुम्हें जिस वस्तु की जितनी आवश्यकता हो, ले जाओ।

भौतिक शास्त्र के अन्वेषक, जड़-विज्ञान शास्त्र के उपासक, वैज्ञानिक कहते हैं कि ईश्वर कोई वस्तु नहीं है, प्रकृति का सब काम अपने आप होता है। प्रकृति किसी के साथ में कोई रियायतें नहीं कर सकती, वह नियमबद्ध है, नियम तोड़कर वह कोई काम नहीं करती। लेकिन वे दूसरे ही क्षण मनोविज्ञान का विवेचन करते हुए बताते हैं कि जिस वस्तु की हम बार-बार याचना करते हैं—विशेष इच्छा करते हैं, उसके लिए मस्तिष्क में एक प्रकार का घर्षण होता है और एक चुम्बक शक्ति ऐसी पैदा होती है, जो इच्छित पदार्थ के सूक्ष्म परमाणुओं को अनन्त आकाश में से अपनी ओर आकर्षित करती है। यदि हृदय में उत्कट इच्छा है और मन में अन्य प्रकार के विचार नहीं आते एवं एकाग्रतापूर्वक उसी सम्बन्ध की विचार लहरें उठती रहती हैं तो यह आकर्षण इतना प्रबल हो जाता है कि वह पदार्थ खिंचते हुए बहुत तीव्र गति से निकट आ जाते हैं और सफलता मिल जाती है।

हमें वैज्ञानिकों से भी लड़ाई मोल नहीं लेनी है, क्योंकि कि वे हमारी सब बातों पर पूर्णतः सहमत हैं। अन्तर केवल शब्दों का है। ‘प्रार्थना के लिए यदि वे तीव्र इच्छा शब्द का उपयोग करते हैं और ‘तपस्या’ को वे ‘एकाग्रता’ कहते हैं, तो यह केवल शब्दों का ही तो अन्तर हुआ। बात एक ही है-अर्थ एक ही है। हम प्रार्थना करें—सच्चे हृदय से चाहें, तपस्या करें—एकाग्रतापूर्वक प्रयत्न करें, तो हमारे समस्त अभाव मिट सकते हैं। हमारी सच्ची कामनाएं पूरी हो सकती हैं।

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