संध्योपासना की विधि
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(ले0 पं0 भोजराज शुक्ल ऐतमादपुर, आगरा)
शारीरिक, सामाजिक तथा आत्मिक उन्नति के लिये, सुख और शान्ति की प्राप्ति के लिये, धर्मात्मा बनाने के लिये, हमको संसार में जिन साधनों की आवश्यकता है, उनमें सब से पहिला कर्तव्य हमारे लिये सन्ध्या है। बिना सन्ध्या के अर्थात् परमात्मा का आश्रय लिये बिना जो दशा हमारी आजकल हो रही है, वह छिपी नहीं है-एक दुःख से छुटकारा नहीं पाते कि दूसरा शिर पर आ विराजता है। धनवान के सन्तान नहीं, संतति वाले के धन का अभाव, जिसके धन, सन्तान दोनों हैं, वह नीरोग नहीं, जो स्वस्थ है उसके धन नहीं, उसको मुकदमे बाजी से अवकाश नहीं मिलता, रात दिन चिन्तित रहता है।
सचमुच दुनिया काँय-काँय, भाँय-भाँय में फँसी हुई है। किसी महात्मा के पास भेड़ पली हुई थी, एक दिन भेड़ को प्यास लगी, उसने महात्मा से कहा कि “मुझे बड़े ज़ोर की प्यास लगी है, कहाँ पानी पीऊ”। महात्मा ने कहा कि पहाड़ी पर झरना बह रहा है, वहाँ जाकर पानी पी-आ भेड़ पानी पीने गई, पहाड़ों पर झरने के बहने से पानी शब्द चुल-चुल हो रहा था, भेड़ चुल-चुल शब्द से डर कर बिना पानी पिये महात्मा के पास लौट आई महात्मा ने भेड़ से पूछा कि पानी पी आई? भेड़ ने उत्तर दिया कि वहाँ कोई चुल चुल बोल रहा था, उसके भय से मैं पानी न पी सकी। महात्मा बोले “कमबख्त! तुझे पानी पीना हो तो पी-आ, यह चुल चुल कभी बन्द होगी” बस दुनिया की चुल चुल कभी बन्द थोड़े ही होने को है। मनुष्य को सब कामों के लिये फुर्सत है, परन्तु सन्ध्या भजन के लिये अवकाश नहीं मिलता, कारण यह कि लोगों को श्रद्धा, विश्वास नहीं है, परंतु याद रखिये कि जो मनुष्य धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश करता है। धर्म उसका विनाश अवश्य ही कर देता है। अतएव मनुष्य को धर्मात्मा बनना अनिवार्य है, इसके लिये प्रथम सीढ़ी सन्ध्योपासना है, बिना परमेश्वर की उपासना के शाँति सुख नहीं मिल सकता।
सन्ध्या का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है, समझिये और कीजिये।
अर्थ।
‘सन्ध्यायति सन्ध्यायते वा परब्रह्म यस्याँ सा सन्ध्या।
भली-भाँति ध्यान करते हैं वा ध्यान किया जाए परमेश्वर का जिसमें वह सन्ध्या। रात दिन के संयोग समय दोनों सन्ध्या यों में सब मनुष्यों को परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना और उपासना अवश्य करनी चाहिये, क्योंकि प्रातःकाल की सन्ध्या से रात्रि भर के और सायंकाल की सन्ध्या से दिन भर के मलों (दुर्वासनाओं) तथा पापों का नाश हो जाता है दिन- रात्रि की सन्धि में गृहस्थी का कोई कार्य नहीं करना चाहिये। यदि भूल से कोई कार्य किया जाएगा तो उससे अनर्थ होगा जिसे आयुर्वेद कहता है, यथा सन्ध्या समय भोजन करने में रोगोत्पत्ति, मैथुन करने से कुरूप तथा राक्षसी प्रकृति की सन्तान का जन्म लेना, निद्रा से सुस्ती तथा आलस्य, पठन-पाठन से बुद्धि नाश इत्यादि। यह समय तो केवल परमात्मा के भजन, उपासना ही के लिये नियत किया गया है। इसी नियम को पालते हुए इस्लामी भाई मस्जिदों में, ईसाई गिरजाघरों में, आर्य—समाजी आर्य मन्दिरों में, सनातन धर्मी देवालयों में जाते हैं। प्रायः देखा गया है कि सन्ध्या समय मनुष्य की चित्त-वृत्ति सतोगुणी हो ही जाती है, साँसारिक कार्यों से चित्त को उपराम हो जाता है। एकान्त स्थान, जलाशय व बागों में जाने को चित्त चलायमान होता है।
स्थान।
सन्ध्या के लिये स्थान, निर्जन जलाशय सरिता-सरोवर का तट होना चाहिये। यदि यह स्थान प्राप्त न हो तो अपने मकान ही में कोई स्वच्छ कमरा या कोठरी नियत कर लेनी चाहिये।
आसन।
शुद्ध पवित्र समतल भूमि में कुशासन, मृगचर्म या वस्त्र बिछाना चाहिये, जिससे (कि प्राणायाम करते समय जो शारीरिक विद्युत-शक्ति वेग से भ्रमण करने लगती है, उससे पृथ्वी की विद्युत शक्ति मिलने को दौड़ती है, इससे शरीरान्त हो जाने का भय रहता है) पृथ्वी की विद्युत-शक्ति शरीर की विद्युत शक्ति से मिलने नहीं पाती। आसन एक दूसरी को पृथक करता है कुशासन में एक गुण यह भी है कि उस पर बैठने वाले को अर्श (बवासीर) नहीं होने पाती।
सन्ध्या के समय मुख।
सन्ध्या करते समय प्रातः काल पूर्व दिशा में, सायंकाल पश्चिम-दिशा में अपना मुख रखना चाहिये, क्योंकि दोनों समय यानी सूर्योदय व सूर्यास्त में सूर्य की किरणें रक्त वर्ण होती हैं, जो कि फेफड़ों के अनेक रोगों को दूर करती हैं।
सन्ध्या में विघ्न।
मैं 9 विघ्न, ‘अखण्ड-ज्योति’ अप्रैल मास के शीर्षक लेख “जप-योग“ में दिखला चुका हूँ, उनके पुनः लिखने की आवश्यकता नहीं समझता हूँ, बस सबसे बढ़ा विघ्न मन की चंचलता है आप विश्वास रखिये धीरे-धीरे अभ्यास करने से मन वशीभूत हो ही जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण महाराज का वचन है:-
असंशय महावाहो, मनो दुर्निग्रह चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय, वैराग्येण च गृह्यते॥
हे अर्जुन! निस्सन्देह मन चंचल है, इसका दबाना कठिन है, किन्तु वैराग्य तथा अभ्यास द्वारा यह वश में किया जा सकता है। साधन की संपत्ति को भी वशिष्ठ जी ने कहा है—
हस्तं हस्तेन संपीडय, दन्तैर्दन्तान्विचूर्ण्य च।
अंगान्यंगैः समाक्रम्य, जयेदादौ स्वकं मनः॥
हाथ को हाथ से मींज कर, दाँतों को दाँतों से विचूर्ण कर। तथा अंगों से अंगों को दबा कर, सबसे पहले साधक अपने मन को जीते। घबड़ाने की कोई बात नहीं—
करत करत अभ्यास के, जड़-मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान॥
जो करना चाहोगे , वही हो जाएगा, जो बनना चाहोगे, वही बन जाओगे। दृढ़ प्रतिज्ञ होकर दोनों काल ठीक समय पर सन्ध्या अवश्य करो भगवान तुमको आत्मिक बल अवश्य देंगे, जिससे तुमको सुख शान्ति प्राप्त होगी।

