ईसप की नीतिशिक्षा
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(1)
एक चींटी नदी के किनारे पानी पीने गई। वह अचानक लहरों के थपेड़े में पड़कर पानी में बहने लगी। एक कबूतर किनारे पर बैठा हुआ यह देख रहा था। उसने वृक्ष से एक पत्ता तोड़ कर डाल दिया। चींटी उस पर चढ़कर बहते-बहते किसी प्रकार किनारे पर जा लगी।
एक बार उस कबूतर को पकड़ने के लिए शिकारी ने जाल फैलाया। चींटी ने यह देखा और अपने ऊपर उपकार करने वाले के प्राण बचाने दौड़ी। कबूतर जाल में फंसने ही वाला था कि चींटी ने शिकारी के पैर में बड़े जोर से काट लिया। जिससे वह पैर पीटने लगा। आहट पाकर कबूतर उड़ गया और उसके प्राण बच गये।
उपकार का बदला अवश्य मिलता है।
( 2 )
एक लड़का कम चौड़े मुँह के बर्तन में हाथ डालकर उसमें रखी हुई मेवा पूरी मुट्ठी भरके निकालने लगा, पर बर्तन का मुँह छोटा होने के कारण मेवे से भरी हुई मुट्ठी बाहर न निकलती थी। लड़का रोने लगा। इस पर एक चतुर आदमी ने हँसकर कहा—यदि तुम मुट्ठी के आधे मेवे छोड़कर आधे लेने पर ही रजामंद हो जाओ तो अभी तुम्हारा हाथ निकल सकता है।
विपत्ति आने पर जो आधा छोड़ देता है वह बच जाता है।
( 3 )
शिकारी से प्राण बचाता हुआ एक हिरन अंगूरों की लताओं में छिपा रहा। शिकारी की आँखों से ओझल हुआ समझकर हिरन ने अंगूर की सारी पत्तियाँ चरलीं।
शिकारी जो उसे तलाश करता हुआ घूम रहा था, उधर आ निकला और हिरन को देखते ही मार लिया। मरता हुआ हिरन कह रहा था कि अपने आश्रय देने वाले के साथ जो कृतघ्नतापूर्ण व्यवहार करता है उसकी यही दुर्गति होती है।
( 4 )
एक सईस अपने मालिक के घोड़े का दाना चुरा लेता था और मालिक को वफादारी दिखाने के लिये उसे खूब मला करता था। दाना कम हो जाने पर घोड़ा दुबला होने लगा। एक दिन सईस ने घोड़े से पूछा—भाई, मैं चाहता हूँ कि तुम मोटे हो जाओ, बताओ मुझे क्या करना चाहिए। घोड़े ने उत्तर दिया—पीठ मलना कम करो और दाना बढ़ाओ।
किसी की वास्तविक सेवा करनी हो तो बातें बनाना कम करके कुछ ठोस सहायता करनी चाहिए।
( 5 )
एक हिरन अपनी भलमनसाहत के लिये बहुत प्रसिद्ध था। जंगल के सब जानवर उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। एक बार वह बीमार पड़ा; तो जानवरों के झुँड के झुँड उसे देखने आने लगे। जो आता वही हिरन के सामने रखी हुई घास में एक मुँह खा जाता। इस प्रकार हिरन की सारी घास समाप्त हो गई और वह भोजन के अभाव में भूखा मर गया।
केवल सहानुभूति जताने वाले और कार्य रूप में कुछ सहायता न करने वाले मित्रों से भला किसको लाभ हो सकता है?
( 6 )
नासपाती और सेब के पेड़ आपस में झगड़ रहे थे। एक कहता था मैं सुन्दर हूँ, दूसरा कहता मैं।बड़बेरी के पेड़ ने नम्रता से कहा—जब तक मैं हूँ तब तक आपको विवाद करने की आवश्यकता नहीं है। मेरी अपेक्षा तो आप दोनों अधिक सुन्दर हैं।
अपने से निर्बल और दुखियों को देखकर अपनी दशा पर सन्तोष करना चाहिये।
कथा—

