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Magazine - Year 1942 - Version 2

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विश्व प्रेम का एक ठोस कार्य

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संसार में मानव प्राणी की जो दुर्दशा हो रही है, उसे देखकर हृदय विचलित हो जाता है। बीमारी से शरीर क्षत-विक्षत हो रहे हैं, गरीबी के कारण आवश्यक वस्तुओं का अभाव दुःख दे रहा है, चिन्ता और कलह क्लेशों की दावानल में मानसिक शान्ति जली जा रही है। वियोग, विछोह, ममता-मोह अलग ही दुःख दे रहे है, पापों की ओर झुकाव होने से आपत्तियों के ज्वालामुखी चारों ओर चिनगारियाँ बरसा रहे हैं। अज्ञान और दारिद्र का नग्न नृत्य हो रहा है। बेचारी मानवता इन वेदनाओं की चिता में पड़ी हुई है। यह भूलोक मरघट बना हुआ है।

जगज्जननी वसुन्धरा की संतान, परब्रह्म परमात्मा के अमर युवराज, सच्चिदानंद आत्मा के प्रतिनिधि-मानव प्राणी इस प्रकार की व्यथा वेदनाओं में झुलसे और मैं खुश खड़ा निष्ठुर नेत्रों से उन्हें देखूँ, यह कैसे हो सकेगा। मैं प्रेम धर्म का अनुयायी हूँ, मेरे अन्तःकरण में दया का संचार हो रहा है, विश्व के दुखों को हलका करने के लिये मुझ से जितना बन पड़ेगा, अवश्य करूंगा। प्रभु की इस सुरम्य वाटिका के पौधों को हरा भरा करने के लिए अपना पसीना बहाकर सिंचन करूंगा। अपने आत्मीय स्वजनों, मानव बन्धुओं को विपत्ति में से निकालने के लिए यदि मेरा अन्तःकरण उल्लासित न हो तो उसमें और पाषाण में, अन्तर ही क्या रह जायगा? दया प्रेम और करुणा से भरा हुआ मानस लेकर आज मैं अपना कदम आगे बढ़ाऊँगा और अपनी संपूर्ण शक्ति यों को मानव जाति की सेवा में समर्पित करके उसे सुखी बनाने का व्रत ग्रहण करूंगा।

देखता हूँ सामने एक बीमार पड़ा हुआ है। उसकी सेवा करता हूँ, दवा-दारु का प्रबन्ध करता हूँ, सतत प्रयत्न से उसे अच्छा कर देता हूँ, लेकिन अरे यह क्या, अभी तो दस दिन भी बीतने नहीं पाये, वह फिर बीमार पड़ गया। बेचारा स्वास्थ्य के नियमों से परिचित न था, बीमारी से उठने के बाद कुपथ्य करने लगा, फिर बीमार पड़ गया। इसकी ऐसे तो रोज ही सेवा करनी पड़ेगी। मैं रोज अच्छा करूंगा यह फिर वैसा ही हो जायगा, इसे छोड़ू, चलूँ दूसरे की सेवा करूंगा।

यह सामने एक बड़ा दरिद्र भिक्षुक आ रहा है, उसकी सहायता करना मेरा कर्तव्य है। अपने लिए जो भोजन बनाया है, वह उसे खिला देता हूँ, बेचारे की भूख मिट जायगी, मेरी क्या है; मैं आज भूखा ही रह लूँगा। प्रसन्नतापूर्वक मैंने स्वयं भूखे रहकर अपना भोजन उसे करा दिया। पर अरे, मेरा प्रयत्न तो व्यर्थ रहा। कल मैंने स्वयं भूखे रहकर इसकी भूख मिटाई थी, यह तो आज फिर भूखा का भूखा है, यों जिन्दगी भर इसे कहाँ तक खिलाता रहूँगा, चलूँ दूसरे स्थान पर अपना कार्य आरम्भ करूं।

अरे, वह मनुष्य दूसरे दुष्ट द्वारा सताया जा रहा है, चलूँ इसे छुड़ाऊँ। इसके बदले की आपत्ति अपने सिर पर ले लूँगा, ओर इसे सताये जाने से बचा दूँगा। चलता हूँ, बलवान से लड़ता हूँ, विनय करता हूँ या किसी अन्य प्रकार से समझा-बुझाकर उस बेचारे निर्बल मनुष्य को दुष्ट के पंजे से छुड़ा देता हूँ। परन्तु उफ, मेरा प्रयत्न व्यर्थ ही गया। कल इसे एक जालिम के चंगुल में से छुड़ाया था, आज दूसरे का शिकार बन गया। यह तो इसका रोज का काम है, मैं कहाँ तक इसे बचाता फिरूंगा। यह तो जहाँ जायगा वहीं जुल्म का शिकार बन जायगा। भला मैं क्या कर सकता हूँ, चलूँ दूसरा कार्य करूं।

इस आदमी का धन चोरी चला गया है। बेचारा धाड़ मार कर रो रहा है, अच्छा इसे अपना धन दे दूँ, जिससे इसे संतोष हो जायगा। अच्छा इसका जितना धन गया है उतना इसे पास से देकर संतोष करा देता हूँ। अब तो यह प्रसन्न हो जायगा। अरे, यह क्या अभी चार दिन भी नहीं हुए, इसे अपना धन देकर संतुष्ट कर गया था, आज यह फिर क्यों उसी तरह रोता है, जरा पूछूँ तो कहता है कि आज मेरे घर की एक दीवार टूट गई। भाई, यह तो बड़ा बखेड़ा है, दुनिया की नाशवान चीजें तो रोज-रोज नष्ट होने वाली हैं, यह तो हर नाश पर रोवेगा। इसे संतोष कराना मेरे बस की बात नहीं है, चलूँ अपना रास्ता नापूँ।

इस बेचारे अभावग्रस्त को तो देखो, कितनी प्रार्थना के साथ एक पैसा माँग रहा है। अच्छा इसकी इच्छा पूर्ण करूंगा। चल भई, ऐसे एक पैसा क्या माँगता है, मेरे साथ चल जिस वस्तु की तुझे जरूरत हो मुझ से ले लिया करना। वह गरीब आदमी साथ चल देता है। पहले भोजन माँगता है, वह देता हूँ, फिर वस्त्र माँगता है वह देता हूँ, अब घर चाहिए, वह भी दिया, फिर स्त्री, नौकर-चाकर, घोड़ा, गाड़ी, धन, सन्तान, कीर्ति, भोग, विलास, वैभव, राजपाट आदि की माँगें क्रमशः उत्पन्न होती गई। अरे भाई, मैं तो मामूली आदमी हूँ। तेरी इच्छा तो रोज बढ़ती जाती है, मैं इन्हें कहाँ तक पूरा करूंगा। तेरी इच्छाएँ तो कभी पूरी होने वाली नहीं है। यह सब मेरे बस की बात नहीं है। तृष्णा तो सात समुद्रों को पीकर भी शान्त नहीं हो सकती।

इन दो व्यक्ति यों में झगड़ा हो रहा है, चलकर तय करा दूँ। अपनी सारी बुद्धि लगाकर उस समय मामले को निपटा देता हूँ, किन्तु दूसरे दिन वह विग्रह दूसरे रूप में उपस्थित हो जाता है।

एक व्यक्ति कोई अनुचित काम कर रहा है, आज उसे धिक्कार देकर समझा-बुझा कर अपने प्रभाव से या बलपूर्वक रोक देता हूँ। किन्तु कल वह फिर उसी प्रकार दूसरे कार्य करने पर उतारू है।

एक मनुष्य एक प्रकार के भ्रम में उलझकर अपने को दुखी बनाये हुए है। उस समय उस का वह भ्रम हटा देता हूँ पर दूसरे क्षण दूसरी सनक उस पर सवार हो जाती है। एक व्यवस्था चलाने के लिए कानून बनवाता हूँ पर लोग चुपके चुपके उसे तोड़ते हैं।

हे भगवान्! किस झंझट में फँस गया। मैं तो विश्व प्रेम की पवित्र भावनाओं से संसार की सेवा करने निकला था। इतने दिन बीत गये सारी शक्ति लगाकर दीन दुखियों का उद्धार करने का प्रयत्न करता हूँ, पर हाय! रत्ती भर भी सफलता नहीं मिलती। किसी के दुःख में जरा भी न्यूनता तो नहीं आती। प्रभो, यह कैसी विडम्बना है। आप ही कोई मार्ग दिखाइये, जिसमें लोक कल्याण का कोई ठोस कार्य कर सकूँ ।

अब मुझे सारी समस्या पर नये सिरे से विचार करना होगा। संसार के दुखों के कारण और उनको दूर करने के उपाय पर गंभीरतापूर्वक मनन करना होगा। अन्ततः सूक्ष्म बुद्धि से दूरदर्शिता के साथ जब सोचता है, तो एक नया प्रकाश पाता हूँ। मानव जाति के अनेकानेक कष्टों का कारण वे अभाव नहीं है जो प्रत्यक्षतः दिखाई पड़ते हैं। समस्त दुखों की जननी अविद्या है। बीमार को दवा से अच्छा नहीं किया जा सकता। यदि उसे निरोग बनाना है तो उसकी ज्ञान चेतना में यह बात बिठा देनी होगी कि किन उपायों से स्वास्थ्य ठीक रह सकता है। यदि वे बातें उसके मन में भर जायें तो वर्तमान बीमारी को बहुत ही अल्प समय में खोकर सदा के लिये निरोग और स्वस्थ बन सकता है। भिक्षुक को स्वावलम्बन का महत्व समझाकर उसे परिश्रमपूर्वक जीवन का उपार्जन करने के मार्ग पर प्रवृत्त कर दिया जाय तो उसकी रोज-रोज की अपमानित याचना से छुटकारा मिल सकता है। निर्बलों को बलवान बनने और बलवानों को दया करने की भावनाओं से भर दिया जाय, तो आये दिन होने वाले जुल्म सहज ही में मिट सकते हैं। कमजोर मनुष्य जब तक अन्याय का विरोध करने के लिए, स्वयं कुछ करने को तत्पर नहीं होते, तब तक उन्हें ईश्वर भी बेइन्साफी में पिसने से नहीं बचा सकता। दिन-दिन बढ़ने वाली तृष्णा और नाशवान वस्तुओं के विछोह की वेदना ज्ञान द्वारा ही दूर की जा सकती है, अन्यथा इनका निवारण किसी प्रकार हो ही नहीं सकता। इस आनी-जानी दुनिया में एक न एक वस्तु का विछोह नित्य होगा। आज भाई मरा तो कल बेटा मरने वाला है। आज धन गया तो कल घर फूटने वाला है, इनके लिए रोया जाय, तो निरन्तर रोते रहने पर भी शाँति नहीं मिलेगी। इन अवसरों पर केवल ज्ञान द्वारा ही धैर्य धारण किया जा सकता है। गये दिन आने वाले संकट, मनोविकार, पाप आकर्षण यह सब तात्कालिक प्रतिबन्ध से रोके नहीं जा सकते। इनका निवारण ज्ञान द्वारा ही होना सम्भव है। दुनिया को एक ही दुःख है ‘अज्ञान’ उसे सुखी बनाने का एक ही उपाय हो सकता है—’ज्ञान प्रसार’।

माना कि पीड़ितों को कुछ तात्कालिक सहायता की भी आवश्यकता होती है, पर उसका अन्ततः निवारण ज्ञान के द्वार ही होगा। आप किसी की उतनी सहायता रुपया-पैसा देकर नहीं कर सकते, जितनी कि उसे विषम स्थिति में से निकलने का पथ-प्रदर्शन कर के कर सकते हैं। मनुष्य के पास किसी चीज की कमी नहीं है। परमात्मा ने उसे अनंत शक्ति यों का खजाना सौंपकर इस लोक में भेजा है। उसके अन्दर ऐसी 2 योग्यताएं छिपी पड़ी हैं कि जिनके एक-एक कण का उपयोग कर के वह सम्राटों का सम्राट बन सकता है। ‘मैं उसे अमुक वस्तु दूँगा’ ऐसा सोचते समय आप अपनी आत्मा का विस्तार करते हैं। राजा को एक पैसा देकर, आत्मा को भौतिक वस्तुओं के टुकड़े देकर आप उसे क्या देते हैं? उन्हें इन टुकड़ों की जरूरत नहीं है। जरूरत केवल एक है; और वह यह कि मानव जाति के अन्तस्तल में सोई हुई महान शक्ति को जगाया जाय।

समुद्र लाँघते समय हनुमानजी अपनी अशक्ति अनुभव करते हुए बड़े दीन हो रहे थे, जामवंत ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि —हे पवन पुत्र! आप में अकूत बल भरा हुआ है। हनुमानजी का सोया हुआ बल जाग पड़ा और वे एक ही छलाँग में समुद्र पार कर गये।

आज कोटी-कोटि हनुमान अपनी अशक्ति प्रकट करते हुए दीन वचन बोलते हैं और असफलता से तट पर बैठे-बैठे हाथ मलते हैं। इस समय ऐसे जामवंतों की जरूरत है, जो इन्हें इनके आत्मबल का उद्बोधन कराके आपत्तियों का समुद्र लाँघने के लिए तत्पर कर दे। मैं जामवन्त का कार्य करूंगा। संसार में ज्ञान प्रचार का महत्तम अश्वमेध यज्ञ करूंगा, जिससे स्वर्ग के देवता भी प्रसन्न हो जावें, इसी यज्ञ से वह अमृत वर्षा हो सकती है, जो जलते तवे के समान झुलसते हुए भूलोक में सुख शाँति की हरियाली पैदा कर दे।

मैं प्रेमी हूँ। विश्व-प्रेम मेरे रोम-रोम से छलक रहा है। विश्व के पीड़ित बन्धुओं को क्लेशमुक्त करने की मेरी आन्तरिक इच्छा है। यह कार्य ज्ञान प्रसार द्वारा होना ही संभव है। मैं जीवन का प्रत्येक क्षण ज्ञानयज्ञ की आहुति में समर्पित करूंगा, निरंतर सद्ज्ञान फैलाता रहूँगा और इस कार्य में अपने जैसे विचार रखने वाले अन्य सुहृदयों को आमन्त्रित करूंगा।

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