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Magazine - Year 1942 - Version 2

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नवयुग की चुनौति

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First 40 42 Last
(श्री मैथली शरण जी गुप्त)

वह अतीत पुरखों का युग था उसका क्या कहना है।

सुनो किन्तु अपने ही युग में हम सबको रहना है॥

अपने युग को हीन समझना आत्म हीनता होगी।

सजग रहो! इससे दुर्बलता और दीनता होगी।

जिस युग में हम हुए वही तो अपने लिये बड़ा है।

अहो, हमारे आगे कितना कर्म क्षेत्र पड़ा है॥

जीर्ण वस्तुओं की ममता से घर ही कूड़ा होगा।

अहो आज का कुसुम हार भी कल का कूड़ा होगा॥

यदि मानस गोमुखी हमारी निरवधि नहीं झड़ेगी।

तो गर्तों में ही जीवन की धारा पड़ी पड़ेगी॥

विसत हो गया विगतों का युग, अपना तो प्रस्तुन है।

कितना नव्य भव्य तुम देखो यह अपूर्व अद्भुत है॥

अन्तरिक्ष के नहीं किन्तु हम उस वसुधा के वासी।

जिसके सरस गंध गुण के हैं आप अमर आश्वासी॥

यही हमारा प्रमुख देवता कभी न भूलो इसको।

कहो दूसरा देव कौन है आहुति दें हम जिसको॥

निरुत्साह से साहस शुभ है, जीवन एक समर है।

भव भंगुर है, रहे किन्तु यह आत्मा आप अमर है॥

बिगड़ गया यदि यही लोक तो क्या परलोक बनेगा।

कहाँ जायेंगे नारायण तब, जब नर लोक बनेगा॥

करने में तो मरने में भी है कल्याण स्वयं ही।

लौटो न तुम प्रमाण खोजने बनो प्रमाण स्वयं ही॥

आदर्शों की पूजा से ही पार नहीं पाओगे।

नहीं आप उनकी पद्धति पर जब तब तुम आओगे॥

मन में, वाणी में आकर ही धर्म न पूरा होगा।

किये बिना कोई भी अपना कर्म न पूरा होगा॥

वह महान, जो मार्ग दिखावे सबको ऊँचा चढ़कर।

कीर्ति छोड़ कर्तव्य करे जो वह उससे भी बढ़कर॥

मनुष्यत्व जन में ही रहना नहीं विशाल भवन में।

वह भी क्या कुछ दुर्लभ होगा जो तुम चाहो मन में॥

रही चुनौती आज हमारी अधिक कहूँ क्या तुमको।

नई सृष्टि के लिए प्रलय भी प्रेक्षणीय है हमको॥

*समाप्त*

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