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Magazine - Year 1948 - Version 2

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गायत्री से पाप और दुखों से निवृत्ति

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गायत्री को अपनाने से पापों, दुखों और कषाय कल्मषों का नाश होता है। पूर्व संचित कितने ही कुसंस्कारों की जड़ उखड़ जाती है, जिसके कारण उनके द्वारा भविष्य में उत्पन्न होने वाले दुखों से भी छुटकारा मिल जाता है। कुसंस्कार स्वयं एक प्रकार के पाप हैं। चाहे उनके द्वारा प्रत्यक्ष पाप क्रिया कोई बड़ी मात्रा में न हो सके तो भी वे अपने जहरीले धुँऐ से मानस लोक को गंदा करते रहते हैं और उस गंदगी के फलस्वरूप बुरे फलों का प्राप्त होना स्वाभाविक है। वे मानस पापों की निरन्तर सृष्टि करते रहते हैं और उस सृष्टि का बुरा फल होता ही है। गायत्री साधना से यह कुसंस्कार उखड़ जाते हैं जिससे उन विषवृक्षों का वन नष्ट हो जाता है जो भविष्य में अपने लिए अथवा दूसरों के लिए घातक परिणामों को उपस्थित करता है।

अब केवल वे पाप रह जाते हैं जो पककर प्रारब्ध बन चुके हैं, और जिनको भुगते जाने का विधान प्रस्तुत हो गया है। यह प्रारब्ध बने हुए भोग भी गायत्री साधक के लिए बड़े सरल हो जाते हैं। जेल के अधिकारी अपनी जेल में आये हुए क्रूर प्रकृति के कैदियों की अपेक्षा उन कैदियों से नरम व्यवहार करते हैं जिनका सेवाभाव उत्तम, विनय युक्त एवं मधुर होता है। जब मनुष्य का स्वभाव बदल जाता है तो ईश्वर का दंड विधान भी अपेक्षाकृत नरम हो जाता है। इसके अतिरिक्त सद्बुद्धि वाले व्यक्ति की सहन शक्ति बढ़ जाती है, वह ईश्वरीय दंडों को हँसते हँसते झेल लेता है और “भगवान मुझे शीघ्र शुद्ध कर रहे हैं” ऐसा सोचकर उस बुरी स्थिति में भी आनंदित रहता है।

दुखों का सीधा संबंध मन की मान्यता से है। धन का मिलना या नष्ट होना बाह्य दृष्टि से कुछ महत्व नहीं रखता। कागजों का एक बंडल या धातु के टुकड़ों एक एक थैला अपने पास रहा या दूसरे के पास रहा इससे वैसा कोई विशेष बनता बिगड़ता नहीं पर, मन की मान्यता के अनुसार इनकी प्राप्ति में सुख और हानि में दुख होता है। विरक्त पुरुषों की स्थिति इससे उलटी होती है, ये प्राप्ति में दुख और त्याग में आनन्द मानते है। इससे प्रकट है कि सुख दुख मान्यता से संबंध रखने वाला एक काल्पनिक तथ्य है। सद्बुद्धि वाले व्यक्ति की धारणाएं बदल जाने से उसे वे आपत्तियाँ जिनमें पड़कर साधारण लोग भारी दुख अनुभव करते हैं उन्हें वैसा अनुभव नहीं होता। इस प्रकार सब दुःख वस्तुतः नष्ट हो जाते हैं। भले ही दूसरों की दृष्टि में वे अभावग्रस्त या दुखी प्रतीत हों।

गायत्री साधना से सब पापों की और सब दुखों की निवृत्ति के अनेक प्रमाण मिलते हैं जिनमें से कुछ नीचे दिये जाते हैं-

ब्रह्म हत्यादि पापानि गुरुपि च लघूनि च।

नाशयत्यचिरेणैव गायत्री जापको द्विजः।।

पद्यपु0

गायत्री जपने वाले को ब्रह्म हत्यादि सभी पाप, छोटे हों, चाहें बड़े हों शीघ्र ही समस्त नष्ट हो जाते है।

गायत्री जपकृद्भकत्या सर्व पापैः प्रमुच्यते।

पराशर

भक्तिपूर्वक गायत्री जपने वाला समस्त पापों से छूट जाता है।

सर्व पापानि नश्यन्ति गायत्री जपतो नृप!

भविष्य पुराण

गायत्री जपने वाला समस्त पापों से छूट जाता है।

गायत्र्यष्ट सहस्रं तु जापं कृत्वा स्थिते रवौ।

मुच्यते सर्व पापेभ्यो यदि न ब्रह्महा भवेत।।

अत्रिस्मृति। 3-15

सूर्य के समक्ष खड़े होकर यदि गायत्री का आठ हजार जप करे तो वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। यदि वह ब्रह्मा अर्थात् ज्ञानी पुरुषों की निन्दा करने वाला न हो, तो।

सहस्र कृत्वस्त्वभ्यस्य वहिरेतत्त्रिकं द्विजः।

महतोप्येनसो मासात्वचे वाहिर्विमुच्यते।।

मनुस्मृति ॰ 2।79

एकान्त स्थान में प्रणव महा व्याहृति पूर्वक गायत्री का 1000 एक हजार जप करने वाला द्विज बड़े से बड़े पाप से ऐसे छूट जाता है जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है।

जना यैस्तरति तानि तीर्थनि।

जिनसे पुरुषों के पाप दूर हो जाते हैं और वे इस संसार से तर जाते हैं उनको तीर्थ कहते “गायत्री” -इन तीन अक्षरों में वही तीर्थ विद्यमान् है-ग = गंगा। य = यमुना। त्र = त्रिवेणी समझनी चाहिए।

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वांगना गमः।

महानि पातकान्यानि, स्मरणान्नाशमाप्नुयात्।।

गायत्री पु0 22।

गायत्री के स्मरण मात्र से ब्रह्म-हत्या सुरापान चोरी, गुरुस्त्री गमन आदि अन्य महा पातक भी नष्ट हो जाते हैं।

य एता वेद गायत्रीं पुन्याँसर्वगुणान्विताम्।

तत्वेन भरतश्रेष्ठ! स लोके न प्रणश्यति।।

महा भा0 भीष्म प॰ अ॰ 14।16।

हे युधिष्ठिर! जो मनुष्य तत्त्वपूर्वक सर्वगुण सम्पन्न पुण्य गायत्री को जान लेता है। वह संसार में दुखित नहीं होता है।

गायत्री निरतं हव्य कव्येषु विनियोजयेत्। तस्मिन्न तिष्ठते पापमब्बिंदु रिव पुष्करे।।

गायत्री जपने वाले को ही पितृकार्य तथा देवकार्य में बुलाना चाहिए, क्योंकि गायत्री उपासक में पाप उस प्रकार नहीं रहता जैसे कमल के पत्ते पर पानी की बूँद नहीं ठहरती।

गायत्रीम पठेद्विप्रो न पापेनलिप्यते।

लघु अत्रि संहिता

जो द्विज गायत्री को जपता है वह पाप से युक्त नहीं होता।

चरक संहिता में गायत्री साधना के साथ आँवला सेवन करने से दीर्घजीवन का वर्णन किया है।

सावित्री मनसा ध्यायन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।

सम्वत्सरान्ते पौषीं वा माधीं वा फाल्गुनीं तिथिम्

चरक चिकित्सा0 आवं0 रसा0 श्लो0 9

मन से गायत्री का ब्रह्मचर्य पूर्वक एक वर्ष तक ध्यान करता हुआ वर्ष के उपरान्त में पौष मास अथवा माघ मास की अथवा फाल्गुन मास की किसी शुभ तिथि में तीन दिन क्रमशः उपवास कर उपरान्त आँवले के वृक्ष पर चढ़ जितने आँवले मनुष्य खायेगा उतने ही वर्ष जीवित रहेगा।

यदिहवा अप्येवं विद्वव्हिव प्रतिगृहणाति न हैव तद् गायत्र्या एकं च न पदं प्रति। स य इमाणं स्त्रीं ल्लोकान् पूर्णान् प्रतिगृहणीयात् सोऽस्या एतत्प्रथमं पदमवाप्नुयादथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्तावत्प्रति गृहणीयात् सोऽस्याः एतत् द्वितीय पदमवाप्नुयादथे यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृहणयात सोऽस्याः एतत्तृ तीयं पदमवाप्नुयात् अथास्याः एवदेव तुरीयं दर्शनं पदं परोरजाय एष तपतिनैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत्प्रतिगृहणीयात।

वृ0 5।14। 5-6

गायत्री को सर्वात्मक भाव से जपने वाला मनुष्य यदि बहुत ही प्रतिगृह लेता है तो भी उस प्रतिगृह का दोष गायत्री के प्रथम पाद उच्चारण के समान भी नहीं होता है। यदि समस्त तीनों लोकों को प्रतिगृह में लेवे तो उसका दोष प्रथम पाद उच्चारण से नष्ट हो जाता है। यदि तीनों वेदों का प्रतिगृह लेवे तो उसका दोष द्वितीय पाद में नष्ट हो जाता है। यदि संसार के समस्त प्राणियों को भी प्रतिगृह में लेवे तो उसका दोष तृतीय पाद में नाश हो जाता है, अतः गायत्री जपने वाले को कोई हानि नहीं पहुँचती, और गायत्री को चौथा पाद तो चौथा पर ब्रह्म है, इसके सदृश दुनिया में कुछ भी नहीं है।

यदह्नत्कुरुते पापं तदहात्प्रतिमुच्यते।

यद्रात्रियात्कुरुते पापं तद्रात्रियात्प्रतिमुच्यते।।

तै0 आ॰ प्र0 10 अ॰ 34

हे गायत्री देवि! तुम्हारे प्रभाव से दिन में किये पाप दिन में ही नष्ट हो जाते हैं और रात्रि में किये पाप रात्रि में ही नाश हो जाते हैं।

गायत्रीं तु परित्यज्य येऽन्य मन्त्रमुपासते।

मुण्डकरा वै ते ज्ञेया इतिवेदविदोविदुः।।

जो गायत्री मन्त्र को त्याग अन्य मन्त्र की उपासना करते हैं वे नास्तिक हैं ऐसा वेदवेत्ताओं ने कहा है।

गायत्री चिन्तयेद्यस्तु हृद्पद्मे समुपस्थिताम्।

धर्माधर्म विनिर्मुक्तः स याति परमाँ गतिम्।

जो मनुष्य हृदय कमल में बैठी गायत्री का चिन्तन करता है, वह धर्म, अधर्म के द्वंद्व से छूट कर परम गति को प्राप्त होता है।

सहस्र जप्ता सा देवी ह्युपपातक नाशिनी।

लक्ष्य जाप्ये तथा तच्च महापातकनाशिनी।।

कोटि जाप्येन राजेन्द्र! यदिच्छतितदाप्नुयात्।

एक सहस्र जप करने से देवी उपपातकों का विनाश करती है एक लाख जप करने से महा पातकों का विनाश होता है। एक करोड़ जाप करने से अभीष्ट सिद्धि प्राप्ति होती है।

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