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Magazine - Year 1952 - Version 2

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भगवान बुद्ध के उपदेश

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-जिसका चित्त मल रहित है। जिसका चित्त स्थिर है जो पाप विहीन है उस जागरुक पुरुष के लिए भय नहीं है।

-अहो! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतन रहित हो काठ की भाँति धरती पर गिर पड़ेगा।

-न माता पिता, न दूसरे रिश्तेदार आदमी की उतनी भलाई करते हैं जितनी भलाई सन्मार्ग पर गया हुआ चित्त करता है।

-न दूसरों के दोष को, न दूसरों के कृत-अकृत को देखो। अपने ही कृत-अकृत को देखते रहो।

-जागते रहने वाले की रात लम्बी होती है। थके हुए का योजन लम्बा होता है। इसी प्रकार सद्धर्म को न जानने वाले मूर्ख आदमी का साँसारिक आवागमन लम्बा हो जाता है।

-यदि विचरण करते हुए अपने से श्रेष्ठ व अपने जैसे साथी को न पाये तो आदमी दृढ़ता पूर्वक अकेला ही रहे। मूर्ख की संगत अच्छी नहीं।

-पुत्र मेरे हैं। घर मेरा है। ऐसा सोच मूर्ख आदमी दुखी हो जाता है जब शरीर तक अपना नहीं है तब पुत्र कहाँ? और धन कहाँ?

-यदि मूर्ख अपने को मूर्ख समझे तो उतने अंश में तो बुद्धिमान है। असली मूर्ख तो वह है जो मूर्ख होते हुए भी अपने को पंडित समझता है।

-उस काम का करना अच्छा नहीं है जिसे करके पछताना पड़े और जिसके फल को रोते हुए भोगना पड़े।

-जब तक पाप कर्म फल नहीं देते तब तक मूर्ख उन्हें मधु की तरह मीठा समझता है लेकिन जब पाप कर्म फल देता है तब उसे दुःख होता है।

-लाभ का रास्ता दूसरा है और निर्वाण का दूसरा। इसे इस प्रकार जानकर बुद्ध का शिष्य भिक्षु सत्कार की इच्छा न करे विवेक व एकान्तचर्या की वृद्धि करे।

-जो आदमी अपना दोष दिखलाने वाले को धन दिखलाने वाले की तरह समझे, जो संयम के समर्थक मेधावी पंडित की संगति करे उसका कभी अकल्याण नहीं हो सकता है।

-न दुष्ट मित्रों से संगति करे। न अधर्मी पुरुषों की संगति करे। अच्छे चित्रों की संगति करे। उत्तम पुरुषों की संगति करे।

-जो पार पहुँचते हैं वे तो मनुष्यों में थोड़े ही हैं। बाकी आदमी तो किनारे पर ही दौड़ते रहते हैं।

-सत् पुरुष आसक्त नहीं होते। वह काम भोगों के लिये बात नहीं बनाते। उन्हें चाहे दुख हो चाहे सुख। वे विकार को प्राप्त नहीं होते।

-सारथी द्वारा सुरक्षित घोड़ों की तरह जिनकी इन्द्रियाँ शान्त हैं जिसका अभिमान नष्ट हो गया है जो आश्रय रहित है। ऐसे पुरुष की देवता भी स्पृहा करते हैं।

-एक आदमी संग्राम में लाखों आदमियों को जीत ले और एक दूसरा अपने आपको जीत ले। यह दूसरा आदमी ही सच्चा संग्राम विजयी है।

-जो अभिवादन शील है जो नित्य बड़ों की सेवा करता है। उसके आयु, बुद्धि तथा बल में वृद्धि होती है।

-आलसी और अनुद्योगी के सौ वर्ष के जीवन से दृढ़ता पूर्वक उद्योग करने वाले का एक दिन का जीवन अच्छा।

-शुभ कर्म करने में जल्दी करो। पापों को मन से हटाओ। शुभ कर्म करने में ढील करने पर मन पाप में रत होने लगता है।

-यदि पाप बने तो उसे दुबारा फिर न करे उसमें रत न होवे। पाप का संचय दुःख का कारण होता है।

वर्ष-13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक -6

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