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Magazine - Year 1952 - Version 2

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भेंट का शिष्टाचार

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(श्री कामता प्रसाद गुरु)

लोग भेंट या मुलाकात के लिए उन्हीं के पास जाते हैं, जिनसे किसी प्रकार का सम्बन्ध, स्नेह अथवा काम-काज होता है। कभी कभी परिचित व्यक्ति के द्वारा अपरिचित,परन्तु प्रतिष्ठित लोगों से भेंट की जाती है। गोसांई जी ने कहा है—

“इहि सन हठि करिहौं पहचानी।

साधु तें होइ न कारज-हानी॥”

जिसके घर भेंट करने को जाते हैं उसके सुभीते का भेंट करने वाले को अवश्य ध्यान रखना चाहिए। किसी के यहाँ ऐसे समय पर न जाना चाहिये जब उसे किसी से मिलने का अवकाश या सुभीता न हो! घनिष्ठ मित्र एक दूसरे से बिना किसी संकोच के दिन में कई बार मिलते हैं, पर इस अवस्था में भी शिष्टाचार पालने की आवश्यकता है। किसी के यहाँ बिना किसी आवश्यक कार्य के दिन निकलते ही अथवा भोजन के समय या ठीक दोपहरी में जाना अनुचित है। अधिक रात को भी साधारण अवस्था में किसी के यहाँ न जाना चाहिए। कामकाजी लोगों को समय का बहुत संकोच रहता है, इसलिये किसी के यहाँ प्रायः आधे घण्टे से अधिक बैठना उचित नहीं है। यदि इस अवधि में महत्वपूर्ण बातचीत पूर्ण हो सके तो बहुत अच्छी बात है। जिस समय किसी मनुष्य की बातचीत में उदासीनता, शिथिलता अथवा उकलाहट दीख पड़े उस समय समझ लेना चाहिए कि उसे मिलने का अधिक सुभीता नहीं है। इसलिये ऐसे संकेत को सूचना समझ कर उसके यहाँ से चले आने का उपक्रम करना चाहिए। यदि वह जाने वाले व्यक्ति के प्रस्ताव को सुनकर कुछ अधिक बैठने का अनुरोध करे तो यह अनुरोध मान लिया जावे और कुछ समय के पश्चात् उससे विदा ग्रहण की जावे । भेंट के लिए आये हुए सज्जन से उसकी जाति और पद के अनुसार ‘प्रणाम’ ‘नमस्कार’ ‘राम-राम’ अथवा ‘बन्दगी’ कहकर उसका अभिवादन करना चाहिए। परिचित लोगों को इस बात के लिए ठहरना चाहिए कि जब दूसरा अभिवादन करेगा तब हम उसका उत्तर देंगे, भेंट होने पर एक दूसरे का मुँह देखते रहना और कुछ न कहना बड़ी असभ्यता है। इसलिए मुख्य प्रयोजन अथवा और किसी उपयुक्त विषय पर चर्चा छेड़ देनी चाहिए। यदि दिन में एक से अधिक बार भेंट हो तो प्रत्येक बार मिलने पर भी अभिवादन करने में कोई हानि नहीं है। जहाँ तक हो अभिवादन के पश्चात् थोड़ी बहुत बात चीत अवश्य कर ली जावें। यदि और कुछ न हो तो केवल कुशल प्रश्न से ही काम चल सकता है।

किसी के यहाँ जाकर उसके कागज-पत्र, पुस्तकें अथवा दूसरे पदार्थ उठाना धरना अथवा उन्हें बड़े ध्यान से देखना अनुचित है। भेंट करने वाले को उसी कोठे में बैठना चाहिए जो बैठक के लिए नियत हो और उस स्थान में तभी प्रवेश करना चाहिये जब गृह स्वामी अथवा कोई अन्य पुरुष वहाँ उपस्थित हो। पुरुषों की अनुपस्थिति में किसी के यहाँ जाना संदेह की दृष्टि से देखा जाता है इसलिये सभ्य लोगों को संदेह की दृष्टि से बचना चाहिये। जिन लोगों में पर्दे का विशेष प्रचार नहीं है उनके पास अनुमति मिलने पर स्त्रियों के उपस्थित रहते हुए भी जा सकते हैं। यद्यपि पश्चिमीय देशों पर दरवाजा बन्द रहने पर बाहर से पुकारने के लिये साँकल खटकाना अथवा किवाड़ भड़काना अनुचित नहीं समझा जाता, तथापि हमारे देश में इन कार्यों को अनुचित समझते हैं। किसी के दरवाजे जाकर जोर जोर से और लगातार पुकारना भी अनुचित है। दो एक बार पुकारने पर मिलने वाले को यह देखने के लिए ठहर जाना चाहिए कि कदाचित आवाज सुनकर कोई द्वार खोलने को और कुछ सूचना देने आवे।

गृह स्वामी को उचित है कि वह अपने यहाँ आने-वाले सज्जन का उसकी योग्यता के अनुसार स्वागत करे और उसे आदर पूर्वक बिठावे। कुशल प्रश्न के पश्चात् उससे कुछ ऐसी बात करनी चाहिये जो उसकी रुचि के अनुकूल हो अथवा उसके काम काज से सम्बन्ध रखती हो। उसके आने का कारण पूछने की उतावली कभी न की जावे। वह बातचीत में बहुधा आप ही प्रकट हो जाता है अथवा कुछ समय के पश्चात् चतुराई से पूछा जा सकता है यदि तुम्हें अधिक समय न हो और बैठने वाले के कारण तुम्हारे किसी आवश्यक कार्य में हानि की सम्भावना हो तो तुम्हें अपनी कठिनाई नम्रता-पूर्वक और चतुराई से जता देनी चाहिए। ऐसे अवसर पर शिष्टाचार का अधिक पालन करने से लाभ के बदले हानि होगी। मिलने वालों को भी उचित है कि वह गृह स्वामी के सुभीते का पूरा ध्यान रक्खे और उसके कुछ कहने से अप्रसन्न न हो। यदि किसी मुलाकाती को हमारे यहाँ बैठने में अधिक समय लग जावे तो हमारा कर्त्तव्य यह है कि हम उससे कुछ जलपान करने के लिए निवेदन करें और यदि उसके अस्वीकृत करने पर भी हमें यह अनुमान हो कि आग्रह करने पर उसे आपत्ति न होगी तो हमें चाय, फल अथवा मिष्ठान्न से उसको तृप्त करना चाहिए।

यदि किसी मित्र या परिचित व्यक्ति से बाहर अथवा सड़क पर भेंट हो तो वहाँ घण्टों खड़े रहकर बात-चीत करना उचित नहीं। यदि विषय लम्बा हो तो कुछ दूर तक साथ साथ चलकर बात-चीत कर ली जावे, पर ऐसा न हो कि किसी को दूसरे की बात सुनने के लिए विवश होकर कई जरीबडडडडड जाना पड़े।

यदि किसी बड़े आदमी के यहाँ मिलने को जाना हो तो उनके अवकाश का पूरा पता लगा लेना चाहिये और जाकर किसी के द्वारा अपने आने की सूचना भिजवा देनी चाहिए। उन सज्जन के पास पहुँचने पर उपयुक्त आसन ग्रहण करना उचित है और संक्षेप में उन्हें भेंट का तात्पर्य बता देना चाहिये। कार्य हो जाने पर कुछ समय और बैठना अनुचित न होगा। इसके पश्चात् पूर्वोक्त महाशय से आज्ञा लेकर चले आना योग्य है। किसी के यहाँ कभी न जाना जैसा अनुचित है उसी प्रकार बार-बार जाना भी अनुचित है। यदि किसी के यहाँ जाने से जाने वाले को ऐसा जान पड़े कि उसके जाने से गृह-स्वामी को खेद होता है तो ऐसे मनुष्य के यहाँ उसे कभी न जाना चाहिए। कहा भी है—

बचनन में नहिं मधुरता, नैनन में न सनेह।

तहाँ न कबहूँ जाइये, कंचन बरसे मैह ॥

एक दूसरे के यहाँ आने जाने से परस्पर मेल मिलाप पढ़ता है, इसलिए यदि कोई परिचित व्यक्ति अथवा मित्र, जिसके साथ आवागमन का सम्बन्ध है बहुत समय तक किसी के यहाँ न जावे, तो दूसरे मनुष्य को उसके यहाँ उपयुक्त अवसर पर जाना अनुचित न होगा। इससे इस बात का भी निर्णय हो जायगा कि वह मनुष्य जाने वाले से किसी प्रकार अप्रसन्न तो नहीं है। बहुधा उच्चस्थिति के महानुभाव निम्न-स्थिति के लोगों के यहाँ मिलने नहीं आते। यदि उन्हीं का काम हो तो वे इन्हें बुलाने को बहुधा सवारी भेज देते हैं। दो चार बार ऐसे महानुभावों की इच्छा-पूर्ति की जा सकती है, पर उनके बढ़ते हुए दुराग्रह को कम करने की आवश्यकता है। ये लोग निमन्त्रण पाकर भी अपने से छोटे के लोगों के यहाँ आने की कृपा नहीं करते, जिससे शिष्टाचार की बड़ी अवहेलना होती है। ऐसी अवस्था में सज्जनों का यह कर्त्तव्य है कि सदाचारी कंगाल, के यहाँ भले ही चले जावें, पर दुराचारी महाजन के द्वार पर न झाँकें।

मुलाकाती के जाने के पूर्व हमें पान, सुपारी, इलायची आदि से उसका आदर करना चाहिए। जिस समय वह जाने लगे उसकी योग्यता के अनुसार खड़े होकर या दूर तक जाकर अथवा दस कदम बाहर चलकर उसे अभिवादन-सहित विदा देनी चाहिए।

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