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Magazine - Year 1952 - Version 2

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विद्वता की नहीं, भावना की आवश्यकता है।

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(श्री स्वामी विवेकानन्द)

संसार में जितने ग्रन्थ उपलब्ध हो सकते हैं, उन सभी का पारायण करके भी हम धर्म या ईश्वर के सम्बन्ध में एक भी शब्द नहीं समझ सकते। जन्म जन्मान्तर तक वाद विवाद करके भी हम इस विषय का ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते। यह भी सम्भव है कि संसार में जितने भी प्रतिमा सम्पन्न व्यक्ति हुए हैं, उन सभी से हमारी प्रतिभा बढ़ जाय, परन्तु जब भी हम ईश्वर के समीप तक पहुँचने में जरा भी समर्थ नहीं हो सकते। कभी-कभी तो इसका परिणाम बिलकुल विपरीत ही देखने में आता है। इस बुद्धि कौशल सम्बन्धी शिक्षा के द्वारा क्या कितने ही घोर अधार्मिक-नास्तिक- नहीं पैदा होते देखे गये? पाश्चात्य सभ्यता का यही सबसे बड़ा दोष है कि इसमें केवल बुद्धि कौशल सम्बन्धी शिक्षा मनुष्य को स्वार्थी ही अधिक बनाती है। इसके द्वारा मनुष्य दस गुना स्वार्थ परायण हो जाता है। इसका यही दोष एक दिन पाश्चात्य समाज के पतन का कारण बनेगा। यदि हृदय और बुद्धि में परस्पर विरोधी भाव दृष्टिगोचर हो तो हृदय का ही अनुसरण करना चाहिए बात यह है कि प्रतिभा की एक मात्र मर्यादा युक्ति है। इस युक्ति के अंतर्गत रह कर ही प्रतिभा काम करती है इसके बाहर जाने में वह समर्थ नहीं है।

केवल हृदय में इतनी शक्ति है कि वह हमें उच्चतम क्षेत्र तक पहुँचा सके। उस क्षेत्र तक पहुँचाना प्रतिभा का काम नहीं है। हृदय प्रतिभा से बहुत दूर निकल जाता है, और वह उस स्तर तक पहुँच जाता है, जो अनुभूति के नाम से प्रसिद्ध है। प्रतिभा, में तत्व-ज्ञान की अनुभूति कभी नहीं आ सकती। इसे प्राप्त करने में तो केवल हृदय ही—यदि उसके ज्ञान का प्रकाश हुआ—समर्थ हो सकता है। कोई व्यक्ति कितना भी प्रतिभा सम्पन्न हो, हृदय हीन होकर तत्वज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता। हृदय ही एक ऐसा है जो सदा प्रेममय मनुष्य में बोलता है। हृदय अनुभूति के लिए ऐसे सुगम साधन का अनुसंधान कर सकता है, जिसका खोज निकलना प्रतिभा की शक्ति से परे है।

सच बात तो यह है कि प्रतिभा ज्ञान का साधन है और हृदय अनुरक्ति का। प्रारम्भिक अवस्था में हृदय प्रतिभा की अपेक्षा बहुत ही निर्बल होता है। एक अज्ञ पुरुष में सत् असत् का विचार नहीं होता। उस आदमी की कसी एक बड़े प्रोफेसर से तुलना कीजिए। प्रोफेसर में कितनी अद्भुत प्रतिभा होती है। परन्तु प्रोफेसर अपनी प्रतिभा के कारण बहुत कुछ बन्धन में रहता है इसके अतिरिक्त जहाँ वह प्रतिभा-सम्पन्न होता है वहीं पापात्मा भी हो सकता है। परन्तु जो व्यक्ति सहृदय होता है, वह कभी पापात्मा नहीं हो सकता। कोई भी भाव परायण व्यक्ति पापात्मा होते नहीं सुना गया। यत्न पूर्वक अनुशीलन करते करते हृदय विशेष रूप से उन्नत किया जा सकता है और अन्त में जाकर यह प्रतिभा से बहुत आगे निकाला जा सकता है। यही हृदय अनुभूति के रूप में परिणित किया जा सकता है। अन्त में मनुष्य को प्रतिभा से आगे बढ़ना ही पड़ेगा।

मनुष्य का ज्ञान, उसकी अनुभव शक्ति, तर्क, प्रतिभा और हृदय, इन सभी से इस संसार के दुग्ध का मन्थन करने के बाद मक्खन निकलता है और वह मक्खन ईश्वर है। जो लोग सहृदय होते हैं, वे मक्खन के अधिकारी होते हैं और मथा हुआ दूध प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तियों के लिए पड़ा रहता है।

यह सारा उद्योग हृदय को प्रस्तुत करने के लिए है प्रेम के लिए है, उस अपरिसीम सहानुभूति के लिए है, जो हृदय से सम्बद्ध है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए शिक्षित होना, शास्त्र का पारगामी होना जरा भी आवश्यक नहीं है। एक बार किसी महात्मा ने कहा था—किसी दूसरे व्यक्ति की हत्या करने के लिए मनुष्य को ढाल तलवार से सुसज्जित होने की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु स्वयं अपनी ही हत्या करने के लिए एक सुई यथेष्ट होती है। इसी प्रकार दूसरों को उपदेश देने के लिए विशेष प्रतिभा और अध्ययन आवश्यक है, परन्तु स्वयं आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए यह सब इतना आवश्यक नहीं है। क्या हृदय पाप रहित है? यदि हाँ, तो ईश्वर को प्राप्त करने में समर्थ हो सकोगे। जो लोग ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त करके धन्य हो जाते हैं, उनका हृदय निष्पाप है, वे ईश्वर का दर्शन करेंगे। यदि तुम पाप रहित नहीं हो, तो संसार की सारी विद्याओं के पारदर्शी होकर भी इस विषय में जरा भी सफलता न प्राप्त कर सकोगे। जितनी भर पुस्तकें तुम पढ़ोगे उन्हीं के बीच में तुम दबे रहोगे, किन्तु उनसे तुम्हें कोई विशेष लाभ न होगा। वह हृदय है, जो लक्ष्य-स्थान पर पहुँचता है। हृदय का अनुसरण करो। पवित्र हृदय प्रतिभा से कहीं अधिक दूर तक देख सकता है, वह तत्व ज्ञान प्राप्त करता है, वह उन वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, जिन्हें तर्क नहीं जान सकता।

पवित्र हृदय और प्रतिभा में जब कभी परस्पर विरोधी भाव परिलक्षित हों तब सदा हृदय का ही पक्ष ग्रहण करना चाहिए, तुम चाहे भले ही यह समझते रहो कि मेरा हृदय जो कुछ कर रहा है, वह न्याय संगत नहीं है। यदि तुम्हें किसी का उपकार करने की अभिलाषा हो, तो तुम्हारा मस्तिष्क यह बतलावेगा कि ऐसा करना नीति के अनुकूल नहीं है। परन्तु उस समय तुम अपने हृदय का अनुसरण करो। उस दशा में तुम्हें ज्ञात होगा कि मस्तिष्क का अनुसरण करने की अपेक्षा हृदय का अनुसरण करने में बहुत कम भूल करता हूँ। सत्य को प्रतिबिम्बित करने के लिये निष्पाप हृदय ही सबसे सुन्दर आइना है। इसलिए ये सारी शिक्षाएँ नियम पालन तथा कठोर व्रत आदि हृदय को विशुद्ध करने के ही लिए आवश्यक होते हैं, हृदय में विशुद्धता आते ही सारे तथ्य उसके ऊपर प्रस्फुटित हो जाते हैं। यदि तुम में यथेष्ट मात्रा में विशुद्धता होगी तो इस विश्व के सारे तथ्य तुम्हारे हृदय में अपने आप प्रस्फुटित हो जायेंगे।

मुट्ठी भर आदमियों ने जो इतने बड़े जन-समूह को दासता की बेड़ी में जकड़ रखा है, वह यह प्रतिभा के विकास का, तरह तरह के ज्ञान विज्ञान के आविष्कार का फल है। इस प्रतिभा के विकास के ही कारण तरह तरह की कृत्रिम आवश्यकताओं की सृष्टि हुई है और हर एक निर्धन व्यक्ति रुपयों के अभाव में भी इनकी पूर्ति के लिए व्यग्र रहता है। तरह तरह के प्रयत्न करके भी जब वह इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ नहीं हो पाता तब उसकी अन्तरात्मा में विकलता उत्पन्न होती है। उस विकलता से ही उसे अपने प्राण तक खो बैठने पड़ते हैं। प्रतिभा के विकास—बौद्धिक उन्नति-का यही फल है। इस दुख कोश की समस्या, प्रतिभा या बुद्धि की समायता से नहीं सुलझ सकती। इसे तो हृदय ही सुलझाता है। बौद्धिक विकास के लिए जितने भी उद्योग किये गये हैं वे ही यदि मनुष्य को अधिक विशुद्ध, अधिक नम्र और अधिक सहिष्णु बनने में उपयुक्त किये जाते तो यह संसार आज की अपेक्षा हजार गुना सुखमय होता। सदा हृदय को उन्नत बनाओ। हृदय के द्वारा भगवान बोलते हैं और प्रतिभा या बुद्धि के द्वारा आप स्वयं बोलते हैं।

पुरानी बाइबिल में मूसा से कहा गया है-”अपने पैरों से जूते उतार डालो, क्योंकि जहाँ तुम खड़े हो वह पवित्र यानी ईश्वर के बैठने का स्थान है।” हमें सदा ही बहुत श्रद्धा के भाव से धर्म के अध्ययन की ओर अग्रसर होना चाहिए। वह व्यक्ति जो पवित्र हृदय और श्रद्धा का भाव लेकर आता है, उसका हृदय खुल जायगा। उसके लिए द्वार मुक्त रहेगा और वह सत्य का दर्शन करने में समर्थ होगा।

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