हमारा कल्याण किस में है?
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(श्री परिपूर्णानन्द वर्मा)
संसार में ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जो अपना कल्याण न चाहता हो। यह बात दूसरी है कि ‘कल्याण’ का अर्थ ही हम गलत लगाते हों और यह न जान पाते हों कि वास्तविक कल्याण किस चीज में किस दशा में है। इसी अज्ञान का परिणाम है कि चोर या डाकू अपने निन्दनीय कार्य में भी कल्याण की गन्ध पाकर ही प्रवृत्त होता है। वेश्या अपने गन्दे पेशे को अपने सुख का हेतु समझती है और झूठ भी यही सोचकर बोला जाता है कि इससे कल्याण होगा। माया, ममता, मोह- सभी अवगुण इसी भ्रमित भावना के परिणाम हैं। इसीलिये यदि हम अपना सच्चा कल्याण चाहते हैं तो हमें यही जानना जरूरी है कि कल्याण है क्या वस्तु, वास्तविक कल्याण किस चीज में है?
मोटे तौर पर यही समझा जाता है कि जिस चीज से सुख मिले, वही कल्याण कर है। पर सुख भी तो कई प्रकार का होता है। शारीरिक सुख तो क्षणिक है। विषय-भोग में समय चुटकी बजाते बीत जाता है ओर यह अनुभव होने लगता है कि शरीर का सुख एक प्रकार से नहीं मिल सकता। बचपन में यदि खिलौना और मिठाई से सुख मिलता है तो जवानी में स्त्री से, धन से इच्छाएं पूरी होती हैं। बुढ़ापा आते आते सुख के क्रम और साधन में गुरुतर परिवर्तन हो जाते हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि सब सुख सामने हो पर इच्छा न होने पर भी एक अप्रत्यक्ष शक्ति उनसे छीनकर प्राणहीन कर देता है। और जिस शरीर को सुखी बनाने के लिए आत्मा का सौदा कर डाला, वही साथ छोड़ देता है। यही नहीं अपने द्वारा जिन जिनको सुखी बनाने की चेष्टा की, वही लोग हमारे मुर्दा शरीर को तुरन्त जलाकर उसकी राख पानी में फेंककर, दो घण्टे में ही हमसे छुट्टी पा जाते है। तब फिर ऐसी अनिश्चितता में भी क्या सुख माना जा सकता हैं। स्त्री, पुत्र, धन - जब सभी विमुख हो जाने वाले हैं तो यह अपने कैसे हुए? और जो अपने नहीं, वह सुखदायक कैसे कहा जाय? भर्तृहरि ने तो साफ कह दिया-
भोगे रोगमयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं,
मौने दैन्यभयं वले रिपुभयं रुपे जराया भयम्।
शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं,
सर्व वस्तु मयान्वितं भुवि नृणाँ वैराग्यमेवामयम्॥
‘भोग में रोग का, कुलीनता में मर्यादा के लोप होने का, धनी को राजा से धन छिन जाने का, मौन रहने में दीनता का, बलवान को शत्रु का, रूपवान को बुढ़ापे का, शास्त्र ज्ञाता को शास्त्रार्थ में पराजित होने का, गुणी को दुष्ट का तथा शरीर को मृत्यु का भय बना रहता है। सभी साँसारिक वस्तुएं भय से युक्त हैं, केवल वैराग्य की स्थिति ही भय रहित है।’
ऐसी नश्वरता के बीच में केवल एक ही सत्य है, एक ही सार वस्तु है और वह टैनिशन जैसे महा कवि के शब्दों में भगवान हैं। टैनिशन कहते हैं-
वही भगवान चिरन्तन है, अमर है और सबको प्यार करता है। एक ही ईश्वर है, उसका एक महान नियम, एक महान तत्व है, उसी की सुदूर दैवी घटना की ओर- चिरशान्ति की ओर समूची रचना चली जा रही है।’
ऐसे चिरंतन भगवान को न जानना ही अपना सबसे बड़ा अकल्याण है। ‘सादी’ का बड़ी सुन्दर युक्ति है कि ‘मैं भगवान से डरता हूँ और उसके बाद उससे डरता हूँ जो ईश्वर से नहीं डरता। जो ईश्वर को नहीं मानता, वह ‘भगवान से शत्रुता करता है और ईश्वर का बैरी, मनुष्य जाति का बैरी है।’ बेफन के इस कथन में जितनी सच्चाई है, उतनी ही दूरदर्शिता भी है। भगवान का न मानने वाला मनुष्य जाति के मर्म को समझ ही नहीं सकता। ‘बेली’ ने इसीलिए लिखा है कि ‘संसार में यदि कोई वस्तु जानने योग्य है तो वह भगवान है और दूसरी अपनी आत्मा।’ पैनिन ने ईश्वर के लिए बड़े ही सुन्दर शब्दों में लिखा है- ‘जिस संसार में हम रहते हैं, उसका कोई प्रारम्भ तो रहा ही होगा। बिना प्रारम्भ के विकास नहीं होता। बिना कारण के ‘प्रारम्भ’ नहीं होता। बिना प्रज्ञा के कारण नहीं बनता। वह ‘प्रज्ञा’ अनन्त और महान रही होगी। वह महान सदैव महान था और रहेगा- वही महान भगवान है।’ इस महान को देखने के लिए एमर्सन ने साफ लिखा है कि ‘प्रकृति का आवरण (पर्दा) बहुत ही झीना है। ईश्वर की सत्ता चारों ओर से प्रस्फुटित हो रही है। मैकसेन ने कहा है- ‘ईश्वर के निकट रहो, फिर तुम्हें सभी अन्य वस्तुएँ असत्य ज्ञात होंगी।’
भगवान की- विशेष व्याख्या अनावश्यक है। जिसे वेद ‘नेति-नेति’ कहकर अपनी व्याख्या समाप्त कर देते हैं, उसकी व्याख्या हम क्या करें। मैंने जान बुझकर ऊपर विदेशियों द्वारा की गयी उसकी व्याख्या लिखी है। हमारी शास्त्रीय व्याख्या तो अथाह है इससे ज्यादा उसके विषय में क्या कहा जा सकता है कि-
ऐर्श्वयस्य समग्रस्य भूतानामागतिं गतिम्।
वेत्ति विद्यामविद्या च स वाच्चो भगवानिति॥
‘जिसमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य हो और जो प्राणियों के आने जाने तथा ज्ञान-अज्ञान को भी जानता हो, उसे ‘भगवान’ कहना चाहिए।
उसी भगवान को जानना महाधर्म है और इस धर्म का पालन ही एकमात्र कल्याणकारी है। धर्म कोई संकुचित वस्तु नहीं है। यह कोई तर्क की बात भी नहीं है। धर्म तर्क से परे है। रेव.डा. हैरीएमर्सन फ्रास्डिक ने लिखा है- धर्म, संगीत, धार्मिक क्रिया-कलाप, प्रेम, अच्छाई, इत्यादि किसी भी वस्तु में ऐसी कोई बात नहीं है जो बुद्धिगम्य न हो। पर, जब तक संसार में सूर्य का प्रकाश है, हम इन वस्तुओं की महत्ता को तभी प्राप्त कर सकेंगे जब बुद्धि की सीमा को मान जायेंगे।
आजकल बुद्धिवाद का जोर है। पर बिना धर्म के बुद्धि कैसी सामाजिक हो जाती है, इसका निरूपण दार्शनिक बन ने किया है। वे लिखते हैं कि - ‘हृदय में धर्म का प्रदीप बिना जलाये बुद्धि का संस्कार केवल सम्य पाशविकता और छिपा हुआ जंगलीपन ही रहा जाता है। जब आदमी ‘ईश्वर के प्रति ही सच्चा’ न रहा हो तो वह मनुष्य के प्रति सच्चा कैसे हो सकता है? प्रसिद्ध वैज्ञानिक एच.डी. वेल्स लिखते हैं कि- ‘संसार में आदि तथा अन्तिम वस्तु धर्म है।’ आज धर्म के प्रति इतनी शत्रुता केवल इसीलिए है कि वह स्वयं बुराइयों का शत्रु है। बुरे को बुरा दीखता है। प्रसिद्ध पादरी डीन इंगे ने तो साफ कह दिया है कि जो व्यक्ति जैसा होगा, उसे भगवान वैसे ही देख पड़ेंगे और जिसको भगवान जैसे दिखायी देंगे, वह संसार के साथ वैसा ही व्यवहार करेगा।
लोग भूल से कह बैठते हैं कि धन ही समस्त सुख का मूल है। एपिक्यूरस ने साफ कह दिया है कि ‘संसार का वैभव महान सम्पत्ति में नहीं, कम से कम आवश्यकताओं में है। धन तो कामना को प्रज्ज्वलित कर संसार को विषैला कर देता है। त्याग सन्तोष का जनक है। रेग्ल्डस ने ठीक लिखा है कि जितना कम पैसा होगा, उतनी ही कम चिन्ता होगी। धन कमाना, प्राप्त करना सरल नहीं है। उसकी रक्षा करना उससे भी कठिन है। प्रसिद्ध धनु कुबेर रायचाइल्ड का यह कथन बड़ा कीमती है।
धन- यौवन इत्यादि से लाभ ही क्या जबकि-
कफन लपेट कै सुलायो रथी पे अन्त।
चूर होके खोपड़ी मसान में पड़ी रही॥
संसार का विकट सत्य मृत्यु है। कुछ भी कीजिये, इसके पाश से कोई बच नहीं सकता। बेकन के शब्दों में ‘मनुष्य के लिए मर जाना उतना ही स्वाभाविक है, जितना उसका जन्म लेना, और जिस प्रकार बच्चे को पैदा होने के समय कष्ट होता है, वैसा ही स्वाभाविक कष्ट मृत्यु के समय भी होता है।’
जब मृत्यु जैसी सत्य वस्तु को भी इन्सान भूल सकता है, तब उसका कल्याण किस प्रकार सम्भव है। ब्लेयर के शब्दों में- ‘जो लोग अपने धर्म में मरते हैं, भविष्य के सुख स्वप्नों के अन्धकार में पड़ें हुए हैं और जिन्होंने यहाँ से विदा होकर जिस संसार में जाना है, उसके लिए कोई तैयारी ही नहीं की है उनके सामने जब मृत्यु आकर खड़ी हो जाती होगी तो उन्हें कैसा घातक दुःख होता होगा।’
मरने से कौन नहीं डरता- किसे दुख नहीं होता! शेक्सपीयर नामक संसार प्रसिद्ध नाटककार का कथन है कि ‘राह चलते एक कीड़े को यदि हम पैर से कुचल देते हैं तो उसे मरने से उतना ही दुःख होता है, जितना बड़े से बड़े आदमी को!’ पर यह भी सत्य है कि जो मृत्यु को केवल पुराना वस्त्र बदलना ही समझता है और भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन को ध्यान में रखता है कि-
वासाँसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्लाति नरोऽपाराणि।
उसके लिए मृत्यु का भय नहीं है। लाँगफेलो कहते हैं कि ‘मृत्यु तो है ही नहीं। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, वह स्थान परिवर्तन मात्र है। यह शरीर ही नश्वर है -बस!’ एच.डब्ल्यू. बीचर ने बहुत ठीक कहा है कि ‘जिस प्रकार पहले फूल लगता है और जब यह झड़ जाता है, तब उसके स्थान पर फल या बीज उत्पन्न होते है, उसी प्रकार यह मृत्यु है जो नवीन रूप को जन्म देती है।’
इसलिए शरीर को नश्वर समझते हुए उससे मोह करना या उस पर घमण्ड करना नादानी और अज्ञान है। जो इस अज्ञान में नहीं पड़ता, उसी का कल्याण होता है। हमारा कल्याण इसी में है कि हम किसी से भी राग-द्वेष न कर अपने धन-बल या दारिद्रय पर भी सुख-दुख करना छोड़ दें और जीवन को उस एक उद्देश्य की सिद्धि का साधन समझें, जिसके लिए भगवान शंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है-
एकं ज्ञानं नित्यमाद्यन्तशून्यं
नान्यंन् किश्चिद् वर्तते वस्तु सत्यम।
यद्भेदोऽस्मिन्निन्द्रियोपाधिना वै
ज्ञानस्यायं भासते नान्यथैव॥
‘एक नित्य, आदि-अन्तरहित ज्ञान सत्य है। ज्ञान के सिवा अन्य कोई वस्तु सत्य नहीं है। इन्द्रियरूप उपाधि के कारण इस संसार में जो विभिन्नता दीख पड़ती है वह भी ज्ञान में ही भासती है।
इस ज्ञान का उपार्जन करना ही हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है और उसे प्राप्त करने के लिए सद्गुरु की तलाश करनी चाहिए। इसके अभाव में ही सब अनर्थ होते हैं। शिवसंहिता में स्पष्ट लिखा है-
अभेदो भासते नित्यं वस्तुभेदो न भासते।
द्विवधात्रिधादिभेदोऽयं भ्रमावे पर्यवस्यति॥
यद् भूतं यच्च भाव्यं व मूर्तामूत तथैव च।
सर्वमेव जगदिंद निवृत्तं परमात्मनि॥
‘परमात्मा संसार से भिन्न नहीं है। किसी वस्तु में भेद नहीं है और जो भेद प्रतीत होता है, वह भ्रम है। जो हुआ है और जो होगा, जो मूर्तिवान है और जो अमूर्त है- वह सब परमात्मा में ज्ञान से भासता है।’ ऐसा परम ज्ञान हो जाने से सब भेद भाव छूट जाता है। सारी वस्तुएं ईश्वरमय हो जाती हैं और मन का मोह नष्ट हो जाता है।
ऐसे ज्ञान के उपार्जन में ही हमारा महा कल्याण है।

