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Magazine - Year 1953 - Version 2

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रोग क्या हैं? और क्यों होते हैं?

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(श्री हीरालाल जी)

रोग शब्द से ही लोग दहल जाते हैं लेकिन रोग होने पर डरने की नहीं बल्कि खुश होने की जरूरत है। रोग बेचारा निस्वार्थी मित्र बन कर चेतावनी देता है कि संभल जाओ शरीर में विकार उत्पन्न हो गया है। यदि रोग की इस चेतावनी से अपने को सम्भाल लेते हैं तो आगे वाली मुसीबत से छुटकारा पा जाते हैं लेकिन यदि हम उसकी अवहेलना करते हैं तो प्रकृति हमें दुहरी सजा देती है, क्योंकि और दरबार में तो खुशामद चल भी जाती है लेकिन प्रकृति के यहाँ तो इसकी जरा भी गुँजाइश नहीं है। वहाँ तो जो अपने को, प्रकृति के चरणों में समर्पण करके उसके इशारे पर चलता है उसकी वह मदद और रक्षा हर प्रकार से करती है।

रोग के कारण के बारे में तो जिनसे पूछिये वह कुछ न कुछ तो कह ही सकता है पर वैज्ञानिक ढंग से छानबीन करने पर उसमें अनेक प्रश्न उपस्थित हो जायेंगे कि रोग का कारण क्या है? उससे छुटकारा कैसे पाया जा सकता है आदि प्रश्नों का भी हल होना आवश्यक है।

किसी का तो कहना है कि शरीर संस्थान में किसी भी प्रकार का व्यक्तिक्रम होना ही रोग है और किसी का कहना है कि जिस चीज से शरीर की स्वाभाविक गति में किसी प्रकार की रुकावट पैदा हो, रोग है। चाहे वह किसी विशेष कारण वा प्राकृतिक जीवन के कारण हुआ हो।

स्वास्थ्य क्या है?

जिस काम के करने में किसी प्रकार की तकलीफ न हो, श्रम से जो न उकताए, मन में काम करने के प्रति उत्साह बना रहे और मन प्रसन्न रहे और मुख पर आशा की झलक हो यही शरीर के स्वाभाविक स्वास्थ्य की पहचान है। मनुष्य स्वाभाविक दशा में बिना किसी प्रकार की कठिनाई के साँस ले सकें, आँख की ज्योति और श्रवण शक्ति ठीक हो, फेफड़े ठीक-ठीक ऑक्सीजन को लेकर नाइट्रोजन को बाहर निकालते हों, आदमी के सभी निकास के मार्ग-त्वचा, गुदा, फेफड़े ठीक अपने कार्य को करते हों, न तो कब्ज ही हो और न पतले दस्त की ही शिकायत हो, और पेट, आँत और गुदा में किसी प्रकार प्रवाह या मरोड़ न हो बल्कि प्रत्येक अंग ठीक ठीक काम करें और जो चीज इन स्वाभाविक क्रियाओं से दूर ले जाती है वही रोग है?

हम जब किसी रोगी से उसकी बीमारी के बारे में प्रश्न करते हैं तो वह कहता है कि मैं बीमार हूँ लेकिन उसे इसका क्या ज्ञान कि किस रोग से क्यों पीड़ित है लेकिन जब किसी स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉक्टर के पास जाइए तो वह इसे श्वाँस संस्थान का रोग बतायेगा।

बच्चा जब जोर जोर से चिल्लाकर अपना कान उँगलियों से खोदने लगता है तो बच्चे की माँ से पूछने पर वह उत्तर देती है कि बच्चे के कान में दर्द है।

इसी प्रकार हर एक आदमी चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान रोग के लक्षणों को रोग समझता है कि मैंने रोग के बारे में ठीक उत्तर दिया है। लेकिन वहाँ बुद्धि तुरन्त कह देती है कि यह सब रोग नहीं बल्कि रोग के लक्षण मात्र हैं। रोगी को चिकित्सा के लिए रोग क्यों हुआ, कैसे हुआ जान लेना बहुत आवश्यक है।

बीमार कौन होता है?

हम सभी लोग जानते हैं कि ऐसा ही आदमी बीमार पड़ता है जिसका जीवन नियमित नहीं है और प्रकृति के साथ पूरा पूरा सहयोग नहीं कर रहा है। सोते समय उसके कमरे बन्द रहते हैं, खाने बैठता है तो पेट को खूब पूड़ी कचौड़ी से भर लेता है कि खाने के बाद तुरन्त चलना फिरना दुश्वार हो जाता है। व्यायाम नहीं करता, माँस मछली तथा शराब आदि अनेक भारी चीजों का सेवन करता है जिनका शरीर से निकास होना दुश्वार हो जाता है। जब उस भोजन से पैदा हुआ दूषित पदार्थ शरीर से बाहर नहीं निकल पाता तो एक एक करके त्वचा, गुर्दे और फेफड़े के शिथिल पड़ जाने से शरीर की स्वाभाविक गति में कमी आ जाती है। वह अपना काम ठीक ठीक नहीं कर पाता जीतेजी मुर्दे की तरह जिन्दगी बिताता है। ऐसे आदमी को ‘रोगी’ कहकर पुकारते हैं। ऐसी अवस्था में शरीर में एकत्र हुआ दूषित पदार्थ न निकलने के कारण ही जवानी में ही बुढ़ापे से बदतर हालत हो जाती है।

जीवन के लिए अनेक चीज घातक भी हैं लेकिन बुद्धिमानों का काम है वह जीवन में ऐसे रास्तों को अख़्तियार करें कि जिस रास्ते पर चलने से जीवन में रोग देखने को न सुनने को न मिले। यदि हम अपने नित्य के रहन-सहन, खान-पान पर रोजाना एक सरसरी नजर डाल लिया करें और देखें कि हम प्रकृति से कहाँ अलग हो रहे हैं, बस वहीं रुककर प्रकृति के पीछे पीछे चलना शुरू कर दें तो स्वास्थ्य खराब ही न हो? और जब हमारा स्वास्थ्य ठीक रहेगा तो रोग की गुँजाइश ही कहाँ?

सुन्दर स्वास्थ्य के सामने रोग का उसी प्रकार पता नहीं चलता जिस प्रकार सूर्य निकलते ही अँधेरे का।

रोग के प्रकार

रोग का अन्वेषण करने पर मालूम होता है कि रोग दो प्रकार के हैं-

(1) किसी भी अचानक घटना- आग लगने, पेड़ पर से गिरने, ऊँचे घर पर से गिरने, किसी सवारी पर से गिरने, पानी से डूबने से, पाले पत्थर पड़ जाने आदि के कारण रोग हो जाता है।

(2) रोग शरीर से गन्दगी निकालने का प्रयास मात्र है।

दवाओं के जन्मदाताओं का कहना है कि रोग का शरीर के तरल तत्व में ही स्थान है। रक्त अशुद्ध होने के कारण ही रोग पैदा होता है। रोग हजारों शक्ल में पैदा होता है और उसमें हजारों ही लक्षण हैं और उन्हीं लक्षणों के अनुसार ही डाक्टरों ने रोग का विभाजन किया है, लेकिन प्रकृति का पुजारी प्राकृतिक चिकित्सक तो रोग एक-वह रक्त की अशुद्धता से पैदा होता है- रोग का कारण एक और दूसरी दवा भी एक ही मानता है कि हम गलत आहार बिहार के कारण बीमार पड़ते हैं, उसे ठीक कर लेने पर स्वस्थ रहना जन्मसिद्ध अधिकार है।

रक्त दूषित होने के अनेक कारण हैं लेकिन संक्षेप में यह जान लेना आवश्यक है कि रक्त जानने वाले यन्त्रों में किसी प्रकार की अस्वाभाविकता आ जाने से अपना काम जब ठीक ठीक नहीं कर पाते तो रक्त अशुद्ध हो जाता है और साथ ही रक्त में विष पैदा हो जाता है जिसके फलस्वरूप निकास द्वार उस दूषित द्रव्य को बाहर निकालने से असमर्थ हो जाते हैं और उसी समय रोग की घण्टी बज जाती है कि सावधान हो जाओ!

अब तो यह मालूम हो गया है कि रोग शरीर से विष निकालने का प्रकृति का एक प्रयास मात्र है। दुश्मन के बदले यह चेतावनी देकर और विष को शरीर से बाहर निकाल कर सच्चे साथी का काम करता है।

रक्त के अशुद्ध हो जाने पर यदि रोग द्वारा चेतावनी न दी जाय तो वह यों ही मर जायगा लेकिन रोग की घण्टी बजने से वह सावधान होकर अपने को सम्भालने की कोशिश करता है कि उसे अब अपने जीवन के गलत आहार विहार को छोड़कर प्रकृति की शरण आना चाहिए। वह सोचने लगता है कि जीवन में अब अस्वाभाविकता आ गई है और इसका एकमात्र उपाय है सम्भलना। जब हम आरम्भ में ही प्रकृति की चेतावनी पर ध्यान दे देते हैं तो रोग का कारण शीघ्र ही समूल नष्ट हो जाता है नहीं तो दिन प्रतिदिन बुरी हालत हो जाती है और तेजी से हम मौत के नजदीक पहुँच जाते हैं। यही नहीं मर कर भी अपना रोग अपनी सन्तान को दे जाते हैं और वह खानदानी रोग बन जाता है।

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