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Magazine - Year 1953 - Version 2

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गायत्री महा अभिज्ञान आयोजन

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मनुष्य जीवन में सद्बुद्धि का महत्व सब से अधिक है। किसी की अन्तरात्मा में सत तत्व अधिक हो तभी उसी विचारधारा और कार्य प्रणाली मानवोचित हो सकती है। यदि उसके अन्तस्थल में दुर्बुद्धि भरी हुई हो तो वह जो कुछ भी सोचेगा, जो कुछ भी करेगा वह सब उसके अपने लिए तथा समस्त संसार के लिए अशुभ परिणाम ही उत्पन्न करेगा। आज पढ़ाई लिखाई की बहुत बढ़ोतरी हो रही है और कमाई करने के भी उपाय निकाले जा रहे हैं। यह सब उचित और आवश्यक भी है। परन्तु जब तक मनुष्य की अन्तरात्मा में सत् प्रेरणा न हो, उसकी स्वाभाविक अभिरुचि शुभ दिशा में न हो तो यह पढ़ाई, कमाई, चतुराई, शक्ति, सत्ता आदि कितनी भी बढ़े उससे शैतानी को ही बल मिलेगा। बिना पढ़ा, भूखा नंगा, अशक्त, असंगठित, बदमाश कितनी बुराई कर सकता है उसकी अपेक्षा यदि वह शिक्षित, धनी, गिरोह बन्द, चतुर हो तो अनेक गुने भयंकर उत्पात कर सकता है। आज दुर्भाग्य से ऐसे ही पथ प्रदर्शक, एवं शासक, संसार को प्राप्त हैं। फलस्वरूप दुनिया अशान्ति, संघर्ष, त्रास, अनीति, चिन्ता एवं पतन की सर्वनाशी सड़क पर द्रुत गति से दौड़ी जा रही है।

इस प्रवाह को रोकने के लिए मनुष्य के अन्तस्तल के उस मूल उद्गम स्थल का स्पर्श करना होगा जिसमें तनिक सा परिवर्तन होते ही विचार पद्धति एवं कार्य प्रणाली में भारी हेर फेर हो जाता है। रेलवे की लाइनों को इधर उधर बदलने के लिए स्टेशनों पर ‘केंची’ होती है। इसमें एक लाइन को जरा सा इधर उधर हटा दिया जाय तो उस पर दौड़ने वाली रेल की दिशा बदल जाती है। इस कैंची के परिवर्तन से एक ही समय एक ही साथ चलना आरम्भ करने वाली रेलों में से एक रेल कलकत्ता जा पहुँचती है दूसरी बम्बई। दोनों के अन्तिम स्थान में सैकड़ों मीलों का अन्तर पड़ जाता है। मनुष्य के अन्तरात्मा में भी एक ऐसी ही केंची है जो यदि मूल मान्यताओं ने थोड़ा हेर फेर कर दें तो मनुष्य के बाह्य जीवन की सारी रूप रेखा ही बदल जाती है।

यों मनुष्य को अच्छा मनुष्य बनाने के लिए सरकारी और गैर सरकारी अनेक प्रयत्न होते रहते हैं भाषणों और लेखों द्वारा भी ऐसे ही प्रचार बहुत होते रहते हैं पर देखा जाता है कि उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं होता। कारण कि- उन प्रयत्नों का प्रभाव अन्तस्तल में अवस्थित जीवन दिशा बदलने वाली केंची तक नहीं होता। उस अदृश्य गहन स्तल का स्पर्श स्थूल उपकरणों से होता भी नहीं। उसके लिए सूक्ष्म औजारों और प्रयत्नों की जरूरत पड़ती है।

गायत्री उपासना एक ऐसा विज्ञान सम्मत अनुभूत, परीक्षित, रामबाण उपाय है जो मनुष्य के अत्यन्त ही सूक्ष्म एवं गहन अन्तस्तल पर प्रभाव डालता है, केंची काटकर जीवन दिशा बदलता है, दृष्टिकोण में, भावना में, लक्ष्य में, इच्छा में, अभिरुचि में परिवर्तन उपस्थित करता है। जो कार्य सैकड़ों उपदेश सुनने और हजारों लेख पढ़ने से भी सम्भव नहीं है वह इस ऋषियों द्वारा निरन्तर परीक्षित गायत्री उपासना द्वारा सहज भी सम्भव हो सकता है। इसी लिए गायत्री उपासना का इतना अधिक महत्व माना गया है। वह सद्बुद्धि की देवी है। आत्मा में सद्प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाय तो जीवन में उपस्थित सभी अमंगलों का शोक सन्तापों का, सरलतापूर्वक निवारण हो सकता है। मानव का वास्तविक, ठोस, चिरस्थायी लाभ उपार्जन, स्वार्थ साधन जितना गायत्री द्वारा हो सकता है, उतना और किसी उपाय द्वारा नहीं हो सकता। इस सुदृढ़ तथ्य के कारण ही गायत्री उपासना पर इतना अधिक जोर दिया जाता है।

गायत्री का महत्व अखण्ड ज्योति परिवार एवं गायत्री संस्था के सदस्य भली प्रकार जानते हैं। ऋषियों के, महात्माओं के, सिद्ध पुरुषों के दिव्य अनुभवों को छोड़ भी दें तो हम लोग स्वयं अपने अपने जीवनों में जो असाधारण दिव्य अनुभव कर चुके हैं, उसके आधार पर हम लोगों की अत्यन्त दृढ़ मान्यता है कि आत्म कल्याण के पुण्य परमार्थ के विश्व हित के जितने भी उपाय हैं उनमें गायत्री माता की शरणागति एक उत्कृष्ट साधन है। इसलिए हम सब सदैव इस बात के लिए प्रयत्न शील रहते हैं, कि भारतीय संस्कृति की मूलभूत आधार शिला, अनन्त आर्य विद्याओं की उद्गम स्थली गायत्री माता की भारत भूमि की पुनः प्रतिष्ठा हो और हम अपने प्राचीन गौरव, बल, वैभव, को पुनः प्राप्त करें।

‘गायत्री माता की दिव्य शक्ति से अधिक लोग लाभ उठावें” यह इच्छा प्रत्येक सच्चे गायत्री भक्त के मन में रहनी चाहिए। जो व्यक्ति स्वयं तो माता से बहुत कुछ माँगते हैं किन्तु उसके लिए कुछ नहीं करते ऐसे स्वार्थी लोग सकाम उपासना द्वारा थोड़ा लाभ भले हो उठालें पर उन्हें माता का सच्चे प्रेम, वात्सल्य एवं अनुग्रह प्राप्त नहीं हो सकता। जो अपने भौतिक लाभों को नहीं माता की महिमा बढ़ाने के लिए श्रम करते हैं वस्तुतः वे ही सच्चे त्यागी मातृभक्त हैं। हम अपने को ऐसा ही मातृभक्त सिद्ध करना चाहते हैं और गायत्री प्रचार की पुनीत साधना में संलग्न हैं।

लोग गायत्री उपासना को तभी अपना सकते हैं जब जानकारी हो। पूरे परिचय के अभाव में तो हीरा भी काँच जैसा तिरस्कृत होता है, नेत्र विहीन के लिए चन्द्रमा की कोई महत्ता नहीं। यदि अनायास ही किसी को गायत्री उपासना के लिए कहा जाय तो उसकी समझ में इसकी उपयोगिता न आवेगी, कुछ टूटा फूटा करने भी लगा तो उसका मन न लगेगा। पर यदि उसे इस विद्या की पूरी जानकारी हो जाय उसके लाभ, महत्व, विज्ञान, विधान, रहस्य, अर्थ, प्रयोजन एवं तत्व ज्ञान का पूरा पता चल जाय, तो वह बिना किसी की प्रेरणा के स्वयं ही इस सन्मार्ग पर श्रद्धा और दृढ़तापूर्वक प्रवृत्त होता है। अपना आत्म कल्याण करता है और जिसने उसे ज्ञान दान किया या दिलाया था उसके लिए पुण्य रूप बनता है। इसलिए हम लोगों की गायत्री साधना की प्रधान श्रद्धाँजलि “गायत्री प्रचार” है। इन गुलदस्ते को पाकर माता अन्य किसी की साधना की अपेक्षा अधिक प्रसन्न होती है।

नारद जी सब ऋषियों से बड़े माने जाते हैं, भगवान के घर में उनका सदैव आना जाना रहता था। कोई शंका होती थी तो वे विष्णु भगवान के पास सीधे दौड़ जाते थे। यह सौभाग्य और किसी ऋषि को प्राप्त न था। भगवान की सर्व अधिक प्रिय जिस साधना को और कोई ऋषि न कर सका वह था “भगवद् भक्ति का प्रचार।” नारद जी अपनी मुक्ति आदि की चिन्ता में अन्य ऋषियों की भाँति जप तप नहीं करते थे। उन्हें अपनी नहीं भगवद् भक्ति के प्रचार की चिन्ता थी। एक क्षण मात्र का विश्राम लिए बिना वे निरन्तर इसी प्रचार तप से संलग्न रहते थे और यहाँ से वहाँ भगवान का गुणानुवाद करते हुए भी भ्रमण करते रहते थे।

हम अखण्ड ज्योति परिवार एवं गायत्री संस्था के सदस्यों ने भी नारद जी के चरण चिन्हों पर चलने का व्रत लिया हुआ है। हमारा यह व्रत साधन संसार की किसी भी अन्य साधना से अधिक उत्कृष्ट है। बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, विवेकानन्द, रामतीर्थ, दयानन्द प्रभृति आत्माएं इसी प्रचार मार्ग में आपका जीवन लगा चुकी हैं। शुकदेव, व्याग्र, शौनिक आदि के जीवन भी इसी दिशा में लगे थे। हम लोग अब तक इस दिशा में तत्परतापूर्वक बढ़ते रहे हैं। अब इस सम्बन्ध में एक विशेष आयोजन आरम्भ किया जा रहा है।

मकर संक्रान्ति ज्ञानदान का प्रधान त्यौहार है। धार्मिक प्रकृति के लोग इस दिन पंचांग या अन्य कोई छोटी बड़ी पुस्तकें दान करते हैं क्योंकि इस शुभ अवसर पर पुस्तक दान का महात्म्य बहुत भारी माना गया है। मकर की संक्रान्ति से लेकर कुम्भ की संक्रान्ति होने तक का एक महीना मुहूर्त शाखा ज्योतिष विद्या एवं गृह की पृथ्वी पर आने वाली किरणों के प्रभाव ‘विज्ञान के अनुसार ऐसा शुभ है कि इस समय में की हुई ज्ञान चर्चा अत्यधिक सफल रहती है। इसी आधार पर प्रयोग हरिद्वार, नासिक, उज्जैन, वृन्दावन के कुम्भ मेले होते हैं। इन मेलों का उद्देश्य सामूहिक रूप से ज्ञान प्रसार करना था। सन्त महात्मा अपनी कुटियों और नियामत साधनाओं को छोड़कर पैदल यात्रा करते हुए कुम्भ मेले में पहुँचते थे। सन्तों का आपसी विचार विनिमय होता था। लाखों की संख्या में जनता वहाँ पहुँचकर ज्ञान लाभ तथा तीर्थ यात्रा का पुण्य करती थी। आज उन मेलों का ढंग बिगड़ गया है तो भी मूल कारण और उद्देश्य वही है।

इस वर्ष प्रयाग (इलाहाबाद) का कुम्भ मेला है। मकर संक्रान्त (14 जनवरी गुरुवार) से प्रारम्भ होकर 14 फरवरी रविवार तक रहेगा। इस महीने में गायत्री ज्ञान प्रसार के लिए एक विशद ‘अनुज्ञान’ करेगा। ‘अनुष्ठान’ में जप प्रधान है ‘अनुज्ञान’ में ज्ञानदान प्रधान है। जिस प्रकार सवा लख जप का एक अनुष्ठान होता है वैसे ही संचालन व्यक्तियों को गायत्री विद्या की जानकारी कराने का हमारा संकल्प है। वह सामूहिक संकल्प है। जैसे पिता के कर्ज में और लाभ कमाने में उसके बेटे भी शामिल माने जाते हैं। कानूनी रूप से सम्मिलित समझे जाते हैं उसी प्रकार संस्था द्वारा किये गये इस संकल्प में सभी सदस्य भागीदार हैं। इसका श्रेय और पुण्य हम सभी का है इसलिए इसे पूर्ण करना भी हम सभी का कर्तव्य और उत्तरदायित्व है।

उपर्युक्त एक मास में संचालन नये व्यक्तियों को गायत्री विद्या की समुचित जानकारी कराने का संकल्प पूर्ण करने के लिए संस्था की ओर से एक अत्यन्त ही सस्ता, आकर्षक एवं महत्वपूर्ण प्रकाशन किया गया है। पाँच पाँच पैसा मूल्य की आठ पुस्तकें इसी अवसर के लिए छापी गई हैं। (1) गायत्री की गुप्त शक्ति, (2) गायत्री से बुद्धि विकास, (3) सुख शान्ति दायिनी गायत्री, (4) गायत्री की दिव्य सिद्धियाँ, (5) स्त्रियों की गायत्री साधना, (6) गायत्री उपासना कैसे करें, (7) गायत्री का अर्थ सन्देश (8) गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध। यह आठ पुस्तकें छापी गई हैं। पुस्तक साइज के 16 पृष्ठ तिरंगे चित्ताकर्षक मुखपृष्ठ इन सबके हैं। पाँच पैसा मूल्य लगभग लागत मात्र है। केवल दस आने का यह सैट साधारणतः गायत्री विद्या का आवश्यक ज्ञान, विधान, महत्व, लाभ, विज्ञान, रहस्य, अर्थ, प्रयोजन, तत्वज्ञान एवं साधन की बहुत कुछ जानकारी करा देता है। हम लोग मिलकर इस साहित्य को अपने अपने क्षेत्र में अधिक से अधिक संख्या में फैलाने का प्रयत्न करें।

गायत्री संस्था के प्रत्येक सदस्य को कुम्भ पर्व के अवसर पर आयोजित इस महान ‘अनुज्ञान’ में भाग लेना चाहिए। तीस दिन में प्रति दिन एक सैट के हिसाब से साधारणतया तीस सैट प्रचारित कर देने का प्रयत्न कर चाहिए। थोड़ा साहस और प्रयत्न करने वालों के लिए यह कुछ भी कठिन नहीं है। साधारण दुकानदार प्रतिदिन दर्जनों ग्राहकों को पटाते हैं, और रोज बहुत पैसे की बिक्री करते हैं। तो क्या एक ग्राहक रोज पा लेना या दस आने रोज की इतनी सस्ती और सुन्दर वस्तु बेच देना कुछ कठिन होगा नहीं, निश्चय पूर्वक थोड़ा मनोबल रखने वालों के लिए यह बहुत ही सरल बात है! हम चाहते हैं कि जहाँ। तक हो सके यह सैट बेचे जायं। क्योंकि विक्रय के लिए दूसरों को कुछ समझाना भी पड़ता है, समझाने वालों को जो समय खर्च करना पड़ता है, और वस्तु अधिकारी लोगों के ही हाथ में पहुँचती है, यह दोनों ही बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक महीने में 18 रु. का ऐसा अद्भुत साहित्य बेच देना बहुत सरल है। प्रतिभावान और मनस्वी लोग तो इससे कई गुना कार्य कर सकते हैं।

जिनको कम अवसर हों वे चाहे थोड़ा ही कार्य करें पर करें अवश्य। बिल्कुल न करने से कम करना ही उत्तम है। आठ सैट (80 पुस्तक) 6 रु. की मँगाई जा सकती हैं। इतना बेचने की तो समय या प्रयत्न भी अधिक नहीं लगेगा। इसमें से भी यदि कुछ बिकने से बच जाय तो उसे वितरण करने में भी बहुत भारी बोझ नहीं है। जहाँ बहुत ही असुविधा है वहाँ कई सदस्य मिलकर केवल 6 रु. की पुस्तक मँगाकर भी कुछ न करने के दोष से बच सकते हैं। स्मरण रहे 6 रु. से कम मूल्य की पार्सल न भेजा जायगा क्योंकि छोटे पार्सलों में कई बार मूल्य की बराबर तक पोस्टेज लग जाता है।

अपनी श्रद्धानुसार इस साहित्य को दान करना या भेंट उपहार में देना भी उत्तम है। पर देते समय बेगार नहीं भुगतनी चाहिए। जिस किसी के सिर पर अनावश्यक रद्दी की तरह फेंक देने से कुछ लाभ नहीं। जिनमें धार्मिक प्रवृत्ति के अंकुर पहले से हों उन्हीं को देना उचित है। केवल ब्राह्मणों को ही यह पुस्तकें दान की जाय ऐसी कोई बात नहीं। अपने रिश्तेदार, कुटुम्बी, मित्र, व्यवसाय, सहयोगी, परिचित लोगों को सबसे पहले देना उचित है। जिन्हें देना हो, उन्हें गायत्री विद्या के सम्बन्ध में कुछ मौखिक रूप से भी समझना चाहिये। यह आवश्यक नहीं कि अपने ग्राम या नगर में ही सब पुस्तकें दी जायें। दूरस्थ लोगों को डाक से बुक पोस्ट द्वारा भेजनी चाहिए और अलग से एक एक कार्ड भी उन्हें तद्विषयक जानकारी तथा प्रेरणा के लिए देना चाहिए इस प्रकार दूरस्थ प्रदेशों में भी प्रचार कार्य किया जाना चाहिए।

अनेक व्यक्ति दिवाली पर, वर्ष आरम्भ होने के अवसर पर कैलेन्डर, शुभकामना सन्देश उपहार आदि भेजते हैं। अपने जन्म दिन, बालकों के जन्म दिन, पूर्वजों या प्रियजनों के श्राद्ध, पुत्रजन्म, विवाह, पदवृद्धि, परीक्षा में उत्तीर्णता, मुकदमें की सफलता, प्रतिभोज, कथा, कीर्तन, सभा, सम्मेलन, व्रत, अनुष्ठान, तीर्थ यात्रा, त्यौहार आदि अवसरों पर कुछ दान करते, उपहार देते या गायत्री सैट दिये जाये तो कितना उत्तम हो। अन्न दान की अपेक्षा ज्ञानदान का महत्व असंख्य गुना अधिक है। किसी को भोजन करा देने की अपेक्षा उसे ज्ञानामृत पिला देने का फल बहुत अधिक है।

कई गायत्री उपासक मिलकर एक मण्डली के रूप में अपने नगर के धार्मिक व्यक्तियों के पास इस साहित्य को बेचने जावें। जैसे कि गाँधी जयन्ती पर चर्खा संघ व काँग्रेस के कार्यकर्ता खादी बेचने घर घर जाया करते हैं। ऐसे परमार्थिक कार्यों में संकोच या झिझक करना अथवा अपनी हेठी समझनी भूल है।

इस एक महीने में प्रतिदिन एक नये व्यक्ति से गायत्री सम्बन्धी चर्चा करने का नियम बना लिया जाय तो तीस व्यक्तियों में प्रचार हो सकता है। जिनके पास गायत्री सम्बन्धी पुस्तकें हैं वे अपनी पुस्तकें इस मास तक नये पढ़ने वाले ढूंढ़कर उन्हें पढ़ाते रहें। इस कार्य में आने जाने की, समझाने की तथा कभी कभी पुस्तकें फटने या गुप्त होने की भी आशंका रहती है, इतने पर भी यह सब करना ही उचित है। जिन्हें सुविधा हो वे अपने समीपवर्ती नगरों में भी इस उद्देश्य के लिए यात्राएं करनी चाहिए। नौकरी पेशा वाले या व्यवसायी लोग अपनी छुट्टी का दिन इस प्रयोजन के लिए लगा दिया करें तो एक महीने में इस अवधि में चार पूरे दिन भी लगा सकते हैं।

इस एक मास में कम से कम एक सामूहिक प्रचार आयोजित करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, गोष्ठी, आदि का आयोजन स्थानीय सुविधा के अनुसार करना चाहिए। जो दिन सुविधा का हो वही रखना चाहिए। साधारणतः बसन्त पंचमी इसके लिए विशेष उपयुक्त है। हमारी इच्छा है कि कुछ व्यक्ति अपना जीवन ही गायत्री प्रचार के लिए लगा दें। प्राचीन काल में अनेक ऋषि मुनि लोक हित के लिए अपना जीवन दान करते थे और अपनी व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं को, लोभ, मोह तथा स्वार्थ की तिलाँजलि देकर परमार्थिक उद्देश्यों के लिए अपना जीवन दान कर देते थे। आज तो सभी को अपनी अपनी पड़ी है कोई कोठी बँगले खरीद रहा है तो कोई ऋद्धि या स्वर्ग मुक्ति के लिए संलग्न है। ऐसे लोग ढूंढ़े नहीं मिलते जो अपनी बात को ताक पर उठाकर रखदें और नारदजी की भाँति अपने इष्ट का मान एवं महत्व बढ़ाने में संलग्न हों। हम लोगों से कोई ऐसे सच्चे लोग हैं या नहीं, अभी तक इस प्रश्न का ठोस उत्तर नहीं दिया जा सकता है। जिन्हें साहस हो वे बढ़कर आगे आवें, गायत्री प्रचार में अपना शेष जीवन लगावें। उनके जीवन निर्वाह की व्यवस्था अटकी न पड़ी रहेगी। जिनमें इस सम्बन्ध में अभिरुचि हो हमसे पत्र व्यवहार करलें।

जिनके पीछे पारिवारिक बहुत झंझट नहीं है, जिनके ऊपर गृहस्थों के अधिक उत्तरदायित्व नहीं है। तथा जो आलस्य रहित, कर्मनिष्ठ है, जिनकी वाणी ज्ञान प्रसार करने की योग्यता से युक्त है ऐसे धर्म परायण व्यक्ति अपने जीवन को गायत्री माता के चरणों में अर्पण करके अपने को सब प्रकार धन्य बना सकते हैं।

महा अनुज्ञान, हमारा सच्चा कुम्भ मेला है। इस वर्ष यह पर्व है जो 12 वर्ष बाद आता है। हम लोग अपने अपने घरों, ग्रामों और नगरों में गायत्री प्रचार के आयोजनों द्वारा सच्चे रूप में कुम्भ पर्व मनावेंगे। इस अवसर पर हम लोगों को ‘महा अनुज्ञान’ पूर्ण करना है। सवालक्ष व्यक्तियों तक अपनी माता का संदेश पहुँचाना है। हम में से एक भी ऐसा न रहे जो अपनी सुविधा और सामर्थ्य अनुसार किसी न किसी प्रकार इस आयोजन में भाग न लें और इसे सफल बनाने में कोई भी योगदान न करे। हमारा विश्वास है कि संस्था का एक भी परिजन ऐसा न होगा जो इस पुण्य आयोजन में भाग लेने के महत्व की उपेक्षा करे। माता हम सबको साहस, बल और उत्साह प्रदान करें।

कुम्भ स्नान के लिए लाखों व्यक्ति बहुत किराया खर्च करके जाते हैं वहाँ भी बहुत दान पुण्य करते हैं। हमारे परिवार के सदस्य भी इस अवसर पर निष्क्रिय न रहें वे कुम्भ स्नान के मूल उद्देश्य के अनुसार अपना कार्यक्रम बनावें। सर्वोत्तम ज्ञान गायत्री ज्ञान को अपने निकटवर्ती क्षेत्र में दीपक बनकर प्रकाशित करें। जिनकी सामर्थ्य हो वे कुम्भ में आगत साधु-महात्माओं में तथा बद्रीनाथ आदि तीर्थों के तीर्थ यात्रियों में गायत्री साहित्य अपनी ओर से वितरण करा सकते हैं। वितरण करने की व्यवस्था हम अपने विश्वस्त आदमियों द्वारा भी करा सकते हैं।

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