ब्रजधाम (Kavita)
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ब्रज की पावन भूमि जहाँ पर प्रगट हुये गिरधारी,प्रहरी गोवर्धन अभिसिंचित करती यमुना प्यारी,
रस के कलश सदृश नित अम्बर जिस पर उमड़ा रहता,
कुंज कुंज में घूम प्रलय है अपनी बातें कहता, फूल फूल पत्ते पत्ते की पागल प्रेम कहानी। लिखता रहता सरसी रुह से कालिंदी का पानी॥ जिसकी रज को चूम अनेकों रसिक बने दीवाने,
भक्ति तूलिका पाकर मन के भाव बन गये गाने, सहसा बनी विरक्ति हृदय की चिर सिंचित अभिलाषा,
कृष्ण चन्द्र के दर्शन हित मन चातक अब भी प्यासा, नटवर तुम्हें प्राप्त करने को व्याकुल है विकलता।
तुम्हें मनाने अलंकार से सजकर आई कविता॥ मथुरा ब्रज की मुकट भूमि का अरुण विभव सुखदाई,
जिसके रंग मंच पर आई द्वापर की तरुणाई,
जिसने बतलाया कि पाप पर सदा पुण्य जीता है, सदा दंभ का घर मानव की ममता से रीता है,
जिसने लिखी अतीत पटल पर भरत भूमि की गाथा। झुक जाता जिसके पदरज के आगे कवि का माया॥
गीता का आदर्श जहाँ पर मूर्तिमान हो बोला, दमन दैत्य को ग्रस लेने को चंडी ने मुँह खोला,
यहाँ कृष्ण का चक्र सुदर्शन सर्वप्रथम था घूमा, यही विजय की श्री को पौरुष ने पहले था चूमा,
यहाँ सदा ही रहे भूमि के स्वामी बन संन्यासी। राजनीति हो गई यहाँ पर सत्य धर्म की दासी॥ कृष्ण भक्ति के सरस काव्य ने यहीं प्राण पाया है,
सूरदास ने यहीं बैठ निज गीतों को गाया है, कृष्ण भक्त कवियों ने खोली यहीं भाव मंजूषा,
मध्यकाल के अन्धकार ने पाई पावन ऊषा, अंकित अब भी काव्य जगत में रास रंग की बातें।
जिन्हें स्वच्छ रखती भक्तों के नयनों की बरसातें॥ *समाप्त*
(श्री शिवशंकर मिश्रा, एम.ए.)
कुंज कुंज में घूम प्रलय है अपनी बातें कहता, फूल फूल पत्ते पत्ते की पागल प्रेम कहानी। लिखता रहता सरसी रुह से कालिंदी का पानी॥ जिसकी रज को चूम अनेकों रसिक बने दीवाने,
भक्ति तूलिका पाकर मन के भाव बन गये गाने, सहसा बनी विरक्ति हृदय की चिर सिंचित अभिलाषा,
कृष्ण चन्द्र के दर्शन हित मन चातक अब भी प्यासा, नटवर तुम्हें प्राप्त करने को व्याकुल है विकलता।
तुम्हें मनाने अलंकार से सजकर आई कविता॥ मथुरा ब्रज की मुकट भूमि का अरुण विभव सुखदाई,
जिसके रंग मंच पर आई द्वापर की तरुणाई,
जिसने बतलाया कि पाप पर सदा पुण्य जीता है, सदा दंभ का घर मानव की ममता से रीता है,
जिसने लिखी अतीत पटल पर भरत भूमि की गाथा। झुक जाता जिसके पदरज के आगे कवि का माया॥
गीता का आदर्श जहाँ पर मूर्तिमान हो बोला, दमन दैत्य को ग्रस लेने को चंडी ने मुँह खोला,
यहाँ कृष्ण का चक्र सुदर्शन सर्वप्रथम था घूमा, यही विजय की श्री को पौरुष ने पहले था चूमा,
यहाँ सदा ही रहे भूमि के स्वामी बन संन्यासी। राजनीति हो गई यहाँ पर सत्य धर्म की दासी॥ कृष्ण भक्ति के सरस काव्य ने यहीं प्राण पाया है,
सूरदास ने यहीं बैठ निज गीतों को गाया है, कृष्ण भक्त कवियों ने खोली यहीं भाव मंजूषा,
मध्यकाल के अन्धकार ने पाई पावन ऊषा, अंकित अब भी काव्य जगत में रास रंग की बातें।
जिन्हें स्वच्छ रखती भक्तों के नयनों की बरसातें॥ *समाप्त*
(श्री शिवशंकर मिश्रा, एम.ए.)

