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Magazine - Year 1956 - Version 2

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भारतीय संस्कृति में गुण-कर्म की प्रधानता

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गुण, कर्म, स्वभाव से ही किसी व्यक्ति की लघुता और महानता को नापा जा सकता है। जिस प्रकार कलक्टर का लड़का कलक्टर और चपरासी का लड़का चपरासी होना जरूरी नहीं, इसी प्रकार किसी वंश में उत्पन्न होने वाले सभी व्यक्ति अपने पूर्वजों के समान ही हों, यह कोई आवश्यक नहीं। सर्वत्र कर्म की ही प्रधानता है। जो जैसे कार्य करता है उसकी गणना उसी श्रेणी में होने लगती है। पूर्व काल में चारों वर्णों का निर्धारण इसी आधार पर हुआ था इसके कुछ प्रमाण नीचे उपस्थित किये जाते हैं—

एकवर्णमिदं पूर्व विश्वमालीद्यु धिष्ठिर। कर्मक्रिवा विशेषण चतुर्वर्णं प्रतिष्ठितम्॥

—महाभारत

पहले केवल एक ही वर्ण था। बाद में कर्म-क्रिया विशेष वश चार वर्ण हुये।

एक एव पुरावेदः प्रणवः सर्ववां्मय। देव नारायणोनान्य एकोग्निर्वर्ण एव च॥

—भागवत

पहले सर्वांगमय प्रणव ही एक मात्र वेद था। डडडड डडडड था और कोई नहीं। एक मात्र लौकिक अग्नि ही अग्नि और एक मात्र हंस ही वर्ण था।

आदौ कृतयुगे वर्णों नृणां हंस इति स्मुतम्।

—पुराण

प्रारम्भ में-सत्ययुग में मनुष्य की एक मात्र जाति हंस थी।

अप्रंवृत्ति कृदयुगे कर्मणोः शुभषाषये। वर्णाश्रम व्यवस्थाश्व न तद्सिन न संकरः।

—पुराण

उस सत्ययुग में पाप-पुण्य की सृष्टि नहीं हुई थी, वर्णाश्रम व्यवस्था नहीं थी। इसीलिये उस समय वर्णशंकर भी नहीं था।

चातुर्वर्णस्य वर्णेन यदि वर्णों विभिद्यते सर्वेषा खलु वर्णानाँ दृश्यते वर्णसंकर। कामः क्रोधो भयं लोभः शोकश्चिन्ता क्षुवाश्रमः

सर्वेषा नः प्रभवति करमाद्वर्णो विभिद्यते। चिद्मूत्रपूरीपाणि श्लेष्मा वित्तं सशाणित। तनुः क्षरति सर्वेषाँ कस्याद्वर्णो विभिद्यते॥ जंगमानायसंख्येयाः स्थावराणाँ च जातयः। तेषाँ विविधवर्णानाँ कुतो वर्णविनिश्चयः। —शान्ति॰ 188।5

यदि रंग से ही वर्णभेद समझा जाय तब तो सभी वर्णों में वर्णशंकर देखे जायेंगे। फिर हम सभी लोग काम, क्रोध, मद, लोभ, शोक, चिन्ता और भ्रम से पराभूत होते हैं, इसलिये वर्णभेद होते कैसे हैं? स्वेद, मूत्र, पुरीष, श्लेष्मा, पित्त और शोणित सभी शरीरों में समान भाव से क्षरित हो रहे हैं फिर वर्णों भेद कैसे होता है? फिर अशेष प्रकार के स्थावर और जंगमों के वर्णों की विभिन्नता कैसे निश्चित? होगी!

न विशेषोऽस्ति वर्णानाँ सर्व ब्राह्ममिद्ं जगत। ब्रह्मणा पूर्वसृष्ठम् हि कर्मभिर्वर्णता गतम् ॰॥ क मभोग प्रियास्तीक्ष्णाः क्रोधनाः प्रियसाहसाः। व्यक्तस्वधर्मा रक्त गास्ते द्विजा क्षत्रता गताः॥11॥ गोभ्यो वृत्ति समास्माय पीताः कृष्पुप जीविन। स्वधर्मान्नितिष्ठन्ति ने द्विज वैश्यताँ गताः॥12॥ हिंसानृतप्रिया लुघ्घाः सर्व कर्मोपजीविन। कृष्णाःशौचरिभ्रष्टास्ते द्विजाः शूद्रताँ गताः॥13॥ इत्येतैः कर्मभिर्व्यस्ताः द्विजाः वर्णान्तरंगता धर्मो यज्ञक्रिया तेषाँ नित्यं न प्रतिषिध्यते॥14॥ इत्येते चतुरोवर्णा येषाँ ब्राह्मी सरस्वती। विहिता ब्रह्मणा पूर्व लोभादज्ञानताँ गता॥15॥

—शान्ति पर्व

वर्णों की कोई विशेषता नहीं है। समस्त जगत् को ब्रह्मा ने पहले ब्राह्मणमय ही सृष्ट किया था। बाद में सभी कर्मानुसार नाना वर्ण को प्राप्त हुए। जो ब्राह्मण काम, भोगप्रिय, तीक्ष्ण स्वभाव, क्रोधी, प्रिय साहस और स्वधर्म त्याग करके राजसिक लोहित वर्ण हुये वे क्षत्रिय हो गये। गोरक्ष वृत्ति ग्रहण करके जो कृषि जीवी हुए वे स्वधर्म त्यागी पीतवर्ण वाले ब्राह्मण वैश्य हुये। जो ब्राह्मण हिंसाप्रिय, अनृत प्रिय लोभी और सर्वकर्मोपजीवी हो गये, वे शौच परिभ्रष्ट कृष्णवर्ण ब्राह्मण शूद्र हुये। इन कर्मों से पृथक् पृथक् ब्राह्मण लग ही वर्णान्तर को प्राप्त हुये। इसीलिए उनके लिए यज्ञ किया और धर्म नित्य विहित हैं, निषिद्ध नहीं। इन चारों वर्णों को वेद में अधिकार है, ब्रह्मा का यही पूर्व विधान है। लोभ के कारण ही लोग अज्ञान को प्राप्त हैं।

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहू राजप्यः कृतः। ऊरु तद्स्य यद्वैश्यः पद्भ्याँ शूद्रो अजापत॥

—10म मण्डल 90 सूक्त 12

उस प्रजापति के मुख ब्राह्मण, बाहु क्षत्रिय, उरु वैश्य थे और पदों से शूद्र उत्पन्न हुये।

प्रत्समदस्य शौनकश्चातुर्षरार्यं प्रवर्तंयिताभूत्।

—विष्णु॰ अंश 4।8।1

विष्णु पुराण के मतसे गृत्समद के पुत्र शौनक ने चातुर्वणर्य व्यवस्था प्रवर्तित की।

भार्गस्य भार्गभूमि अतश्चतुर्वरार्यप्रवृतिः।

—विष्णु, चतुर्थ अंश 8, 91

भार्ग से भार्गभूमि उत्पन्न हुए और उनसे चातुरवर्ण्य प्रवर्तित हुआ।

ब्राह्मणश्च दक्षिणाँगुष्ठ जन्मादक्ष प्रजापतिः।

—विष्णु 4, 1, 5

दक्ष प्रजापति ब्रह्मा के दाहिने अंगुष्ठ से उत्पन्न हुये।

ब्राह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः पञ्चमहर्षयः। मरींचिरपंगिरिसौः पुलस्यः पुलहः क्रतुः। मरीचे कश्यपः पुत्रः कश्यपातु इमाः प्रजाः।

—आदिपर्त्र 65, 10।11

ब्रह्मा के 6 मानसपुत्र है, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतुः। मरीचि के पुत्र हैं कश्यप। उन्हीं से पूजाओं की सृष्टि हुई।

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।

—गीता 4,13

मैंने गुण कर्म के अनुसार चातुरवर्ण्य की सृष्टि की हैं।

सर्वोऽयम् ब्राह्मणों लोके वृत्तंनेतु ब्रिधीयते। वृत्तं स्थितस्तुशूद्रोऽपि ब्राह्मणत्वं नियच्छति॥

—अनु॰ 143,51

चरित्र से सभी ब्राह्मण हो सकते हैं शूद्र भी यदि सच्चरित्र हो; तो ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है।

आर्जवे वर्तमानस्य ब्राह्मरायमभि ज्रायते।

—वन॰ 211,12

जो आर्जव् या सरलतापूर्वक आचरण करता है, उसी को ब्राह्मणत्व प्राप्त होता है।

एभिस्तु कर्मोभिर्देवि शुभराचरितैस्तथा। शूद्रो ब्राह्मणताँ याति वैश्यः क्षत्रियताँ ब्रजेत्॥

‘सदाचार और कर्म से ही शूद्र ब्राह्मण होता है और वैश्य क्षत्रिय होता है।’

एतैः कर्मफलैर्देवि न्यूनजाति कुलोद्भः। शूद्रोऽप्यागमसंपन्नों द्विजो भवति संस्कृतः॥

(अनु॰ 144, 43)

‘सत्कर्म के फल से आगम सम्पन्न शूद्र संस्कृत होकर द्विजत्व प्राप्त करता है।’

ब्राह्मणोवाऽप्यसद्वृत्तः सवसंकरभोजनः। ब्राह्मण्यं स समुत्सृज्य शूद्रो भवति तादृशः॥

(अनु॰ 144, 47)

‘ब्राह्मण भी असत् चरित्र और सर्वसंकर भोजन करने से जाति च्युत होकर शूद्र हो जाता है।’

कर्मभिः शुचिभिर्देवि शुद्धात्मा विजितेन्द्रियः। शूद्रोऽपि द्विजवत् सेव्य इति ब्रह्माऽव्रवीत् स्वयं॥

(अनु॰ 144, 48)

‘पवित्र कर्म से शुद्धात्मा और विजतेन्द्रिय शूद्र भी द्विजवत् सेवनीय होता है, यह बात स्वयं ब्रह्मा ने कही है।’

पुत्रो गृत्समद्म्यापि शुनको यस्य शौनकाः। ब्राह्मणाः क्षत्रियाञ्चैव वैश्याः शूद्रास्तथैव च॥

(हरिवंश—29 अध्याय 1519-20)

‘गृत्समद् के पुत्र शुनक हुए। शुनक से ही शौनक नाम से परिचित ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बहुत से पुत्र उत्पन्न हुए।

अक्षराद् ब्राह्मणाः साम्याःक्षणत् क्षत्रियबान्धवाः। वैश्या विकारतञ्चैव शूद्रा धूमविकारतः॥

(हरिवंश—भविष्य पर्व 210, 11816)

‘ अक्षर से ब्राह्मण, क्षर से क्षत्रिय, विकार से वैश्य और धूम-विकार से शूद्रगण उत्पन्न हुए।’

वाक्यसंयमकाले हि तस्य वरप्रद्स्य देवदेवस्य ब्राह्मणः प्रथमं प्रादुर्भूताः। ब्राह्मणेभ्यञ्च शेषा वर्णाः प्रादुर्भूताः।

(महाभारत शाँति॰ 342, 21)

‘देवदेव नारायण के वाक्य संयम के समय उनके मुख से पहले ब्राह्मणों की उत्पत्ति हुई। अन्यान्य वर्णों ब्राह्मणों से उत्पन्न हुए।’

यस्मात् त्रिपु वर्णैषु ब्राह्मणो यज्ञसृष्टा तस्मात्। सर्वेऽपि वर्णा ऋजवः साधव एव यज्ञसंयोगात्॥ (नीलकंठ टीकाकार)

‘चूँकि तीन वर्णों में ब्राह्मण ही यज्ञसृष्टा है, इस लिये उत्पन्न सभी वर्ण ही यज्ञ संयोग वश ऋजु अर्थात् साधु हैं।’

संसर्ज ब्राह्मणनग्रे सृष्टयादौ स चतुर्मुखः। सर्वे वर्णाः पृथक् पश्चात् तेषाँ वंशेषु जज्ञिरे॥

(पद्मपुराण, उत्कलखंड 38,44)

‘चतुर्भुज ब्रह्मा ने सृष्टि के प्रारंभ में पहले ब्राह्मणों का ही सृजन किया। फिर अन्य सभी वर्ण उन्हीं के वंश में पृथक-पृथक उत्पन्न हुए।

येन पूर्णभियाकाशं भवत्यकेन सर्वदा। शून्यं येन जनाकीर्ण तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥

(शान्ति 244, 11)

जिसके अकेले रहते भी आकाश पूर्ण की भाँति ज्ञात होता है और शून्य स्थान जनाकीर्ण सा लगता है, उसे ही देवता लोग ब्राह्मण कहते हैं।’

न क्रुध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः। सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मण विदुः॥

(शान्ति 244-14)

‘सम्मानित होकर भी जो धृष्ट नहीं होता, अपमानित होकर भी रुष्ट नहीं होता, जो सर्वभूत को अभय देने वाला है, उसे ही देवता लोग ब्राह्मण कहते हैं।’

जीवित यस्य धर्मार्थ धर्मो हर्यर्थमेव च। अहोरात्राश्च पुण्यार्थ तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥

(शान्ति 244, 23)

‘जिसका जीवन धर्म के लिये है, धर्म हरि के लिये है और दिन रात पुण्य के लिये है, उसे ही देवता लोग ब्राह्मण कहते हैं।’

निराभिषमनारंभं निर्नमस्कारमस्तुतिम्। निर्मुक्त बंधनैः सर्वेस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥

(शान्ति 244, 24)

‘जो निरामिष हैं, जो अनारम्भ हैं, जो स्तुति और नमस्कार से हीन हैं, जो सर्व बन्धन से विमुक्त हैं, उसे ही देवता लोग ब्राह्मण कहते हैं।’

कारणं हि द्विजत्वे च वृत्तमेव न संशयः।

(वन॰ 312, 108)

‘निस्सन्देह चरित्र ही ब्राह्मणत्व का कारण है।’

ब्राह्मणो वा च्युतो धर्माद्यथा शूद्रत्वनाप्नुते।

(अनु॰ 144, 59)

‘धर्म की सहायता से शूद्र भी द्विज होता है और धर्म से विमुख होकर ब्राह्मण भी शूद्र हो जाता है।”

ब्राह्मणस्य सदाकालं शूद्रप्रेषणकारिणः। भूमाचन्नं प्रदातव्यं यथाहि वा तथैव सः।9।35

‘ब्राह्मण शूद्र की नौकरी करके कुत्ते के समान हो जाता है उसे भी कुत्ते की तरह जमीन पर अन्न देना विहित है, क्योंकि जैसा कुत्ता है वैसा ही वह है।’

तं होवाचनैतद् ब्राह्मणोववक्तु मर्हति, समधि सौम्याहरोपमत्वा नैष्येनसत्यादगा इति॥

—छाँदोग्य 4।4।5

जाबाला के पुत्र सत्यकाम के माता की बात को गुरु से ज्यों का त्यों कह देने से गुरु गौतम ने कहा कि—सच्चे ब्राह्मण के सिवा और कोई ऐसी सच्ची बात नहीं कह सकता। जाओ सौम्य, समिध लाओ। मैं तुम्हें उपनीत करूंगा, इसलिये कि तुम सत्य से भ्रष्ट नहीं हुये।’

ततो ब्राह्मणताँ यातो विश्वमित्रों महातयाः। क्षत्रियः सोऽष्यथ तथा ब्रह्मवंशस्य कारकः॥

—शल्य॰ 4।48

‘विश्वामित्र क्षत्रभाव से ब्राह्मण भाव को प्राप्त हुये थे।’

उतासि मैत्रावरु णो वसिष्ठौर्वश्या ब्रह्मनमनसोऽधिजातः।

(ऋग्॰ 7।33।11)

असल में अगर जन्म से ब्राह्मणत्व का विचार किया जाय तो पता चलता है कि विशिष्ठ स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी की सन्तान है। मित्रावरुण के औरस से उनका जन्म है। वशिष्ठ के जन्म में कुछ गोलमाल था, इसीलिये ऋग्वेद में कहीं उन्हें उर्वशीपुत्र और तृत्सु-वंशोत्पन्न कहा है। कई जगह उन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र भी कहा है।

किं ब्राह्मणस्य पितरं किमु पृच्छसि मातरं। श्रतुँ चंदस्मिन् वेद्यं स पिता स पितामहः॥

(काठकसंहिता 30।1)

कृष्ण यजुर्वेद कहता है—ब्राह्मण के माता-पिता को क्यों पूछते हो? यदि उसमें श्रतु है, तो वही उस का पिता है, वही पितामाह।

नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं यथैकता समता सत्यता च शीलं स्थितिर्दस्भनिवाननमार्जवं ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः।

—शान्ति॰ 175।3-7

‘एकता, सत्यता, समता, अहिंसा, सरलता और कर्म में अनासक्ति इनसे बढ़कर ब्राह्मणों का कोई धन नहीं है।’

तत्रचोद्यमस्ति को या ब्रह्मणोनाम, किं जीवः किं देह किं जातिः, किं ज्ञानम् किं धार्मिकक इति।

‘ब्राह्मण कौन है? जीव या देह या जाति या ज्ञान या कर्म या धर्म से ब्राह्मण नहीं होता, अद्वितीयात्मा का साक्षात्कार होने से ही ब्राह्मण होता है।’

तब प्रथमो जीवो ब्राह्मण इतिचेतन्न। अतीतानागतनिक देहानाँ जीवस्यैकरुपत्वात् एकस्यापि कर्मवशाद नेक देह संभवात् सर्वं शरीराणाँ जीवस्यैकरुपःवाच्च। तस्मान्न जीवो ब्राह्मण इति।

‘पहले विचार किया जाय कि क्या जीव ब्राह्मण है? ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि अतीत और अनागत काल में नाना जातीय देहों में जो जीव चल रहा है, वह एक रूप है, एक ही जीव के कर्म वश अनेक देह पैदा होते हैं, इस प्रकार सर्व शरीर के जीव के एकरूपत्व की बात सोचने से जान पड़ता है कि जीव ब्राह्मण नहीं हो सकता।

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