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Magazine - Year 1956 - Version 2

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स्वभाव को कैसे सुधारा जाय

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(श्री रामकुमार शर्मा, आगरा)

सामाजिक संस्कारों के अनुशीलन के सिलसिले में अनेकों खोजियों ने आश्चर्य के साथ देखा होगा कि सुखी और सम्पन्न घराने के लोगों ने किसी संवेग से प्रेरित हो किसी के साधारण मूल्य की वस्तुयें चुरा लीं। यद्यपि उतने पैसे या उन वस्तुओं का अभाव उन्हें जरा भी नहीं होता, फिर भी चुराने में उसे मजा आता है। और ये आदतें मार-पीट, दबाव और शासन से नहीं छूटती। मनुष्य इन आदतों को छोड़ने की इच्छा करके भी नहीं छोड़ पाते। इन जटिल आदतों को कैसे छुड़ाया जाय, इनके मूल कहाँ हैं, इन सभी बातों के लिये मन का विश्लेषण करना आवश्यक है।

इन आदतों की उत्पत्ति कैसे होती है, इस सम्बंध में प्रथम विचार, इस प्रकार के हैं-बार बार किसी कार्य को करते रहने से, उसके संस्कार कर्त्ता के मन पर क्रमशः जमते जाते हैं और एक दिन वे संस्कार घनीभूत होकर आदत में परिणत हो जाते हैं। जिस प्रकार बारम्बार के संघर्ष से जड़ पदार्थों में एक निश्चित संस्कार उत्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्यों में भी किसी काम को बारम्बार करते रहने से वह उसकी आदत ही बन जाती है। इसलिये कोमल शिशुओं को किसी काम में बारम्बार लगाने से उसकी आदत निर्मित करने के लिए पर्याप्त हैं और किसी आदत को बदलने के लिए उसके विपरित कार्यों को बारम्बार कराना भी पर्याप्त है।

नवीन मनोवैज्ञानिक विचारधारा कहती है कि प्रत्येक आदत की जड़ किसी संवेग में रहती है और इस संवेग के उत्तेजित होने पर आदत से होने वाले कात किए जाते हैं। संवेग की उत्तेजना, शिथिलता एवं विनाश ही, आदत की क्रिया शीलता, उसकी दिलाई एवं नाश का कारण बनता है। आदत मशीन है, संवेग उसकी चालक विद्युत शक्ति है। अभ्यास की बारम्बारता आदत निर्मित होने का कारण नहीं है। जटिल आदतें, मानसिक जटिलता, पेंचदार संवेगों के कारण ही उत्पन्न होती हैं।

यदि बुरी आदतें छुड़वाने और छोड़ने की जरूरत है तो इसके लिए आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार उन संवेगों के केन्द्र, मानसिक ग्रन्थियों के खोल देने ही से उन संवेगों के नष्ट हो जाने पर ही सम्भव है।

इस सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिक चिकित्सा के अनुभवी श्री हेड फील्ड महाशय के कथन उल्लेख किये जाते हैं—

“मानसिक चिकित्सा में देखने में आता है कि जब किसी भावना ग्रन्थि को पूर्णतः नष्ट कर दिया जाता है, तो उससे सम्बन्धित बुरी आदत उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जिस प्रकार बिजली के प्रवाह की धारा तोड़ देने से बिजली का प्रकाश समाप्त हो जाता है। कारण के हटा देने पर कार्य का अन्त अपने आप हो जाता है। यदि आदत मानसिक ग्रन्थि के हटाने पर भी बनो रहे, या हटाने में समय ले रही हो, तो समझना चाहिए कि मानसिक ग्रन्थि अभी तक विद्यमान है।

इसका सबसे सुन्दर प्रत्यक्ष प्रमाण धार्मिक परिवर्तनों में देखा जाता है। बड़े से बड़ा पापी भी एक ही दिन में किसी अपने विशेष अनुभव से पुण्यात्मा बन जाता है। और अकस्मात् अपनी ऐसी आदतों को छोड़ देता है, जो जन्म से ही बनी आ रही थी। मनुष्य के संवेगात्मक जीवन में परिवर्तन होने से, उसकी बुरी आदतें उसे सदा के लिए छोड़ देती हैं। बुरी आदतों को मिटाने के लिए सम्भव है कि मानसिक चिकित्सकों को, उस ग्रन्थि को खोज निकालने में अनेकों सप्ताह अथवा महीने भी लगे, किंतु एक बार उस मानसिक ग्रन्थि को ढूंढ़ लेने पर (जो ग्रन्थि, उस आदत की जड़ है) तथा उसके निराकरण होने पर बुरी आदत अचानक ही नष्ट हो जाती है यह नियम न केवल आचरण की कुछ आदतों के लिए लागू होता है, वरन् शारीरिक अभ्यासों, मानसिक अकारण भयों,दुःखानुभूतियों आदि के लिए भी पूर्ण रूपेण लागू होता है। नैतिक सुधार में ही यह मनोवैज्ञानिक नियम कार्य करता है।

उस सिद्धाँतों का समर्थन ऐसे अनेकों उदाहरणों से किया जाता है। वाल्मीकि,तुलसीदास,सूरदास आदि इसके उदाहरण हैं। संवेग परिवर्तित होते ही इनके विचार ही नहीं,आचरण तक बदल गये। मनोवैज्ञानिक चिकित्सक प्रमाण के लिए ऐसे ही उदाहरण पेश करते हैं, जिसके कुछ नमूने नीचे दिये जा रहे हैं—

एक महाशय को रात के तीन बजे जग जाने की आदत पड़ गयी थी। वह स्वयं इस समय सोना चाहते थे, पर लाख चाहने पर उसे नींद नहीं आ पाती थी। इस आदत की स्वभाव ग्रन्थि की खोज करने पर पता चला कि एक बड़े ही तीव्र वेदना भरे अनुभवों के कारण ही वह जटिल ग्रन्थि बन गयी थी जिसने इस आदत का रूप धारण कर रक्खा था। कई वर्ष पूर्व उन्हें पेचिश की बीमारी हुई थी। इस बीमारी के कारण एक रात के तीन बजे सहसा ही इनकी नींद टूट गयी और उस समय उनके पेट में इतनी दुस्सह पीड़ा हुई कि उन्होंने समझ लिया कि अब मेरे प्राण शरीर से निकलने ही वाले हैं। पश्चात् ये पीड़ा और पेचिश एवं मृत्यु भय की बात उसकी याद में से धुल गयी पर उस मानसिक ग्रन्थि के निर्मित हो जाने के कारण उसे अनचाहे भी तीन बजे जग जाना पड़ता था। संवेगात्मक-अनुभव का संबन्ध तीन बजे रात के जगने से हो गया था, अतः संवेग के उत्तेजित होते ही आदत क्रियामाण हो पड़ता था, और वे नींद से वंचित हो जाते थे।

कभी-कभी मानव के जीवन में यह आश्चर्य भी उपस्थित होता है कि जिस व्यक्ति से हम सद्भाव पूर्वक बरतने का विचार रखते हैं, प्रेम करना चाहते हैं, उसी व्यक्ति को देखते ही कुछ ऐसे भाव भी उद्वन्द्व हो पड़ते हैं जो उस विचार और भाव के बिल्कुल विपरीत पड़ते हैं। वैसा व्यवहार करना हमारे विचार को जरा भी पसन्द नहीं, और न वैसा करना ही चाहते हैं, फिर भी एक संवेग वैसा कर डालने के लिये अनुप्रेरित करता रहता है। इसके भी एक उदाहरण जो मनोवैज्ञानिक जनों की ओर से दिए गए हैं, उसे देखिये और इस मनोवैज्ञानिक जटिलताओं के कारणात्मक सत्य की परख कीजिए—

एक अस्पताल में एक पुरुष “नर्स’ का काम करता था। उसी अस्पताल में एक “नर्स” का काम करने वाली महिला से उसे प्रेम हो गया। उसके प्रति उस (पुरुष) के हृदय में स्नेह के बाढ़ आते, तो उसकी सुन्दर कल्पना में विभोर हो उठता, पर ज्यों ही वह महिला उसके सामने आती तो उसमें एक संवेग उठता कि उसके सुकोमल गालों में जोर से एक घूंसा लगा दूँ। घूंसा मारने से तो प्रेम और विवाह होने की सारी स्थितियाँ बिगड़ ही जाएंगी, यही सोच कर वह अपने को रोक लेता, पर अन्तर से उठते हुए संवेग को रोकने में वह सदा ही असमर्थ रहता। एक दिन वह इसी चिंता में तल्लीन था कि अपनी प्रेमिका के प्रति, प्रतिकूल आचरण करने का संवेग जो मुझे होता है, वह क्यों? सहसा ही उसे याद आयी कि एकबार अस्पताल में नर्स का काम करते हुए उसे एक महिला नर्स ने नौकरी से वञ्चित कर वह स्वयं उस स्थान पर अधिकृत हो गयी थी। उसकी उस गर्हित नीचता से पुरुष को बड़ा क्रोध आया और उसने उस महिला नर्स से कहा--आज यदि मैं भी एक नारी होता तो तुम्हारे सुकोमल से कपोलों को जोर के घूंसे मारकर मरम्मत कर देता, किंतु अफसोस! वह आवेश उसने रोक लिया था और कुछ दिनों के बाद उसे भूल भी गया, पर उसी ने उसके मन में-स्वभाव में एक ग्रन्थि उत्पन्न कर दी थी; जिससे वैसे चेहरे वाली नर्सों के गाल उसके सामने आते ही उसके संवेग उत्तेजित हो उठते और उसे वह बड़ी कठिनाई से संयत कर पाता था।

यह स्मृति में आने के उपरान्त उसकी मानसिक ग्रन्थि खुल गयी और उस अनिच्छित संवेग की भी परिसमाप्ति हो गयी।

अतः आज का मनोविज्ञान चाहता है कि मनुष्यों की बुरी आदतों को छुड़ाने के लिए उसके विरुद्ध अच्छी आदतों का बारम्बार अभ्यास करना असफल प्रयोग है। बुरी आदतें तो तभी छूट सकती हैं जब उसकी आदत की कारण स्वरूपा मान सके ग्रन्थियों को ढूंढ़ कर सुलझायी खोल डाली जाय।

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