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Magazine - Year 1956 - Version 2

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योगेश्वर भगवान कृष्ण

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(श्री ओऽम् प्रकाश शर्मा बी.ए.एल.टी. मथुरा)

हिन्दू धर्म और आर्य संस्कृति में समस्त ऐतिहासिक और प्रामाणिक महापुरुषों से अधिक भगवान कृष्ण का व्यापक प्रभाव पड़ता है जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भगवान कृष्ण हमारे सम्मुख आदर्श रूप हैं। संगीत, नाटक, नृत्य, शिल्प तथा काव्य से लेकर राजनीति, कूटनीति और दर्शन जैसे शुष्क विषयों में भी श्रीकृष्ण रमे हुये हैं। श्रीकृष्ण को अलग करके किसी विषय की पूर्णता की कल्पना ही नहीं की जा सकती, विशेषतः साँस्कृतिक और धार्मिक क्षेत्र में।

हमारे जीवन में व्याप्त श्रीकृष्ण के दो रूप हमारे समाने आते हैं। पहिला रूप ललित, गुणात्मक, जिसे हमारे भावुक भक्तों, संत कवियों तथा सहृदय कलाकारों ने अपनाया।

इस रूप का मूल स्रोत श्रीमद्भागवत् है।

इसमें भगवान कृष्ण के विभिन्न किन्तु सहज, सरल, तथा सरस ललित गुणों को आख्यानों द्वारा जनता के समक्ष उपस्थित किया गया है। इन्हीं गुणोँ को हमारे संत कवियों ने अपनाया और अपनी कला के चमत्कार से कृष्ण को जन-जन के हृदय में बसा दिया है।

इस रूप में कृष्ण के सौंदर्य और उनकी बाल-लीला को ही विशेष बल दिया गया है लेकिन कोई स्थल ऐसा नहीं जहाँ कृष्ण के शौर्य और वीरता को प्रधानता दी गई हो।

श्री कृष्ण भारतीय जनता के रोम-रोम में बसे हुये हैं इस का कारण यह है कि- हमारे सहृदय भक्त कवियों ने श्री कृष्ण के इस पहलू को इस प्रकार उपस्थित किया, जो जनसाधारण के जीवन के लिये यथार्थ और स्वाभाविक होने साथ-साथ सरसता लिये हुए है। श्री कृष्ण का यह जनप्रिय रूप इस सीमा तक व्यापक हुआ कि हजारों वर्षों से इसी रूप को सम्मुख रखने में न तो कलाकार ही ऊबे और न जनता ही ऊबी। हिन्दी और संस्कृत के सभी कवियों ने श्रीकृष्ण के इसी रूप को ग्रहण किया है। यहीं तक नहीं उनके इस रूप पर विमोहित होकर मुसलमान कवि रहीम, रसखान, ताज, आलम और सागर निजामी तक, इस रूप के दीवाने हैं।

इस जादू का रहस्य यही है कि इसमें मानवमात्र की कोमलतम भावनाओं को विकसित होने का आधार मिलता है, जीवन का व्यापक दृष्टिकोण मिलता है। इसमें मानवमात्र को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया गया है।

जहाँ कृष्ण की ललित और गुणात्मक लीलाओं ने मानव मात्र के हृदय में प्रेम की पवित्र धारा बहाई हैं, वहाँ कृष्ण का दूसरा रूप महाभारत के एक योद्धा, कुशल राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ, राजदूत और योगिराज के रूप में अपने कर्तव्य के लिये कटिबद्ध पाते हैं।

यह रूप विविधता का है। विविध मतावलम्बी, दार्शनिक एवं राजनीतिज्ञ अपने सिद्धान्तों के अनुसार उन्हें विभिन्न रूपों में अपनाते हैं। द्वैत और अद्वैतवादी सगुणोंपासक और निर्गुणोंपासक सभी भगवान कृष्ण को अपने-अपने मतों के प्रतिपालक के रूप में पाते हैं।

महाभारत के कृष्ण तत्कालीन परिस्थितियों के नेता के रूप में पाये जाते हैं। वे कौरवों और पाँडवों के मध्य महाभारत युद्ध के मेरु दण्ड हैं। वे एक दार्शनिक विचारक और राजनीतिज्ञ के रूप में हमारे सम्मुख आते हैं।

श्रीकृष्ण वास्तविकता की कसौटी पर कसकर ही शत्रु और मित्र को देखते हैं। परिस्थितियों का वास्तविक स्वरूप ही उनके सम्मुख आता है। वे कठिन परिस्थितियों के समय भी मन और मस्तिष्क का संतुलन नहीं खोते।

राम हमारे सम्मुख जीवन का आदर्श उपस्थित करते हैं वे अपने जीवन से संसार के सम्मुख आदर्श नियमों का निर्माण करते हैं, जब कि कृष्ण प्रतिकूल समय और परिस्थितियों में उस आदर्श का उल्लंघन कर कठोर सत्य एवं यथार्थता को अपनाते हैं।

इस प्रकार कृष्ण मानव उद्धार के लिये अवतरित हुए हैं। कृष्ण ने न्याय और सत्य के स्थापन के लिये विभिन्न साधनों को अपनाया है। वे शान्ति के स्थापन के लिये, पहिले प्रत्येक योद्धा के पास जाते हैं।

महाभारत के युद्ध में कृष्ण को कोई स्वार्थ न था। महाभारत के युद्ध के पहिले भी कितने ही राजाओं को परास्त किया, लेकिन उन्होंने उनके राज सिंहासन उन्हीं के बन्धु-बान्धवों को दे दिये, यहाँ तक कि भगवान् कृष्ण द्वारिका के भी राजा न बने।

दुर्योधन ने सूचीभेद्य भूमि तक देने से इन्कार कर दिया तो उन्हें पाण्डवों का साथ देना पड़ा।

गीता हमारे राष्ट्र के जीवन में अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में बहुत अधिक तीव्र हथियार रही है। अर्जुन ने अपने बन्धु-बान्धवों को युद्ध-स्थल में खड़ा देखा तो उन्होंने अपने हथियार डाल दिये। श्रीकृष्ण ने उस समय उन्हें धर्म और न्यायपूर्ण मार्ग दर्शाया और पलायनवादी प्रवृत्ति को समूल नष्ट कर दिया।

जनता को संगठित करने और उसे अत्याचार के विरुद्ध सक्रिय बनाने के लिये यह आवश्यक है कि जनता के मनोबल और आत्मविश्वास की दृढ़ता में कमी न आये यह श्रीकृष्ण का आत्मविश्वास युगों से जन जीवन में यह अमिट आशा और मनोबल को दृढ़तर करता आ रहा है।

गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने रूढ़िवादिता अन्धानुकरण और परिस्थितियों को न पहिचान कर जबरदस्ती लादने वाली प्रवृत्तियों का विरोध किया है।

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादाश्च भापसे। गतासूनगतासूँश्च नानुशोचन्ति पंडिताः॥

श्रीकृष्ण का यही यथार्थवादी रूप हमारे जीवन में संजीवन रस भर देता है।

श्रीकृष्ण का यही रूप हमें यथार्थ सत्य एवं न्याय की ओर उन्मुख कराता है और हमें सद्जीवन यापन करने की प्रेरणा देता है। यों ललित कलायुक्त भक्त भावन कृष्ण भक्त जनों के मानस सागर में प्रेम भावनाओं को तरंगित करने में विशेष महत्वपूर्ण हैं।

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