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Magazine - Year 1957 - Version 2

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वर्ण व्यवस्था का आदर्श

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(आचार्य क्षितिमोहन सेन शास्त्री, एम.ए.)

वर्णाश्रम धर्म भारतीय समाज संगठन का मूलाधार माना जाता है। यद्यपि इस समय ‘चातुर्वर्ण्य’ का केवल नाम ही शेष रह गया है और उनका स्थान अनगिनत जातियों ने ले लिया है तो इन जातियों का निकाय मुख्यतः चारों वर्णों से ही माना जाता है।

इसमें संदेह नहीं कि जब वर्णाश्रम धर्म की स्थापना की गई तो लोक नेताओं के सामने उसका एक बहुत ऊँचा आदर्श रहा होगा। यही कारण है कि उन्होंने ब्राह्मण को पूज्य मानें, और उनके प्रत्येक आदेश को अक्षरशः शिरोधार्य करे वहाँ ब्राह्मण के लिए भी अनिवार्य रूप से यह विधान बना दिया गया कि वे सरल, आडम्बरहीन, जीवन बितावें और अपना लक्ष्य ज्ञान की प्राप्ति और कठोर तपस्या ही रखकर उस का संचालन करें।

पर दुर्भाग्यवश यह ऊँचा बहुत दिन नहीं टिक सका। जब श्रद्धा सम्मान सहज ही मिलने लगा और कठोर तपस्या की आवश्यकता न रही, तो आदर्श से भ्रष्ट होने में कितनी देर लगती है? परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे प्राचीन ऋषियों की तपोभूमियाँ तीर्थों और मठों के रूप में बदल गई और वहाँ के आचार्यों और तपस्वियों के उत्तराधिकारी महन्तों और पण्डों के रूप में प्रकट हुए। जिन लोगों के ऊपर समाज जीवन छोड़कर ऐश आराम की जिन्दगी बिताने लगे।

शास्त्रों में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि ब्राह्मण का आदर्श उच्च और महान होना चाहिये। उस आदर्श से भ्रष्ट होने पर जन्म से ब्राह्मण होने पर भी उसका ब्राह्मणत्व जाता रहता है। ‘स्कन्द पुराण’ में कहा गया है कि “राजद्वार पर वेद बेचने वाला ब्राह्मण पतित है। सदाचारहीन, सूदखोर और दुर्विनीति ब्राह्मण शूद्र है।” ‘पद्म पुराण’ में कहा गया है कि “केवल वेद पढ़ना ही ब्राह्मणत्व के आदर्श के लिये पर्याप्त नहीं है। वेद पढ़कर भी विचारपूर्वक जो उसका तत्व न समझ सके यह ब्राह्मण शूद्र-कल्प अपात्र है।”

इस प्रकार उस समय जो लोग लोक-मत का परिचालन या निर्माण करते थे, उनके हृदय में एक महान आदर्श था, और समाज को उस आदर्श पर अग्रसर करना ही उनका उद्देश्य था। इसीलिए वर्णाश्रम धर्म में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि उससे प्रत्येक मनुष्य समाज का उपयोगी अंग बनकर अपना जीवन सार्थक कर सके। जहाँ आदर्श और उद्देश्य रहते हैं वहाँ मनुष्य की विचार-बुद्धि जाग्रत रहती है। जहाँ कोई भी आदर्श और लक्ष्य नहीं वहाँ विचार किस बात का होगा? इसलिये जब उस समय के नेताओं ने देखा कि वर्णाश्रम धर्म से जो महान उद्देश्य पूरा होना चाहिए वह सफल नहीं हो रहा है तो उन्होंने उपर्युक्त प्रकार के तीव्र विचार प्रकट किये थे। आज एकमात्र धन की सत्ता ने हमारा उद्देश्य और आदर्श लुप्त कर दिया है इसलिए विभिन्न समुदायों के कर्त्तव्यों पर जोर देने का विचार भी जाता रहा। प्राचीन काल की तुलना में आजकल हमारा समाज तामसिकता से भर गया है। फिर भी कभी-कभी कुछ लोगों के मन में विचार बुद्धि जागृत हो जाया करती है। कबीर, रैदास, तुकाराम, नानक, दादू आदि मध्ययुग के महापुरुष बारम्बार इस आदर्श हीनता और अन्याय की तीव्र आलोचन करते रहे हैं, इसके पहले भी अनेक विद्वानों ने इस झूठे जात्यभिमान की निन्दा की है।

महाभारत में ही इस विषय में सैकड़ों श्लोक पाये जाते हैं, जिनमें नाममात्र की जाति के महत्व को अस्वीकार किया गया है। पर इस संबंध में सबसे स्पष्ट विवेचन ‘बज्र सूची-उपनिषद्’ में मिलता है। यह तो अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं लग सका कि इसका रचयिता कौन है, पर सन् 973 में इसका अनुवाद चीनी भाषा में हुआ था, इससे इसकी प्राचीनता का अनुमान किया जा सकता है। इस ग्रंथ में मुख्य रूप से इस संबंध में विचार किया गया है कि ब्राह्मण कौन है। इसके आरम्भ में ही यह प्रश्न किया गया है-

“तत्रचोद्यमस्ति कोवा ब्राह्मणोनाम, किं जीवः किं देहः, कि जातिः, कि ज्ञानम्, कि धार्मिक, इति।”

अर्थात् “प्रश्न यह है कि ब्राह्मण कौन है? जीव, देह, जाति, ज्ञान, धर्म, इनमें ब्राह्मण कौन है?”

“पहले विचार किया जाय कि क्या जीव ब्राह्मण है?” ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि जीव भूतकाल से भिन्न-भिन्न देहों में निवास करता आ रहा है। वह एक रूप है, एक ही जीव को कर्मवश अनेक देह मिलती हैं। इस प्रकार सब देहों के जीव एक ही रूप के हैं और उसकी ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता।”

“तो फिर क्या देह ब्राह्मण है? नहीं, क्योंकि ब्राह्मण से चाण्डाल तक सभी लोगों की पंचभौतिक देह एक ही तरह की है। सब में बुढ़ापा और मृत्यु एक तरह ही आता है। ऐसा तो कोई नियम दिखाई नहीं पड़ता कि ब्राह्मण श्वेतवर्ण का, क्षत्री रक्त वर्ण का, वैश्य पीले वर्ण का और शूद्र काले वर्ण का ही हो। देह अगर ब्राह्मण होती तो पिता की मृत देह का दाह करने पर पुत्र को ब्रह्महत्या का पाप लगता। इस विचार से देह ब्राह्मण नहीं है।”

“तो फिर क्या जाति ब्राह्मण है? नहीं। ऐसा होता तो अन्य प्राणियों में भी अनेक जातियाँ होतीं। मनुष्य जाति के सिवा भी अन्य जाति से अनेक महर्षियों का उत्पन्न होना बतलाया गया है। जैसे शृंगी ऋषि मृगी से, कौशिक ऋषि कुश से, जाम्बुक ऋषि जम्बुक (त्यार) से, व्यास जी मल्लाहिन से, वशिष्ठ जी उर्वशी (स्वर्ग की वेश्या) से, अगस्त जी घड़े से उत्पन्न हुए कहे जाते हैं। जाति के बिना भी अनेक ज्ञान सम्पन्न ऋषि हुए हैं। इससे जाति ब्राह्मण नहीं है।”

“तो फिर क्या ज्ञान ब्राह्मण है? नहीं, शास्त्रों के ज्ञाता और परमार्थदर्शी अनेक क्षत्रिय भी हैं। इसलिए ज्ञान ब्राह्मण नहीं है।”

“तो फिर ब्राह्मण कौन है? वह, जो अद्वितीय, जाति, गुण, क्रियाहीन, सत्य, अनन्त ज्ञान स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार प्रत्यक्ष भाव से करता है। यही स्मृति, श्रुति, पुराण, इतिहास का अभिप्राय है। अन्यथा और किसी प्रकार से ब्राह्मणत्व की सिद्धि नहीं हो सकती।”

इसी प्रकार ‘भविष्य पुराण’ में कहा गया है-

सामग्रय़नुष्ठनगणौः समग्रः शूद्रायतः सन्ति समाद्विजानाम्। तन्माद्विशेषो द्विज शूद्रनाम्नोनाध्यात्मिको बाह्य निमित्त को वा ॥ (41-29)

“क्योंकि सम्मान्य शूद्र और सम्मान्य ब्राह्मण ये दोनों सामग्री और अनुष्ठान में समान ही हैं, इसलिये ब्राह्मण और शूद्र में बाह्य या आध्यात्मिक कोई भेद नहीं है।”

इस प्रकार भारतीय वर्णाश्रम धर्म जहाँ जाति-भेद का उत्पादक है, वहाँ उसमें गुणों और कर्तव्यों पर भी बहुत अधिक जोर दिया गया है। यह बात दूसरी है कि संसार में हीन प्रकृति के लोगों की ही अधिकता रही है और वे प्रत्येक अच्छे से अच्छे नियम में भी अपनी स्वार्थ सिद्धि का छिद्र ढूँढ़ लेते है। यही कारण है कि अनेक लोग ब्राह्मण-वंश में उत्पन्न होने का अनुचित लाभ उठाते रहे हैं, तो भी कुछ लोग अपने कर्तव्य पालन में भी सचेत रहे हैं। इसका एक प्रमाण यही है कि जिन लोगों ने प्राचीन समय से अब तक जातिभेद और ब्राह्मणत्व की त्रुटियों के विरोध में आवाज उठाई है, वे अधिकाँश में उच्चवर्ण के ब्राह्मण ही थे।

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